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 हिंदू धर्म से बौद्ध धर्म की यात्रा में आंबेडकर ने पूरे 21 वर्ष का समय लिया। इस बीच उन्होंने विभिन्न धर्मों का अध्ययन किया। उस दौरान विभिन्न धर्मों के आचार्यो की ओर से अनेक प्रलोभन भी आए। लगभग सभी लोकप्रिय धर्मों की विवेचना के उपरांत उन्होंने अंततः बौद्ध धर्म का चयन किया। मृत्यु से मात्र दो महीने पहले। क्या यह धर्मांतरण आवश्यक था? क्या एक धर्म से दूसरे धर्म के बीच की यात्रा तथा नए धर्म को ठोक-बजाकर देखने-परखने के लिए यह अवधि स्वाभाविक मानी जाएगी? ठीक है, धर्मांतरण या धर्म का चयन मनुष्य का निजी मसला है। परंतु आंबेडकर के संदर्भ में वह महज आस्था का विषय नहीं था। हम जानते हैं—वे जीवन-भर एक मिशनरी की तरह काम करते रहे। सरकार में रहकर और बाहर, स्वास्थ्य की परवाह न करते हुए उन्होंने रात-दिन अनथक मेहनत की, ताकि दलितों और पिछड़ों को उनकी दुर्दशा से मुक्ति दिला सकें। ऐसे में अपने बारे में निर्णय लेने का उन्हें समय कहां था? तो क्या धर्मांतरण उनके लिए बाकी कार्यों की अपेक्षा कम महत्त्वपूर्ण मसला था? इतना कि उसे 21 वर्षों तक टाला जा सके। या फिर वे हिंदू धर्म को सुधार के लिए पर्याप्त समय देना चाहते थे? जब उन्हें लगा कि संविधान लागू होने के छह वर्ष बाद भी हिंदू धर्म की स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है, न ही उसमें सुधार की कोई संभावना है तो निराश होकर 1956 में नागपुर में उन्होंने लाखों समर्थकों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। वे धर्म के संगठन-सामर्थ्य का उपयोग दलितों को संगठित करने के लिए करना चाहते थे। इस तरह धर्मांतरण का निर्णय उनके लिए निजी आस्था और विश्वास का मामला कम, हिंदू धर्म पर निर्णायक चोट करने तथा अपने समाज को, उस समाज को जो बिना धर्म के सांस लेना भी असंभव मानता था, एक बेहतर विकल्प की ओर ले जाने की छटपटाहट का नतीजा था।

आंबेडकर के विचारों पर हम कबीर और फुले के अलावा थॉमस पेन, मिल, वाल्तेयर, रूसो, बर्ट्रेंड रसेल, लॉस्की, बैंथम जैसे विचारकों का प्रभाव देखते हैं। इन विचारकों में से अधिकांश परंपरागत धर्म के चंगुल से बाहर थे। मानते थे कि धर्म अल्पज्ञों की बैशाखी है। जिन्हें खुद पर भरोसा नहीं होता वही धर्म की शरणागत होते हैं। धर्म उनकी बौद्धिक पंगुता को कम करने के बजाय उसका लाभ उठाता है। उसका नशा इतना गहरा होता है कि मनुष्य को अपनी निरंतर पांव पसारती पंगुता का एहसास तक नहीं होता। आंबेडकर विद्वता के उच्चतम स्तर को प्राप्त कर चुके नेता, विचारक और समाज सुधारक थे। व्यक्तिगत स्तर पर उन्हें धर्मनुमा बैशाखी की आवश्यकता ही नहीं थी। लेकिन जिस समाज के लिए वे काम कर रहे थे, वह बहुत पिछड़ा हुआ था। शताब्दियों से धर्म के आश्रय में रहते हुए वह उसका अभ्यस्त हो चुका था। धर्म और जीवन को एक-दूसरे का पर्याय मानता था। उन्हीं की खातिर आंबेडकर को एक धर्म से दूसरे धर्म तक की यात्रा करनी पड़ी थी।

सवाल है बौद्ध धर्म ही क्यों? क्या इसलिए कि वह मध्यमार्गी था। उसकी नींव निरीश्वरवाद पर टिकी हुई थी? लेकिन बुद्ध के समय में निरीश्वरवादी विचारक तो और भी कई थे। अजित केशकंबलि, मक्खलि गोशाल, पूर्ण कस्सप, पुकुद कात्यायन, संजय वेलट्ठिपुत्त और कौत्स। वे सब अपने-अपने मत के आचार्य, विद्वान और विचारक थे। बुद्ध से पहले ही वे ब्राह्मण धर्म पर हमला कर समानांतर दर्शनों की स्थापना कर चुके थे। ईश्वर, आत्मा, परमात्मा जैसे विषयों पर उन्हें भरोसा नहीं था। वैदिक कर्मकांडों का वे मजाक उड़ाते थे। पाणिनी शिष्य व्याकरणाचार्य कौत्स ने वेदों को ‘अर्थहीन और निस्सार’ माना था। बौद्ध ग्रंथ इस बात की भी गवाही देते हैं कि अपने समय में मक्खलि गोशाल के आजीवक संप्रदाय के अनुयायियों की संख्या बौद्ध मतावलंबियों से अधिक थी। हालांकि उनके बारे में अधिक जानकारी नहीं मिलती। वे प्रकृति के साहचर्य में रहने वाले सीधे-सादे लोग थे। जैसा देखते-सोचते, वही लोगों को समझाते थे। उन्होंने कभी सोचा नहीं कि धर्म जो व्यक्तिगत आस्था का विषय है, कभी राजनीति का दायां हाथ बन जाएगा। वस्तुतः बुद्ध के जीवनकाल तक विचारों का आदान-प्रदान मौखिक किया जाता था। धर्म-दर्शन के संहिताकरण की कोई व्यवस्था नहीं थी। स्वयं बुद्ध ने अपने सारे उपदेश मौखिक ही दिए थे। उनके निर्वाण के नब्बे दिन बाद पहली धर्म-संसद हुई। उसमें बुद्ध के जीवन तथा दर्शन के संहिताकरण का संकल्प लिया गया। धर्म-संसद को मगध सम्राट अजातशत्रु का पूरा समर्थन प्राप्त था। निरीश्वरवादी विचारकों तथा उनके विचारों को कलमबद्ध करने के लिए न तो उस समय के बुद्धिजीवी उनके साथ थे न ही अजातशत्रु जैसे सम्राट का उन्हें समर्थन था। इस कारण वह परंपरा लंबे समय तक मौखिक ही बनी रही।

उस समय तक राजाओं की साम्राज्यवादी लालसाएं उमड़ने लगी थीं। धर्म इस कार्य में सहायक था। इस बीच ब्राह्मणों और क्षत्रियों के बीच शताब्दियों तक चले संघर्ष में कमी आने लगी थी। बुद्ध और महावीर ने धर्म-दर्शन के क्षेत्र में ब्राह्मणों के एकाधिकार को तोड़ा था। लोगों तक यह संदेश गया था कि ब्राह्मणों को उन्हीं के क्षेत्र में चुनौती देना संभव है। इसलिए वे समझौतावादी रवैया अपनाने को बाध्य हुए थे। मनुस्मृति इन दोनों वर्गों के बीच हुए समझौते का भी दस्तावेजीकरण है, जिसके माध्यम से शीर्ष के दोनों पद ब्राह्मण और क्षत्रियों ने कब्जा लिए थे। बौद्ध धर्म-दर्शन के संहिताकरण का काम उन्हीं लोगों को सौंपा गया जो या तो शीर्षस्थ वर्णां यानी ब्राह्मण और क्षत्रिय से थे अथवा उनके वर्चस्व का बिना शर्त समर्थन करते थे। राजाओं और श्रेष्ठि वर्ग का समर्थन होने से भी बुद्ध और महावीर को अपने धर्म-दर्शन के प्रसार में मदद मिली। शूद्र होने के कारण निरीश्वरवादी विचारकों—मक्खलि गोशाल, अजित केशकंबलि, पूर्ण कस्सप आदि को ऐसा कोई समर्थन प्राप्त नहीं था। इसलिए उनके विचार मौखिक परंपरा से बाहर न आ सके। उनके बारे में छिटपुट जानकारी हमें बौद्ध एवं जैन ग्रंथों से ही प्राप्त होती है। तदनुसार वे तर्क और ज्ञान पर आधारित भौतिकवादी विचारधाराएं थीं। इन सबको पढ़ते-समझते हुए आंबेडकर ने बौद्ध धर्म को वरीयता दी। कदाचित उन्हें लगता था कि ठेठ निरीश्वरवादी विचारधारा को उनका अशिक्षित समाज एकाएक स्वीकार नहीं कर पाएगा। समाज को संगठित रखने के लिए वे कोई भी समझौता करने को तैयार थे। बौद्ध धर्म की खूबी है कि वह धुर भौतिकवादी और ठेठ ब्राह्मणवादी दर्शनों के बीच जगह बनाता है। चार्वाकों, लोकायतों और आजीवकों की भांति वह ईश्वर, आत्मा आदि को नकारता नहीं, बस उन्हें किनारे कर जीवन के व्यावहारिक पक्ष पर ध्यान देता है। पहली बार नैतिकता को धर्म-दर्शन का हिस्सा बनाने का श्रेय भी बुद्ध को ही जाता है। बौद्ध धर्म की ये विशेषताएं आंबेडकर के विचारों के अनुकूल थीं। यही बौद्ध धर्म की ओर उनके आकर्षण की वजह बनी थीं। फिर भी एक सवाल बाकी रह जाता है। धर्मांतरण के लिए बौद्ध धर्म को चुनने के पीछे क्या यही एकमात्र कारण था?

ध्यातव्य है कि बौद्ध धर्म का पराभव उसकी अपनी ही विकृतियों के कारण हुआ था। अपने लेखों और पुस्तकों में आंबेडकर ने इस तथ्य की विस्तृत समीक्षा की है। ईसाई, इस्लाम और सिख धर्म में भी जाति के लिए कोई जगह नहीं है, तो भी वहां समानता का अभाव है। बौद्धकालीन भिक्षु संघों के दरवाजे समाज के सभी वर्गों के लिए खुले थे। जातीय स्तरीकरण, बलि, आडंबर, यज्ञादि कर्मकांडों के लिए उसमें कोई स्थान न था। बुद्ध के समय में वर्ण जाति के रूप में रूढ़ होने लगे थे। धर्म-सूत्रों के लिखने की शुरुआत हो चुकी थी। बावजूद इसके विपुल बौद्ध साहित्य में जाति का उल्लेख नहीं है। न ही उसके आधार पर ऊंच-नीच या भेद-भाव है। पेशों का उल्लेख अवश्य है, जिसे स्वाभाविक माना जाएगा। आंबेडकर द्वारा बौद्ध धर्मों को वरीयता देने का प्रमुख कारण भी यही था। उनका मानना था कि हिंदू धर्म की अपेक्षा बौद्ध धर्म में न्याय, नैतिकता और बराबरी के अधिक अवसर हैं। यह बात अलग है; स्वयं डॉ। आंबेडकर ने भी माना है कि भिक्षु संघों में कथित निचली जाति के सदस्यों की संख्या केवल 8।5 प्रतिशत तक सीमित थी, जबकि ब्राह्मणेत्तर जातियों की संख्या उस समय भी देश की कुल जनसंख्या की तीन-चौथाई रही होंगी। इतनी जनसंख्या होने के बावजूद ब्राह्मणेत्तर वर्ग बौद्ध धर्म की ओर से क्यों उदासीन थे? क्यों 75 प्रतिशत ब्राह्मणेत्तर जातियों को गौतम बुद्ध का प्रभा-मंडल आकर्षित नहीं कर पाया था? इन प्रश्नों पर कदाचित आंबेडकर कर ध्यान नहीं गया। न ही बाद में किसी इतिहासकार ने इनपर विचार किया है। फिलहाल इसे शोध का विषय कह सकते हैं। हो सकता है तत्कालीन सामाजिक-सांस्कृतिक परिवेश पर विचार करते हुए कुछ तथ्य सामने आ जाएं।

ब्राह्मणेत्तर वर्ग में मुख्यतः कर्मकार जातियां सम्मिलित थीं। उनके सदस्य छोटे-मोटे उद्यमी, शिल्पकार अथवा श्रमिक थे। परिवार के मुखिया या वरिष्ठ सदस्य के लिए यह बहुत कठिन था कि अपनी जिम्मेदारियों से पलायन कर संन्यास ले; अथवा बौद्ध संघ में सम्म्मिलित होकर श्रमण परंपरा का अनुपालन करे। दूसरा कारण अपेक्षाकृत महत्त्वपूर्ण है। दरअसल बौद्ध धर्म के उभार से पहले भारत में धर्म उतना संगठित एवं शक्तिशाली नहीं था, जितना बाद के वर्षों में देखने को मिला। आश्रमों और गोत्रों की परंपरा थी। सबके अपने-अपने मुखिया और विश्वास थे, जिन्हें वे अपनी-अपनी तरह से सहेजने और आगे बढ़ाने में लगे रहते थे। आश्रम संचालकों का शेष समाज से संबंध दानादि तक सीमित था। यज्ञ के लिए अधिक धन की आवश्यकता हो तो राजा अथवा धनी व्यक्ति की मदद ली जाती थी। शूद्रों का काम मुख्यतः सेवा करना था। उन्हें धार्मिक कर्मकांड में हिस्सा लेने की अनुमति न थी। धार्मिक कर्मकांडों का आयोजन खर्चीला उद्यम था। यह मानते हुए कि शूद्र उसका खर्च उठाने में अक्षम हैं, ब्राह्मणों ने खुद उन्हें यज्ञ के अधिकार से वंचित किया हुआ था। इसके लिए महाभारत में युधिष्ठिर के मुख से कहलवाया गया है—‘कोई गरीब आदमी यज्ञ नहीं कर सकता, क्योंकि यज्ञ के लिए विभिन्न प्रकार की सामग्री प्रचुर मात्रा में इकट्ठी करनी पड़ती है। आगे उसने यह भी कहा है कि यज्ञ करने की योग्यता राजाओं और राजकुमारों को हो सकती है, न कि अकिंचनों और असहायों को।’3 इससे स्पष्ट है कि धार्मिक सरोकार, विशेषकर याज्ञिक कर्मकांड मुख्यतः ब्राह्मणों और क्षत्रियों तक सीमित थे। एकाधिकार की भावना इतनी प्रबल थी कि बाकी वर्गों के निकट आने की भी मनाही थी। राज्य छोटे-छोटे, नगर-राज्य की सीमाओं में कैद थे। उनके आश्रय में पलने वाला पुरोहित वर्ग खुद को आमजन से ऊपर मानता था। बाहरी चुनौती न होने के कारण अधिकाधिक लोगों को धर्म से जोड़ने की उन्हें चिंता भी नहीं थी। कुल मिलाकर धार्मिक विश्वास ताल-तलैया में भरे जल की भांति उथले थे। बावजूद इसके हर वर्ग अपने विश्वास को ही सर्वोत्तम, विशिष्ट और पवित्रतम मानता था। ब्राह्मणों और क्षत्रियों के संबंध भी सहज न थे। उनके बीच वर्चस्व का संघर्ष प्राचीनकाल से चला आ रहा था। लेकिन शेष जाति-वर्गां को लेकर दोनों का व्यवहार एक जैसा था। मनुस्मृति की आलोचना वर्ण-व्यवस्था को शास्त्रीयता का जामा पहनाने के लिए की जाती है। असल में वह शीर्षस्थ वर्गां के बीच समझौते तथा संसाधनों के असमान बंटवारे को ईश्वरीय घोषित करने की चाल थी, ताकि शेष जनसमाज दुरावस्था को ही अपनी नियति मानकर जीता रहे। तदनुसार समाज का बामुश्किल दस प्रतिशत हिस्सा उसके संपूर्ण संसाधनों पर कब्जा जमाए रहता था। धर्म ब्राह्मण के लिए आज भी धंधा है, तब भी धंधा था। बाकी धंधे भौतिक लाभ-हानि के सिद्धांत पर चलाए जाते थे, उसका धंधा पवित्रता और अध्यात्म के नाम पर फलता-फूलता था। रक्षक होने का दावा करते हुए क्षत्रिय भी उसका भोग करता था।



शीर्षस्थ वर्गों की सेवा में लगे शूद्रों के अलावा उनका एक वर्ग ऐसा भी है जो अपने शिल्प-कौशल के कारण अपेक्षाकृत स्वतंत्र था। उसमें किसान, धातुकर्मी, बढ़ई, रथ-कार, चर्मकार, बुनकर, रंगरेज, राज-मिस्त्री, तैलिक आदि लोग आते थे। शीर्षस्थ वर्गों को उनकी सेवाओं की जरूरत थी। अपने शिल्प-कौशल के कारण वे आर्थिक स्तर पर अपेक्षाकृत आत्मनिर्भर समूह थे। ब्राह्मण उन्हें शूद्र कहकर वैदिक कर्मकांडों से अलग रखते थे तो उन्हें भी उनके कार्यक्रमों पर विश्वास न था। वे केवल अपने काम में लिप्त रहते थे। कृषि और पशुपालन दोनों अर्थव्यवस्थाओं में पशुधन की महत्ता थी, उसे बलि के बहाने गंवा देना आर्थिक दृष्टि से भी नुकसानदेह था। इस कारण ब्राह्मणेत्तर जातियों का बड़ा हिस्सा आजीवक विचारधारा का समर्थक था, जो यज्ञादि कर्मकांडों को ढकोसला, पोंगापंथी ब्राह्मणों की चाल मानते थे। महावीर और बुद्ध पहले ऐसे विचारक थे जिन्होंने धर्म के आधार पर समाज को संगठित करने की कोशिश की थी। उस समय उनका ध्यान स्वाभाविक रूप से उन वर्गों की ओर गया जिन्हें ब्राह्मणों ने धार्मिक कर्मकांड के दायरे से बाहर रखा था। उनमें भी अधिक सफलता बुद्ध को मिली। माना जाता है कि अहिंसा पर अतिरिक्त जोर देने के कारण जैन धर्म लोगों को अव्यावहारिक लगता था। परंतु बौद्ध धर्म की अपेक्षा उसके पिछड़ जाने का एकमात्र यही कारण नहीं था। असली कारण जैन धर्म द्वारा वर्ण-व्यवस्था को ज्यों का त्यों स्वीकार लेना था। वर्ण-व्यवस्था को लेकर ब्राह्मण-धर्म और जैन धर्म की विचारधाराएं परस्पर मेल खाती थीं। अंतर केवल इतना है कि ब्राह्मण-संस्कृति में वर्ण-व्यवस्था के उत्स की खोज हमें ऋग्वेद तक जाती है, जैन धर्मावलंबियों के अनुसार उसकी शुरुआत आदि तीर्थंकर द्वारा की गई थी।

हमारा मूल प्रश्न अभी तक अनुत्तरित है। आखिर क्या कारण है कि आंबेडकर ने अपने समय के लोकप्रिय धर्मों को छोड़कर बौद्ध धर्म का समर्थन किया था? ऐसा कौन-सा आकर्षण था उनके मन में बौद्ध धर्म के प्रति? जैसा कि ऊपर कहा गया है, बुद्ध के समय आजीवक संप्रदाय की काफी प्रतिष्ठा थी। आंबेडकर आजीवकों के बारे में मौन रह जाते हैं। कदाचित वे सोचते थे कि अपढ़-अशिक्षित जनसमाज बौद्धिक रूप से इतना परिपक्व नहीं है कि किसी नास्तिक दर्शन को अपना सके। दूसरे आजीवकों के बारे में ऐतिहासिक साक्ष्य बहुत प्रच्छन्न हैं। जो हैं वे केवल सूत्र रूप में प्राप्त होते हैं। उनमें भी भारी दोहराव है। एक मुश्किल यह भी है कि व्यक्ति से उसका विश्वास एकाएक छीन पाना संभव नहीं होता। उसकी या तो किसी बड़े विश्वास के साथ अदला-बदली की जा सकती है, अथवा विवेक द्वारा धीरे-धीरे समाहार हो सकता है। दलित समाज संत परंपरा का अनुयायी था। कबीर, रैदास, पल्टू जैसे संतकवियों को अपना गुरु मानता था। उन सभी ने तंत्र-मंत्र, कर्मकांड आदि का तो विरोध किया, किंतु किसी न किसी रूप में आत्मा-परमात्मा के अस्तित्व का समर्थन करते थे। स्वयं आंबेडकर के पिता कबीरपंथी थे। ‘मानुष होना कठिन हया, तू साधू कैसे होया’ जैसे कबीरपंथी पदों को सुनते हुए उन्होंने मानवतावाद का पहला पाठ पढ़ा था। वे देशी-विदेशी साहित्य के अध्येता तथा प्रकांड विद्वान थे। ऐसा व्यक्ति बने-बनाए रास्तों का अनुसरण नहीं करता। अपने तथा दूसरे लोगों के लिए नए रास्ते बनाता है। आंबेडकर का पूरा जीवन इसी की मिसाल है।

आंबेडकर का मुख्य ध्येय दलितों में आत्मविश्वास पैदा करना था। वह केवल शिक्षा और राजनीति द्वारा ही संभव था। इसलिए वे एक ओर तो सवर्णों से पर्याप्त सामाजिक-सांस्कृतिक लोकतंत्र की मांग करते रहे, दूसरी ओर दलितों के राजनीतिकरण, शिक्षा और संगठन पर जोर देते रहे। ताकि त्वरित परिवर्तनशील माहौल में वे अपनी जगह बना सकें। संभव है इसके पीछे उनके अपने जीवनानुभवों का भी योगदान रहा हो। उनके पिता सेना में थे। महारों ने अंग्रेजों की सेना में रहते हुए कई निर्णायक युद्धों में भाग लिया था। कोरेगांव के युद्ध में उन्होंने ईस्ट इंडिया कंपनी का साथ देते हुए पेशवा छत्रपतियों को पराजित किया था। आंबेडकर ने कोरेगांव युद्ध में शहीद महार सैनिकों का स्मारक बनवाने की पहल की थी। प्रत्येक वर्ष जनवरी में वे वहां शहीद सैनिकों को श्रद्धांजलि देने जाते थे। प्राचीन भारतीय समाज और संस्कृति के बारे में उन्होंने जितना लिखा है, उसमें बौद्ध धर्म के अलावा क्षत्रियों और ब्राह्मण के संघर्ष को ही अधिक स्थान मिला है। इससे पता चलता है कि उनके मन में क्षत्रियत्व के प्रति विशेष आकर्षण था। शूद्रों की उत्पत्ति को लेकर आंबेडकर की सामान्य धारणा थी कि वे पराजित सैनिक, युद्ध-बंदी क्षत्रिय थे। इतिहास का यह पक्ष किसी न किसी रूप में उनके अवचेतन पर आरंभ से ही छाया हुआ था। धर्म-दर्शन के क्षेत्र में ब्राह्मणों का वर्चस्व सर्वमान्य था। बुद्ध ने पहली बार ब्राह्मणों को न केवल धर्म-दर्शन के क्षेत्र में चुनौती दी थी, बल्कि ब्राह्मण-श्रेष्ठत्व के मिथ का भी सटीक प्रत्युत्तर दिया था। ‘अंबट्ठसुत्त’ में वे अनेक तर्क देकर क्षत्रियों को ब्राह्मणों से उच्चतर सिद्ध करते हैं। उससे पहले आजीवक, लोकायत आदि विद्वान् वर्ण व्यवस्था को ही नकारते थे, परंतु वर्ण व्यवस्था के भीतर रहते हुए ब्राह्मणों के श्रेष्ठत्व को चुनौती देने का काम सबसे पहले बुद्ध ने किया था। हालांकि उस समय वे वर्णव्यवस्था का समर्थन करते हुए नजर आते हैं। इस बारे में कुछ और प्रमाण भी दिए जा सकते है। एक प्रवचन के दौरान वे कहते हैं—‘बुद्धिमान व्यक्ति को यह जानकारी होनी चाहिए कि उसकी प्रियतमा ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र वर्णों में से किस वर्ण की है।’4 तथापि बुद्ध का वर्ण-सिद्धांत विशुद्ध कर्म के सिद्धांत पर आधारित था। उसमें किसी को भी विशेषाधिकार प्राप्त नहीं थे।

इससे यह निष्कर्ष निकालना कि भिक्षु-संघ जातीय भेदभाव से सर्वथा परे थे, जल्दबाजी होगी। उनमें शामिल होने वाले लोग आखिर थे तो समाज का ही हिस्सा। उस समाज का हिस्सा जिसमें जाति-आधारित भेदभाव बहुत आम था। भिक्षु-संघ में आने के बाद भी उनके व्यवहार में एकाएक बदलाव नहीं हो पाता था। बुद्ध के शिष्यों में उपालि का नाम भी आता है। वह जाति से नाई था और प्रवज्या लेकर संघ में सम्मिलित हुआ था। बुद्ध के पांच करीबी शिष्यों में उसका नाम था। बावजूद इसके भिक्षुणियां उपालि की जाति को लेकर प्रायः उसपर कटाक्ष करती रहती थीं। बुद्ध इस विकृति से परिचित थे। जाति को लेकर संघ में किसी प्रकार का द्वेष न फैले इसलिए उन्होंने निर्देश जारी किए थे कि ‘संघ में कोई भी भिक्षुओं की पूर्व जाति, कम्म आदि के बहाने किसी को अपमानित न करें। न ही इस प्रकार का कोई भेद-भाव करें।’(विनयपिटक, 4/4/11)। उनके अनुसार अपने पुरुषार्थ से शूद्र यदि आर्थिक रूप में सक्षम हो तो वह ‘अपने सेवक के रूप में न केवल दूसरे शूद्र को, बल्कि ब्राह्मण, क्षत्रिय या वैश्य किसी को भी नियुक्त कर सकता था।’(मज्झिम निकाय-II पृष्ठ 84-85, डॉ। रामशरण शर्मा, शूद्रां का प्राचीन इतिहास से उद्धृत)। इसी विज्ञानवादी दृष्टिकोण से प्रभावित होकर आंबेडकर ने बौद्ध धर्म का वरण किया था। बुद्ध ने उस दौर में समानता का पक्ष लिया था जब प्रायः सभी प्रमुख दर्शन अभिजात मानसिकता के अनुरूप जनसाधारण से दूरी बनाए थे। आंबेडकर को लगता था कि बौद्ध धर्म को अपनाकर ब्राह्मणवाद पर निर्णायक चोट की जा सकती है, जिसके फलस्वरूप जातिविहीन समाज की स्थापना भी संभव है। वे धर्म के संगठन सामर्थ्य से परिचित थे। उन्हें लगता था कि धर्म-विमुख विचारधारा को दलित समाज एकाएक आत्मसात नहीं कर पाएगा। कदाचित वे सोचते थे कि ईश्वराधारित धर्मों की अपेक्षा ईश्वर को किनारे रखकर जीवन के व्यावहारिक पक्ष पर ध्यान देने वाला धर्म, अपने श्रम-कौशल पर जीवनयापन करने वाले लोगों के लिए अधिक उपयोगी होगा; तथा उसके माध्यम से दलितों को एकजुट रखकर देश की राजनीति में निर्णायक हस्तक्षेप कर पाना संभव होगा। वे चाहते थे कि समाज आत्मा-परमात्मा की निरर्थक वितंडा से बाहर निकलकर रोजमर्रा की परेशानियों के बारे में सोचे। इस दृष्टि से प्रचलित धर्मों की अपेक्षा बौद्ध धर्म अधिक मुफीद था। देरिदा की मदद लेते हुए कहा जा सकता है कि वे ब्राह्मणों द्वारा गढ़े इतिहास, धर्म और संस्कृति का संपूर्ण विखंडन कर नए, आधुनिकताबोध से अनुप्रेत समाज की नींव रखना चाहते थे। उसके लिए बौद्ध धर्म जरूरी औजार जैसा था।