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मेघ सलौने

प्रकाशन :रविवार, 28 अगस्त 2011
देवेंद्र आर्य
मेघ सलौने
भारी-भारी बस्ते लेकर
मेघ सलौने फिर
सावन-भादौं की शाला में
पढ़ने आए हैं।

जेठ दुपहरी देख
किसी कोने में दुबक गए
कभी देख पुरवाई नभ में
मन-मन हुलस गए।

नन्ही-नन्ही आँखों में
खुशियाँ भर लाए हैं।

कभी जेब से
ओलों की टॉफी ले निकल पड़े
कभी किसी कोमल टहनी पर
मुतियन हार जड़े।

स्वाति बूँद बन कभी
सीप का मन हुलसाए हैं।

नटखट बचपन बन
उलटा दी स्याही अंबर पर
इंद्रधनुष निकाल बस्ते से
फेंक दिया घर-घर।

बिजली पर चढ़
ढोल नगाड़े
खूब बजाए हैं।

कभी नदी के घाट नहाने
मिलकर निकले हैं
धरती के कण-कण को छूकर
हरषे-सरसे हैं।

हंसों की पाँतों सा
सजकर
नभ पर छाए हैं।
  देवेंद्र आर्य
वाणी सदन, बी-98,सूर्यनगर,
गाजियाबाद-201011 (उ.प्र.)
 
         
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