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लेखकों को दोहरा जीवन जीना पड़ता है

प्रकाशन :मंगलवार, 6 सितम्बर 2011
जया केतकी
59 वर्षीय मदन सोनी भारत-भवन के प्रशासक हैं। आगामी वर्ष में सेवानिवृत होने वाले मदन जी ने 25 वर्षों तक पूर्वग्रह का संपादन किया। मदन सोनी सागर के देवरी क्षेत्र के महाराजपुर ग्राम से हैं। अपने आप को भोपाल का ही मानते हुए कहते हैं कि पिछले 30 साल से यहाँ रहते हुए मैं ऐसा महसूस करता हूँ कि यह मेरी जन्मभूमि और यही कर्मभूमि है।

मूलतः किस क्षेत्र से हैं मदन जी ?
उत्तर - अगर यह कहूँ कि मैं भोपाल का नहीं हूँ तो ठीक नहीं होगा, क्योंकि पिछले 30 सालों से भोपाल में ही रहता हूँ । मूलतः सागर से हूँ और जीविकोपार्जन के लिए भोपाल आया। मेरी प्रारंभिक शिक्षा सागर जिले के छोटे-छोटे गाँवों में हुई। दरअसल मेरे पिता फारेस्ट विभाग में थे। उनका तबादला कई गांवों में होता रहा और मैं भी उनके साथ-साथ रहा।
आपके इस प्रश्न पर मुझे याद आता है कि होली पर हम एक पत्रिका निकालते थे संयुक्तांक। उसमें जगदीश स्वामीनाथन और अशोक वाजपेयी जी का एक काल्पनिक इन्टरव्यू छापा करते थे। उसके लिए जब अशोक वाजपेयी जी जगदीश स्वामीनाथन का इन्टरव्यू ले रहे थे, उन्होंने सबसे पहला प्रश्न किया जगदीश तुम्हारा नाम क्या है?
रचनाक्रम का सिलसिला कब शुरू हुआ?
उत्तर- मेरे होने और मेरे लेखक होने के बीच में भेद करना बहुत मुश्किल है। मैं ये जानता हूँ और मानता भी हूँ कि मेरी और मेरे लेखन की उम्र में कोई अंतर नहीं। जब से मैंने होश सम्हाला, चेतना का जागरण हुआ, खुद को शब्दों के आकर्षण में पाया। आसपास के वातावरण को इस माध्यम के थ्रू देखना शुरु किया जिसे साहित्य कहते हैं। हाईस्कूल यानी ग्यारहवीं, बारहवीं में पढ़ता था तभी से कविताएं लिखता रहा। आपको जानकर निराशा होगी कि अब कवि के रूप में नहीं जाना जाता। अधिकान्शतः लेखन की शुरूआत कविता लेखन से होती है। सभी के अंदर एक कवि होता है और सब कविता कर सकते हैं। अपने आसपास के प्रकृति सौन्दर्य को देखकर सबके मन में कविता उत्पन्न होती है। ये अलग बात है कि कोई लेखन के माध्यम से उसे प्रस्तुत कर देता है और कोई नहीं कर पाता। अब एक आलोचक हूँ।
 आपकी प्रिय विधा ?
उत्तर- आलोचना ही मेरी प्रिय विधा है। इसे मैं दो तरह से देखता हूँ। एक तो वह विधा जिसमें मैं लिखता हूँ क्योंकि उसके साथ मेरा संबंध कुछ-कुछ वैसा है जैसे जो सबसे प्रिय व्यक्ति होता है उससे झगड़ा भी सबसे ज्यादा होता हैं, उसी तरह मैंने भी अपनी सबसे प्रिय रचनाओं की आलोचना की। आलोचना ही मेरे होने का प्रमाण है। दूसरों की कविताओं की आलोचना से मैंने लेखन आरंभ किया। जिसमें मैं संलग्न हूँ।
वर्तमान में उपन्यास की आलोचना लिखने का विचार है। निर्मल वर्मा की कहानियों पर पूरी किताब लिखी। मेरी सबसे पहली रचना कविता ही थी। बस इतना याद है कि बसंत ऋतु थी आम पर बौर आ गए थे और अमराई पर ही मैंने वह कविता लिखी थी। इनफेक्ट उसी अमराई को देखकर मेरे अंदर वह भाव उपजे और मैंने कविता लिखी। 1970 में निराला के प्रति शीर्षक से मैंने भी कविता लिखी। निराला के प्रति इस शीर्षक से बहुत से लोगों ने इस शीर्षक से कविता लिखी है।
मदन जी मुख्यतः आलोचक हैं, वर्तमान कहानियों और कहानीकारों के बारे में आपकी राय?
उत्तर- हाँ यही कहूँगा कि कथानक, शिल्प आदि सभी में बदलाव है। विषयों के बढ़ने का प्रभाव दिखता है। उन्हें अपने आप को माँजने के लिए पढ़ना अधिक चाहिए। किस्सा गोई लगभग खत्म है।
कोई ऐसी रचना जो आपको प्रिय है?
उत्तर- मैं समझता हूँ एक रचना नहीं। लेखक को तो सब प्रिय है जो उसने लिखा है। इसे मैं दो तरह से कह सकता हूँ। एक तो मेरी जो अपनी एक भाषा है, इसके लिए मैंने बहुत पढ़ा है। संसार भर का साहित्य पढ़ता हूँ। मेरे अत्यन्त प्रिय लेखक हैं निर्मल वर्मा। उनके साहित्य पर मैंने एक पूरी पुस्तक बिना किसी बाहरी उत्प्रेरणा के लिखी। अपनी स्वयं की आंतरिक उत्प्रेरणा से। मेरे प्रिय लेखकों कि बहुत लंबी लिस्ट है। इसमें दोस्तोवस्की भी शामिल हैं, मार्खेज भी हैं। परन्तु निर्मल वर्मा आप कह सकती हैं सबसे प्रिय हैं। मेरे कुछ प्रिय कवियों में शमशेर, अज्ञेय, निराला।
 कितने वर्षों हुए भारत भवन से जुड़े ?
उत्तर-मैं 1980 में भोपाल आया। 1982 में भारत भवन बना। पहले अलाउद्दीन खाँ संगीत अकादमी कला परिषद के नाम से जाना जाता था। कला परिषद के प्रकाशन विभाग के माध्यम से मैं उससे जुड़ा। फिर सांस्कृतिक विभाग का निर्माण और उससे जुड़ा रहा। केवल इसके भौतिक निर्माण से नहीं, बल्कि उसके सांस्कृतिक निर्माण से भी जुड़ा रहा। उसके बाद 1986 से पूर्वग्रह पत्रिका के प्रकाशन से, फिर बाद के वर्षों में उसके संपादन से जुड़ा रहा। मैं सौभाग्यशाली हूँ कि लगभग 25 साल से सेवा में हूँ। मुझे भारत भवन के जन्म से ही उसके साथ जुड़ने का अवसर मिला।
अशोक वाजपेयी का जिक्र आया तो उनसे आपके संबंध?
उत्तर- आरंभ में तो उनसे जो संबंध बने वह एक अधिकारी और कर्मचारी के ही रहे। पर अशोक वाजपेयी की फितरत बहुत अलग किस्म की है। वे कला परिषद के सचिव और संस्कृति विभाग के विशेष सचिव हुआ करते थे। भारत-भवन के प्रकाशन विभाग में उनके मातहत काम करता था। 1984-85 की बात है मैंने उनकी एक बड़ी प्रसिद्ध किताब पर तीखी प्रतिक्रिया लिखी। जब मैंने उस समीक्षा को छपाया तो उन्होंने उसकी तारीफ की। मुझे बहुत डर था कि उनकी क्या प्रतिक्रिया होगी इस पर। परंतु मैंने जो लिखा था उसके शिल्प की उन्होंने प्रशंसा की। तभी से उनसे मेरे संबंध मित्रवत हुए और आज भी हैं। अब वे मेरे अंतरंग मित्र हैं और मैं उनके अजीज मित्रों में से हूँ।
रचना कार से प्रशासक के इस सफर को कैसे तय किया?
उत्तर- दरअसल, हिन्दुस्तान में लेखकों को दोहरा जीवन जीना ही पड़ता है। लेखन और बुनियादी पैशन के बीच एक कनफ्ल्सिक्ट सा देखने को हमेशा मिलता है। क्योंकि लेखक को जीविकोपार्जन के लिए कुछ न कुछ करना ही पड़ता है। अपने यहाँ ऐसा नहीं है कि केवल लेखन से ही जीविका चल जाए। शायद और देशों में हो भी। यह निश्चय ही दो विपरीत परिस्थिति के कार्यों का साधने जैसी बात है। मैं दोनों को साधता रहा हूँ। थोड़ी मेहनत लगन और आपसी सामन्जस्य बहुत जरूरी है। परस्पर विरोधी चीजों को साधना मुश्किल होता है। देखिए जिम्मेदारियाँ आएं तो निभाना पड़ता है। मैंने कभी भी नहीं सोचा कि मैं भारत भवन का प्रशासक बनूँ। कुछ परिस्थियों के चलते मुझे यह जिम्मेदारी सौंपी गई। और मैं निर्वाह कर रहा हूँ। उससे मेरी भौतिक और मानसिक दोनों प्रकार की व्यस्तताएं बढ़ी हैं। पर जल्दी ही इससे मुक्त होने वाला हूँ। इस माह के अंत में ही मेरा रिटायरमेन्ट है।

 साहित्य सेवा है व्यवसाय नहीं, आप कितना सहमत हैं?
उत्तर- निश्चय ही साहित्य व्यवसाय नहीं है, तब भी जब निर्मल वर्मा जैसे लोगों ने इसको किया है। ये दो बिल्कुल अलग तरह की चीजें हैं। एक तो पैसे के लिए लोग लिखते हैं, ऐसी बात हमारी संस्कृति में नहीं है। संगीतकारों के लिए यह सुविधा है। कुछ हद तक चित्रकारों के लिए भी है कि वे अपना पारिश्रमिक तय कर लेते हैं और अपनी कला के आधार पर जीविका भी चला लेते है। यह सच है कि साहित्य में धन नहीं है। उससे जीविका नहीं चल सकती। खासकर उन लेखकों के लिए जो लोक कला और साहित्य से जुड़े हैं, जीविका के लिए दूसरा पर्याय जरूरी है। अन्य कलाओं में है पर लेखन में बहुत कम। आमलोग कला और साहित्य से दूर भागते हैं। जिससे लोग दूर भागते हों मेरी दृष्टि में वह व्यवसाय नहीं हो सकता। इसमें कोई निश्चितता नहीं है।
 लेखन शैली पर किसका प्रभाव है?
उत्तर- इस सवाल का जवाब मैं क्या दूँ मैं सोचता हूँ कोई और इसका जवाब दे तो ठीक रहेगा। जिन्होंने मुझे पढ़ा है और मेरे लेखन की गहराई को देखा, समझा है। पर दो लोगों का प्रभाव मेरे लेखन पर दिखता है। एक तो मैं समझता हूँ मलयज हैं जो बड़े राष्ट्रीय स्तर के आलोचक हैं और दूसरे स्वयं अशोक बाजपेयी जी हैं जिनका प्रभाव दिखता है। निर्मल वर्मा से मैं बहुत प्रभावित रहा हूँ, पर मेरे लिखने पर उनका जरा भी प्रभाव नहीं रहा। हिन्दी के तो दो लेखक मलयज और अशोक जी ही हैं। हाँ बाहर के कुछ और हो सकते हैं क्योंकि मैं पढ़ता बहुत हूँ पर वो मुझे स्वयं नहीं पता।
 किन साहित्यकारों को पढ़ना चाहते हैं मदन जी?
उत्तर- भारतीय तो मुक्तिबोध, अज्ञेय, शमशेर, प्रसाद, निराला। इसके अलावा दुनिया भर का साहित्य मैं पढ़ता हूँ। मेरे सबसे पसंदीदा चिन्तक और विचारक विदेशी रचनाकार हैं जॉन देरीदा। इनका मुझ पर गहरा प्रभाव दिखता है। थोड़े मुश्किल लेखक, कॉम्प्रिहेन्सिव हैं। यह वो लेखक हैं जिन्होंने पिछली सदी में दर्शन और चिन्तन के क्षेत्र में नया आगाज जोड़ा। दुभाग्य से वे अब हमारे बीच नहीं हैं। सामाजिक परिवर्तन में का्रंतिकारी विचारों वाले कुछ भारतीय लेखक हैं, उनका भी प्रभाव है। मेरे लेखन में उनका प्रभाव है या नहीं मैं नहीं जानता।
साहित्य के अलावा आपकी रुचि का क्षेत्र?
उत्तर- शुरू से उपन्यास लेखन की इच्छा रखता हूँ। उसका कुछ हद तक काम मैंने कर लिया है। मैं गुप्त रूप से उसे लिखने में लगा हूँ बहुत समय से जो पूर्ण रूप से मेरी आटोबायोग्राफी होगी। आटोबायोग्राफी लिखने की इच्छा है। दूसरा अनुवाद करना मुझे अच्छा लगता है। काफी काम किया है मैंने अनुवाद के क्षेत्र में। मैंने कुछ प्रमुख रचनाकारों के अनुवाद किए हैं। शेक्सपियर की रचना, अंबर टेको की नेम ऑफ द रोज नामक पुस्तक का अनुवाद किया है। हाल ही में कालीदास की रचना को मैंने बुन्देली में रूपान्तरित किया है। बहुत से नाटकों का अनुवाद किया है। बहुत से साहित्य चिन्तन संबंधी लेखों का अनुवाद किया है। जान देरीदा के आलेखों का अनुवाद भी मैंने किया है। आप कह सकती हैं कि आलोचना के अलावा ट्रांसलेशन भी मेरी रुचि का क्षेत्र है।
 मंच पर होने वाले नाटकों के दर्शकों के बारे में क्या कहेंगे?
उत्तर- इस बात का अगर में नपा-तुला उत्तर अपने भोपाल के अनुभव के आधार पर दूँ तो अन्य प्रस्तुतियों के अलावा नाटकों में सबसे अधिक भीड़ होती है। कई रंग मंडलियाँ काम कर रहीं हैं इस समय। चूँकि में भारत-भवन से जुड़ा हुआ हूँ तो मेरा यह निजी अनुभव है कि संगीत के मुकाबले, चित्रकला के मुकाबले, नृत्य के मुकाबले नाटक के दर्शक इस समय सबसे ज्यादा हैं। वो नाटक कैसे होते हैं यह अलग बात है। परन्तु नाटकों का अब वो स्तर नहीं रहा। इसका एक कारण और भी है कि लाइव नाटक को देखना पसंद करते हैं। शायद दर्शक अन्य माध्यमों से बोर हो गए हैं और लाइव प्रोग्राम को देखना चाहते हैं। हबीब तनवीर, बंसी कौल आदि के नाटकों में तो हाउस फुल होता है।
कला और सामाजिक सरोकार में मीडिया की भूमिका?
उत्तर-मीडिया की क्या भूमिका है और क्या होनी चाहिए ये दोनों अलग तरह से विचारणीय बाते हैं। आप खुद जानती हैं कि हमारे देश में इस समय 100 से भी अधिक मीडिया हाउस काम कर रहे हैं, मीडिया नेटवर्क हैं। चैनलों की बाढ़ है। हर विषय के लिए अलग चैनल है। पर कला के लिए एक भी नहीं। दूरदर्शन पर भी एकाध कोई कार्यक्रम आता है पर टाइम बहुत कम है। इससे जाहिर है कोई कला के बारे में गंभीरता से नहीं सोचता। गंभीर किस्म की कला पर चैनल तो छोड़िए कोई कार्यक्रम भी नियमित नहीं होते। कोई दिलचस्पी नहीं लेता। यह बड़ा ही दुर्भाग्य है। गंभीर किस्म की कला में मीडिया के किसी अखबार या किसी भी माध्यम में कला की खबरों के अलावा कुछ खास सामग्री नहीं होती। थोड़ा बहुत भास्कर है। हाँ मैं यह कह सकता हूँ जनसत्ता एक ऐसा अखबार है जो कला में कुछ रुचि ले रहा है। अन्य विषयों के लिए बीट तय है पर कल के लिए अलग से कोई बीट नहीं। कोई एक्सपर्ट भी नहीं रखे जाते। किसी दूसरी बीट का रिपोर्टर ही कवरेज कर रहा है। कार्यक्रम शुरु होने से थोड़ी पहले आकर वह राग आदि के बारे में पूछ लेता है और खबर बना देता है। जब उसमें कोई स्वयं कि ख्वाहिश ही नहीं है तो वह क्या कर पाएगा इसमें सहज ही संदेह है।
 मीडिया समाज को बहका रहा है, आपको क्या लगता है?
उत्तर- यह नहीं कहूँगा कि मीडिया रुचि नहीं लेता या बहका रहा है। पर समाज के सरोकार में ठीक है। मीडिया को समाज की समस्याएं, समाधान जो कला के माध्यम से देना चाहिए वह ऐसा नहीं कर रहा है। कला के क्षेत्र में मीडिया की जो भूमिका होना चाहिए ऐसी नहीं है। शायद मीडिया कला में कम विश्वास करता है। इस समय समाज की नब्ज पहचानने में यदि कोई आगे है तो वह कला है। कला ही सबसे करीब है मानव मन को टटोलने में। मैं यह नहीं कहता कि हर अखबार को कला से ही ओतप्रोत होना चाहिए, मैं जानता हूँ हर अखबार की अपनी सीमाएं हैं, लोक जरूरतों और लोकरुचि की बात है। परन्तु मीडिया केवल सूचना एकत्र कर भण्डाफोड़ कर रहा है लेकिन उससे उबरने के बेहतर उपाय नहीं सुझा रहा। मेरे हिसाब से यदि मीडिया कला के माध्यम से समाज तक पहुँचे, उनकी समस्याएं समझे और उपाय सुझाए तो ये ज्यादा बेहतर तरीका है। यह बात जरूर है कि मीडिया हमारे सिस्टम को ट्राँस्पेरेन्ट जरूर बना रहा है पर अधिक ट्राँसपरेंसी से भी समाज को खतरा है। यह एक इविल बन जाती है। इससे सब कुछ बहुत ज्यादा खुल जाता है। कोई रहस्य नहीं रह जाता। इससे जीवन सुन्दर नहीं रह जाता। आपको जब सबके बारे में सब पता हो जाता है तो भी जीवन का मजा नहीं रह जाता। मैं मानता हूँ कि लोकतंत्र की बहुत बड़ी जरूरत है ट्राँसपरेंसी पर उसकी सीमा होना चाहिए।

 आप सागर से हैं तो मैं एक प्रश्न सागर से लेना चाहूँगी। दिनोंदिन बढ़ रहे आधुनिकता के प्रभाव के बारे में बताएं।
उत्तर- हमारा युवा आजकल एकदम टिपिकल किस्म का है। जिसको आप आधुनिक कह रही हैं वह आधुनिकता दरअसल एक दृष्टि है और दृष्टि बुद्धि पर, विवेक पर जोर डालने वाली दृष्टि है। लेकिन विचित्र सी स्थिति है। एक ओर तो हमारा युवावर्ग बहुत बड़े पैमाने पर आकर्षित है, विज्ञान के प्रति, टेक्नालॉजी के प्रति। दूसरी ओर उसमें विचित्र किस्म का दकियानूसी भाव भी दिखाई देता है। सागर पर भी विश्व का प्रभाव है अन्य शहरों की तरह। परन्तु जितनी सांस्कृतिक पहचान उसे मिलना चाहिए थी उतनी नहीं मिली। सबसे बड़ी बात है कौन प्रयास करे। नगर का विकास भी सही तरीके से नहीं हुआ। आज भी वहाँ बड़ी संख्या में बीड़ी मजदूर हैं। क्षेत्र के सम्यक विकास के लिए प्रयास ही नहीं किए गए। सरकार ने भी किसी प्रकार की दिलचस्पी नहीं दिखाई। साहित्य और संस्कृति का विकास तो बिल्कुल नहीं हुआ। करण यह कि वहाँ साहित्यकार तो बहुत हुए पर सब बाहर निकल गए। जितने भी साहित्यकार हुए वहाँ, वे सभी जीविकोपार्जन के लिए बाहर निकल गए। सरकारों ने भी यत्न नहीं किए जिस प्रकार होने चाहिए थे।
युवा वर्ग पर पड़ रहे आधुनिकता के विषय में क्या कहेंगे?
उत्तर- आधुनिकता में आकर्षण तो है पर आज के युवा की मनोदशा बड़ी टिपीकल है। आधुनिकता एक दृष्टि है बुद्धि के विवेक पर जोर डालने की। विज्ञान और तकनीक के प्रति आकर्षण, झुकाव, लगाव सब ठीक है। परन्तु जब आज का युवा कहीं-कहीं दकियानूसी हो जाता है तो मुझे आश्चर्य होता है। और उसके आधुनिक होने पर संदेह भी। खासकर मध्यम वर्ग में ज्यादा। मसलन कि एम ओर तो वह आधुनिम ढंग से रहना, खाना, घूमना चाहता है पर जैसे है कोई मंदिर देखता है, सिर झुकाए बिना नहीं रह पाता। यह जो दोहरी मानसिकता है वह कहीं न कहीं उसे भटका रही है। न तो वह पूरी तरह से आधुनिक हो पा रहा है और न ही पूरी तरह दकियानूसी। और इसलिए विवेकपूर्ण ढंग से विकास नहीं हो पा रहा। उसकी यह विचित्र किस्म की धर्मभीरुता दिखाई दे रही है। ऐसा लगता है वह कम सिक्यूलर सा है। बहुत रेशनल ढंग से उसका विकास हो रहा है इसमें मुझे संदेह है। मैं चाहता हूँ कि मेरा यह संदेह गलत निकले। भारतीय ढंग से भी देखा जाए तो ऐसा लगता है कि भारतीय धर्म का स्वरूप ठीक ढंग से नहीं साधा जा रहा। पैगन या बहुदैव वादी जो धर्म में उसे भी ठीक ढंग से नहीं अपना रहा। न ही वह पूरी तरह से आधुनिकतावाद यानी पश्चिम को अपना पा रहा है। आज का युवा एक प्रकार से बीच की स्थिति में है।
कौनसा मुकाम हासिल करना चाहते हैं, मदन जी ?
उत्तर- अभी तक तो मेरे जीवन में कोई मकाम नहीं आया है। इनफैक्ट साहित्यकारों के जीवन में मकाम नहीं आते। उनका जीवन तो दौड़-भाग से भरा होता है। बड़ी धीमी चाल होती है साहित्यकार की। मैंने उसके बारे में कुछ निश्चित भी नहीं किया। बस चलते रहना है। पढ़ना है। जब भी कोई प्रेरणा मिले लिखना है। मेरा अगला मकाम है कि मेरी उपन्यास पूरी हो जाए। फिर कोई दूसरा शुरु हो जाए। एक के बाद एक रास्ते के डग भरना है।

कला और कलावाद पर जो आरोप लगाए गए, आपका क्या कहना है?
उत्तर-अगर मैं इस बारे में कुछ नहीं कहूँगा तो मुझे यह कहा जाएगा कि मैं खुद को बचा रहा हूँ। थोड़े से उन लेखकों का एक समूह, जो आम लेखक थे, जो किसी गुट में शामिल नहीं थे, उन्हें कलावादी कह दिया गया। उसमें मैं भी था, अशोक बाजपेयी जी भी थे। भारत-भवन को कलावाद का गढ़ कहा गया। कुछ संगठनों ने उसे भोपाल स्कूल, भोपाल घराना कहा। हिन्दी में असल में हमेशा एक ध्रुवीकरण सा रहा है। खासकर उन लेखकोंं ने जो किसी लेखकसंघ के अंदर रहकर काम कर रहे थे। भारत-भवन से जुड़ा जो लेखक था वह किसी भी संघ का सदस्य नहीं हो सकता था। भारत-भवन का स्वरूप पूरी तरह से डेमोक्रेटिक रहा। इसका स्वरूप् पूरी तरह से वामपंथी रहा है। यहाँ नामवर सिंह भी आते हैं, निर्मल वर्मा भी आते रहे, नेमीचंद जैन भी आते रहे। बाद के वर्षों में अज्ञेय भी आए। कुल मिलाकर इसका बहुत ही डेमोक्रेटिक रूप रहा है। मैं नहीं जानता कि कलावाद से इन लोगों का क्या आशय रहा है। वे ही इसका अर्थ बता सकेंगे। हमस ब तो अपनी-अपनी तरह से अपने देश के प्रति, कला के प्रति अपनी तरह से रिस्पांड करते रहे। हम लोंगों ने किसी आइडियोलाजी के आधार पर अपने विचार नहीं बदले। इसीलिए जो जनवादी या प्रगतिशील नहीं हुए उन्हें यानी हम लोगों को कलावादी कहा गया। प्रमुख बात तो यह है कि कलावाद के अर्थ पर ही प्रश्न चिन्ह लगा हुआ है। हम सभी अपनी सेवा के प्रति, कला के प्रति कर्मठ रहे। लोगों को क्या है वह तो कहते ही रहते हैं।
 आज के ड्रामा की दिशा और दशा क्या है?
उत्तर- बहुत आश्वस्त करने वाली तो दिखाई नहीं देती है। भारत की कई नाटक मंडलियाँ हैं जो अच्छे और स्तरीय नाटकों का प्रस्तुतीकरण कर रही हैं। पर में यह कहूँगा कि नाटक का डेक्लाइन तो हुआ है। कुछ ही अच्छे हैं, पणिक्कर की सोपानम, पूर्वांचल में रतनथियम जो ड्रामा के लिए काम कर रहे हैं और अच्छा काम कर रहे हैं। इन दो चार को छोड़ दे ंतो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के भी मैंने नाटक देखे हैं, पर यह काफी नहीं है। मैं इसे सबसे अधिक कम्युनिकेबल, सबसे अधिक संप्रेषणीय माध्यम मानता हूँ फिर भी उसके स्तर में उठाव नहीं है। मणिपुर के रतन थियम ने आधुनिक थियेटर को साधने की कोशिश की और सृजनात्मक प्रक्रिया को भी निर्धारित किया। फिर भी नाटक का भविष्य बहुत बेहतर नहीं कहा जा सकता। इसमें स्वतः जागृत प्रतिभाओं की आवश्यकता हैं।

कला और साहित्य को सम्मानजनक स्तर तक पहुँचाने के लिए क्या करना चाहिए?
उत्तर-साहित्यकारों को तो वही करना चाहिए जो वह कर रहे हैं, उन्हें प्रतिबद्ध होकर लिखना चाहिए। जिसके बारे में वे लिखें उससे भी ज्यादा प्रतिबद्धता की आवश्यकता है। मेरा यह कहना बड़ा अमानवीय सा लगेगा कि जिस मनुष्य के लिए साहित्य लिखा जाता है साहित्यकार को उससे भी ज्यादा प्रतिबद्ध साहित्य के साथ होना चाहिए। तभी वह मनुष्य के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को जाहिर कर पाएगा। जिम्मेदारी तो दरअसल साहित्य के प्रति तो सभी की है। देश में साहित्य और कला तभी फले-फूलेगी । निजी स्तर पर भी उन्मुख होना जरूरी है। लेखक का स्वयं का योगदान बहुत जरूरी है। पुस्तकें पढ़ें। एक बात और मैं कहूँ हमारी सिविल सोसाइटी भी इसके प्रति उदासीन है। लाइब्रेरी नहीं हैं। जहाँ हैं वहाँ पढ़ने की सुविधा नहीं है। सरकार के प्रयत्न मात्र से कला और साहित्य का विकास नहीं हो सकता। उसके लिए सिविल सोसाइटी की जागरूकता जरूरी है। मुख्य जिम्मेदारी समाज की है।
कोई यादगार संस्मरण।
उत्तर-कोई विशेष तो नहीं। पर जब मैं पहली बार निर्मल वर्मा से मिला वह आज भी याद है। उनसे पहली बार मिलना। उनके उपन्यास पर मेरी कमजोर सी समीक्षा छपी थी। तब तक उन्हें देखा नहीं था। उन्हें आमने-सामने देखना बहुत अच्छा लगा।
पूर्वग्रह के संपादन का क्या अनुभव रहा।
उत्तर- 1981 में सहसंपादक के रूप में जुड़ा। पूर्वग्रह के 101 अंक तक मैं सहसंपादक रहा। 102 अंक से संपादक बना दिया गया। 14-15 अंक निकाले मैंने। 6-7 साल पहले तक जुड़ा रहा।
आपको पहला देवी शंकर अवस्थी अवार्ड मिला। कैसा लगा?
उत्तर- हिन्दी आलोचना के लिए दिया जाने वाला यह एकमात्र पुरस्कार है। इसमें धनराशि वगैरह तो उतनी नहीं है पर यह हिन्दी के प्रतिष्ठित पुरस्कारों में से एक है। यह किसी किताब को आधार बना कर दिया जाता है। मेरी पुस्तक विषयान्तर के उपर मुझे दिया गया था। इसकी सबसे बड़ी बात है कि यह निजी उपक्रमों पर आधारित पुरस्कार है।
 कोई प्रेरणा स्त्रोत?
उत्तर- मेरी माँ, उसके बाद पिताजी। बाद के दिनों में लेखकों और मित्रों के नाम छोड़ दे तो मेरी पत्नी। मेरी पत्नी न लेखक है और न पाठक, पर यह उसकी उदारता और उसकी सहिष्णुता कहें कि उसने मुझे सृजन का कार्य करने दिया बिना किसी व्यवधान के।
युवाओं के लिए कोई संदेश?
उत्तर- मेरा युवाओं के लिए जो संदेश है, पता नहीं कितने युवा उसे ग्रहण करना चाहेंगे। हर युवा को अपनी दिनचर्या में एक घण्टे पढ़ना जरूर चाहिए। लिट्रेचर, पुस्तक, साहित्य, उपन्यास, कविता, कहानी, जो चाहें पढ़े। अपने देश का साहित्य, कला की परंपराएं, उनके स्थापन में संलग्न रहें। दिलचस्पी लें। आज का युवा जानता सब है। पर करना नहीं चाहता। समृद्ध कला का ज्ञान प्राप्त करे। कला को समृद्ध करने में आगे आए। अब तो संसाधनों की भी कोई कमी नहीं है।
  जया केतकी
45, मंसब मंजिल रोड,
कोहेफिज़ा, भोपाल,
मध्यप्रदेश-462001.
jaya.ems@gmail.com
 
         
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