कविवर रवीन्द्रनाथ टैगोर (ठाकुर) मानवीय भावनाओं के
चितेरे कवि ही नहीं वरन् एक संवेदनशील कथाकार भी थे। टैगोर की कहानियों में तत्कालीन समाज, मानव प्रकृति व प्रवृत्ति, एवं मानव मनोविज्ञान अपने समग्र रूप में उभर कर आया है। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध तक बंगाल में स्त्रियों की दशा अत्यंत शोचनीय थी। वे उपभोग की वस्तु थीं, घर की चार दीवारों के भीतर की सजावटी वस्तु थीं, दुर्भाग्य यह कि घर की चौखट लांघते ही वे बाज़ारू और बिकाऊ मान ली जाती थीं। चाहे अविवाहित युवती हो या विधवा स्त्री, दोनों के लिए जीवन कुछ अधिक ही दुरूह था। तत्कालीन बंगाली साहित्य में स्त्रियों के मानसिक एवं दैहिक शोषण की अनेक कथाएं हैं। शरत्चन्द्र, बंकिमचन्द्र आदि ने स्त्री जीवन के विभिन्न पक्षों को अपने कथा साहित्य में बड़े विश्लेषणात्मक ढंग से प्रस्तुत किया है। इनके साहित्य में स्त्री अपनी मुक्ति के लिए छटपटाती हुई दिखाई देती है। इनसे इतर रवीन्द्रनाथ टैगोर की कहानियों में स्त्री अधिक आत्मनियंत्रित एवं स्वाभिमानी है। वह अपने जीवन के महत्वपूर्ण निर्णय लेने का साहस करती हुई दिखाई देती है। टैगोर की कहानियों में भारतीय स्त्री का सम्पूर्ण स्वरूप पूरी गरिमा के साथ उभर कर सामने आया है।स्त्री विमर्श
जहाँ तक स्त्री विमर्श का प्रश्न है तो स्त्री विमर्श, स्त्री मुक्ति, नारीवादी आंदोलन आदि, इन सभी के मूल में एक ही चिन्तन दृष्टिगत होता है, स्त्री के अस्तित्व को उसके मौलिक रूप में स्थापित करना। स्त्री विमर्श को ले कर कभी-कभी यह भ्रम उत्पन्न हो जाता है कि इसमें पुरुष को पीछे छोड़ कर उससे आगे निकल जाने का प्रयास है किन्तु ‘विमर्श’ तो चिन्तन का ही एक रूप है जिसके अंतर्गत किसी भी विषय की गहन पड़ताल कर के उसकी अच्छाई और बुराई दोनों पक्ष उजागर किए जाते हैं जिससे विचारों को सही रूप ग्रहण करने में सुविधा हो सके। स्त्री विमर्श के अंतर्गत भी यही सब हो रहा है। समाज में स्त्री के स्थान पर चिन्तन, स्त्री के अधिकारों पर चिन्तन, स्त्री की आर्थिक अवस्थाओं पर चिन्तन तथा स्त्री की मानसिक एवं शारीरिक अवस्थाओं पर चिन्तन, इन तमाम चिन्तनों के द्वारा पुरुष के समकक्ष स्त्री को उसकी सम्पूर्ण गरिमा के साथ स्थायित्व प्रदान करने का विचार ही स्त्री विमर्श है। प्राचीन ग्रंथ इस बात के साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं कि वैदिक युग में समाज में स्त्री का विशेष स्थान था। उन्हें यह अधिकार था कि वे शिक्षा प्राप्त कर सकें, उन्हें यह भी अधिकार था कि वे अविवाहित रह कर अध्ययन एवं आत्मोत्थान के प्रति समर्पित जीवन व्यतीत कर सकें, उन्हें अधिकार था कि वे पुरुषों के समान कार्य करती हुई उन्हीं की भांति सम्मान पा सकें, उन्हें चिकित्सा, नक्षत्र विज्ञान तथा मार्शल आर्ट पढ़ने-सीखने का भी अधिकार था।
स्त्रियों के संदर्भ में इतिहास का मध्ययुग वह क्षोभनीय युग था जब विदेशी आक्रांताओं ने देश पर आक्रमण किया और उनके द्वारा अपमानित किए जाने के भय से स्त्रियों को घरों में ‘बंदी’ बना दिया गया। उनके अधिकार एक-एक कर के छीन लिए गए, उनकी मनुष्य रूपी स्वतंत्रता के पंख काट दिए गए। सामाजिक जीवन में स्त्रियों की सहभागिता वास्तविक कम और प्रदर्शनीय अधिक रह गई। यहीं से उनके आर्थिक एवं शैक्षिक अधिकारों का हनन आरम्भ हुआ। किन्तु ब्रिटिश शासन के अंतर्गत ही स्त्रियों को बराबरी के अधिकार दिए जाने के प्रयास शुरू किए गए। राजा राममोहन राय, ऐनी बेसेन्ट, सरोजनी नायडू, ईश्वर चन्द्र विद्यासागर, महात्मा फुले आदि ने स्त्रियों को उन कुरीतियों से बचाने के लिए ऐतिहासिक प्रयास किए जिन कुरीतियों के कारण स्त्रियों को सती होना पड़ता था, बहुपत्नी प्रथा की शिकार होना पड़ता था तथा बालविवाह की जंजीरों में जकड़े रहना पड़ता था। इसके बाद स्त्री जागरूकता का दौर आया जिसकी आरम्भिक अवस्था गुरु रवीन्द्र नाथ टैगोर की कहानियों में परिलक्षित होता है।स्त्री और प्रेम
स्त्री के जीवन में प्रेम का महत्व पुरुष के जीवन में प्रेम के महत्व से कहीं अधिक है। पुरुष प्रायः प्रेम-पात्र बदल कर सम्हल जाता है। अन्यथा किसी लत का व्यसनी हो कर देवदास का जीवन अपना लेता है किन्तु स्त्री के लिए ये दोनों मार्ग न तो सहज होते हैं और न संभव। समाज के समीकरण स्त्री को उन्मुक्त प्रेम करने की स्वतंत्रता नहीं देते हैं। फिर स्वयं स्त्री भी प्रकृति से समर्पिता होती है। वह जिसे एक बार अपना मान लेती है, जीवनपर्यन्त उसका स्थान दूसरे को नहीं दे पाती है। यदि परिस्थितिवश उसका विवाह किसी अन्य से हो भी जाए तो वह अपने प्रेम हृदय में छिपाए हुए पूरा जीवन व्यतीत कर देती है, वह भी उस व्यक्ति के प्रति समर्पित हो कर जिसे वह अपेक्षाकृत कम प्रेम करती है अथवा जिसके साथ निर्वाह करना वह अपनी नियति मान चुकी होती है। आधुनिक और वैश्वीकरण के इस दौर में स्त्री ने स्वयं को ढालने का प्रयास भले ही किया हो किन्तु टैगोर युग की स्त्री प्रेम के प्रति समर्पिता स्त्री थी।टैगोर की कहानियों में स्त्री और प्रेम
बंगाल के सामाजिक परिवेश में स्त्री की दशा जितनी दयनीय थी उतनी ही तेजी से बदलाव आते जाने के कारण उनमें मानसिक चेतना और अपने अस्तित्व को पहचानने एवं स्थापित करने की प्रवृत्ति का तेजी से विकास हुआ। यह विकास क्रम टैगोर के कथा साहित्य में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। टैगोर की कहानियों में प्रेम और स्त्री के सहअस्तित्व को निम्नांकित बिन्दुओं में उपस्थित हैः-
1. आत्मिक प्रेम2. समर्पित प्रेम
3. प्रेम और स्त्रीहित
4. स्वाभिमानी स्त्री का प्रेम
5. प्रेम में स्त्री की अभिलाषा
टैगोर की कहानियों में स्त्री विमर्श को स्त्री और प्रेम के सदर्भ में परखने के लिए उनकी पांच कहानियों का यहां विश्लेषणात्मक उल्लेख कर रही हूं:-
माल्यदान:- यह कहानी एक ऐसी युवती की है जो बाल्यावस्था में ही अनाथ हो जाने के कारण एक परिवार में शरण पाती है और उस परिवार की सेवा करती हुई शैशवावस्था से युवावस्था तक पहुंचती है। इस युवती का नाम है बिन्नी। उस परिवार के यतीन नामक एक युवा रिश्तेदार आता है। वह घर यतीन की चचेरी बहन पटल का था। पटल हंसी-हंसी में ही बिन्नी को यतीन की जीवनसंगिनी बनाए जाने की बात चलाती है। यतीन इस विषय पर गंभीर नहीं था अतः वह बिन्नी को भी गंभीरता से नहीं लेता है किन्तु इसके विपरीत बिन्नी यतीन को अपना मान बैठती है। जब यतीन वापस चला जाता है तो बिन्नी बहुत दुखी होती है। वह दुख के कारण बीमार पड़ जाती है और फिर एक दिन घर छोड़ कर चली जाती है। उन्हीं दिनों प्लेग फैलता है जिससे सैंकड़ों स्त्री-पुरुष, बच्चे प्रमिदिन मौत के मुंह में जाने लगते हैं। यतीन जो कि एक चिकित्सक था, प्लेग पीड़ितों की चिकित्सा करने लगता है। एक दिन अचानक बीमार स्त्री के रूप में बिन्नी उसे अपने अस्पताल के बिस्तर पर मिलती है। यतीन उसकी दशा देख कर अवाक् रह जाता है। यतीन को उस समय और भी अधिक अचम्भा होता है जब वह बिन्नी के गले में फूलों की वह सूखी हुई माला देखता है जो बिन्नी ने उसे कभी दी थी और यतीन ने उसे लापरवाही से भुला दिया था। यतीन को उस पल बिन्नी के आत्मिक प्रेम का बोध होता है। तब पटल उसे बिन्नी को अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करने को कहती है। यतीन स्वीकार करता है किन्तु तब तक बिन्नी इस दुनिया से जा चुकी होती है और अपने आत्मिक प्रेम के उपहार के रूप में यतीन के द्वारा प्रेम को स्वीकार किए जाने का सुख पा लेती है, अपनी अंतिम सांस में ही सही।
प्रेम की मौन साधिका के रूप में बिन्नी का चरित्र स्त्री के उस प्रेम संघर्ष की कथा कहता है जिसमें वह निरंतर आंतरिक संघर्ष में निमग्न रहती है और अंततः विजयी होती है। संघर्ष का रास्ता उसे इस लिए चुनना पड़ता है क्योंकि वह अपनी सामाजिक स्थिति से भली-भांति परिचित है। वह जानती है कि जिस परिवार ने उस अनाथ को सहारा दिया, जीवनदान दिया, यदि उसका एक सदस्य उसके प्रेम को स्वीकार नहीं करना चाहता है तो वह उससे हठ नहीं कर सकती है। दूसरी ओर वह अपने प्रेम को भुला पाने में भी सक्षम नहीं है। अतः घर त्याग कर अपने प्रेम की प्रतिष्ठा को बचाए रखने का प्रयास करती है, भले ही इसके बदले उसे अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ता है। यहां टैगोर ने प्रेम को स्त्री के लिए हठ नहीं अपितु मौन साधना के रूप में प्रस्तुत किया है। टैगोर ने इस तथ्य को भी सामने रखा कि प्रेम में स्त्री की अभिलाषा किसी भी तरह अपने प्रिय को पा लेने से कहीं अधिक अपने प्रेम को निःस्वार्थ और निश्चछल बनाए रखने की होती है।
प्रेम का मूल्य:- यह कहानी ‘महाभारत’ कालीन पात्र कच और देवयानी के परस्पर संवाद पर आधारित है। देवताओं के गुरु बृहस्पति ने अपने पुत्र कच को अमर जीवन का रहस्य ज्ञात करने के लिए पृथ्वी पर शुक्राचार्य के पास भेजा। शिक्षा प्राप्त करने के बाद पिता के पास लौटने से पूर्व कच देवयानी से विदा लेने पहुंचा। उस समय कच और देवयानी के बीच प्रेम के संदर्भ में तर्क-वितर्क भरा संवाद हुआ। संवाद के समाप्त होते-होते कच का पुरुषत्व बोल उठा, ‘‘अभिमानी स्त्री! सच्चाई जानने से क्या लाभ? यह मेरा भ्रम था कि मैंने एक विशेष भावना के वशीभूत हो कर तेरी सेवा की और मुझे उसका दण्ड मिल गया। किन्तु अभी वह समय नहीं आया कि मैं इस प्रश्न का उत्तर दे सकूं कि मेरा प्रेम सत्य था या नहीं क्यों कि मुझे अपने जीवन का उद्देश्य दिखाई दे रहा है.......।’’
इस पर देवयानी कहती है, ‘‘....तुम एक पथिक के रूप में यहां आए, धूप से बचने के लिए मेरे वृक्षों की छाया में आश्रय लिया और अपना समय बिताया। तुमने मेरे बगीचे के फूल तोड़ कर एक माला गूंथी और जब चलने का समय आया तो तुमने धागा तोड़ दिया, फूलों को धूल में मिला दिया। मैं अपने दुखित हृदय से शाप देती हूं कि जो शिक्षा तुमने प्राप्त की हैवह सब तुमसे विस्मृत हो जाए....।’’
टैगोर ने देवयानी के रूप में एक ऐसी स्त्री-चरित्र को चुना जिसमें अपने प्रेम के प्रति स्वाभिमान है। वह अपने प्रेम को अपमानित होते हुए नहीं देख सकती है। उसके प्रेम का यदि कोई अनादर करता है, चाहे वह उसका प्रिय व्यक्ति ही क्यों न हो तो वह अपने उस प्रिय व्यक्ति को भी दण्डित कर सकती है। कच और देवयानी की पूरी कथा में से मात्र इसी भाग को अपनी कहानी के कथानक के रूप में चुनने के पीछे टैगोर का यही उद्देश्य प्रतीत होता है कि वे प्रेम के प्रति स्त्री की गरिमा और गंभीरता को सामने रखना चाहते थे।
कंचन:- एक ऐसी युवती की कथा है जो पढ़ी-लिखी है, तार्किकता से परिपूर्ण है और आत्मसंयमी है। उसे एक ऐसे युवक से प्रेम होता है जो लम्पट प्रवृति का है। वह कंचन को विवाह का वादा करता है, इससे उत्साहित हो कर कंचन के पिता उसके विदेश जा कर अध्ययन करने का पूरा खर्च वहन करते हैं किन्तु विदेश से लौट कर वह लम्पट स्वार्थवश एक उच्चपदाधिकारी की लड़की से विवाह कर लेता है। कंचन और उसके पिता आहत हो कर वह शहर छोड़ कर एक छोटे स्थान में जा बसते हैं। यहीं कथानायक का उनसे परिचय होता है। कथानायक कंचन को जितना जानता जाता है, उतना ही उसे कंचन की प्रतिबद्धतापूर्ण स्वाभिमानी प्रेम का परिचय मिलता जाता है और वह कंचन से प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता है। वह चाहता है कि कंचन अपने प्रथम प्रेम और उस प्रेम से मिली पीड़ा को भूल जाए किन्तु कंचन प्रत्युत्तर में कहती है, ‘‘आप नहीं समझ सकेंगे। आपकी संपत्ति ज्ञान हैउच्चतर शिखर पर वह भी व्यक्तिगत नहीं है। नारी संपत्ति हृदय की सम्पत्ति है। यदि उसका सब कुछ चला जाए, वह सब कुछ जो बाहरी है, जिसे स्पर्श किया जा सकता है तब भी उस प्रेम में वह वस्तु बच जाती है, जो व्यक्तिगत नहीं है।’’
प्रेम के संदर्भ में कंचन विवेकशील है। वह प्रेम में छली जाती है फिर भी टूटती नहीं है। वह जीवन से पलायन का रास्ता नहीं चुनती है वरन् इस संतोष के साथ कि उसका अपना प्रेम निःस्वार्थ था, धैर्य और शांति से जीवन बिताने का रास्ता चुनती है।
विचारक:- इस कथा में टैगोर ने समाज में स्त्री के प्रति दृष्टिकोण और दोहरेपन को एकदम स्पष्ट शब्दों में व्यक्त किया है। कथा की नायिका क्षीरोदा की स्थिति कुछ इस प्रकार है कि, ‘‘क्षीरोदा ने अपने यौवन की सीमा में जिस दिन प्रातःकाल जग कर देखा उसका प्रणयी पिछली रात उसके सारे अलंकार और धन चुरा कर भाग गया है, घर का किराया देने लायक भी पैसे उसके पास नहीं, तीन वर्ष के शिशु को दूध ला कर पिलाने तक के लिए पैसा नहीं। जब उसने सोच कर देखा, उसके जीवन के अड़तीस वर्षों में वह एक भी व्यक्ति को अपना नहीं बना सकी, एक घर के कोने में भी जीने-मरने का अधिकार प्राप्त नहीं किया। तब उसे याद आया, आज फिर उसे आंसू पोंछ कर, दोनों आँखों में काजल लगाना होगा, अधर कपोलों पर लाली फेरनी होगी....।’’
क्षीरोदा की इस दशा का कारण टैगोर ने बड़ी गंभीरता से ढूंढा है। गहन विश्लेषण के बाद वे जो कारण पाते हैं उसे कथा नायक मोहित मोहन की धारणा के रूप में व्यक्त करते हैं, ‘‘ एक ओर वे हिन्दू महिलाओं को देवी की संज्ञा देते हैं, दूसरी ओर स्त्री जाति के प्रति उनका आंतरिक अविश्वास था। उनका मत था कि रमणियां कुल-बंधन तोड़ने के लिए तैयार रहती हैं।, यह मर्यादा जरा भी शिथिल होते ही समाज के पिंजरे में एक भी कुल नारी नहीं रहेगी।’’
वस्तुतः यह धारणा मोहित मोहन की ही नहीं अपितु तत्कालीन समाज की धारणा थी जिसने स्त्री को स्वतंत्रतापूर्वक जीने और मनचाहे पात्र से प्रेम करने पर प्रतिबंध लगा रखा था। यदि कोई स्त्री मनचाहे पात्र से प्रेम कर बैठती थी तो उसका प्रेम-पात्र भी उसे ‘कुलशील वाली’ नहीं मानता था, उसके साथ इस तरह छल-कपट करता था जैसे यह उसका अधिकार हो।पहला नंबर:- यह कहानी एक ऐसी विवाहिता अनिला की है जो अपने पूर्व प्रेमी और प्रति के बीच अंतर्द्वद्व से जूझती रहती है। संकट यह कि वह अपने पति के प्रति एकनिष्ठ रहना चाहती है किन्तु उसका प्रेमी उससे दूरी बनाए रखने को भी अपने पौरुषजनित अहसान के आवरण में लपेटे रखना चाहता है। वह अनिला को जता देने का प्रयास करता है कि, ‘‘बाहर से मैं तुम्हारे बारे में कुछ नहीं जानता किन्तु अंतर की ओर से मैं देख रहा हूं तुम्हारी वेदना को। यहां मेरी बड़ी कठिन परीक्षा है। मेरे पुरुष की यह भुजा निश्चेष्ट नहीं रहना चाहती। इच्छा होती है कि सारे बंधन तोड़ कर तुम्हें तुम्हारे जीवन की सारी व्यर्थता से मुक्ति दिलाऊं।’’
दूसरी ओर अनिला के घर छोड़ कर चले जाने पर उसका पति सोचता है कि वह अपने पूर्व प्रेमी के पास गई होगी। जब काफी अरसे बाद पति को अनिला का पूर्व प्रेमी मिलता है तो वह उससे जानने को उत्सुक हो उठता है कि अनिला उसके साथ खुश है या नहीं? तब उसे पता चलता है कि अनिला अपने पूर्व प्रेमी के पास भी नहीं गई। उसने जिस प्रकार प्रेमी के घुटन भरे प्रेम को ठुकरा दिया, ठीक उसी प्रकार पति की संदेहाकुल मनोदशा से भी स्वयं को मुक्त कर लिया। यद्यपि इस स्थान पर आ कर टैगोर चुप हो जाते हैं कि दोनों से मुक्ति पा कर अनिला ने किस रास्ते पर पांव रखा। तत्कालीन सामाजिक दशा में संभवतः यह स्पष्ट करना सटीक नहीं रहा होगा। टैगोर अपनी कथा-नायिका को कमजोर अथवा पलायनवादी नहीं बना सकते थे किन्तु स्त्राी मुक्ति के नए आयाम उस समय की सामाजिक व्यवस्था में समय से पहले की बात होती। इसीलिए वे अनिला के आगे के जीवन को पाठकों की सोच कर छोड़ देते हैं जो स्वाभाविक रूप से अनिला के पक्ष में ही निर्धारित होती है।
टैगोर, स्त्री और प्रेम
जिन कहानियों की यहां मीमांसा की गई है उनमें प्रेम के परिप्रेक्ष्य में एक ऐसा स्त्रीविमर्श उभर कर सामने आता है जो रवीन्द्रनाथ टैगोर को एक समाजविज्ञानी और मनोविज्ञानी के रूप में प्रस्तुत करता है। वे स्त्री मनोविज्ञान के बड़े चितेरे दिखाई देते हैं। चाहे बिन्नी हो या अनिला, टैगोर प्रेम के मामले में स्त्री को अनावश्यक समर्पिता या समझौतावादी नहीं बनने देते हैं। वे स्त्री को विवेकशील और स्वाभिमानी के रूप में प्रस्तुत करते हैं। टैगोर की कथानायिकाएं विवादास्पद परिस्थितियों से पलायन करती हैं किन्तु वे सिजोफ्रेनिक नहीं हैं। वे खुली हवा में सांस लेने के लिए घुटन से पलायन करती हैं, आत्मघात के लिए नहीं। प्रेम की पीड़ा से शक्ति मिलती है, इस धारणा का भी टैगोर अनुमोदन नहीं करते हैं। टैगोर के लिए स्त्री का प्रेम-आत्मोत्सर्ग किसी अनुष्ठान की भांति नहीं है, वह तो एक मार्ग है जो जीवित रहते हुए स्त्री को उसके अस्तित्व की पूर्णता प्रदान करता है। यह प्रेम वर्ण, जाति एवं वर्ग से परे है। यह मानव की अंतर्निहित भावनाओं का मुखर और सशक्त रूप है।
वस्तुतः टैगोर ने स्त्री के उस रूप को अपनी कहानियों में पिरोया है जो प्रायः अदेखा रह जाता है। टैगोरकालीन बांगला साहित्य में समर्पिता नायिकाएं तो बहुत मिलती हैं किन्तु अनिला, कंचन या देवयानी की भांति कम ही मिलती हैं। देवयानी का वह रूप टैगोर को प्रिय लगा जिसमें स्त्री प्रेम का अपमान होने पर कठोरतम निर्णय ले कर अपने प्रिय को दण्डित भी कर सकती है। यह प्रसंग स्त्री के प्रति टैगोर की स्त्री-हितैषी भावना का प्रस्तुतिकरण है। रवीन्द्रनाथ टैगोर के कथा साहित्य में स्त्री और प्रेम अपनी पूर्ण गरिमा और तार्किक विश्लेषण के साथ विद्यमान है।

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