SrijanGatha

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श्रीकांत जिस दिन अठारह साल का हुआ , उसी दिन उन्मादियों ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिरा दी । देश में जगह-जगह दंगे शुरू हो गए जिनमें निर्दोष लोग मारे जाने लगे । उस दिन श्रीकांत देर तक रेडियो और टी.वी. पर ख़बरें देखता-सुनता रहा । आज़ाद भारत के इतिहास में एक और काला अध्याय जुड़ गया था । हवा में ज़हर घुला हुआ था । चारो ओर भय , अविश्वास और आतंक का माहौल था । उस रात श्रीकांत को नींद नहीं आई ।
अगले दिन समाचार-पत्र चीख़-चीख़ कर उन्मादियों की घिनौनी करतूत की ख़बरें बता रहे थे । दंगे अब देश में ही नहीं , विदेशों में भी फैल गए थे । धर्म-स्थलों पर हमले हो रहे थे । बेक़सूर लोगों को मारा-काटा जा रहा था । इस उपद्रव का श्रीकांत पर यह प्रभाव पड़ा कि उसे हफ़्तों तक रात में नींद नहीं आई ।
गली में एक-दो मुसलमान परिवार रहते थे । उन दिनों उनके चेहरों पर ख़ौफ़ की परछाईं साफ़ देखी जा सकती थी । श्रीकांत ने अपनी ओर से पूरी कोशिश की कि असुरक्षा के माहौल में उसकी गली में कोई ऐसी-वैसी वारदात न हो जाए । दिन के अलावा वह रात में भी दो-एक बार जुम्मन मियाँ और नफ़ीस अली के घर का चक्कर लगा आता था ।
जुम्मन मियाँ का बेटा इरफ़ान वैसे भी उसका दोस्त था । नफ़ीस अली का लड़का सादिक़ भी उनके साथ गली में क्रिकेट खेला करता था । अब अचानक माहौल में इतना ज़हर घुल गया था कि श्रीकांत बेचैन रहने लगा था । उसकी शिराओं और धमनियों में एक छटपटाहट-सी भर गई थी । कई हफ़्तों तक उसने रातें जगे रह कर बिस्तर पर उलटते-पलटते हुए बिताईं ।
घर में जब माँ को यह पता चला कि श्रीकांत की रातों की नींद उड़ गई है तो वह चिंतित हुई । श्रीकांत के पिता एक हादसे में पहले ही चल बसे थे । माँ ने श्रीकांत को वैद-हकीमों से लेकर डॉक्टरों तक सबको दिखाया , पर दवाइयों का भी कोई फ़ायदा नहीं हुआ । नींद की गोलियाँ भी बेकार गईं । उसकी रातों की नींद हफ़्तों वापस नहीं लौटी । उसकी पलकें सूज गईं । आँखें लाल रहने लगीं । इसी बेचैनी की हालत में श्रीकांत ने सांप्रदायिक तनाव से जुड़े कई स्केच और कई पेंटिंग्स बना डालीं । हफ़्तों बाद जब हालात कुछ सामान्य हुए तब उसकी नींद ख़ुद-ब-ख़ुद लौट आई ।
फिर तो यह एक नियम-सा बन गया । जब भी कहीं दंगे-फ़साद होते या कोई आतंकवादी घटना होती जिसमें निर्दोष नागरिक मारे जाते तो श्रीकांत की रातों की नींद फिर से उड़ जाती । जब स्थिति सामान्य हो जाती तो उसकी हालत भी ठीक हो जाती । चूँकि इस अजीब मामले में इलाज से कोई फायदा नहीं होता था , इसलिए श्रीकांत ने हालात से समझौता कर लिया ।
कई बरस गुज़र गए । श्रीकांत की पढ़ाई ख़त्म हो गई । एक अच्छी कम्पनी में उसकी नौकरी लग गई । फिर उसकी शादी हो गई और कुछ साल बाद उसे एक बेटा हुआ । धीरे-धीरे बेटा बड़ा हो गया ।
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एक बार श्रीकांत तेज बुखार में बीमार पड़ा हुआ था । पड़ोस में एक शादी थी । वहाँ जाना ज़रूरी था । पत्नी ने श्रीकांत को दवाई पिला कर कहा , " आप आराम कीजिए । मैं और मनु शादी में हो आते हैं । थोड़ी देर में वापस आ जाएँगे ।"
यह कह कर पत्नी और बेटा शादी में चले गए ।
थोड़ी देर बाद जब दवा के असर से श्रीकांत का बुखार उतरा तो बिस्तर पर लेटे-लेटे वह बोरियत महसूस करने लगा । उठ कर उसने पानी पिया और वह खिडकी तक गया । पड़ोस में से बैंड-बाजों की आवाज़ आ रही थी । शायद बारात आ गई थी । पटाखे चलाए जा रहे थे । अचानक श्रीकांत को कुछ ठंड-सी लगी । भीतर वाले कमरे से कम्बल उठा लाया जाए -- उसने सोचा । भीतर वाले छोटे कमरे में से कंबल उठाते हुए श्रीकांत की निगाह कोने में पड़े एक पुराने लोहे के ट्रंक पर पड़ी । उसे बरसों से खोला नहीं गया था । जब उसकी माँ जीवित थी तो वही उसमें कुछ-न-कुछ रखती-निकालती थी । माँ की मृत्यु के बाद बरसों से वह ट्रंक यूँ ही अनछुआ पड़ा था । अपने भीतर एक रहस्यमयी दुनिया समेटे ।
श्रीकांत को उत्सुकता हुई । धूल और मकड़ी के जालों को हटाते हुए उसने धीरे से वह ट्रंक खोला । एक सीलन भरी गंध ने उसका स्वागत किया । माँ के कपड़ों के बीच अचानक उसकी निगाह एक पुरानी डायरी पर पड़ी । उसके पिताजी का नाम डायरी पर साफ़ पढ़ा जा रहा था ।

श्रीकांत की उत्सुकता और बढ़ गई । पिताजी की डायरी ? डायरी खोलकर उसने कुछ पन्ने पलटे । काग़ज़ पीले पड़ चुके थे । अचानक एक पृष्ठ पर उसकी निगाह ठिठक गई । डायरी में लिखा था -- जून 1975 में देश में एमरजेंसी लागू हो गई । सरकार विरोधियों को पकड़-पकड़ कर जेलों में बंद करने लगी । सभी मौलिक अधिकार स्थगित कर दिए गए । ज़बरन नसबंदी अभियान चलाया जाने लगा । जनता की आवाज़ पर सेंसर लग गया । उन्हीं दिनों मैं अठारह साल का हुआ और मेरी रातों की नींद उड़ गई । हालाँकि व्यक्तिगत तौर पर मेरे साथ कुछ नहीं हुआ था पर देश के हालात देखकर मैं सो नहीं पाता था । सारी रात बिस्तर पर करवटें बदलते हुए बीतती थी । मैं हफ़्तों , महीनों नहीं सो पाया । घरवालों ने आयुर्वेदिक , होम्योपैथी , ऐलोपैथिक -- सभी क़िस्म की दवाइयाँ खिलाईं । पर कोई फायदा नहीं हुआ । नींद नहीं आनी थी । सो नहीं आई । जब देश से एमरजेंसी हटाई गई तब जा कर मेरी नींद वापस लौटी ... 1984 में इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद जब सिखों के विरुद्ध दंगे शुरू हो गए और हज़ारों निर्दोष सिखों को जान से मार डाला गया तो एक बार फिर मेरी रातों की नींद उड़ गई । उस दौरान मैंने कई सिख पड़ोसियों को अपने घर में छिपा कर दंगाइयों से उनकी जान बचाई ।

बाद में जब स्थिति सामान्य हुई तब जा कर मेरी नींद वापस लौटी ...श्रीकांत अवाक् था । यह क्या ? उस के पिता को भी कठिन समय में उपद्रवों के बाद नींद नहीं आती थी ? वे भी अन्यायपूर्ण स्थिति नहीं सह पाते थे ? उसे तो यह बात किसी ने नहीं बताई । माँ ने भी नहीं । उसने डायरी के कुछ पृष्ठ पलटे । एक पन्ने पर उसकी निगाह फिर अटक गई । डायरी में उसके पिता ने उसके दादा के बारे में लिखा था --पिताजी ने मुझे बताया था कि अगस्त 1947 में जब वे अठारह साल के हुए तब देश को आज़ादी मिलने वाली थी । पर देश का बँटवारा कर दिया गया था । पाकिस्तान बनने वाला था और पूरे देश में दंगे-फ़सादों का क़हर था । हज़ारों-लाखों की संख्या में लोग दंगाइयों के हाथों मारे जा रहे थे । स्त्रियों और बच्चों को भी नहीं बख़्शा जा रहा था । रेलगाड़ियों में एक ओर से दूसरी ओर भागने वाले सैकड़ों लोगों को बेरहमी से काट डाला जा रहा था ।

अविभाजित पंजाब की गलियाँ मारे गए लोगों से भरी पड़ी थीं ।
अंतिम-संस्कार करने वाला कोई नहीं बचा था । लाशों को गिद्ध नोच-नोच कर खा रहे थे । कई जगहों पर गिद्धों ने इतना खा लिया था कि वे उड़ नहीं पा रहे थे । ऐसे समय में पिताजी अठारह साल के हुए और उनकी रातों की नींद उड़ गई । इन उपद्रवों में उनका या उनके परिवार का कोई नुक़सान नहीं हुआ था पर इंसान
के भीतर मौजूद दरिंदगी देख कर उनकी आत्मा छलनी हो गई थी ।
उनका दिल यह वहशीपन देख कर बिलखता था । वे महीनों तक रात में सो नहीं पाए । सारी रात बेचैनी से करवट बदलते रहते । उन्होंने अपने मोहल्ले के कई मुसलमान परिवारों की दंगों के समय रक्षा की और अपनी जान पर खेल कर भी सकुशल पाकिस्तान जाने में उनकी मदद की । गाँधीजी में पिताजी की बड़ी आस्था थी ।
जनवरी , 1948 में गाँधीजी की हत्या से उन्हें गहरा सदमा लगा ।
उन उथल-पुथल भरे वर्षों में उनकी रातों की नींद ग़ायब हो गई ।
घरवालों ने उनका बहुत इलाज कराया , पर कोई फ़ायदा नहीं
हुआ । बहुत बाद में जब स्थिति सामान्य हुई तब जा कर उनकी
आँखों में नींद वापस लौटी ...
पढ़ते-पढ़ते श्रीकांत के हाथ थरथराने लगे । तो क्या दादाजी भी अन्याय और अत्याचार नहीं सह पाते थे ? तो क्या यह सब उसके यहाँ पीढ़ी-दर-पीढ़ी चला आ रहा था ?
उसने डायरी के कुछ पृष्ठ और पलटे । एक पृष्ठ पर उसकी निगाहें फिर जम गईं । उसके पिता ने आगे डायरी में उसके पर-दादा के बारे में लिखा था --
पिताजी ने मुझे बताया कि दादाजी जब 1919 में अठारह साल के हुए , उसी समय देश में जलियाँवाला कांड हो गया जिसमें अंग्रेज़ फ़ौज ने अमृतसर में सैकड़ों लोगों को गोलियों से भून दिया । इस बर्बरता ने दादाजी की भी रातों की नींद उड़ा दी ।
हालाँकि उनके घर-परिवार में से कोई हताहत नहीं हुआ था पर दादाजी इस वहशी कांड की निर्ममता से इतने उद्विग्न हुए कि वे रात में सो नहीं पाते थे । अमृतसर में अंग्रेज़ फ़ौज ने ' मार्शल लॉ 'लगा दिया था । आम जनता पर अत्याचार किए जा रहे थे । उस दौरान दादाजी ने परोक्ष रूप से क्रांतिकारियों की मदद भी की थी । पर कई महीनों तक उन्हें नींद नहीं आई । स्थिति सामान्य होने के बाद ही उनकी नींद वापस लौटी ...इसी तरह जब अंग्रेज़ों ने भगत सिंह , राजगुरु और सुखदेव को फाँसी दे दी तो दादाजी को गहरा आघात पहुँचा था और उनके दिन का चैन और रातों की नींद फिर उड़ गई थी । महीनों बाद जा कर वे सामान्य हो पाए थे ...श्रीकांत की आँखें भर आईं । यह सब उसे विरासत में मिला था । उसने डायरी के कुछ पृष्ठ और पलटे । एक पृष्ठ पर उसके पिता ने आगे लिखा था --पिताजी ने मुझे यह भी बताया कि हमारे एक पूर्वज 1857 की क्रांति के समय अठारह वर्ष के हुए । तभी जगह-जगह अंग्रेज़ों के विरुद्ध संघर्ष का बिगुल बज उठा था जिसे अंग्रेज़ों ने कुचल दिया । उन उथल-पुथल भरे वर्षों में विजयी अंग्रेज़ों ने जगह-जगह स्थानीय लोगों पर बहुत अत्याचार किए थे । लोगों को तोपों की नली में डालकर गोलों से उड़ा दिया जाता था । इस ज़ुल्म की वजह से हमारे इस पूर्वज की भी रातों की नींद उड़ गई थी । जब अंग्रेज़ों ने दिल्ली को घेर लिया था तब हमारे यह पूर्वज भी अंग्रेज़ों के विरुद्ध लड़े थे । जब पराजय निश्चित हो गई तो वे भी किसी तरह जान बचा कर छिपते-छिपाते हुए
निकल भागे थे । बहादुरशाह ज़फ़र के पुत्रों का वध और उन्हें रंगून में क़ैद किए जाने का ग़म हमारे इस पूर्वज को बेधता रहा ।
उन्हें बरसों नींद नहीं आई थी ...तभी दरवाज़े पर दस्तक हुई । यह सब पढ़कर श्रीकांत का सिर चकरा रहा था । किसी तरह उसने खुद को सहेजा । पिता की डायरी वापस ट्रंक में रखकर उसने ट्रंक बंद कर दिया । पत्नी और बेटा शादी से लौट आए थे ।
" अब कैसी तबीयत है , पापा ? " बेटे ने पूछा ।
" बुखार कम है । " उसने धीरे से कहा ।
" आप आराम कीजिए , " पत्नी सिर पर हाथ रखते हुए बोली ।
इधर कुछ समय से श्रीकांत को फिर से नींद नहीं आ रही थी । पहले दलित छात्र रोहित वेमुला को प्रताड़ित करके आत्महत्या की राह पर धकेला गया था । फिर गुजरात के ऊना में दलितों के विरुद्ध हिंसक घटनाएँ हुई थीं । खैरलाँजी और मिर्चपुर जैसी लम्बी शृंखला में एक नाम और जुड़ गया था । निर्दोष लोगों का उत्पीड़न हो रहा था । कट्टरपंथियों के हाथों वे मारे जा रहे थे ।
" पापा , आप से कुछ कहना चाहता हूँ । " बेटा था ।
" बोलो बेटा , क्या बात है ? " श्रीकांत ने पूछा ।
" पापा , पिछले कुछ दिनों से मुझे रात में नींद नहीं आ रही । मन उद्विग्न है । पहले ऐसा कभी नहीं हुआ था । " बेटा चिंतित स्वर में बोला ।
" बेटा , किसी बात की टेंशन है क्या ? "
" पापा , गुजरात के ऊना में दलितों के ख़िलाफ़ हिंसा हुई है । वहाँ निर्दोष लोग मारे जा रहे हैं । दलितों को सताया जा रहा है । " बेटा कह रहा था , " मैंने इस के बारे में एक कहानी भी लिखी है ... "
और अचानक श्रीकांत सारी बात समझ गया । कुछ दिन पहले बेटा अठारह साल का हो गया था ।
" कल रात मैंने माँ से लेकर ' स्लीपिंग-पिल्स ' खाए थे । फिर भी रात में नींद नहीं आई । " बेटा कह रहा था ।
कमाल की बात थी । एक ओर देश-विदेश में जगह-जगह अन्याय और अत्याचार हो रहा था । धर्मांध और कट्टर लोग जगह-जगह आतंक फैला रहे थे । साम्प्रदायिक तत्व दलितों और अल्पसंख्यकों को अपना निशाना बना रहे थे । निर्दोष लोगों का ख़ून बहाया जा रहा था । दूसरी ओर गैंडे की खाल वाले लोग इस सब से बेख़बर टी. वी. पर ' रियलिटी शो ' देख रहे थे । बाज़ार को ख़रीद कर अपने घर ला रहे थे , और चैन की नींद सो पा रहे थे । ये कैसे लोग थे -- श्रीकांत ने सोचा ।
श्रीकांत बिस्तर से उठा और ट्रंक में से पिता की डायरी निकाल लाया ।
" बेटा , यह तुम्हारे दादाजी की डायरी है । इसे सम्भाल कर रखना । इसे पढ़ते ही तुम सब समझ जाओगे । " श्रीकांत ने पिता की डायरी बेटे के हाथों में थमा दी और प्यार से उसे चूम लिया ।
फिर वह दलितों पर हो रहे अत्याचार पर लिखी बेटे की कहानी पढ़ने लगा ।
कहानी की पहली पंक्ति थी -- " इंसानियत ज़िंदा रहने के लिए छटपटा रही है ... "