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सोशल नेटवर्किंग - अभिव्यक्ति की आजादी के मायने

प्रकाशन :मंगलवार, 13 दिसम्बर 2011
संजय कुमार

सोशल नेटवर्किंग पर लगाम कसने की खबर से कोहराम मचा हुआ है। राजनीतिक व सामाजिक स्तर पर बहस जारी है। केन्द्रीय दूर संचार और सूचना टेक्नोलॉजी मंत्री कपिल सिब्बल ने जब यह कहा कि उनका मंत्रालय इंटरनेट में लोगों की छवि खराब करने वाली सामग्री पर रोक लगाने की व्यवस्था विकसित कर रहा है और सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स से आपत्तिजनक सामग्री को हटाने के लिए एक नियामक व्यवस्था बना रही है। हडकंप मचना जाहिर सी बात है। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार का मीडिया पर सेंसर लगाने का कोई इरादा नहीं है। सरकार ने ऐसी वेबसाइट्स से संबंधित सभी पक्षों से बातचीत की है और उनसे इस तरह की सामग्री पर काबू पाने के लिए अपने पर खुद निगरानी रखने का अनुरोध किया। लेकिन सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स के संचालकों ने इस बारे में कोई ठोस जवाब नहीं दिया।

सवाल उठता है कि आज सरकार की सोच को सरकारी नजरिये से देखते हुए, उस सोच के खिलाफ आवाजें उठ रही हैं। लेकिन वहीं सवाल यह भी है कि क्या अभिव्यक्ति की आजादी के मायने यह नहीं कि, फेसबुक, ट्विटर, गूगल, याहू और यू-ट्यूब जैसी वेबसाइट्स को लोगों की धार्मिक भावनाओं, विचारों और व्यक्तिगत भावना से खेले तथा अश्लील तस्वीरें पोस्ट करें ? उनके व्यक्ति विशेष के उपर असंवैधानिक बातें/फोटो डाले ? देखा जाये तो सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स पर जो कुछ हो रहा है क्या उसे अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर स्वीकार कर लिया जाये ? थोड़ी देर के लिए इसे राजनीतिक दृष्टिकोण से हटा दिया जाये और सामाजिक पहलू को सामने रख देखा जाये तो क्या, हमारे व आपका चेहरा हो और नग्न धड़ किसी और का हो ? अगर यह स्वीकार है तो फिर गलथोथरी करते रहिये। क्योंकि सोशल नेटवर्किंग वेबसाइट्स पर जो खतरा है वह है इस पर तेजी से अपसंकृति का फैलना व अश्लील सामग्रियों का साम्राज्य कायम होना।

इस बात से इंकार नहीं कि जा सकता है कि अंतरजाल के माध्यम से आज सोशल नेटवर्किंग का तिलस्मी दुनिया स्थापित हो चुकी है। वैष्विककरण के दौर में सोशल नेटवर्किंग का मायाजाल दिनोंदिन अपने जाल में लोगों को फांसता ही जा रहा है। इसका नशा बच्चे, बुढ़ें और जवानों पर सर चढ़ बोल रहा है। खासकर युवाओं के उपर इसका नशा इस कदर चढ़ चुका है कि उसकी कल्पना नहीं की जा सकती है। घंटों इससे चिपके रहते हैं। सोशल नेटवर्किंग को संवाद अदायगी के तौर पर देखा जा रहा है जहाँ जनांदोलन, सामाजिक मुद्दों व सत्ता परिर्वत्तन के नाम पर गोलबंदी की दुहाई भी दी जा रही है। इसका स्वप्न काफी मीठा है। इसके मिठास में खास ‘‘मीठापन’’ है वह है सोशल नेटवर्किंग के माध्यम से अश्लीलता व अपराध का बढ़ता मायाजाल, जो अपसंस्कृति को खुल्लेआम बढ़ावा दे रहा है।

संवाद के आदान-प्रदान का कारगर हथियार सोशल नेटवर्किंग है। इस पर कोई खास प्रतिबंध नहीं है। किसी का डर-भय नहीं है। बेटा अपने बाप से छुपाकर, बाप, बेटे से तो पति, पत्नी से और पत्ती, पति से यानी हर कोई इस तिलस्म से चोरी छुपे या खुल कर जुड़ना चाहता है। और इस जुड़ाव के केन्द्र में ज्यादातर युवक-युवतियां है। अपने शरीरिक आर्कषण से महिलाएं, पुरूषों को लुभाती व न्यौता देते दिखती हैं तो वहीं पुरूष भला क्यों पीछे रहे वह भी अपने शरीरिक आर्कषण से महिलाओं को लुभाते व न्यौता देते दिखते हैं।

सोशल नेटवर्किंग पर फर्जीवाड़ों का जमावड़ा है। उलटे-सीधे पोस्ट के आड़ में ये युवक-युवतियां फर्जी भी है और हकीकत में भी। इनके आर्कषण का इस बात से अंदाजा लगाया जा सकता है कि इनके दोस्तों की संख्या हजारों में होती है और उनके पेज को पसंद करने वालों की संख्या भी हजारों का आंकड़ा पार होता है। यह सब सुंदर चेहरे जुड़ाव के कारण बनते हैं और उनके बीच अश्लील सामग्रियों का अदान-प्रदान शुरू हो जाता है।

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  संजय कुमार
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