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कला की अन्यो सरणि‍यों के बि‍ना रंगकर्म सम्भव नहीं।

प्रकाशन :मंगलवार, 1 नवम्बर 2011
वंदना शुक्ला
कथाकार-नाटककार और रंगचिंतकहृषिकेश 'सुलभ' हृषीकेश सुलभ से समकालीन रंगपरि‍दृश्य पर वंदना शुक्ला की बातचीत
यद्यपि रंगमंच के क्षेत्र में आज कुछ सामान्य विसंगतियाँ दिखाई दे रही हैं जैसे पिछले कुछ वर्षों से हिंदी नाटकों के लेखन में कमी आई है! अनूदित/अनुवादित नाटकों को खेला जा रहा है! इससे हिंदी रंगमंच कि अस्मिता को कोई नुकसान?

उत्तर : आप जि‍न्हेंं वि‍संगति‍याँ कहती हैं, मैं उन्हेंा अन्त‍र्द्वन्द्वी मानता हूँ। हर समाज और समय के अपने अन्त र्द्वन्द्वे होते हैं। हर कला के अपने अन्तखर्द्वन्द्वि होते हैं। समाज और समय के अन्तपर्द्वन्द्वों से जब यथार्थ टकराता है तो रचना का यथार्थ और रचना का सत्यव उपजता है। और यह यथार्थ और सत्यव जब कलाओं की संरचना के लि‍ए उपयोग में आनेवाली युक्तिस‍यों से टकराता है तब उसका सौन्दबर्यशास्त्र वि‍कसि‍त होता है और सम्प्रे षणीयता के नए आयाम वि‍कसि‍त होते हैं। हि‍न्दीत रंगमंच का यह दुर्भाग्या रहा है कि‍ वहाँ अन्त र्द्वन्द्वों से टकराहट कम है। अधि‍कांश रंगकर्म अपने समय की हलचलों से कटा हुआ है या सतही रूप से जुड़ा हुआ है। भारतीय समाज में पि‍छले कुछ सालों में व्या पक परि‍वर्तन हुए हैं। अन्तार्वि‍रोधों की टकराहट बढ़ी है। यथार्थ के नए रूप सामने आ रहे हैं और पुराना यथार्थ भी अपना रूप बदलकर प्रकट हो रहा है। इसकी समझ और वि‍वेचना के लि‍ए जि‍स बौद्धि‍क अभ्याअस की ज़रूरत है, रंगसमाज उससे कटा हुआ है। कि‍सान भूमि‍हीन होते जा रहे हैं। ज़मीन, जंगल और भूगर्भीय सम्प दा पर पूँजीपति‍यों का कब्ज़ाा होता जा रहा है। सत्ताैधारी नि‍रन्त र हिंसक, अराजक और क्रूर होते जा रहे हैं। ज्ञान पर एकाधि‍कार की साज़ि‍श जारी है। सामाजि‍क और सांस्कृ ति‍क आन्दो लनों को कुचला जा रहा है।.....क्याक यह सब हि‍न्दीा रंगमंच पर दि‍ख रहा है? नहीं। ऐसे यथार्थ में हि‍न्दीं रंगमंच की रूचि‍ ही नहीं है।...जहाँ तक नये नाटकों की उपलब्धचता का सवाल है, तो यह सच है कि‍ नाटक कम लि‍खे जा रहे हैं। पहले भी नाटक कम ही लि‍खे जाते रहे हैं। नाटक के लि‍ए यह आवश्यचक है कि‍ रचना में दोनों मूल्यह यानी रंगमूल्यप और साहि‍त्यि ‍क मूल्यथ हों। एक और संकट है कि‍ अधि‍कांश नि‍र्देशक रंगमंच पर असफलता से घबराते हैं। वे सफलता के अपने पहले से अजमाए हुए नुस्खोंध के आधार पर लि‍खे नाटक चाहते हैं। यह सच है कि‍ रंगमंच का साहि‍त्यय से रि‍श्तां क्षीण हुआ है।

इधर कुछ वर्षों से नाटकों में लोक नाट्य का प्रचलन बढ़ा है और इसे नाटक की मुख्य धारा माना जा रहा है। निर्देशकों के इस प्रयास को एक प्रयोग कि तरह देखना चाहिए अथवा नए नाटक न मिल पाने पर विवशता (भरपाई)के तहत !

उत्तर : मुख्यं नाटक या गौण नाटक जैसा कुछ भी नहीं होता। नाटक, केवल नाटक होता है। स्वततन्त्रवता के बाद हमारे रंगमंच का जेसा वि‍कास होना चाहि‍ए था, वैसा नहीं हो सका। हमने अपने सुख-दु:ख को अपने सामाजि‍क संघर्षों को,...अपने जीवन के राग-द्वेष को अपनी रंगभाषा में अभि‍व्यवक्त नहीं कि‍या। हमने प्रस्तु.ति‍ की यथार्थवादी या नैचुरलि‍स्टिम‍क पद्धति‍यों को अपनाया। हमने पश्चिय‍म से एब्संर्डि‍टी को भी ग्रहण कि‍या। पर हम भारतेन्दुद की रंग परम्पभरा को भूल गये। हमने जगदीश चन्द्रक माथुर के समग्र थि‍एटर यानी टोटल थि‍एटर के चि‍न्तदन की अनदेखी की। हालाँकि‍ संस्कृरत रंगमंच की महान परम्पयरा के कई रंगतत्वे हमारे समय के रंगमंच के लि‍ए उपयांगी थे। संस्कृ‍त रंगमंच के अवसान के बाद जि‍न पारम्पवरि‍क नाट्यपद्धति‍यों ने कई सौ सालों तक हमारे जीवन की सांस्कृृति‍क भूख को तृप्त कि‍या, हम उन्हें भी भूल गए। इन पारम्पसरि‍क नाट्यपद्धति‍यों में वंचि‍तों-दलि‍तों के जीवनसंघर्षों को अभि‍व्यगक्तं करने की अपार क्षमता का रचनात्मरक वि‍स्फोिट आज भी देखा जा सकता है। .....;कुछ समय बाद रंगकर्मि‍यों को लगा कि‍ उनकी अभि‍व्योक्तिज‍ के लि‍ए यह पश्चिय‍मोन्मुंख पद्धतियाँ पूरी तरह उपयोगी नहीं हैं और तब उन्हों ने अपने लि‍ए अपनी रंगपरम्पतरा से रंगयुक्तिक‍यों की तलाश शुरु की। हबीब तनवीर के रायल अकादमी ऑफ ड्रामेटि‍क आर्ट्स (लंदन) की पढ़ाई छोड़कर ब्रि‍स्टिल‍ल ओल्डख वि‍क (लंदन) में प्रशि‍क्षि‍त होने के पीछे एक मात्र यही कारण था। सन् 1958 में वहाँ से लौटकर उन्होंकने मृच्छ कटि‍क मंचि‍त कि‍या और हि‍न्दीम रंगमंच पर एक नवीन अवधारण का जन्म हुआ। यहाँ हमें लोक की अवधारणा को भी समझना होगा। हमारा लोक पश्चिष‍म का फोक नहीं है। हमारा लोक बहुत व्याधपक है। लोक या पारम्पररि‍क नाट्य पद्धति‍यों या शैलि‍यों में सब कुछ आज के लि‍ए यानी हमारे समय के लि‍ए उपयोगी हो यह आवश्यकक नहीं। आधुनि‍क रंगमंच के लि‍ए यह आवश्य‍क है कि‍ हम अपने समय और समाज के लि‍ए आवश्यनक तत्वों को ही वहाँ से चुने। परम्पशरा में बहुत कुछ मृत और अनुपयोगी भी होता है। उन्हेंआ छोड़ना होता है। और जो लि‍या जाता है उनमें भी नए भाव भरने के लि‍ए उनकी भंगि‍माओं को तराशना होता है। अगर ऐसा नहीं होता तो हम पुनरुत्थारनवादी बन कर रह जायेंगे। आज भारतीय रंगमंच पर हबीब तनवीर के बाद कई रंगकर्मि‍यों ने इस दि‍शा में महत्व्भारपूर्ण काम कि‍या है।

ये सच है कि किसी भी कला पर उसके समय का यानी सामाजिक,आर्थिक,राजनैतिक और वैचारिक स्थितियों का बहुत प्रभाव होता है। वैश्वीकरण का, (विशेषतौर पर सोवियत संघ के विघटन के बाद) कलाओं पर इस परिवर्तन का प्रभाव?

उत्तर : साहि‍त्यत समाज का एक कलात्मीक उत्पािद है। रंगमंच भी। इस वैश्वीवकरण ने हमें और दरि‍द्र बनाया है। मनुष्य‍ को वैचारि‍क रूप से दि‍वालि‍या बनाया है। इसने मनुष्यस के लालच को हवा दी है। इसकी अभि‍व्ययक्तिव‍ रंगमंच पर भी हो रही है, पर जि‍स आवेग और वैचारि‍क सघनता की आवश्यीकता है, वह कम है। हां, रंगमंच पर वि‍परीत प्रभाव कुछ ज़्नयादा ही है। जैसे रातों रात वैश्वि‍‍क और यशस्वीच बनने और धन कमाने के चक्कपर में कर्इ नि‍र्देशक अपनी ज़मीन और स्थाानीयता से कटकर अबूझ प्रयोगों में मुब्तहला हैं। जबकि‍ वही रंगमंच सार्थक और सफल होता है, जो स्था नीय हो। रंगमंच के संदर्भ में ब. व. कारंथ की यह टि‍प्प णी मैं भूल नहीं पाता हूं कि‍ ‘’ जो अपनी गली और अपने मोहल्लेक का नहीं हो सकता, वह अपने नगर, प्रदेश या देश का भला कैसे हो सकता है!’’

आज समाज में बाजार एक ज़रूरी घटक के रूप में अपना स्थान बना चुका है। और चूँकि साहित्य कलाओं में समाज का प्रतिबिम्ब होना स्वाभाविक घटना है अतः रंगमंच पर बाज़ार का क्या प्रभाव दिखाई देता है? और ये कितना सार्थक या कितना असंगत है, जबकि बाजार कि मुख्य नियति केवल मुनाफा देखना है।

उत्तर : बाज़ार तभी आपकी ओर देखता है जब आप बाज़ार के हि‍त की बात करते हैं। अगर आपसे बाज़ार का हि‍त नहीं सधता तो वह आपको पूछनेवाला नहीं। यह आपके ऊपर नि‍र्भर है कि‍ आप बि‍कने को प्रस्तुआत हैं या लि‍ये लुकाठी हाथ खड़े हैं। इस मुनाफे के खेल में शामि‍ल होनेवाले कला की हर वि‍धा में हैं। रंगमंच अपवाद नहीं।

यथार्थवाद वस्तुतः एक द्रष्टि है ,लेखक जीवन को यथार्थ कि द्रष्टि से देखता है !अनेक नाटकों में जिनमे यथार्थ कि सघन अभिव्यक्ति हुई है , अमूमन वो नाटक अत्यंत सफल रहे हैं ! तो क्या इसका ये अर्थ माना जाये कि फंतासी कि लोकप्रियता घटी है?

उत्तर : यथार्थवाद एक दृष्टि ‍ है, पर नाटक की प्रस्तुति‍शैली के सन्दमर्भ में यह एक रूढ़ पारि‍भाषि‍क शब्द है। इस सन्दकर्भ में इसका वही अर्थ नहीं होता। यह आवश्य क नहीं कि‍ यथार्थ की सघन अभि‍व्यक्ति ‍ के लि‍ए यथार्थवादी शैली में ही प्रस्तुयति‍ हो। भारतीय रंगपरम्पभरा ग़ैर यथार्थवादी रंगशैली की रही है। प्रसाद के नाटक इसी भ्रम का शि‍कार हुए और उन्हें यथार्थवादी शैली का नाटककार मानकर हमारा रंगमंच पश्चिक‍म की शैली में उनके नाटकों की असफल प्रस्तु ति‍याँ करता रहा। हमारे पास उधार ली हुई प्रयोगशाला थी। कारंथजी ने जब स्कलन्द‍गुप्तं का मंचन कि‍या, तब कई लोगों की आँख खुली। भि‍खारी ठाकुर के अभि‍नेता अपने हाथ की लाठी को काँधे पर रखते तो वह बन्दूकक बन जाती और धरती से टि‍काते तो हल। एक चादर तानकर पूरी बारात का दृश्य और उसके दूसरी और दूल्हेत को नि‍रखती लड़की और उसकी सखि‍यों की ठि‍ठोली का दृश्य्। रतन थि‍यम के कर्णभारम् में कुंती के काँधे की एक चादर सरकती है और प्रसव की पीड़दायी प्रक्रि‍या समाप्तर होती है। चक्रव्यु ह में मृदंग के बजाता अभि‍नेता रथ के गति‍शील पहि‍ए में बदल जाता है। प्रोबीर गुहा के नमकीन पानी में एक अभि‍नेत्री के पेट से लाल वस्र्पी नि‍काल उसे चबाने का नाट्य करता अभि‍नेता स्त्रीेभ्रूण हत्याे का ऐसा दृश्या रचता है कि‍ ....ऐसे अनगि‍नत उदाहरण हो सकते हैं।

भरत मुनि का नाट्यशास्त्र नाट्यकला का बीज ग्रन्थ है। उसमे अभिनय को ‘’एक्टिंग’’न मानकर उसके चार भाग बताये गए हैं आंगिक,वाचिक,आहार्य,और सात्विक जो समग्र रूप से संकलित/संयोजित होके अभिनय कहलाते हैं। आंगिक में शारीरिक, मुखज, चेश्ताकृत का प्रयोग, वाचिक में वाणी द्वारा प्रकट होने वाले भावों कि व्याख्या , आहार्य में वेश भूषा, रूप सज्जा, मंच के दृश्यविधान और सात्विक में मनोविज्ञान का दृश्य शील परिवर्तन बताया है। क्या शौकिया/प्रोफेशनल रंगकर्मियों को नाट्य कार्यशालाओं में इसका विस्तृत ज्ञान देना नाट्य शिक्षा कि गुणवत्ता को बढ़ा सकता है ?

उत्तर : हाँ। नाट्यशास्त्र एक दुर्लभ और प्रचीनतम रंगसम्पमदा है। हर कार्यशाला की अपनी सीमा होती है। उस सीमा में इसका शि‍क्षा दी जानी चाहि‍ए। कार्यशाला के स्वकरूप और शि‍क्षक की दृष्टि ‍ पर यह नि‍र्भर करता है।

इसमें संदेह नहीं कि आज महानगरों में नहीं बल्कि छोटे शहरों-कस्बों में रंगमंच को बढ़ावा मिल रहा है। ये ज़रूर है कि पिछले दशक में ( टी वी के प्रकटीकरण के बाद कुछ वक़्त तक )ख़ामोशी रही,लेकिन अब पुनः रंगमंच ने प्रतिस्थापित किया है खुद को !पटना रंगमंच ने देश के रंग परिद्रश्य पर अपनी एक विशेष पहचान बनाई है ! यहाँ के अनेक कलाकारों ने न सिर्फ शौकिया रंगमंच में अपनी उपस्थिति दर्ज की है, बल्कि अनेक नाट्यकर्मियों ने नाट्य विद्ध्यालयों में विधिवत शिक्षा पाई है और देश के विभिन्न हिस्सों में कार्य कर रहे हैं ! अपना अलग शहर चुन चुके हैं क्या इससे स्थानीय रंगमंच को नुकसान हुआ है?

उत्तर : नहीं। कि‍सी के चले जाने से कोई जगह ख़ाली नहीं रहती।...जो हैं, वे पूरी नि‍ष्ठा से काम कर रहे हैं। जो चले गए, उनमें से अधि‍कतर अपना दायि‍त्वत मानकर या अपने गहरे लगाव के कारण आकर काम करते रहते हैं। प्रशि‍क्षण के बाद नई समझ और सोच के साथ उनकी वापसी या आवाजाही पटना या बि‍हार के रंगमंच को नई त्व रा और ऊर्जा देती है। पटना में गजब की ऊर्जा है। यहाँ का रंगवातावरण बेहद प्राणवान् है और हमेशा स्पान्दिद‍त रहता है।

सुलभ जी ,अपने एक जगह लिखा है कि ‘’भिखारी ठाकुर ‘’के प्रभाव में कई मंडलियां बनी थीं ! जो गांव में शादी ब्याह के अवसरों पर अपना प्रदर्शन करती थीं !क्या ‘’लोक नाटय का आकर्षण यही से माना जाये ?

उत्तर : भारतीय समाज में प्रदर्शनकारी कलाओं का उत्सकवधर्मि‍ता से बड़ा गहरा रि‍श्ताी है। आदि‍वासी समाजों में तो आज भी मृत्युद पर उत्स व मनाने की परम्पनरा है। भि‍खारी ठाकुर का नाट्यदल भी शादी-वि‍वाह जैसे मांगलि‍क अवसरों पर प्रदर्शन करता था। पर लोक नाट्य के आकर्षण का यह कारण नहीं। इसका उत्स जीवन के राग-वि‍राग की सहज और आत्मीथय अभि‍व्यरक्तिउ‍ में है।

आजकल लोक रंगमंच कि चर्चा है ‘’अलख नंदन के ‘’नत बुंदेले’’(भोजपुरी) से लेकर ,भिखारी ठाकुर लिखित संजय उपाध्याय द्वारा निर्देशित बिदेसिया ,जिसमे चैती का बहुत आकर्षक स्तेमाल किया गया है ..इनकी लोकप्रियता का अनुमान इनको खेले जाने वाली संख्या से लगाया जा सकता है !तो क्या नाटक का ये रूप नाटक के अन्य अंगों पर भारी है?या हिंदी के कम लिखे नाटकों पर इसे उसकी भरपाई मना जाये ?

उत्तर : नट बुंदेले एक नाट्य संस्था है, जि‍ससे अलखनन्दीन जुड़े हुए हैं। वे बेहद प्रति‍भाशाली और संवेदनशील नि‍र्देशक हैं। वे लोक की व्या पक संवेदना को अपनी प्रस्तुसति‍यों में जगह देते हुए हमारे समय , समाज और जीवन को वि‍स्ता र देते हैं। संजय ने मेरे दो नाटकों (माटीगाड़ी और धरती आबा) को नि‍र्देशि‍त कि‍या है और अमली, माटीगाड़ी, बटोही और धरती आबा के लिए‍ रंगसंगीत भी रचा है। वे कई बार लोक की सांगीति‍कता के रास्ते नाटकों में प्रवेश करते हैं और पारम्पबरि‍क युक्तिव‍यों को आधुनि‍क बोध से पूरि‍त करते हुए नई रंगभाषा रचते हैं।.....;यह हि‍न्दीप रंगमंच का एक रंग है। हमारा रंगपरि‍दृश्ये वि‍वि‍धताओं से भरा हुआ है।

यदि हम साहित्य कला के प्राचीन इतिहास को देखें तो पाएंगे कि उस काल में न सिर्फ साहित्य कलाओं के बीच ,बल्कि एक कला और दूसरी कला के बीच गहरा अंतर्संबंध था !भारतेंदु ने भी नाटक को कई कलाओं से जोड़ा ! तकनिकी बुद्धिवाद के चलते आधुनिक परिप्रेक्ष्य में कला कि स्वायत्तता और स्वतंत्रता कि अवधारणा इतनी घनीभूत हो गई है ,कि हर कला ने अपना एक स्वतंत्र अस्तित्व मान लिया है ! तो क्या ये माना जाएँ कि फैलते बाजारवाद के बीच कलाएं मुल्योंमुखी हो रही हैं ?

उत्तर : रंगमंच की अवधारणा ही अन्यो कलाओं से उसके सघन अन्तजर्सम्बेन्धोंर पर टि‍की है। कला की अन्यु सरणरि‍यों में बि‍ना आवाजाही के रंगकर्म सम्भ्व नहीं। ‘’ फैलते बाजारवाद के बीच कलाएं मुल्योंमुखी हो रही हैं ? ‘’ इससे आपका आशय अगर पैसा पैदा करने के रूझान से है, तो यह सही है कि‍ आज रंगकर्मि‍यों का एक बड़ा तबका परि‍योजनाजीवी और अनुदानजीवी हो गया।

यदि पिछले कुछ दशकों का नाट्य इतिहास देखें तो पाएंगे कि रंगमंच कलाकार रंगमंच कि विधिवत शिक्षा प्राप्त कर खुद को सिनेमाई प्रलोभन से दूर नहीं रख पाए और बड़े परिद्रश्य कि ओर उन्होंने रुख कर लिया !सुप्रसिद्ध लेखक शम्भुनाथ के अनुसार ‘’ बड़े और नामी कलाकार वस्तुतः बड़ी पूंजी के बंधुआ मजदूर बन गए हैं !’’ये मानसिकता आज कितनी प्रासंगिक है?

उत्‍तर : इसके बारे में तरह-तरह के तर्क सामने आते रहे हैं। मैं यह मानने को तैयार नहीं कि‍ रंगमंच के सभी बड़े और नामी कलकार वस्तुतत: बड़ी पूँजी के बँधुआ मज़दूर बन गए हैं। इसी देश में प्रसन्ना़ हैं। प्रवीर गुहा का नाट्यदल नाममात्र का प्रोडक्शँन शुल्क लेकर देश के कोने-कोने में प्रदर्शन करता है। अभी-अभी पटना में नसीरूद्दीन शाह का नाट्यदल बि‍ना कोई प्रोडक्श न शुल्कै लि‍ये मंचन करने आया था। ये सब रंगजगत के बड़े नाम हैं। ऐसे और कई उदाहरण दि‍ए जा सकते हैं।.....;जहाँ तक रंगमंच का प्रशि‍क्षण प्राप्तं कर सि‍नेमा में जाने का सवाल है, तो एक बार मैंने ऐसा ही सवाल राबि‍न दास से पूछा था। उन्हों ने कहा था कि‍ बच्चाम पैदा करने का अधि‍कार आपके हाथ में है, पर चोर बने या साधु यह आपके हाथ में नहीं।....;अभी पि‍छले दि‍नों पटना में आयोजि‍त एक नाट्य समारोह में पटना के रंगमंच से जुड़े फि‍ल्मों के प्रसि‍द्ध अभि‍नेता वि‍नीत कुमार पहुँचे। वे आयोजन से पहले आए एक सामान्ये कार्यकर्ता की तरह स्टेीज पर झाड़ू लगाने से लेकर गेटकीपर तक का काम करते रहे।...;यह प्रशि‍क्षण पर नि‍र्भर करता है। वे भी रानावि‍ से प्रशि‍क्षि‍त हैं पर उसके पहले उनकी नींव की माटी की यह खासि‍यत है कि‍ रंगकर्म उनके जीवन में यह महत्व्प रखता है।.....;शम्भुीनाथजी की बातें कुछ लोगों के लि‍ए सही हैं, पर सब पर लागू नहीं होतीं।

संगीत में आजकल ‘’फ्यूजन ‘’का ज़माना है क्या रंगमंच में भी इस प्रकार के कोई प्रयोग किये जा रहे हैं ?

उत्तर : फ्यूजन के पीछे दृष्टि्‍ क्या है, यह ज़्यादा महत्वपूर्ण है। कुमारजी ने अपनी शास्त्री यता में मालवा के नि‍र्गुण गायन का रंग भरा और आज उनका संगीत हमारी धरोहर है। रंगमंच तो पहले से ही फ्यूजन कला है। यानी यह कई कलाओं का समुच्चउय है। यहाँ कि‍सी भी तरह की शुद्धता के लि‍ए कोई जगह नहीं। इसकी वि‍नम्र ग्रहणशीलता ही इसे अन्यर कलाओं में वि‍शि‍ष्टव स्थाधन दि‍लाती है। रंगमंच को प्रयोगभूमि‍ भी कहा गया है।

कलाओं के ‘’अर्थपूर्ण ‘’और ‘’लोकप्रियता’’कि बीच के विभाजन को आप भी मानते हैं ?

उत्तर : रंगमंच पर जो अर्थपूर्ण होता है वह लोकप्रि‍य भी होता है। अर्थपूर्ण होने का अर्थ दुरूह होना नहीं होता। अर्थपूर्ण रंगकर्म वृहत्तजर समाज में अपना स्थारन बनाता है। रंगमंच अन्य् कलाओं की अपेक्षा जीवंत कला है। उसका रच्यि‍ता और भोक्ताा दोनों रचे जाने के काल में साथ-साथ होते हैं, आमने-सामने या अगल-बगल। दर्शक भी रंग की सृजनप्रक्रि‍या का अभि‍न्न अंग होता है। जो अर्थपूर्ण नहीं होता समाज उसे नकारता है। संस्कृयत रंगमंच की महान परम्पगरा जब अभि‍जन के बीच सि‍मटकर रह गई, जनता ने उसे नकार दि‍या। लोकप्रि‍य पारसी रंगमंच का अवसान भी इसका उदाहरण है। हाँ, जो भी लोकप्रि‍य है, वह सब अर्थपूर्ण हो यह आवश्य क नहीं। अपने समय की लोकरूचि‍ को परि‍ष्कृीत करना भी एक दायि‍त्वर है। इसका नि‍र्वाह भी रंगकर्म को करना होता है। भि‍खारी ठाकुर ने अपने समय में यह काम कि‍या और यही कारण है कि‍ वे आज भी प्रासंगि‍क हैं। उनका रंगमंच बेहद लोकप्रि‍य था। हज़ारों की संख्या में दर्शकों की भीड़ जुटती थी।

  वंदना शुक्ला
डी–200, वि‍द्या वि‍हार, बि‍ट्स कैम्पस, पि‍लानी, राजस्थान-333031, मो.-9928831511
 
         
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