पीले पत्ते बड़े अभागे हैं ।
बेचारों को जिस समय अपने जनक की सबसे अधिक आवश्यकता होती है, उस समय वह इनका परित्याग कर देता है । यूँ तो वृक्ष को बड़ा परोपकारी माना जाता है, जो अपनी छाया, लकड़ी, फल और पत्ते सब कुछ दूसरों के हित में देने को सर्वदा उद्यत रहता है, लेकिन अपने ही आत्मज पत्तों के सन्दर्भ में उसे स्वार्थी भी कहा जा सकता है, क्योंकि पहले तो वह इनके माध्यम से पूरा वर्ष सूर्य की ऊर्जा सोखता है और इनके द्वारा ही अपनी गंदगी से मुक्ति पाता है,लेकिन ज्योंही उसका काम निकल जाता है, वह निर्मोही बनकर इनसे नाता तोड़ लेता है । पीले पत्ते बेबस हैं । न तो वे पेड़ द्वारा त्यागे जाने को रोक सकते हैं और न ही उठकर टहनियों पर लग सकते हैं । उधर पेड़ ऐसा कठकलेजी है कि उन्हें फिर कभी तन से जुड़ने नहीं देता । कबीर ने उनकी पीड़ा को अनुभव करते हुए लिखा था
पात झरंता यूँ कहे सुन तरुवर बनराय ।
अबके बिछुरे नाहिं मिलें दूर परेंगे जाय ।।
पीले पत्ते हिन्दी की उन पुस्तकों से भी गये गुज़रे हैं, जिनको अगर कोई पढ़ता नहीं, तो कम-से-कम उनके पन्ने चाट बेचने वालों और पुड़ियाँ बाँधने वालों के काम तो आते हैं । ये बेचारे अनाथों की तरह दर-दर की ठोकरें खाने को विवश हैं, क्योंकि लाखों साल गुज़र जाने के बाद भी मनुष्य को इनका कोई उपयोग नहीं सूझा है । कुछ ग़रीबों को छोड़ दें, जिनके लिये ये जलावन का काम करते हैं, बाक़ी तो इन्हें भस्म करके भी कोसते हैं, क्योंकि उन्हें इनका धुआँ अच्छा नहीं लगता । यही नहीं, उन्हें तो इन बेचारों का अपने जनक के चरणों में बैठकर खोई हुई जवानी पर आँसू बहाना भी अखरता है । वे इन्हें घूरे पर फिंकवा देते हैं । कोई उनसे पूछे अगर आपको पत्तों के धुएँ से इतनी ही नफ़रत है, तो आप धूम्रपान क्यों करते हैं ? तम्बाखू के पत्तों का विषैला धुआँ तो साधारण पत्तों के धुएँ से भी अधिक हानिकारक होता है ।
अगर हरे पत्तों से पेड़ हरे-भरे और सुन्दर लगते हैं, तो पीले पत्तों से भी तो लगते हैं । हाँ, उस सुन्दरता की प्रशंसा करने के लिये दृष्टि और दृष्टिकोण ज़रूर बदलने पड़ते हैं, लेकिन अपनी हिन्दी के दो-चार कवियों और ब्रिटेन जैसे देशों के कुछ गिने-चुने प्रकृति प्रेमियों को छोड़ दें, जो इनमें सौन्दर्य देखते हैं, शेष तो इनकी ओर झाँकना तक बेकार समझते है । और वही क्यों, चित्रकार भी पीले पत्तों को कम ही चित्रोपम मानते और चित्रित करते हैं । अगर मनुष्य थोड़ी-सी संवेदनशीलता से भी काम ले, तो देखकर चकित रह जायेगा कि झड़ने से पहले ये पत्ते पेड़ों को कैसा सुनहरा और अरुणिम रंग प्रदान करते हैं और प्रकृति का सौन्दर्य कैसा जाज्वल्यमान हो जाता है । ऐसे लगता है मानो वनदेवी ज़रदोज़ी की चादर ओढ़े अपने प्रिय के आगमन की प्रतीक्षा कर रही है । दरअस्ल मानव जवानी, सुन्दरता और समृद्धि का उपासक है, बुढ़ापे, कुरूपता और निर्धनता का नहीं और पीले पत्ते ठहरे इनके मूर्तिमान उदाहरण । यदि वे किसी कोने में छुप-छुपाकर रो लेते, तो भी चल जाता, लेकिन वे तो मानव के सजे-सँवरे और कटे-छँटे बगीचों की ऐसी की तैसी करने लगते हैं । इस लिये मानव उन्हें झाड़ू मार-मार कर निकलवाता है ।
पीले पत्ते आजकल की भागदौड़ वाली ज़िंदगी के लिये ख़तरा और बाधा भी तो बन जाते हैं, क्योंकि वे रेल की पटरियों और सड़कों पर फिसलन और संकट पैदा करते हैं । अपनी सफ़ाई में पत्ते कह सकते हैं कि इसमें हमारा क्या दोष है, जो हवा हमें पटरियों और सड़कों पर ला पटकती है और दुबारा हमारी मिट्टी पलीद करवाती है । यही नहीं, अगर ब्रिटेन में हमेशा बरसात होती रहती है, तो क्या उसे हम बुलाते हैं ?फिसलन तो वह पैदा करती है और अपराधी मान लिये जाते हैं हम । हमें दुर्घटना के कारण मान लिया जाता है । हम तो उन ग़रीबों से भी गये गुज़रे हैं, जो रेल की पटरियों और फ़ुटपाथों के किनारे टूटी-फूटी झोंपड़ियों में रहने और जीने-मरने को मजबूर हैं । मानव समाज की न्याय व्यवस्था ऐसी ही है प्यारे ! ग़रीबी को दूर करने की उसे ज़रूरत नहीं और वर्षा ठहरी आधिदैविक शक्ति वाली । उसपर मनुष्य का वैसे ही कोई ज़ोर नहीं चलता, इस लिये वह उसकी घातक मार से पीड़ित पत्तों को ही दंड दे डालता है । पंजाबी की एक कहावत है – डिग्गा खोती तों ते ग़ुस्सा कुमिहार ते – आप गिरे हैं गधी से और ग़ुस्सा निकाल रहे हैं कुम्हार पर ।
अगर पेड़ से पूछा जाये कि भाई तुम अपने ज़िगर के टुकड़ों के प्रति इतनी निर्दयता क्यों बरतते हो और उन्हें मिट्टी में क्यों मिलवाते हो ? तो वह कह सकता है – प्यारे ‘पत्र’-मित्रो, हम तो केवल गीता के इस सन्देश को आपके सामने लाते हैं -
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णान्यन्यानि संयाति नवानि देही ।।
डॉ. गौतम सचदेव
drGsachdev@aol.com


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