सुमात्रा, इंडोनेशिया की लोक कथा
मध्य सुमात्रा में, नदी किनारे के एक गाँव में रहता था लेबाई।
जीवनयापन के लिए वह लोगों को कुरान पढाता था। चूंकि वह धर्म गुरु था इसलिए न सिर्फ अपने गाँव में बल्कि आसपास के गांवों में भी उसका बड़ा मान था।
लेबाई के गाँव के दोनों ओर दो घनी आबादी वाले गाँव थे, एक धारा की दिशा में और एक धारा की विपरीत दिशा में। ये एक इत्तिफाक की बात थी कि एक ही दिन, एक ही समय इन दोनों पडोसी गांवों के दो धनिकों ने एक बार भोज का आयोजन रक्खा।लेबाई बहुत खुश था क्योंकि वह दोनों जगह निमंत्रित था। भोज वाले दिन लेबाई ने अपने सबसे अच्छे कपडे पहने और अपनी नाव लेकर निकल पड़ा।वह तय नहीं कर पा रहा था कि पहले कहाँ जाये?
उन दिनों ये प्रथा थी कि ऐसे भोजों के लिए काटी गई भैंसों के सर सम्मानित व्यक्तियों को उपहार के तौर पर दिए जाते थे। जाहिर था कि सर लेबाई को ही मिलेंगे। भोज के लिए जाते समय लेबाई ने राह चलते लोगों से सुना कि धार की दिशा वाले गाँव के धनिक के यहाँ दो भैसें काटी गई हैं और विपरीत दिशा वाले धनिक के यहाँ एक।
लेबाई ये भी जानता था कि जहाँ केवल एक ही भैस कटी है, वहां खाना बड़ा स्वादिष्ट बनता है और जहाँ दो कटी हैं, वहां का खाना सामान्य स्टार का होता है, क्योंकि वह पहले भी कई बार दोनों जगह जा चुका था।
लेबाई के लिए यह तय कर पाना कठिन हो रहा था कि वह स्वादिष्ट खाने के चक्कर में भैंस के केवल एक सर कि भेंट से संतुष्ट हो जाए या दो सिरों के चक्कर में सामान्य सा खाना खा कर तृप्ति महसूस करे। तय तो कुछ ना कुछ करना ही था सो वह पहले 'एक सर' वाले गाँव की ओर नाव खे उठा। जब वह गाँव के नजदीक पहुंचा तो उसने देखा कि किनारे पर नावें ही नावें रुकी हुई हैं। झुण्ड के झुण्ड लोग हँसते-बतियाते आ-जा रहे हैं।
उसने सोचा यहाँ तो अभी बड़ी भीड़ है, पता नहीं कोई मेरी ओर ध्यान देगा भी या नहीं और फिर बाद में भैंस का सर भी एक ही मिलेगा तो क्यों न मै पहले धार कि दिशा वाले गाँव के भोज को निपटा दूं? वहां कम खाऊंगा, लौटकर यहाँ मन भर कर खा लूँगा, दो सर भी वहां से मिल जायेंगे। उसने तुरंत नाव मोड़ ली। गाँव अभी कुछ दूर था कि उसे भोज से लौटती हुई कुछ नावें मिलीं। उसने ऊंची आवाज़ में पूछा,' क्यों भाई, कैसा आयोजन है?'
'अरे! क्या पूछते हो लेबाई? निरी हड्डियाँ और खाल रख दी है खाने में,' किसी ने उत्तर दिया। लेबाई ने तुरंत नाव धार के विपरीत दिशा वाले गाँव की ओर मोड़ दी। केवल दो सिरों के फेरे में बेमज़ा खाना खाने क्यों जाऊं? बाद में जाऊँगा। उसने मन ही मन सोचा।
इस बार जब लेबाई गाँव के निकट पहुंचा तो उसने देखा एक-एक कर नावें लौट रही हैं। "आप लोग बड़ी जल्दी लौट रहे हैं?' नाव बांधते हुए लेबाई ने पूछा। 'आयोजन तो समाप्त हो चुका है, भोज के बाद की प्रार्थना भी निपट गई,' किसी ने उत्तर दिया।
ओह! ये क्या हुआ? स्वादिष्ट भोजन भी गया और भैंस का सर भी। लेबाई ने झटपट नाव खोली और दूसरे गाँव की ओर खे उठा। वह थक गया था और पसीना-पसीना हो रहा था।
वह चाहता था की जितनी जल्दी हो सके 'दो सर' वाले गाँव पहुँच जाये और जैसा भी है खाना खा सके क्योंकि अब तो उसे जोरों की भूख लग रही थी और जोर की भूख में तो किवाड़ भी पापड होते हैं। नाव वह तट पर लगाने ही वाला था कि उधर से लौटकर अपनी नाव खोलते एक व्यक्ति की नज़र उस पर पड़ी,' अरे! लेबाई, बड़ी देर कर दी। आयोजन तो समाप्त हो गया। भोज के बाद की प्रार्थना भी हो चुकी। अब तो वहां कुछ भी नहीं बचा।'
लेबाई का तो चेहरा उतर गया। भोजन भी नहीं मिला, भैंस के सर भी नहीं। सारे दिन इधर से उधर नाव खेता रहा भूखे पेट सो अलग, जबकि भोज के दो-दो निमंत्रण थे। कोई चारा नहीं रह गया था सिवाय इसके कि वह अपने गाँव वापस लौट जाये। वापसी में नाव खेते हुए उसने साथ आ रही नाव वालों से पूछा,' वैसे यहाँ खाना तो कुछ ख़ास अच्छा नहीं था ना?'
'हाँ भोजन तो बहुत अच्छा नहीं था पर उन्होंने हर अतिथि को कुछ धन और उपहार दिए हैं।' उनमे से किसी ने उत्तर दिया। लेबाई के लिए तो ये सूचना जले पर नमक छिड़कने वाली सूचना थी। नाव किनारे लगा कर, थके-थके कदमो से वह घर लौटा जहाँ केले के पत्ते में लिपटे रात के पके ठंडे, बासी चावल उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। भोज के दो-दो निमंत्रनो के बावजूद लेबे को हासिल हो रहे थे सूखे, ठंडे, बासी चावल। निर्णय ना ले पाने की अक्षमता का नतीजा था यह। जब यही ठंडे, बासी चावल खाने हैं तो क्यों ना ज़रा-सा सब्र करूं और इनके साथ खाने के लिए नदी पर जाकर मछली पकड़ लाऊं? लेबाई ने मन में सोचा। चावलों की पोटली और अपने प्यारे कुत्ते को साथ ले कर वह फिर नदी पर जा पहुंचा।
एक अच्छा स्थान देखकर उसने काँटा डाल दिया। बड़ी देर प्रतीक्षा की लेकिन मछली नहीं फंसी। भूख से आंतें कुलबुलाने लगी थीं। उसने कांटे को समेटा और केले के पत्ते को खोल कर चावल खाने बैठ गया। पहला कौर लेने ही वाला था कि नाव के बिलकुल पास एक अच्छी मछली तैरती नज़र आई। लेबाई ने सोचा कि इसे तो यूं ही पकड़ लूँगा। उसने झट से पानी में छलांग लगा दी। मगर ये इतना आसान नहीं था।
लेबाई ने कोशिश तो बहुत की लेकिन वो मछली हाथ नहीं आई। निराश हो कर वह वापस नाव पर लौटा। लगता है सूखे चावल ही नसीब में हैं, उसने सोचा। मगर ये क्या? वहां तो केवल केले का पत्ता पड़ा था। लेबाई का कुत्ता इतनी देर में सारे चावल चट कर चुका था।
गाँव वालों को जब यह सब पता चला तो उनके लिए हंसी- उड़ने को ये एक बिषय हो गया। उस दिन से लोगों ने उसका नाम ही रख दिया, लेबाई मालांग। मालांग यानि बेचारा। जिस दिन सभी लोगो ने अच्छे- अच्छे व्यंजनों का आनंद लिया उस दिन लेबाई मालांग को भूखा ही रहना पड़ा। इसी को कहते हैं मोती के चक्कर में घोंघा भी हाथ से गया।


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