भारत की गुलाबी नगरी जयपुर में प्रतिवर्ष आयोजित होने वाले "साहित्य उत्सव" के साथ विवादों का पिटारा जुड़ा ही रहता है, इस दफा भी इस विडंबना ने अपना गुल खिलाया और उत्सव के आयोजन से पहले ही इसे विवादास्पद बना दिया गया।
भारतीय मूल के अंग्रेजी लेखक सलमान रश्दी इस उत्सव में शामिल होते हैं या नहीं, अब यह मुद्दा गौण है, महत्वपूर्ण यह है कि रश्दी की संभावित उपस्थिति के कारण जितना विवाद पिछले एक सप्ताह से मीडिया में पैदा हुआ है, इसने उत्सव को आवश्यकता से अधिक प्रचार पूंजी से समृद्ध जरूर कर दिया है! निस्संदेह इसके आयोजक इस पूंजी से प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से कम लाभान्वित नहीं हुए होंगे। रश्दी की ख्याति अंतरराष्ट्रीय है, इसलिए उनसे जुड़े समाचार पूरी दुनिया के मीडिया में प्रचारित-प्रसारित हुए हैं। आयोजकों की ऎसी कोई प्रोपेगेंडा रणनीति रही भी हो, तो इसमें कोई हैरत की बात नहीं है।
वैसे भारत की परंपरा उत्सवधर्मिता की रही है, जब सृजनात्मक साहित्य के उत्सव की घटना हो, तो निस्संदेह इसका महत्व व आकर्षण और भी बढ़ जाता है, इस तरह के आयोजन प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से समाज में सृजनात्मक परिवेश के निर्माण में कहीं न कहीं अपनी भूमिका निभाते हैं, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय साहित्य और विमर्श के नए क्षितिज दिखाई देते हैं और देश का साहित्य प्रेमी इनसे स्वयं को किसी स्तर पर जुड़ा भी पाता है, इस दृष्टि से यह साहित्य उत्सव स्वागतयोग्य है, लेकिन उसे ज्यादा ईमानदार और लोकतांत्रिक बनाने की जरूरत है।
उत्सव या आयोजन कोई भी रहे, प्रत्येक की पृष्ठभूमि में आयोजकों और प्रायोजकों के निश्चित उद्देश्य रहते हैं, जब साहित्य, कला, संस्कृति राजा या सामंत आश्रित हुआ करते थे, तब भी तत्कालीन प्रभुवर्ग के अपने निहित उद्देश्य रहते थे। दरबारी संस्कृति, दरबारी साहित्य, दरबारी कला जैसी प्रवृत्तियां इसके प्रतीक हैं, पूंजीवादी युग में इसके चरित्र में गुणात्मक परिवर्तन जरूर आया है, अब इस तरह के आयोजन पूंजीवादी, विशेष रूप से बहुराष्ट्रीय पूंजीवादी या कॉरपोरेटी पूंजी से संरक्षित होते हैं, प्रायोजित होते हैं, जब बड़ी पूंजी का हस्तक्षेप या प्रवेश सृजनात्मक संसार में होता है, तब कई तरह की समस्याएं, जटिलताएं पैदा हो जाती हैं। विगत में साहित्य उत्सव के प्रायोजकों में ऎसे नाम भी थे, जोकि कई प्रकार के विवादों से घिरे हुए थे। जब ऎसे घरानों की पूंजी-बैशाखियों पर साहित्य उत्सव होते हैं, तो विवादों-शंकाओं का उठना स्वाभाविक ही होता है।
पाठकों को याद होगा बीती सदी के नवें और दसवें दशकों में भारत में विश्व सुंदरियों का मेला लग गया था। उन वषोंü में ऎसा लगने लगा था कि भारत सुंदरियों की मंडी है और अन्य देश सुंदरियों के अकाल से ग्रस्त हैं। यह सब अकारण नहीं हुआ था। नवें दशक में भारत में वैश्वीकरण की शुरूआत हुई। उपभोक्ता संस्कृति का विस्फोट हुआ। एक मजबूत नव मध्यवर्ग अस्तित्व में आने लगा। सुंदरता के प्रति जागरूकता बढ़ने लगी। कुकुरमुत्ते की तरह ब्यूटी-पार्लर खुलने लगे। आयातित सौंदर्य-प्रसाधनों का विस्फोट हुआ और विलासितापूर्ण सौंदर्य सामग्री के उत्पादकों को भारत में एक बड़ा बाजार मिल गया।
इस संक्षिप्त क्षेपक की पृष्ठभूमि में इस साहित्य आयोजन को भी समझने की आवश्यकता है। आज भारत तीसरी दुनिया में अंग्रेजी का सबसे बड़ा बाजार बनने जा रहा है। एक नई भाषा - "हिंग्लिश" तेजी से अस्तित्व में आ रही है। तथाकथित "द ग्रेट इंडियन मिडिल क्लास" इसे अपनी जीवन शैली के अभिन्न हिस्से के रूप में अपना भी रहा है। विगत दो दशकों में भारतीय मूल के अंग्रेजी लेखकों को जमकर उछाला भी गया है।
इसमें कुछ बुरा भी नहीं है, लेकिन बहुराष्ट्रीय कंपनियों और उनके स्थानीय प्रतिनिधियों की साहित्य उत्सव की रणनीति को नजरअंदाज करना भी गलत होगा। क्या यह सही नहीं है कि इस तरह के उत्सवों में पश्चिमी संस्कृति और अंग्रेजी लेखकों का ही वर्चस्व होता है? क्या यह सही नहीं है कि यूरोप और अमरीकी जगत की वर्चस्ववादी संस्कृति को बड़ी बारीकी से ऎसे साहित्य उत्सवों के माध्यम से प्रसारित किया जाता है? क्या यह सही नहीं है कि भारतीय भाषाओं के लेखकों को हाशिए पर ही रखा जाता है? फोकस के केंद्र में विदेशी लेखक ही रहते हैं। क्या भारतीय भूमि पर आयोजक यह दर्शाना चाहते हैं कि भारतीय भाषाओं के लेखक अंग्रेजी लेखकों के समकक्ष नहीं हैं? क्या भारतीय भाषाई साहित्य विश्व स्तर का नहीं है? यहां हिन्दी के बड़े-बड़े लेखक भी छोटे नजर आते हैं और अंग्रेजी के छोटे-छोटे लेखक भी बड़े लेखक के रूप में पेश किए जाते हैं। इस आयोजन को लेकर हिन्दी समाज में कई तरह की शिकायतें होती हैं, लेकिन समाधान कोई नहीं खोजता।
कुछ शिकायतें तो भागीदारी मिलने तक ही होती हैं। वैसे भी भारत की अपनी भाषाओं के लेखकों को दोयम दर्जे पर ही रखा जाता है। इसके साथ-साथ इस तरह के उत्सव में जो चर्चा के विषय होते हैं, उनमें भी अभिजातवर्गीय दृष्टि ही प्रतिबिंबित होती है। साहित्य के लिए अथवा कलावादी दृष्टि पूरे आयोजन पर छाई रहती है। भारत तेजी से बदल रहा है। हाशिए के समाज अब केंद्र में आने लगे हैं।
उनके खुरदरे हाथों की दस्तकें साहित्य, कला और संस्कृति में सुनाई देने लगी हैं। इस नए यथार्थ को समझे बगैर कोई भी साहित्यिक आयोजन अपूर्ण ही माना जाएगा। उसे निरापद नहीं कहा जा सकता। यही कहा जाएगा कि यह उत्सव साहित्य की निर्मलता और संवेदनशीलता के बजाय पूंजी की भव्यता, यूरोपीय वर्चस्ववादी संस्कृति की आक्रामकता और जन विमुख कुलीन लेखकों का जमावाड़ा है। ऎसे आयोजनों को चमक-दमक और दिखावे की बजाय विचार-विमर्श के गहरे और बहुजन उपयोगी स्तर पर उतरना चाहिए।


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