एक भोजपुरी गुजरिया,
जो पान की तरह पतली और फूल की तरह सुंदर है, जिसके लंबे और चिकने केश पृथ्वी पर लोटते रहते हैं, अपनी चोली सिलवाने दरजी के पास जाती है। दरजी की बखरी उसके पिछवाड़े ही है। वहाँ जाकर दरजी से कहती है—‘हे दरजिया, एक सुंदर सी चोली सिल दो।’
‘मोर पिछुवरवा दरजिया के बखरी,
निक-निक चलिया सिआवहु जी
असकर सुइया चलावहु रे दरजिया,
चारि चिरइया दुई मोर जी।’
अर्थात् वह कहती है—अरे दरजिया, ऐसी सुई चलाओ कि मेरी चोली में चार चिडि़या और दो मोर बन जाएँ।
दरजी पूछता है—कहवां बनावो गुजरि, चारी चिरइया, दुई मोरजी। अर्थात् हे गूजरी, किस जगह चार चिडि़या और दो मोर बना दूँ?
गुजरिया बोली—‘अँगिया बनावहु चरि चिरइया, अँचरे बनावहु दुई मोर जी। उठत बोले जेमे चारि चिरैया, बइठत कुहके दुई मोर जी।’ अर्थात् हे दरजिया, अँगिया में चार चिडि़याँ और आँचल में दो मोर ऐसे बनाओ कि मैं उठूँ तो चिडि़याँ बोलने लगें और बैठूँ तो दोनों मोर कुहकने लगें।
मन का भोलापन भी कितना कल्पनाशील होता है। कभी-कभी मुझे लगता है कि हमारे भीतर एक तरह का बचपना न हो तो मन की आँखों में उभरनेवाली कल्पनाएँ उन अल्पनाओं को नहीं रच सकतीं, जो ‘शून्य भीति पर चित्र रंग नहीं तन बिना लिखा चितेरे’ की तरह परमेश्वर की ही पवित्र रचना हो सकने का सामर्थ्य रखती हो। बचपन अपने भोलेपन से भरी आँखों के द्वारा जो देख लेता है, वह इतना अनूठा होता है और इतना अलौलिक भी कि वह हमें लोकांतरों की यात्रा का सुख दे जाता है। उस दृष्टि का औघ और उसके द्वारा देखा गया निरूपम व अनुपमेय दृश्य खंड अपनी अगराई में, अपनी पारमिता में और अपनी अनघता में इतना ललाम और इतना ललित हो सकता है, जिसे अनुभूत तो किया जा सकता है, परंतु शब्दबंधों में अभिव्यक्त करना बहुत कठिन है। भोली गुजरिया की आँखों में निकाई है। उसका सारल्य ही उसकी सुंदरता है। दुनिया की दृष्टि में वह अपरिपक्व और अनाड़ी है, अयानी है, अप्रौढ़ है; परंतु भीतर से देखो तो वह केवलात्मा है, विमलात्मा, सुमनस्क। उसकी अज्ञता और नासमझी पर हँसा तो जा सकता है, पर उसके आंतरिक उल्लास को किसी प्रामाणिकता का प्रमाण-पत्र नहीं चाहिए। उसकी आस खरी है। उसे अपने आप पर इत्मीनान है, एतबार है; उसे अपनी प्रतीति और अपने प्रत्यय से जो तसल्ली मिलती है, उसे आप भले ही बुद्धूपन समझें, परंतु इस सहज विश्वासशीलता आस और अकीदा के बगैर जो संवेदनहीनता पैदा होती है, वह उसमें बिलकुल नहीं है। उसका पतियाना और बतियाना इतना विश्वसनीय है कि वह सब होने लगता है जो उसे लगता है कि होता है। वह अंतर्लीनता और भावमग्नता उसे रागान्वित रखती है। वह दशा सयानों के लिए दुर्लभ है। सयाना जिसे सोच-समझकर और उलट-पुलटकर जोखता है, उसे खो देता है और उन्हीं मन के मोतियों को यह अज्ञानी और भोली गुजरिया अपने सहज विश्वास से पा जाया करती है। सच है, ‘विश्वासं फलदायकम्।’ वह अपनी अँगिया पर चिरैया बनवाती है। आँचल पर मोर का चित्र कढ़वाती है और अपने उल्लास से भरी जब वह चलती है तो उसके साथ सबकुछ चलता है, वह उठती है तो अँगिया की चिरैया बोलने लगती है और उसके चलते ही कुहुकने लगते हैं मोर। यह मोरनी की चाल है, जो हवाओं में इठलाती है। यह उसके भीतर का उल्लास है, जो उसके उठते ही दिशाओं में डोलने लगता है, चिरैया की तरह बोलने लगता है।
इस सरलता के सौंदर्य को उपजाने के लिए हृदय की विश्वासी उर्वर भूमि चाहिए। गुजरिया बहुत भोली थी। उसका ब्याह हुआ किंतु बालक का मुख देखने को तरसती रही। उसके भीतर वात्सल्य उछालें मारता था। उसे बाँझ होने के ताने भी सुनने पड़े। उसका आहत मन क्या करता? क्या उपाय था उसके पास। अपनी दासी के बालक को वह गोद में खिलाना चाहती थी, परंतु उसे बाँझ जानकर दासी ने उसे अपना बालक नहीं दिया। बेचारी गुजरिया अपने घर के पिछवाड़े रहनेवाले बढ़ई को बुलाकर कहती है—हे बढ़ई भैया, मुझे काठ का एक बालक गढ़ दो। काठ के होरिलवा से ही जियरा जुड़ाऊँगी।
‘मोर पिछुअरवा बढ़इया भइया।
वे भे चलि आवहुरे, ए बढ़या!
काठे के होरिलवा गढि़ देहू,
त जिअरा जुड़ाईब हो।’
बढ़ई जब काठ का होरिलवा (बालक) गढ़ता है तो लोकगीतकार ने रचनाकर्म की कलात्मकता का ऐसा अनूठा आदर्श प्रस्तुत किया है, जो महान् कलाओं के जन्म का रहस्य ही उद्घाटित कर देता है,
‘पीठिया उरेहले, त पेटवा, त हाथ गोड़ सिरिजे ले रे,
ए ललना, मुँहवाँ उहेहइत बढ़या रोवे,
परनवाँ कैसे डालबि हो।’
बढ़ई ने बालक की पीठ बनाई। फिर पैर, हाथ और गोड़ रचे, पर जब बालक का मुँह बनाया तब बढ़ई रोन लगा। कहने लगा—हाय! मैं इस बालक मैं प्राण कैसे डालूँ?
बढ़ई की यह पीड़ा प्रत्येक कला-सर्जक की पीड़ा है। वह अपनी रचना को जीवंत रूप देना चाहता है। महान् कथाओं और गाथाओं के कितने ही पात्र हैं, जो काल्पनिक हैं, परंतु वे इतने जीवंत लगते हैं कि उनके सामने सचमुच जीवित लोग भी कम जीवित लगते हैं। महान् चित्रकारों और शिल्पियों की सर्जना भी कितनी जीवंत होती है। पत्थर की मूर्तियाँ बोलती हैं, हँसती हैं, आशीर्वाद देती हैं, यदि विश्वास न हो तो तुलसी बाबा से गवाही लीजिए। पुष्पवाटिका में सीता की प्रेमपूर्ण भाव विह्वलता को देखकर माँ गौरी की प्रतिमा को भी हँसी आ गई थी कि नहीं? ‘प्रेम मगन वश भई भवानी/खसी माल मूरति मुसकानी’ अपनी रचना में प्राण डालने के लिए वह बढ़ई रोता है। नहीं डाल पाने पर भी वह अपनी विवशता को अपने आँसुओं से उजागर करता है। यदि सर्जक की रचना जीवंत नहीं तो वह किस काम की? बढ़ई के काठ के होरिलवा में प्राण डाल नहीं पाने की विवशता पर रोना, इस बात का प्रमाण है कि उस रचनाकार को अपनी रचनाधर्म की कसौटी का पता है। उसे अपनी कमी का पता है। यह पता लगना अनिवार्य है, जिसे अपनी कमी का पता होता है वह एक दिन उस कमी को दूर भी कर लेगा, पर जिसे अपनी कमी का पता ही नहीं चलता, उसके लिए पूर्णता की सिद्धि असंभव है। इस पूर्णता की सिद्धि ही उसकी रचना को प्राणवंत बनाती है। यही जीवंतता तो कला की सिद्धि है। कला मर्मज्ञ श्री अशोक मित्र ने अपनी कृति ‘पश्चिमी यूरोप की चित्रकला’ में चित्रकला की जीवंतता के कई उदाहरण दिए हैं। प्राचीन यूनान में एक चित्रकार था ‘जिऊक्लिसस’! उसका जन्म ईसा पूर्व चार सदी पहले हुआ था। कहते हैं, उसने एक चित्र बनाया था, जिसमें हाथों में अंगूर का गुच्छा लिये हुए एक लड़के को जाते हुए बताया गया था। यह चित्र इतना जीवंत था कि उसे सचमुच का मानकर उन अंगूरों पर चिडि़या चोच मारती थी।
इस चित्र को एक प्रतियोगिता में भेजा गया था। उसके मुकाबले एक और चित्रकार था। उसका नाम था ‘पारसिअस’। मुकाबला बड़ा तगड़ा था, पर लोगों का अनुमान था कि आखिर जीत जिऊक्लिसस की ही होगी। कारण साफ था। चित्र में उसने अंगूरों का गुच्छा इतना सजीव बनाया था कि चिडि़या उन्हें खाने के लिए चोंच मारती थी। पारसिअस भी अपना चित्र लाया। चित्र के ऊपर एक परदा टँगा था। जिऊक्लिसस ने अपना चित्र दिखाया। उसके बाद उसने पारसिअस से कहा, ‘अब चित्र के ऊपर से परदा हटा लो। सब लोग तुम्हारा चित्र भी देखें।’ पारसिअस ने कहा, ‘परदा ही तो मैंने चित्र में बनाया है। इसके पीछे तो और कोई छवि नहीं है। तुम इतने बुद्धिमान हो, तुम्हारी नजर इतनी पैनी है और तुम्हीं ने ऐसी भूल की? फिर तो मैं ही जीता। तुमने चिडि़यों को बेवकूफ बनाया है और मैंने तुम्हें। इसके अलावा यह भी तो सोचो कि चित्र में तुमने जो लड़का बनाया है, वह सचमुच में सजीव नहीं बन पड़ा है। अगर वह सचमुच में सजीव लगता तो क्या चिडि़या उसके हाथों से अंगूर ले जाने का साहस कर पाती?’ खैर! यह तो महान् कलाकारों की बातें हैं, परंतु हमारे लोकगीत का संकेत भी कुछ कम महत्त्व का नहीं है। हमारी भोजपुरी गुजरिया के लिए जब बढ़ई काठ का बालक गढ़ता है तो उसमें प्राण नहीं डाल पाने की अपनी विवशता पर उसका हृदय रोता है। यह रोना कलाकार की आत्मा की वेदना है, क्योंकि कोई भी कलाकृति कितनी ही जीवंत लगे, परंतु उसमें सचमुच प्राण नहीं होते। यह सत्य है। इसीलिए बढ़ई रोता है। परंतु कलाकार की इस विवशता को दूर करने का उपाय है किसी सहृदय की संवेदनशीलता। बाँझ होने की वेदना से भरी गुजरिया उस लोकगीत में भगवान सूर्य की कृपा से अपने काठ के बालक में प्राण प्रतिष्ठा करवा ही लेती है।
गुजरिया जब अपने काठ के बालक को सचमुच का बालक बताते हुए सबसे कहती है कि उसकी गोद हरी हो गई है, तब मन-ही-मन बहुत डरती भी है कि कहीं उसका झूठ पकड़ा न जाए। गुजरिया का भाई जब बालक का मुँह देखने आता है तो भगवान् सूर्य से अपनी लाज रखने के लिए पुकार कर उठती है। आखिर उसकी पुकार सुनी जाती है। भाई ने जब हाथ में होरिलवा को उठाया और उसका मुँह खोला तो सूर्य भगवान की कृपा से ठुमक-ठुमककर होरिला रोने लगा—
‘हथवा के लिहले हो रिलवा त मुँहवा उघारे ले नि रे,
ए ललना, ठुमुकि-ठुमुकि होरिला रोवले,
ते आदित देआल भइले हो।’
वह काठ का होरिलवा, वह काठ का बालक जीवंत हो उठा, यह भले ही कल्पना हो परंतु इस कल्पना का आधार मिथ्या नहीं है। हम अपनी रचना में अपना कितना प्राण उँडेलते हैं, यह इस बात पर निर्भर है कि हमें अपनी कल्पना से कितना प्यार है। अपनी कल्पना से हम जितना प्यार करते हैं, उतना ही प्राण हमारी कला में उतर आता है।
वह गुजरिया लाख-लाख दुःख सहती है। उसे मान-अपमान और दुत्कार मिलती है। उसकी आँखों के आँसुओं से सावन की घटाएँ उठती हैं किंतु ये घटाएँ जहाँ बरसती हैं, वहाँ सब-कुछ हरा कर देती हैं। उसकी वेदना जो बीज बोती है, वह नवान्नों में फलती है। वह अपनी पत्तल पर अपना बचा-खुचा दुःख अपने लिए परोसकर अपना पेट भर लेती है। उसके भीतर भी ऐसी धरती है, जो गर्भ में धधकती हुई आग लिये जीती है। परंतु अपनों की पत्तल पर तो वह केसरिया भात ही धरती है। परंतु जब भी उसे तोड़ो तो मीठे पानी की झीर ही निकलती है। उसका उल्लास अखंडित है। वह सरला है। सारे दुःखों को हँसते-हँसते सहती है, इसीलिए तो उसके उठते ही उसकी अँगिया से बोलती है चिरैया और उसके बैठने पर कुहकते हैं मोर!
यह चिरैया और मोरों से संपन्न उसका उठना और बैठना उसकी प्रकृति है। यह उसका व्यक्तित्व है। उसकी चिरैया रामजी की चिरैया हैं। उसके मोर उसके सतरंगे आँचल का बोलता हुआ जादू है। यह जादू वह अपनी सुंदरता से जगाती है। यह सुंदरता खेतों में काम करते हुए और खान में माटी खोदते हुए मैली भी हो जाती है। उसके केशों में धूल और माटी लगती है। उसके बालों का रेशम मैला भी हो जाता है। उसके आँचल के मोर गारे और माटी में अपने पैरों को धँस जाने और काले पड़ जाने पर रोते भी हैं, परंतु फिर वह किसी बावड़ी की मुँड़ेर पर जाकर पीतल के घड़ों में जल भर लाती है। उस जल से वह अपना मुँह और हाथ-पैर धोती है। घड़े में अमृत भर जाता है। उसके माटी मैले रेशमी केशों से हवाएँ धूल चुरा ले जाती हैं। उसकी आँखें अपने बंजारे को देखकर चमक उठती हैं तो जीवन की अँधेरी रात में किसी बादल को चीरकर चाँदनी छिटक जाती है। वह चलती है तो हवाएँ चलती हैं, वह जगती है तो सुबहें जग जाती हैं। वह बोती है धान तो सबकी भूख मिटती है। यह स्वयं मिट-मिटकर जीवन सिरजती है। यह सहृदयता, यह चारूता, यह ललामता, यह उल्लास ऐसी फँूक है तो चूल्हे की आग को जिंदा कर देती है और सारा धुआँ हवा हो जाता है।
कौन है ये गुजरिया? आपने इसे देखा है? क्या आप इसे पहचानते हैं। उसे पहचानना कठिन है। दिनोदिन पहचानना कठिनतर होता जा रहा है। जैसे-जैसे हम नागरो का सयानापन बढ़ता जाता है, वैसे-वैसे हमारे व्यक्तित्व से बहुत कुछ कम होने लगता है। हमारे होंठों की हँसी से तितलियाँ गुम हो जाती हैं। किसी खेत में हवाओं के साथ झूमती हुई बाजरी के दूधिया दानों को देखकर हमारे भीतर से उल्लास की चिडि़याएँ नहीं चहकतीं। आकाश में मेघ घिरते हैं, वह छाते हैं, बरसकर भी चले जाते हैं, परंतु भीतर का मन मयूरा ठुमके नहीं लगाता। आखिर हो क्या जाता है हमें? बाबा नागार्जुन कहते हैं,‘असल में हुआ है क्या, बतलाऊँ? आहिस्ते-आहिस्ते
तुमने इन्हें अपंग हो जाने दिया है,
शब्द, स्पर्श, गंध, रस, रूप सारे छीज गए हैं सब’
जब हमारे शब्द, स्पर्श, गंध, रस और रूप छीजने लगते हैं, तब हम काठ का होरिलवा ही रह जाते हैं। सूर्यनारायण की किरणें हमें छूती तो हैं, परंतु हमारे भीतर प्राण नहीं उमड़ते। उस गुजरिया के पास और भले ही कुछ न हो, परंतु उसके शब्द छीजे नहीं हैं। उसका स्पर्श पाकर उसके आँचल के मोर कुहकते हैं। उसकी मुसकराहट रसभरी है। उसका रूप इसीलिए तो ऐसा है कि जिसका स्पर्श करे, उसे जीवंत कर देता है।


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