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 हे मेरे आकाश सरीखे आत्मन
देखो तो
तुम्हे देखते रहने की ख़ुशी और आनंद
में डूबती उतराती हुई कैसी लग रही हूँ मैं ---

तुम्हारा इतनी ऊँचाइयों पर होना
कोई साधारण बात तो हैं नही..
पहुँचना तो चाहती हूँ तुम तक
किन्तु नहीं होता हौसला ---

क्योंकि मेरी सामर्थ्य से
मेरी हर कोशिश
छिटक छिटक जाती है बाहर
और,पंख भी तो अभी छोटे हैं मेरे . ... !!

हे मेरे अचीन्हे अतिथि !
मेरे जीवन की प्रभाती

वर्षों से प्रतीक्षारत
जिसकी बाट जोहती मैं

मेरे अनुत्तरित प्रश्नों के उत्तर
कहीं तुम ही तो नहीं ..?

सच सच बतलाना !