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विष–कन्या

प्रकाशन :बुधवार, 15 फरवरी 2012
सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा
"उसकी ह्रदय गति अचानक रुक गयी , इसलिए मर गया "
"जी नहीं , आपको पता नहीं है ......... जहर खा कर खुद मरा है।
"अरे नहीं भाई , बहुत दिनों से न जाने क्यूँ अवसाद में था , पागल तो नहीं हुआ पर कैसे भी करके मौत को जरुर गले लगा गया। चलो अच्छा हुआ वरना पागल हो जाता तो न जाने क्या-क्या बरबराता फिरता और पूरे ख़ानदान की इज्जत मिट्टी में मिला देता।”
“हाँ , अभी तो पूरी ग्रहस्थी कच्ची ही है .......... उसकी इस हालत में कैसे किनारे लगती। जिन्दा रहता तो सबको बर्बाद ही करता।"
"क्या मतलब .........?"
"उसकी मौत ने, घर के बाकी लोगों को बचा लिया वरना जिन्दा रहता तो घर के बाकी लोगों का जीना हराम हो जाता। सब लोग उस पर और उसके परिवार पर थू-थू करके थूकते .........सुना है , मरने से पहले एक चिट्टी लिख कर मरा है ......... पर उसमें नाम किसी का नही खोला।"
वह निरपेक्ष भाव से सभी की प्रतिक्रिओं को सुनती रही।
मृतक की मातमपुर्सी की औपचारिकताएँ पूरी हो रही थीं। औरों की तरह उसने भी ऐसे अवसरों के अनुरूप, अपने सिर को सफेद पल्लू से ढक रक्खा था।
"सभी लोग आखें बंद कर लें और दिवंगत आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करें। वेसे आत्मा तो ईशवर का अंश है और वह कभी मरती नहीं है। इसलिए हम उस आत्मा के लिए प्रार्थना करें की ईशवर अपने उस अंश को मोक्ष प्रदान करे।
मंच-संचालक के आग्रह पर औरों की तरह उसने भी अपनी आखें बंद कर लीं।
ओमशांति के स्वर के बीच, उसे लगा कि एक स्वर-लहरी उसके शरीर के कण-कण को भेद रही है , " तुम्हारे प्रेम- निवेदन को स्वीकार करने के बाद , मुझे लगा था कि जो कमी मेरी अत्रप्त आत्मा , विगत न जाने कितने जन्मों से भुगतती आ रही थी , उसे इस जन्म में मैंने स-शरीर दूर कर लिया है। परन्तु हमेशा की तरह तुम मेरे लिए कोरी म्रग-मरीचिका ही सिद्ध हुई हो और मैं किसी भ्रम-जाल में उलझा हुआ शिकार। तुम्हारे भ्रम ने भले ही मुझे एक बार फिर से छला हो ...................फिर भी , मैं तुम्हें विष-कन्या की उपाधि नहीं दे सकता क्योकिं तुम्हारा विष धारण करने के बाद ही तो मैं अपने शिव की शरण में आ पाया हूँ ...............परन्तु मैं इस चक्र को बार-बार दोहराऊंगा तब तक ,जब तक कि , मैं अंतिम रूप से तुम्हें पा नहीं लूँगा............यही मेरी नियति है।”
उसने नेत्र खोले तो अपनी हथेलियों को अपनी कलाइयों पर कसा हुआ पाया। उसकी चुरियां टूट चुकीं थीं। उसके होठ कापं रहे थे, “भले ही में अम्र्त्व की धारा नहीं बन सकी परन्तु मैं विष-कन्या भी नहीं हूँ .................यह मैं ही नहीं , तुम भी जानते हो।”


  सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा
डी-184, श्याम आर्क एक्सटेंशन साहिबाबाद, उत्तरप्रदेश- 201005
arorask1951@yahoo.com
 
         
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