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विदेशी मिट्टी में देशी संस्कारों की महक

प्रकाशन :मंगलवार, 7 फरवरी 2012
कृष्ण कुमार अग्रवाल

वेब पत्रिका ‘अभिव्यक्ति’ द्वारा आयोजित ‘अन्तर्राष्ट्रीय कथा महोत्सव’ के अन्तर्गत प्रकाशित कहानियों का संकलन ‘वतन से दूर’ शीर्षक कहानी-संग्रह के रूप में प्रकाशित हुआ है। जिसका संपादन पूर्णिमा वर्मन ने किया है। प्रत्येक सोमवार को इंटरनेट पर प्रकाशित होने वाली इस वेबजीन की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस पत्रिका के माध्यम से अनेक नवोदित प्रवासी लेखकों को एक सशक्त मंच प्राप्त हुआ। प्रस्तुत संकलन में अमेरिका, ब्रिटेन, कनाड़ा तथा नार्वे में बसे भारतीय लेखकों की 13 कहानियां संकलित हैं। इन कहानियों को पढ़ना रोमांचक है क्योंकि इनमें स्वदेशी तथा विदेशी परिवेश को एक साथ अनुभव किया जा सकता है। इन कहानियों के लेखक वे भारतीय हैं जो अपनी मेधा और प्रतिभा के दम पर विदेश में महत्वपूर्ण मुकाम पर हैं। इन कहानियों में एक तरफ जहां परंपरागत भारतीय समाज की विसंगतियों से मुक्ति का प्रयास परिलक्षित होता है वहीं भारतीय जीवनादर्शों तथा मूल्यों को सहेजने-संवारने का भी स्तुत्य प्रयत्न किया गया है।

संग्रह की पहली कहानी अश्विन गांधी की ‘अनजाना सफर’ मारुआना के नशे में चूर दो दोस्तों अमर और चार्ली की कथा है। इस कहानी में नशे के शौकीन इन दो दोस्तों के माध्यम से कहानीकार यह रेखांकित करने में सफल रहा है कि नशा हमें खुशी नहीं अपितु गम देता है। एलकोहॉल और मरुआना के नशे में बेहोश अमर जब होश संभालता है तो कहता है- ‘किसी अनजानी जगह पहुँच गया। शुरुआत ठीक रही मगर जहाँ पहुँचा वहाँ मैं दुखी रहा। कंट्रोल नहीं था और शक्ति भी गायब थी। खुश हूँ कि मैं जाने-पहचाने जगत में लौट आया। मैं फिर वहाँ नहीं जाऊँगा।’ (पृ. 22)

सुरेन्द्रनाथ तिवारी की कहानी ‘उपलब्धियां’ संवेदनहीन तथा प्रोफेशनलिज्म के इस युग में आस्थाओं तथा भावनाओं की मृत्यु को दर्शाती है। कथावाचक अपने मित्र ब्रिगेडियर बहल के मृत शरीर के पास बैठकर पुरानी यादों में खोए हुए हैं। वे याद करते हैं कि ब्रिगेडियर बहल जो सेना के दबंग तथा साहसी अधिकारी हुआ करते थे, सेवानिवृत्ति के बाद जीवन के अंतिम क्षणों में कितने टूट-बिखर गए थे। जिन बच्चों के सुखद भविष्य के लिए उन्होंने ब्रिगेडियर होने के गुरूर को ताक पर रखकर टेकनीशियन की नौकरी की, वही बेटा उनके अंतिम संस्कार के समय अपनी जिम्मेवारियों से भाग रहा है। बेटे द्वारा कथावाचक को कहे गए ये शब्द- ‘किशोर जी, मुझे इसके बारे में कुछ भी पता नहीं है कि क्या क्या करना होगा डेडबॉडी के साथ। और मुझे परसों ही मैक्सिको जाना है... दो मिलियन के कान्ट्रेक्ट का सवाल है... मैंने ही निगोशिएट किया है।‘ (पृ. 28) हमारी संपूर्ण चेतना को झकझोर कर रख देते हैं।

शैल अग्रवाल की कहानी ‘वापसी’ हेमंत मिश्रा और परमिंदर लांबा के प्यार की कहानी है। हेमंत और पम्मी शादी करना चाहते हैं परंतु पम्मी की मम्मी धोखे से उसे भारत बुला लेती है और अपनी पसंद से उसकी शादी तय कर देते हैं। पम्मी अपने घर-परिवार की मान-मर्यादा के लिए अपनी खुशियों तथा आकांक्षाओं का गला घोंट देती है। मिस रूथ विलकिन्स के साथ पम्मी को वापस लेने आए हेमंत को पम्मी कहती है- ‘हमारे शास्त्र कहते हैं कि सामूहिक हित के लिए किया गया निर्णय सौदा नहीं त्याग होता है और मैं ही क्या हमारे यहाँ तो हजारों पम्मियाँ सदियों से ही करती आ रही हैं। स्वयंवर और नारी-हित की बातें करने वाले इस देश में बस यही होता आया है। पहले राधा-कृष्ण अलग किए जाते हैं फिर उनके मंदिर बना दिए जाते हैं।...आदत डाल लो तो समुंदर में तैरती मछली भी खुशी-खुशी काँच के बॉल में तैरने लग जाती है।’ (पृ. 42) परंपरा तथा आधुनिकता के अन्तर्द्वन्द्व में फंसी पम्मी अंततः हेमंत के साथ जाने को तैयार हो जाती है और खास बात तो यह कि उसकी दादी भी उसकी वापसी के लिए अपनी सहर्ष सहमति देती है।

कृष्ण बिहारी की ‘जड़ों से कटने पर’ ईमानदारी के बदले मुसीबत में फंसे दो मित्रों की कहानी है। परंतु कहानी ईमानदारी के प्रति भरोसा नहीं उठने देती अपितु सच्चाई की ताकत को दर्शाती है। सुरेशचंद्र शुक्ल की कहानी ‘मंजिल के करीब’ में नस्लभेद के यथार्थ और इंसानी रिश्तों की मिठास को अभिव्यक्त किया गया है। नस्लभेद से आहत कथानायक की पीड़ा थोम द्वारा सांझी की जाती है। कथानायक परदेश में परायों के बीच स्वयं को उपेक्षित महसूस करता है और थोम अपने परिवार में अपने ही बच्चों द्वारा अपमानित है। दोनों एक-दूसरे में अपने लिए इज्जत और प्यार पाते हैं। उषा वर्मा की कहानी ‘रौनी’ नस्लभेद के शिकार एक मासूम बच्चे की कहानी है। क्लास टीचर मि. यूबर्ट के गुस्से और खीझ के शिकार मासूम रौनी को वजह-बेवजह उनकी मार-पीट तथा अत्याचार को सहन करना पड़ता है। कहानी तथाकथित सभ्य और आधुनिक देशों में नस्लभेद के शिकार हजारों लोगों के दर्द, पीड़ा और संघर्ष को बेहद मार्मिक ढंग से उजागर करती है। स्कूल में सभी अध्यापकों तथा सहपाठियों के बीच हमेशा उसे तिरस्कार ही मिलता है। निरपराध जेल में बंद अपनी मां को याद करता रौनी रोते-रोते अपनी मां से अक्सर ख्यालों में बात करता है।

वह कहता है- ‘मैं तो पीछे बैठता हूँ और ये सलीम खुद क्या है। मुझे कभी निगर, कभी ब्लैकी या सि...द्दी... कहता है। वह भी तो पाकी है। लेकिन उसकी मां रोज आती है उसको लेने लेकिन मेरी मां...ममा तुम कहाँ हो, तुम्हें वे जेल क्यों ले गए। ममा ये लड़के मुझे चारों तरफ से घेर कर खड़े हैं, मुझे इतना डर लगता है ममा। मेरे पैर कांपने लगते हैं। मैं तो भाग भी नहीं पाता ममा। रहीम मेरी बाजू में दबा-दबा कर नाखून से खरोंच लगा देता है, कभी मेरे बालों को खींचता है। क्यों ममा, मैं तुम्हारे पास रहूँगा तो कोई मुझे नहीं सताएगा। मैं काला हूँ तो क्या। मैं इन सबसे तेज दौड़ता हूँ। आएँ मेरे साथ रेस करें, मैं आगे निकल कर न दिखा दूँ तो कहें।’ (पृ. 72-73) स्कूल में नई-नई आई मिस रीमा के मन में रौनी के प्रति दया, सहानुभूति और स्नेह की भावना है। रौनी मिस रीमा में अपनी मां को पाता है। मिस रीमा रौनी की सहायता करना चाहती है परंतु अपनी नौकरी गंवाने से डरती है। रौनी को गहरी चोट आने पर सोशल वर्कर और रौनी की फौस्टर मदर जांच के लिए स्कूल आते हैं तो मिस रीमा उन्हें सारी घटना बता देती हैं। उषा वर्मा जिस संवेदना से यह कहानी कहती हैं उससे पाठक बेचैन हो उठता है। नस्लभेद के घिनौनेपन को नंगा कर मानवता की वकालत करती है यह कहानी।

पूर्णिमा वर्मन ने अपनी कहानी ‘यों ही चलते हुए’ में भारतीयों की सामासिक तथा सामंजस्यपूर्ण सभ्यता और संस्कृति को बड़े ही तार्किक ढंग से बयान किया है। वसुधैव कुटुम्बकम् में विश्वास रखने वाले भारतीय किसी भी चौखाने में बंद न होकर तमाम भेदभावों से ऊपर उठकर इंसानियत तथा मानवीय धरातल पर जीते हैं, यही इस कहानी का संदेश है। प्रेम जनमेजय की कहानी ‘क्षितिज पर उड़ती स्कारलेट आयबिस’ की श्रुति अपनी दीदी सुधा के बिना एक पल भी नहीं रह पाती। दोनों बहनों की शादी त्रिनिडाड के एक अच्छे परिवार में हो जाती है। ससुराल में सभी सुख-सुविधाओं के बीच श्रुति का व्यवहार बिल्कुल परिवर्तित हो जाता है। अतिमहत्वाकांक्षी श्रुति न तो अपनी दीदी की कोई बात सुनती और न ही पति नवीन का ही कोई बस उस पर चलता है। सभी संबंधों से अलग श्रुति अकेले ही अन्तर्दन्द्वग्रस्त जीवन व्यतीत करती हुई समुद्र में खो जाती है।

दीपिका जोशी की कहानी ‘सदाफूली’ कुवैत में रह रहे दो भारतीय परिवारों के संवेदनात्मक रिश्ते को अभिव्यक्त करती है। जुही को पड़ोसी भारतीय परिवार की लड़की तृष्णा के प्रति अतिरिक्त स्नेह और चिंता है। उसे इस परिवार में तृष्णा के पापा के दफ्तर में काम करने वाले यशराज का जरुरत से ज्यादा आना-जाना खलता है और इस बारे में वह वासंती को कई दफा समझा भी चुकी है। परंतु वही होता है जिसका जुही को डर था। तृष्णा और यशराज की शादी करके भारत भेज दिया जाता है। जुही अपनी भारत यात्रा पर तृष्णा से मिलना नहीं भूलती। कहानी में अंततः तृष्णा और यशराज दोनों ही आत्महत्या कर लेते हैं। नादान प्रेम की असफलता को दर्शाती है यह कहानी।

गौतम सचदेव की कहानी ‘आकाश की बेटी’ साधना नाम की स्त्री के त्यागपूर्ण तथा संघर्षमय जीवन की कथा है। घर-परिवार के सारे रिश्तों को तोड़कर व तमाम सुख-सुविधाओं को छोड़कर जिस देविंदर के प्यार के लिए साधना झूठ बोलकर इंग्लैंड चली जाती है, वहाँ जाने पर देविंदर द्वारा छली जाती है। देविंदर का रुखा व्यवहार तथा एक अन्य ब्रिटिश मेम शाइला से प्यार उसे तलाक के लिए मजबूर कर देता है। दूसरी शादी में भी उसे इसी प्रकार की समस्याओं से दो-चार होना पड़ता है। वह अपनी बेटी बबली को भी गंवा देती है। अपने घर के दालान में कबूतरों को दाना चुगाती साधना के जीवन में आई एक नई कबूतरी, जिसकी शरारतें कुछ-कुछ बबली से मिलती-जुलती हैं। अब साधना उसी के इंतजार में रहती है और उसी को जीने का सहारा मानकर खुश रहती है।

सुषम बेदी की कहानी ‘अवसान’ में शंकर अपने दोस्त दिवाकर का अंतिम संस्कार हिंदू रीति से करना चाहता है परंतु उसकी अमेरिकी पत्नी हेलन चर्च में ही सारी औपचारिकताएं पूरी करना चाहती है। चर्च में पादरी की ओल्ड टेस्टामेंट की पंक्तियों के बीच शंकर का मन बेचैन है। पादरी की क्रिया खत्म होते ही शंकर गीता के श्लोकोच्चारण से अपने मित्र के अंतिम संस्कार की क्रिया को पूर्ण करता है। अब वह बहुत संयत तथा हल्का महसूस करता है। सुमन कुमार घेई की कहानी ‘स्मृतियां’ केनेडा में बसे भारतीय परिवारों के आपसी सहयोग, सहानुभूति तथा अपनेपन को दर्शाती है।

संग्रह की अंतिम कहानी उषा राजे सक्सेना की ‘बीमा बीस्माट’ एक बिल्कुल नये कथानक से पाठकों को परिचित कराती है। कहानी एक शिक्षिका द्वारा एक अर्धविक्षिप्त बालक बीमा बीस्माट को एक जिम्मेवार ब्रिटिश नागरिक बनाने की कडी मेहनत, लगन और समर्पण को प्रस्तुत करती है।

संग्रह की सभी कहानियां कहीं-न-कहीं स्वदेश से गहरा लगाव रखती हैं और विदेश में रहते हुए भारतीय मूल्यों तथा आदर्शों में विश्वास रखती हैं। लगभग सभी कहानियां चकाचौंध से भरे विदेशी परिवेश के प्रति हमारे अनेक पूर्वाग्रहों तथा दुराग्रहों को दूर करती हैं। अकेलेपन, अजनबीपन तथा दो संस्कृतियों के बीच रह रहे प्रवासी भारतीयों के जीवन के संगत-विसंगत को इन कहानियों में महसूस किया जा सकता है। विदेशी मिट्टी में देशी संस्कारों की सौंधी महक से सराबोर इन कहानियों से गुजरते हुए अपने देश, अपनी मिट्टी और अपनी संस्कृति के प्रति आस्था और विश्वास में बढौतरी होती है।

कृति:वतन से दूर
संपादक:पूर्णिमा वर्मन
प्रकाशक:जनसुलभ पेपरबैक्स, बरेली (उ.प्र.)
मूल्य:60 रुपये
प्रथम सं: 2011
पृ. संख्या:163
  कृष्ण कुमार अग्रवाल
शोधार्थी,
हिन्दी विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय,कुरुक्षेत्र,
1163, सेक्टर-13,
कुरुक्षेत्र-136 118,
मो. 90342-86388
aggarwalkk83@gmail.com
 
         
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