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साहित्य का महाकुंभ

प्रकाशन :बुधवार, 8 फरवरी 2012
लता शर्मा

अंतरराष्ट्रीय छवि के जयपुर साहित्योत्सव को इस बार सलमान रुश्दी विवाद की काली छाया ने आच्छादित किये रखा। इस पांच दिवसीय साहित्यिक मेले का रचनात्मक पक्ष प्रस्तुत कर रहीं हैं प्रतिष्ठित कथाकार लता शर्मा।

कदाचित् विश्व भर में साहित्य का एकमात्र महाकुंभ! जयपुर साहित्योत्सव में सुदूर अफ्रीका, यूरोप और अमेरिका के लेखक उपस्थित थे तो पडोसी बांग्लादेश, पाकिस्तान और म्यांमार के भी। न केवल तहरीर चौक की व्यापक प्रतिक्रिया थी, पाकिस्तान की उथल-पुथल भी चर्चा का विषय रही। असहमति, सत्ता-संत्रास, रंगभेद-लिंगभेद जैसे स्थाई सरोकार थे, तो इक्कीसवीं शती में महाशक्ति बन, कौन-कौन उभरेगा, उनका चरित्र कैसा होगा- इस पर भी चर्चा हुई। लेखन का तकनीकी पक्ष; कहानी किसको कहते हैं, कहानी और कविता, अनुवाद, आत्मकथा, इतिहास और पत्रकारिता प्रत्येक विषय पर चर्चा हुई।

इस बार मेले में उत्साह के साथ आशंका भी थी। राजस्थान के लेखक विजयदान देथा और मलयालम के लेखक के सच्चिदानंद का नाम नोबल पुरस्कार के संभावितों की सूची में होने का उत्साह। ये दोनों की लेखक आरंभ से ही इस साहित्योत्सव के साथ जुडे रहे हैं। .. और सलमान रुश्दी के आगमन पर हंगामे की आशंका। इस उत्सव का फलक अत्यंत विस्तृत था। मिथक, धर्म, कला, स्थापत्य, संगीत, बागवानी- क्या नहीं था। हिंदी में बदलाव पर सत्र था। जेल से हाल ही में रिहा हुए लेखकों ने अपने अनुभव सुनाए। टॉम स्टॉपर्ड और डेविड हेयर जैसे प्रसिद्ध नाटककारों ने गिरीश कर्नाड और असगर वजाहत के साथ नाटक/मंचन पर चर्चा की। ऐनी प्रालश, बैन ओकरी, किरन नागरवाला, लायनल थिलर और माइकेल ओंदात्से जैसे उपन्यासकार उत्सव का प्रबल आकर्षण थे।

भारतीय भाषाओं में कश्मीरी, असमिया, बांगला, उडीया, मराठी, तमिल, मलयालम और राजस्थानी के सत्र थे। एक समय में चार सत्र होते हैं, पांचवां होता है युवाओं की कार्यशाला। सहभागिता के लिए सत्र का चयन अत्यंत दुष्कर है। लेखक तकनीकी विषय और राजनीति में से किसे चुने? जितने मोती समेट सकते हो समेट लो, बाकी अगले वर्ष।

सुबह का पहला सत्र था भक्ति संगीत। शबद-कीर्तन, मीरा, दादू दयाल और कबीर के भजन। सूफी गायन। भक्ति साहित्य, विशेष रूप से दादू दयाल और कबीर पर मोनिका बोअम टिटल बॉख (जर्मन) की जानकारी मुग्ध कर गई। जयपुर की कडकडाती ठंड में जनता आठ बजे सुबह से डिग्गी पैलेस की ओर भागना आरंभ कर देती थी। शबनम विरमानी- हाथ में तंबूरा, दूसरे में खडताल और आकाश चूमते स्वर। उनसे कबीर वाणी सुनना अभूतपूर्व अनुभव था। आज भी कबीर यूरोप से लेकर हमारे गांव तक छाया है। यही गजब पार्वती बाउल ने भी ढाया। लंबी-लंबी जटाएं इकतारा और छोटे से तबले के साथ बाउल गीत-नृत्य देख कर लगा- चिरविरहणी राधा जी साकार हो उठी हैं।

मध्यपूर्व अरब देशों में हुई जनक्रांति पर चर्चा करने वाले वहां के लेखक स्वयं उपस्थित थे। मैक्स रोडेन बैक की धाराप्रवाह अरबी भाषा। कामिन मोहम्मदी और करीमा खलील के बीच संवाद, तहरीर चौक पर बटी ऐतिहासिक घटनाओं/ करवटों पर आधारित था। कश्मीर में क्या हो रहा है? अंजुम जमरूद हजीब, सिद्धार्थ गिग्गू, साहिल मकबूल और इफ्तिखार गिलानी ने बयान किया। पाकिस्तान पर चर्चा की फातिमा भुट्टो, आयशा जलाल और करन थापर ने। पाकिस्तान पर बात हो और कश्मीर में स्वायत्त शासन की बात न उठे यह कैसे संभव है? प्रश्न काल में आयशा जलाल ने कहा- कश्मीर की अवाम को इंटैल्क चुअल फ्रीडम (अब इसका जो भी अर्थ हो!) मिलनी ही चाहिए। तुरंत पांच-सात लोगों ने वजीरिस्तान, बलूचिस्तान और अफगानिस्तान में इंटैल्कचुअल फ्रीडम पर उनके विचार जानने चाहे। वो इसका कोई स्पष्ट उत्तर न दे पाई।

सत्रांत के कारण असली मुद्दा टल गया। नाइजीरियाई लेखक बेन ओकरी और चंद्रहास चौधरी के बीच वार्तालाप में अफ्रीका का दर्द उभरा। ताई सैलासी, तेजू कोल और शबनम खान ने सुदूर अफ्रीका को जयपुर में ला खडा किया। शबनम खान पढ रही थीं और पौला ओलोशाराक (अजेंन टाइना) की आंखें रिस रहीं थीं। दो औरतें- दर्द एक। सृजन, सैंसरशिप और असहमति पर तमिलभाषी चेरन, मलयालम में चारू निवेदता ने बात की। लेखन के कारण चेरन श्रीलंका से निर्वासित हैं और चारू अपने दांत तुडवा बैठे हैं। बामा फौस्तीना के अनुभव भी यही हैं। शोमा चौधरी ने वह प्रश्न उठाया जो कई लेखकों के मन में कुलबुला रहा था। कश्मीर और अन्य कई राज्यों में ऐसे ही साहित्य सम्मेलन का विरोध वहां के लेखकों- बुद्धिजीवियों ने किया। क्यों? उत्तर अनेक थे, पर उलझे हुए। सिद्धांत विशेष/ संस्था विशेष के प्रतिनिष्ठा के अपने आग्रह और दुराग्रह होते हैं।

अर्धसत्य, कुछ अनकही कहानियों, माओवादी गुरिल्ले और भारतीय गणराज्य पर बहस की राहुल पंडिना (बस्तर पर प्रामाणिक लेखन) और नीलाभ अश्क ने। लेखन और असहमति/ विरोध पर एरियल डॉफमैन, थांट मिंट यू (म्यांमार) और इफ्तिखार गिलानी बोल रहे थे। थांट ने स्पष्ट कहा- हमें आर्थिक विकास और अद्योग-धंधों के लिये चीन की सहायता की आवश्यकता है, लेकिन अपनी शर्तो पर। क्या यह संभव है? निजी बातचीत में मिंट ने बताया, वो यू थांट के पौत्र हैं। यू थांट ने भारत-पाकिस्तान युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निबाही थी, वह संयुक्त राष्ट संघ के महासचिव थे। इसी सत्र में जेलिंग यान (चीन) ने कहा- चीनी संस्कृति को समझना असंभव है।

टोबा टेकसिंह और रावी पार पंजाबी भाषा के सत्र थे। विभाजन का दंश वे भी नहीं भूलते और हम भी नहीं। साझा दुख-दर्द हमारी साझी विरासत है। आमार बांग्ला में अनिता अग्निहोत्री और राधा चक्रवर्ती ने बांग्लादेश से आए फकरुल आलम से बात की। उडिया सत्र में प्रतिभा राय उपस्थित थीं। उनकी लेखनी उपेक्षित पात्रों को उठाती है। गांधी, अंबेडकर और जंतर-मंतर (जोसेफ लेलीवैल्ड, सुनील खिलनानी, एम.जे. अकबर) सामयिक उथल-पुथल और चर्चा का सत्र रहा। प्रेम कहानियां (पवन वर्मा, नमिता गोखले, प्रसून जोशी) और डिकेन्स के स्त्री पात्र (मिरियम, नीलम सरन गौर) और अन्य कई सत्र विशुद्ध साहित्यिक सत्र रहे। इन सत्रों में कहानियां, उपन्यास अंश और कविताएं पढी गई। लेखन, नाटक और मंच के तकनीकी पक्ष (क्राफ्ट) पर बोले डेविड हैयर, गिरीश कर्नाड, सिनेमा पर गोविंद निहलानी और इला अरुण, कहानी पर जावेद अख्तर, विशाल भारद्वाज, प्रसून जोशी और गुलजार।

समानांतर हो रहे चार सत्रों में कोई एक साथ उपस्थित नहीं रह सकता! पूरे उत्सव की चर्चा असंभव नहीं तो दुष्कर/कठिन अवश्य है। अपनी रुचि के अनुसार एक सत्र चुन कर बैठने के अलावा कोई चारा नहीं था।

अब आइये स्टार लेखकों की ओर! जी हां! जावेद अख्तर, गुलजार और अशोक चक्रधर को लोग छोडना ही नहीं चाहते। पर बेन ओकरी भी कम लोकप्रिय नहीं। ओप्रा की लोकप्रियता के क्या कहने। जनता जाने-पहचाने चेहरों के पीछे भागती है, परंतु यह सतही उफान है। गंभीर श्रोता मनपसंद लेखकों को सुनने जाते हैं। सबसे सुखद थी युवाओं की उपस्थिति! स्कूल, कॉलेज के छात्र। इनके पास रोचक प्रश्नों की सूची थी। ये हर समय, हर जगह रास्ता रोक, लेखकों से प्रश्न करते थे और उत्तर लिखते जाते थे। नई पीढी में साहित्य के प्रति संवेदना जगा रहा है यह उत्सव। किसी भी भाषा, विषय और तकनीक का कोई सत्र ऐसा नहीं था जिसमें पंडाल खाली पडा हो। अपना-अपना चयन था। कुछ ओप्रा पर निसार थे तो कुछ फातिमा भुट्टो से जिरह कर रहे थे। ऐमी चुआ भी अत्यंत लोकप्रिय रहीं। दोनों सत्र समानांतर थे। पाकिस्तान पर सत्र में तिल रखने की जगह न थी।

इधर लोग कान पसारे लेखकों को सुन रहे थे उधर इंटरनेट और अखबारों में समारोह पर प्रश्न चिह्न टांके जा रहे थे। धन कहां से आ रहा है?- प्रायोजकों के नाम (चालीस से ऊपर) हर जगह, हर कागज पर लिखे थे, पढ लीजिये।

धन कहां से आया की जगह हम यह क्यों नहीं पूछते- धन का क्या उपयोग हो रहा है? देश के बडे-बडे शहरों में बडे धार्मिक आयोजनों को देखिये, धन का क्या हो रहा है? असंख्य लोगों के रहने-खाने की नि:शुल्क व्यवस्था। वहां धन बहुत बडे अनुत्पादक वर्ग का पोषण कर रहा है। जयपुर में धनबल ने ढाई सौ-तीन सौ लेखक एकत्रित किए। युवाओं के लिए कार्यशालाओं का आयोजन किया। मुख्यतया हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के लेखकों को सुदूर अफ्रीका, यूरोप, अमेरिका, चीन और मध्यपूर्व के लेखकों के सान्निध्य का अवसर दिया। सीखने के लिये कितना कुछ।

यहां के वातावरण और अंग्रेजी बाहुल्य पर भी अनेक आपत्तियां हैं। लाख टके का प्रश्न है- हिंदी में ऐसा समारोह करने पर क्या प्रतिबंध है? क्या ऐसे आयोजनों के लिए भारत में दानदाताओं की कमी है? हिंदी वाले क्यों नहीं करते ऐसे आयोजन? कारण है हमारी अपनी आत्ममुग्धता और अनुशासनहीनता। जयपुर में चालीस से ऊपर आयोजक थे मगर उनका कोई प्रतिनिधि मंच पर नहीं बैठा। कोई फूल-हार-वंदन नहीं। मंच पर केवल लेखक और संचालक। मंचासीन होने, माला पहनने और अपनी प्रशंसा सुनने का नशा छोड पाएंगे हम? यह प्रवृति इस उत्सव में भी थी।.. मठाधीश पुस्तक का विमोचन करते हैं.. पुस्तक और लेखक के बारे में कम, अपने बारे में अधिक बोलते हैं। यह आयोजकों का प्रखर अन्याय है कि लब्धप्रतिष्ठ मठाधीशों के साथ अल्पज्ञान-अज्ञात कुल-शील लेखक भी बैठा देते हैं। देश की राजधानी के किसी मंच पर कहां दिखता है राजस्थान की किसी ढाणी से आया लेखक? वातावरण?.. जो पीकर मदमस्त थे, अभद्र आचरण कर रहे थे- अपने ही देश और अपनी ही भाषा के लेखक थे। उन्हें उत्तरदायित्वपूर्ण व्यवहार सिखाने की कार्यशाला क्या विदेशी लेखक आयोजित करेंगे?

जब मुट्ठी भर लोग एक लेखक को देश में न आने दें, एक चित्रकार को देश छोडने पर विवश कर दें, किसी पुस्तक का विक्रय रोक दें, फिल्म का प्रदर्शन नहीं होने दें, तब समझ लेना चाहिये, हम पुन: पाषाण युग की ओर लौट रहे हैं। यहां असहमति अंतत: घृणा और हिंसा में बदल जाती है। धमकी हथियार नहीं, औजार बन गई है। प्रश्न पूछा जा सकता है, वहां उपस्थित लेखकों ने विरोध क्यों नहीं किया? वे तुरंत संगठित नहीं हो सके और निर्णायक क्षण आ पहुंचा। लेखकगण अपने-अपने सत्र के प्रति समर्पित थे। जावेद अख्तर का सत्र था और उन्होंने डट कर विरोध किया। लेकिन लेखकों का यह प्रबल विरोध व्यक्तिगत स्तर पर ही उफन कर रह गया, कोई सामूहिक प्रतिक्रिया/ अभिव्यक्ति नहीं पा सकी। .. कलम की प्रतिक्रिया/अभिव्यक्ति में समय लगता है, पत्थर, माचिस और गोली की नहीं।

चेतन भगत ने कहा- प्रतिबंधित लेखकों को नायक नहीं बनाया जाये। यह तो सरकार (विश्व भर में) का दायित्व है। न प्रतिबंधित करते, न नायक बनते।

लेकिन.. अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ गंभीर उत्तरदायित्व भी जुडे हैं- यह नहीं भूला जा सकता।

  लता शर्मा
रुद्रप्रियम् 1-ग-9, विज्ञाननगर, कोटा, राजस्थान-324005
 
         
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