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सुनहरी बांसुरी

प्रकाशन :मंगलवार, 30 अगस्त 2011
विनोद शर्मा
नई दिल्ली

चीनी लोककथा

बात पंद्रहवीं शताब्दी की है कि चीन के एक छोटे से पहाड़ी गांव में एक लड़की अपनी मां के साथ रहती थी। उसके पिता स्वर्ग सिधार चुके थे। उसका कोई अपना भाई नहीं था। उसे इस बात का दुःख भी था मगर कुछ किया नहीं जा सकता था। भाई के अभाव के साथ जीना उसने सीख लिया था। उसे लाल रंग बहुत पसंद था और वह अक्सर लाल कपड़े ही पहना करती थी इसलिए गांव वाले उसे ‘नन्हीं सिंदूरी‘ कहकर बुलाया करते थे।

एक दिन मां-बेटी खेत में हल चला रही थीं और बीज बो रही थीं कि अचानक आंधी चलने लगी। आसमान में धूल छा गई। फिर न जाने कां से एक बड़ा भयानक शैतान ड्रैगन आसमान में प्रकट हुआ। देखते ही देखते उस ड्रैगन ने झपट्टा मारा और भयानक पंजों में नन्हीं सिंदूरी को दबोचे हुए, पश्चिम दिशा की ओर उड़ चला। सिंदूरी की मां कुछ दूर तक भागी मगर फिर ठोकर खाकर गिर पड़ी। सहसा उसने सुना कि सिंदूरी चीख चीख कर कह रही थी- ‘मां याद रखना, छोटा भइया आएगा। मुझे छुड़ा ले जाएगा।‘

मां बेचारी मन मसोस कर रह गई। बड़ी देर तक आसमान में आंखें गड़ाए रही फिर आंखें मूंद कर परमात्मा से अपनी बच्ची की सुरक्षा के लिए प्रार्थना करके, आंसू पोंछ कर, घर की ओर चल पड़ी। रास्ते भर वह सोचती रही कि सिंदूरी उसकी इकलौती संतान थी। फिर, उसका छोटा भइया कहां से आएगा? निराशा से बोझिल उसके हृदय में एक टीस सी उठी। उसने ठंडी आह भरी। अचानक उसे ठोकर लगी। गिरते हुए, उसके सफेद बालों में, रास्ते के किनारे लगे, लाल सरस फल के एक पेड़ की टहनियां उलझ गई। उसने टहनियों को अपने बालों से अलग किया। तभी उसकी नजर एक टहनी पर लगे एक लाल चमकदार सरस फल पर पड़ी। उसने उसे तोड़ लिया और अपने मुंह में डाल लिया। घर पहुंच कर वह आराम करने के इरादे से बिस्तर पर लेट गई। लेटे-लेटे भी वह अपनी लड़की और उसे ड्रैगन से मुक्ति दिलाने वाले उसके छोटे भइया के बारे में सोच रही थी। थोड़ी ही देर बाद उसने एक लड़के को जन्म दिया। बच्चे का चेहरा गुलाबी था। वह समझ गई कि उसने जो सरस फल खाया था वह एक दिव्य फल था, कोई साधारण फल नहीं। उसने उसका नाम रख सरस कुमार। सरस एक विलक्षण शिशु था। उसके बढ़ने और बड़े होने की गति ने तो उसकी मां को ही क्या, सारे गांव को आश्चर्यचकित कर दिया, कुछ ही दिनों में वह पंद्रह साल के किशोर की तरह दिखने लगा। उसकी मां की इच्छा हुई कि उससे अपनी बड़ी बहन को ड्रैगन से बचाने की कोशिश की बात की जाए मगर ड्रैगन के भय और सरस की कम आयु को ध्यान में रखते हुए उसने चुप रहना ही बेहतर समझा। अपनी असहायता पर वह रात के अंधेरे में आंसू बहाकर अपने दिल को बोझ हल्का कर लेती थी।

एक दिन एक कौआ आया और सरस के घर की मुंडेर पर बैठ कर कांव-कांव करने लगा। दोनों मां बेटा उसकी कर्कश आवाज सुनकर बाहर आये। उन्हें देखकर कौआ मनुष्य की आवाज में बोल उठा,

‘ड्रैगन की गुफा में बेचारी बड़ी बहन बेचारी।
रोती है दिन भर, मुसीबत की मारी।।‘
चट्टान तोड़ते हाथों का रुखापन
पीठ पर चाबुक के निशान
कहते हैं उसकी व्यथा-कथा सारी।

यह सुनकर सरस ने अपनी मां से पूछा कि क्या उसकी कोई बड़ी बहन थी? उसकी मां की आंखों से आंसू बहने लगे। रोते-रोते उसने बताया,- हां, तुम्हारी एक बड़ी बहन भी है। उसका नाम है सिंदूरी, क्योंकि वह लाल कपड़ी पहनना पसंद करती है। एक ड्रैगन उसे हमसे छीन कर कहीं दूर ले गया है। न जाने कहां, भगवान जाने कौन मेरी बेटी को उस दरिन्दे से मुक्ति दिलायेगा।‘ मैं उस शैतान को जान से मान डालंूगा, ‘सरस कुमार ने प्रतिज्ञा करते हुए कहा- ‘अपनी बहन को उसकी कैद से छुड़ाऊंगा और लोगांे को उसके आतंक से छुटकारा दिलाऊंगा। यह कहकर उसने एक छड़ी उठाई और ड्रैगन से युद्ध करने के लिए घर से निकल पड़ा। उसकी मां उसे जाते हुए देखती रही और जब वह आंखों से ओझल हो गया तो आसपास की ओर देखकर उसने प्रार्थना की- ‘हे ईश्वर तू ही मेरे बच्चों का रक्षक है। उन पर कृपा बनाये रखना।‘ सरस कुमार ने गांव के मुखिया से मुलाकात की और पूछा कि ड्रैगन कहां रहता है? मुखिया ने उसे बताया, वो जहां पहाड़ दिखाई दे रहे हैं, वहां जाने पर तुम्हें एक पहाड़ी रास्ता दिखाई देगा, जिसके दूसरे छोर पर ड्रैगन की गुफा है। ढलान पर बने उस घुमावदार पहाड़ी रास्ते पर लगातार, सात रातें और सात दिन चलकर, तुम ड्रैगन की गुफा तक पहुंच जाओगे। सरस कुमार ने मुखिया का धन्यवाद किया और चल पड़ा अपनी मंजिल की ओर।

अपनी अनोखी शक्तियों के बल पर उसने रात भर में आधा रास्ता तय कर दिया। वहां पहुंच कर उसे रुकना पड़ा क्योंकि वहां पर सड़क पर बीचों-बीच एक बहुत बड़ा पत्थर पड़ा था। वह बहुत चिकना था, इसलिए उस पर चढ़कर उस पार नहीं जाया जा सकता था। फिर भी सरस कुमार ने उसे लांघने के लिए कदम उठाया मगर असफल रहा। उसने पत्थर के ऊपर चढ़कर उसे पार करने की कोशिश भी की मगर पत्थर की सतह की चिकनाई के कारण उसकी यह कोशिश भी सफल नहीं हुई। वह समझ चुका था कि आगे बढ़ने के लिए उस पत्थर को रास्ते से हटना जरूरी था। उसने अपनी छड़ी पत्थर के नीचे अड़ाई और जोर लगाया मगर पत्थर अपनी जगह से टस से मस नहीं हुआ। हां, उसकी छड़ी में दरार जरूर पड़ गई। झुंझलाकर उसने छड़ी को एक तरफ रख दिया और दोनों हाथों को पत्थर के नीचे अड़ाया और ऊपर की ओर उछाल कर उसे नीचे की ओर लुढ़का दिया।

पत्थर लुढ़कता हुआ पत्थरों से टकराता हुआ दसों दिशाओं को गुंजाता हुआ घाटी में जा गिरा। पत्थर जिस जगह पर पड़ा था वहां एक उथला गड्ढ़ा बना हुआ था। पत्थर वहां से हटा तो सरस कुमार को उस गड्ढ़े में एक सुनहरी बांसुरी पड़ी दिखाई दी। उसने उस बांसुरी को उठाया और बजाना शुरू कर दिया। वह यह देखकर हैरान हो गया कि बांसुरी का स्वर सुनते ही, वहां आसपास के वीरान इलाकों के कीड़े, मेंढक, छिपकलियां, बकरियां आदि जानवर और आदमी, औरतें और बच्चे नाचने लगे। शुरू-शुरू में बांसुरी की धुन मद्धम थी तो नाचने वाले प्राणी भी धीमे-धीमे नाच रहे थे। जैसे-जैसे धुन तेज होती गई, उनका नाच भी तेज होता गया और जैसे ही बांसुरी बजनी बंद हुई, उनका नाच भी थम गया। सरस कुमार की आंखें खुशी से चमक उठी क्योंकि वह उस जुदाई बांसुरी का रहस्य समझ गया था। उसे अपने सौभाग्य पर गर्व हुआ क्योंकि उस जादुई बांसुरी के बल पर वह ड्रैगन को आसानी से हरा सकता था। उसका आत्मविश्वास दुगना हो गया और वह ड्रैगन की गुफा की ओर बढ़ चला। वहां पहुंच कर उसने ड्रैगन को युद्ध के लिए ललकारा। थोड़ी देर बाद गुफा का दरवाज खुला और ड्रैगन बाहर आया। उसके साथ ही उसकी बहन भी बाहर आई- लाल पोशाक पहने हुए, आंसू बहाती हुई, जंजीरों और बेड़ियों में जकड़ी हुई। सरस कुमार के देखते देखते ड्रैगन ने अपनी पूंछ से सिंदूरी की पीठ पर वार किया और कहा,

‘ओ सुंदरी मत कर इनकार
हो जा मुझसे विवाह के लिए तैयार।‘
वर्ना खोदनी होगी तुझे एक सुरंग और सहनी होगी कोड़ों की मार।

सरस कुमार का खून खौल उठा। वह समझ गया था कि वह लड़की उसकी बहन थी। यह बात ड्रैगन को भी मालूम थी। इसलिए वह उसकी बहन पर उसकी आंखों के सामने इतने जुल्म ढा रहा था ताकि अपनी बहन को बचाने के लिए उसका दुश्मन आत्मसमर्पण कर दे। सरस कुमार ने चिल्ला कर कहा,

‘ओ ड्रैगन मक्कार, मेरी बहन पर तू इतने जुल्म ढहा रहा है। यह जान ले कि अपने तू घोर मुसीबत बुला रहा है। यह कह कर उसने अपनी जादूई बांसुरी बजानी शुरू कर दी। जैसे ही बांसुरी की धुन ड्रैगन के कानों से टकराई वह भूल गया कि वह युद्ध करने के लिए अपने शत्रु के सामने खड़ा था। पलक झपकते ही वह नाचने लगा। सिंदूरी, हथकड़ियों और बेड़ियों के कारण नाच नहीं सकी। वह समझ गई थी कि उसका छोटा भय्या उसे छुड़ाने के लिए वहां आ पहुंचा था। उसका छोटा भाई बांसुरी बजाता रहा और ड्रैगन विवश होकर नाचता रहा। धुन तेज होती तो नाच की रफ्तार भी तेज हो जाती और धुन मद्धम हो जाती तो नाच की रफ्तार भी कम हो जताी। यह देखकर सिंदूरी की खुशी की ठिकाना न रहा। वह अपने भाई के पास गई और उससे कुछ कहा। सरस कुमार ने कोई जवाब नहीं दिया और बांसुरी बजाता रहा। ड्रैगन नाचते-नाचते थक चुका था। धीरे-धीरे उसकी आंखें लाल हो गईं और आग की तरह चमकने लगी। थोड़ी देर बाद वह हाफने लगा और उसकी सांस उखड़ने लगी। वह गिड़गिड़ाया,

‘छोटे भय्या मत बांसुरी बजाओ
मुझे अब और न राताओ
अपनी बहन को यहां से ले जाओ
मुझे माफ करो, मेरे प्राण बचाओ।‘

सरस कुमार ने उसकी विनती ठुकरा दी और बांसुरी बजानी बंद नहीं की। फिर उसने ड्रैगन को एक हाथ से अपने पीछे आने का इशारा किया और एक विशाल जोहड़ की ओर चलने लगा। पीछे-पीछे आने लगा ड्रैगन, नाचता हुआ, अपने अंगों को मरोड़ता हुआ, फिरकी की तरह घूमता हुआ तथा कुंडलियां बनाता और खोलता हुआ चलता गया। सरस के इशारे पर छपाक की आवाज के साथ ड्रैगन जोहड़ में घुस गया मगर उसका नाचना बंद नहीं हुआ क्योंकि बांसुरी बजनी बंद नहीं हुई थी। वह फिर गिड़गिड़ाया,

‘हे महावीर! स्वीकार करो मेरा नम्र प्रणाम
कर देगी ये बांसुरी मेरा काम तमाम
अब न कभी करूंगा कोई बुरा काम
इस जोहड़ में रहूंगा लेकर प्रभु का नाम

ड्रैगन ने अपने सिर हिलाया और फिर बांसुरी चुप हो गई। ड्रैगन ने जोहड़ मंे पानी में डुबकी लगाकर अपने शरीर को छुपा लिया। सरस कुमार के होठों पर एक मुस्कुराहट कौंधी और अपनी बहन का हाथ थाम कर अपने घर की ओर चल पड़ा। वे कुछ ही दूर गए होंगे कि छपाक की आवाज ने उन्हें चैंका दिया। उन्होंने पीछे मुड़कर देखा तो स्तब्ध रह गए। ड्रैगन जोहड़ से बाहर निकलने की कोशिश कर रहा था। सिंदूरी बोल उठी,

कुंआ खोदो, गहरा खोदो
खर-पतवार को, जड़ से उखाड़ो
दुष्ट कभी दुष्टता न छोड़े
ड्रैगन को जीवित मत छोड़ो

दोनों दौड़ कर फिर जोहड़ के किनारे पर पहुंचे और फिर सरस कुमार ने बांसुरी की तान छेड़ दी। ड्रैगन फिर से नाचने लगा। सात दिन और सात रातें बीत गई मगर सरस कुमार ने बांसुरी अपने होठों से अलग नहीं की। आखिरकार नाचते-नाचते ड्रैगन ने दम तोड़ दिया। उसकी लाश पानी में तैरने लगी। दोनों भाई-बहन बहुत खुश हुए और ड्रैगन की लाश लेकर घर की ओर चल पड़े। उनकी मां ने जब उन्हें देखा तो मारे खुशी के रोने लगी। सरस कुमार ने ड्रैगन की खाल और उसकी हड्डियों को अपने घर के निर्माण के लिए इस्तेमाल किया और उसके सींग से हल का फाल बनाया और अपनी मां और बहन के साथ खुशी से रहने लगा।

  विनोद शर्मा
नई दिल्ली

 
         
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