श्रेणियाँ

तेरे जाने पे

प्रकाशन :शनिवार, 26 नवम्बर 2011
प्रेमरंजन अनिमेष
तेरे जाने पे भी आंखों में वो पल जिंदा है,
तेरी आवाज में हर एक ग़ज़ल जिंदा है।

कब फना होते हैं जो लोग दिलों में जीते,
खाक बस खाक में लौटी है असल जिंदा है।

आंखें हैं जिनसे कि बच्चे की किलक झांके है,
और हंसी में वही मासूम सा कल जिंदा है।

वक्त के आगे क्या औकात किसी पत्थर की,
ये मुहब्बत ही है जो ताजमहल जिंदा है।

हों भरी पलकें रहे दिल में हरा कुछ हरदम,
इनके चलते ही तो सपनों की फसल जिंदा है।

उम्र कटने को तो कुछ ऐसे भी कट जाएगी,
दफन हम खुद में कहीं अपना बदल जिंदा है।

जिंदगी मौत से हारी न कभी हारेगी,
उसकी ये दरियादिली है कि अजल जिंदा है।

एक बस तेरी कमी है चले आओ "अनिमेष"
देख तो कितनी चहल कितनी पहल जिंदा है।


  प्रेमरंजन अनिमेष
एस-३/२२६, रिजर्व बैंक अधिकारी आवास, गोकुलधाम, गोरेगांव (पूर्व), मुंबई
 
         
Bookmark and Share
टिप्पणी लिखें
 
वाक्यांश खोजें




Bing


Site Search Site Search
लेखागार (Archive)
लेखक की प्रविष्टियाँ

RoboForm: Learn more...