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धमकी की भाषा

प्रकाशन :गुरूवार, 2 फरवरी 2012
संदीप कुमार मील

ब कभी बचपन में मां मिट्टी खाने को लेकर डांटती थी तो गुस्सा आता था। लेकिन अब जिस तरह जीवन में धमकियों की अलग-अलग भाषाओं से परिचय होता है तो मां की उन ‘धमकियों’ की याद आती है। पुलिस वाले की आंखें ही धमकी के लिए पर्याप्त होती हैं। दोनों ही तरह की धमकियों में भाषा से ज्यादा प्रभावकारी भाव हैं। यही कारण है कि मां की डांट के बाद भी धड़ल्ले से मिट्टी खाई जाती, पर पुलिस वाले की आंखों से ही अजीब-सा डर बैठ जाता है। न जाने धमकी की ऐसी कितनी भाषाओं से हमारा रोज परिचय होता है, जिनके भावों से ही दिल दहल जाता है।

हर किसी की धमकी की अलग भाषा और भाव होते हैं। प्रेमी-प्रेमिकाएं जिस अंदाज में एक-दूसरे को धमकी देते हैं, उस तरह दक्षिणा न मिलने पर ढोंगी बाबा नहीं दे सकता। असल में धमकी की भी अपनी एक सत्ता है और सत्ता का चरित्र है प्रभाव। इसी वजह से सत्ता हमेशा ज्यादा प्रभावशाली होती है, जो भाषा से तो धमकी होती है, पर भाव से आदेश। सत्ता की धमकी और आदेश का अंतर इतना सूक्ष्म है कि हम जैसे लोग हर धमकी को आदेश मान लेते हैं। मां की धमकियों को कितनी ही बार नजरअंदाज कर देता हूं, पर सत्ता की धमकियों को इसी तरह नहीं देख पाता।

हम सुबह से शाम तक महाविनाश से लेकर प्रलय तक की हजारों धमकियां सुनते हैं। जिस प्रकार धर्म, समाज, राजनीति और अर्थ की सत्ताएं होती हैं, उसी प्रकार इनकी अलग-अलग भाषाओं की धमकियां भी। कभी-कभी लगता है कि हम धमकियों की सत्ता के अधीन हैं, बिल्कुल धमकियों की दुनिया में रहने की तरह। हम आसानी से इनकी अवज्ञा भी कर सकते हैं। इससे सत्ताओं को कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता है। जो छोटा-मोटा दंड होगा, वह भुगतना ही पड़ेगा। लेकिन जब धमकी का जवाब धमकी से दिया जाता है, तब सत्ताएं हिल उठती हैं। विद्रोह की एक छोटी-सी धमकी भी बड़े-बड़े सिंहासनों की नींव हिला सकती है।

जयपुर के सिंधी कैंप बस अड्डे पर एक दोस्त के साथ राजनीतिक बहस चल रही थी। पास में खड़ा एक नौजवान बोला- ‘ऐसी बातें करोगे तो सरकार नक्सली समझ लेगी।’ हम अवाक रह गए थे। इस धीमी-सी धमकीमन में अजीब-सा डर बैठा दिया था। बार-बार मां का कहना याद आ रहा था कि बेटा समझदार हो जाओ। उनका ‘समझदार’ होने का मतलब जिम्मेदार हो जाने से होता है, लेकिन मां की इस धमकी में नसीहत ज्यादा होती है। इसलिए उसे नजरअंदाज कर दिया जाता है। अगर वह आज से ही जेब खर्च देने से मना कर दे तो उसी पल समझदार हो जाऊंगा।

मां की धमकी को तवज्जो न देने के पीछे एक कारण यह भी है कि मैं उनकी सत्ता को स्वीकार नहीं करता हूं, जबकि सत्ता पक्ष की धमकी को मानने का कारण उसकी अधीनता स्वीकार करने की वजह से है। इसलिए आतंक बनाए रखने के लिए सत्ताएं धमकियों का पालन न करने वालों को सजा देती हैं। कभी भी देखा जा सकता है कि एक विशेष स्तर पर जाकर ही समाज धमकियों को स्वीकारता है। जब तक स्वतंत्रता होती है, तब तक धमकियों का पुरजोर जवाब दिया जाता है, लेकिन इसके हनन के बाद जवाब मुश्किल है। यह मनुष्य और सत्ता के बीच ही नहीं, बल्कि दो सत्ताओं के बीच भी अपना प्रभाव रखती है। विभिन्न देशों की आपसी तकरार को इसी रूप में देखा जा सकता है। यह देशों की कूटनीतिक चाल के रूप में राजनयिकों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला हथियार है।

नवउदारवादी दौर में इसके भावों के बजाय भाषा में बड़ा परिवर्तन हुआ है। भाव तो एक ही है कि बाजार का भला हो, पर भाव ऐसे दिखाए जाते हैं कि वैसा करना धमकी मानने वाले के ही हित में हो। इसलिए यह मीठी लगती है और लोग इसे आसानी से स्वीकार भी कर लेते हैं। बाजार में विभिन्न प्रकार की वस्तुओं के प्रचार के लिए दिखाए जाने वाले विज्ञापन भी धमकी के भाव में ही होते हैं। यहां हर ताकतवर अपने से कमजोर को आदेश देता है तो बराबर वाले को धमकी। मगर तथाकथित सभ्य समाज इसे चिकने-चुपड़े अंदाज में इस तरह पेश करता है कि आसानी से सभी के गले उतर जाए।

अगर इनका सटीक जवाब नहीं दिया जाता है तो एक ऐसा शून्य बन जाता है, जहां परिवर्तन की कोई गुंजाइश नहीं होती। शायद दुनिया के महत्त्वपूर्ण बदलावों में धमकियों के जवाबों ने प्रमुख भूमिका निभाई है। सामंतवाद से लोकतंत्र तक के सफर में इनका स्वरूप लगातार बदलता जा रहा है। उस युवक की एक छोटी-सी टिप्पणी की वजह से मैं धमकी के इतने भावों और भाषाओं को समझ सका।

  संदीप कुमार मील

 
         
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