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 ज्ञान और अध्यात्म के क्षेत्र में गुरु–शिष्य परंपरा का महत्त्व बताया गया है। आज भी है। भारत में सैकड़ों आश्रम और धर्मगुरु हैं। उनके लाखों–करोड़ों भक्त हैं। प्रत्येक गुरु अपने शिष्यों के भौतिक–अधिभौतिक उत्थान का दावा करता है। शिष्य भी मानते हैं कि उनके गुरु अनन्य हैं। वे अपने और गुरु के बीच मर्यादा की लकीर खींचे रहते हैं। जिसके अनुसार गुरु की आलोचना करना, सुनना यहां तक कि मन में गुरु के प्रति भूल से भी अविश्वास लाना पाप माना जाता है। इसी जड़–श्रद्धा के भरोसे गुरुओं का कारोबार चलता है। उस कारोबार में कभी घाटा नहीं आता। जड़–श्रद्धा के बल पर ही गुरु कमाते, भक्त गंवाते हैं। बुद्ध ने जड़–श्रद्धा का निषेध किया था। दूसरी ओर मीमांसक कुमारिल भट्ट को मात्र इस कारण खुद को प्रायश्चिताग्नि के सुपुर्द करना पड़ा था, क्योंकि उन्होंने गुरु की पूर्वानुमति के बिना बौद्ध दर्शन का अध्ययन इसलिए किया था, ताकि शास्त्रार्थ में बौद्ध आचार्यों को पराजित कर वैदिक दर्शनों की श्रेष्ठता सिद्ध कर सकें। उद्देश्य सही था। ज्ञान का भी यही तकाजा था। परंतु तत्कालीन परंपरा को स्वीकार्य न था।

कुमारिल अपने उद्देश्य में सफल हुए थे, किंतु गुरु–द्रोह के अपराध के प्रायश्चित–स्वरूप खुद को अग्नि–समर्पित करना पड़ा था। सुकरात, प्लेटो और अरस्तु की गुरु–शिष्य परंपरा में अंध–श्रद्धा के लिए कोई स्थान न था। तीनों परंपरा–पोषण के बजाय उसके परिमार्जन पर जोर देते हैं। उसका आदि–प्रस्तावक सुकरात खुले संवाद में विश्वास रखता था। यह सुनकर कि लोग उसे यूनान का सर्वाधिक बुद्धिमान प्राणी मानते हैं, सुकरात को अपने ही ऊपर संदेह होने लगा था। संदेह दूर करने के लिए वह एथेंस के वुद्धिमान कहे जाने वाले राजनयिकों, दार्शनिकों और तत्ववेत्ताओं से मिला। अंततः इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि वह सचमुच सबसे बुद्धिमान है। इसलिए नहीं कि उसे सर्वाधिक ज्ञान है। सुकरात ने माना कि वह केवल एक चीज दूसरों से अधिक जानता है, वह है—अपने ही अज्ञान का ज्ञान। ‘मुझे अपने अज्ञान का ज्ञान है’ कहकर उसने खुद को उन दार्शनिकों, विचारकों और तत्ववेत्ताआ से अलग कर लिया था, जिन्हें अपने ज्ञान का गुमान था। उसके लिए ज्ञान से ज्यादा ज्ञानार्जन की चाहत और उसकी कोशिश का महत्त्व था। ज्ञान की मौलिकता के लिए वह संदेह को आवश्यक मानता था। सुकरात की इसी प्रेरणा पर अरस्तु ने मनुष्य को विवेकशील प्राणी माना है। विवेकशीलता में स्वयं अपने ज्ञानानुभवों के पुनरावलोकन की, संदेह की भावना अंतर्निहित है। ज्ञानार्जन के लिए संदेह की अनिवार्यता को रेखांकित करते हुए ग्यारहवीं शताब्दी के फ्रांसिसी विचारक पीटर अबलार्ड ने लिखा था—‘संदेह हमें जांच–पड़ताल के लिए प्रेरित करता है। जांच–पड़ताल हमें सत्य का दर्शन कराती है।’ ‘सुकरात–प्लेटो और अरस्तु’ की त्रयी के विचारों में अंध–श्रद्धा के लिए कोई जगह न थी। हालांकि इस विद्वान–त्रयी को अनुपम और अद्वितीय मानने पर कुछ लेखकों को ऐतराज है।

‘पॉलिटिक्स’ का अनुवाद करते समय भोलानाथ शर्मा ने ‘सुकरात–प्लेटो–अरस्तु’ की त्रयी के समकक्ष ‘पराशर–व्यास और शुकदेव’ त्रयी का उदाहरण दिया है। इस निष्कर्ष के पीछे उनके पूर्वाग्रह साफ नजर आते हैं। यह ठीक है कि ‘पराशर–व्यास और शुकदेव’ की पिता–पुत्र–पौत्र त्रयी में भी तीनों लेखक थे। पराशर को भारतीय परंपरा में पुराणों के आदि–रचियता होने का श्रेय दिया जाता है। बताया जाता है कि व्यास ने महाभारत के अलावा पिता के लिखे पुराणों का पुनर्लेखन कर, उन्हें वह कलेवर प्रदान किया जिसमें वे आज प्राप्त होते हैं। तीसरे शुकदेव ने ‘भागवत पुराण’ लिखकर पुराण साहित्य को समृद्धि प्रदान की थी। बावजूद इसके ये तीनों भारतीय लेखक उस कोटि के मौलिक लेखक–विचारक नहीं हैं, जिस कोटि के ‘सुकरात–प्लेटो और अरस्तु’ हैं। व्यास की कृति ‘महाभारत’ अवश्य अलग है। उसमें अपने समय का सामाजिक–सांस्कृतिक एवं राजनीतिक विमर्श मौजूद है, परंतु जिस महाभारत से हम आज परिचित हैं, वह ईस्वी संवत्सर की शुरुआत के आसपास की कृति है, जब देश में एकराष्ट्र की भावना प्रबल थी। गणतांत्रिक पद्धति पर आधारित छोटे–छोटे राज्यों को अनावश्यक मान लिया गया था। एकराष्ट्र अथवा साम्राज्यवादी सोच का उद्भव पूरी दुनिया में लगभग एक साथ हुआ था।

भारत में इसका प्रवर्त्तक चाणक्य था, जबकि यूनान में अरस्तु ने सिकंदर की साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाओं का समर्थन करते हुए उसे एशिया पूर्व के छोटे–छोटे देशों को अपने अधीन करने की सलाह दी थी। महाभारत मूलतः धार्मिक ग्रंथ है और उसकी रचना शताब्दियों के अंतराल में एकाधिक लेखकों द्वारा की गई है। दूसरे केवल लेखक होना ही शर्त होती तो एक ही धारा के तीन लेखकों के अनेक उदाहरण दुनिया–भर में मिल जाएंगे। यहां कसौटी ज्ञान की विलक्षणता, मनुष्यता के प्रति अगाध निष्ठा तथा एक–दूसरे से असहमति जताते हुए उसकी ज्ञान–परंपरा को विस्तृत तथा सतत परिमार्जित करने की है—जिसपर यह त्रयी विश्व–पटल पर अनुपम है। प्लेटो के लेखन के हर हिस्से पर सुकरात की छाप है। इसी तरह अरस्तु के लेखन पर भी प्लेटो का प्रभाव छाया हुआ है। लेकिन प्लेटो सुकरात से तथा अरस्तु प्लेटो से कदम–कदम पर असहमति दर्शाते हैं। प्लेटो से अरस्तु की असहमतियों का दायरा तो इतना बड़ा है कि उन्हें एक ही दर्शन–परंपरा से जोड़ना अनुचित जान पड़ता है। जैसे कि पारिवारिक जीवन का महत्त्व, सुख–स्वास्थ्य प्राप्ति के संसाधन, लोकमत का सम्मान, जनसाधारण की रुचि एवं इच्छाओं का समादर जैसे विषयों पर अरस्तु पर्याप्त उदार था। जबकि प्लेटो ने अपने आदर्श राज्य में सामूहिक संस्कृति और सहजीवन पर जोर देते हुए परिवार संस्था को अनावश्यक मानते हुए कठोर–अनुशासित जीवन जीने की अनुशंसा की है।

फिर प्रभाव किस बात का है? कौन–सा सूत्र है जो इन तीनों को परस्पर जोड़ता है? इस तारतम्यता को इन्हें पढ़ते हुए आसानी से समझा जा सकता है। एकसूत्रात्मकता ‘पराशर–व्यास–शुकदेव’ की त्रयी के बीच भी है। अंतर केवल इतना है कि भारतीय परंपरा के लेखकों पर अध्यात्म प्रभावी रहा है, जो अतिरेकी आस्था और विश्वास के दबाव में अंधानुकरण में ढल जाता है। जबकि ‘सुकरात–प्लेटो–अरस्तु’ के बीच ज्ञान की लालसा तथा शुभत्व की खोज के लिए एक–दूसरे पर संदेह का सिलसिला निरंतर बना रहता है। परंपरा–पोषी होने के कारण भारतीय लेखक एक–दूसरे को दोहराते अथवा परंपरा का पिष्ठ–प्रेषण करते हुए नजर आते हैं। पश्चिम का लेखन विशेषकर वह लेखन जो सुकरात से आरंभ होकर अरस्तु और आगे थामस हॉब्स, जान लॉक, रूसो, वाल्तेयर, बैंथम आदि तक जाता है, उसमें संदेह का सिलसिला कभी टूटता नहीं है।

वाल्तेयर और रूसो एक–दूसरे के समकालीन लेखक थे। जीते–जी उनमें हमेशा विलगाव बना रहा। दोनों एक–दूसरे के कट्टर आलोचक थे। परंतु वाल्तेयर और रूसो को पढ़ते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि उनमें से किसी एक के मन में ज्ञान की ललक, मनुष्यता को बेहतर बनाए जाने की उत्कंठा दूसरे से कम है। जिस तरह प्लेटो सुकरात के प्रति और अरस्तु प्लेटो के प्रति अगाध प्रेम और विश्वास रखते हुए, विनम्र असहमति क साथ विचार–परंपरा को आगे बढ़ाते हैं, वैसा भारतीय परंपरा में दुर्लभ है। प्लेटो के विपुल वाङ्मय में एक भी शब्द, एक भी पंक्ति ऐसी नहीं है, जिसपर सुकरात का असर न हो। बावजूद इसके जहां आवश्यक समझा उसने सुकरात की बात भी काटी है। अरस्तु तो प्लेटो से आगे निकल जाता है। उसके मन में गुरु प्लेटो के प्रति गहरा सम्मान था। बावजूद इसके उसके ग्रंथों में प्लेटो के विचारों के प्रति सहमति से अधिक असहमति नजर आती है। प्लेटो और अरस्तु अपने–अपने गुरु के ज्ञान को आत्मसात करते हैं, परंतु उनका विश्वास उस परंपरा को आगे बढ़ाने में है, न कि अनुसरण में। प्लेटो भावुक, कवि हृदय है, जबकि अरस्तु अपेक्षाकृत वैज्ञानिक प्रवृत्ति से युक्त।

इसलिए अरस्तु के लेखन में असहमति अधिक मुखर है। इस कारण कुछ विद्वान तो अरस्तु को प्लेटो का शिष्य मानने को ही तैयार नहीं है। लेकिन अरस्तु के लेखन में प्लेटो के प्रति जैसा सम्मान–भाव है उसे देखते हुए यह असंभव भी नहीं लगता। कथ्य के आधार पर उनमें अंतर न के बराबर मिलेगा। ऐसा महसूस होगा मानो सारे पुराण एक ही लेखक द्वारा रचित अलग–अलग कालखंड की कृतियां हैं; अथवा उनके लेखक मंजे हुए किस्सागो थे। उन्होंने समाज में पहले से प्रचलित कहानियां को अतिरेकपूर्ण कल्पनाओं और रोचकता के साथ पौराणिक कलेवर प्रदान किया था।

अरस्तु(जन्म 384 ईस्वीपूर्व) और प्लेटो के जन्म के बीच लगभग चार दशक का अंतराल था। Aristole का अर्थ है—‘श्रेष्ठतम लक्ष्य’(The best purpose)। कहने की आवश्यकता नहीं कि अपने नामानुरूप अरस्तु ने जीवन में महान उद्देश्य सिद्ध किए। अरस्तु का मुख्य कर्मक्षेत्र एथेंस रहा, परंतु सुकरात और प्लेटो की भांति वह मूल एथेंसवासी नहीं था। उसका जन्म एथेंस से लगभग 340 किलोमीटर दूर, थ्रेस नदी के किनारे स्थित स्तेगिरा नामक छोटे से शहर में हुआ था। उसके पिता का नाम निकोमाराक्स् था। उनके पूर्वज मैसेनिया से ईसापूर्व सातवीं–आठवीं शताब्दी में स्तेगिरा में आकर बसे थे। उसकी मां का नाम फैस्तिस था और उसके पूर्वज यूबोइया प्रदेश के खालिक्स नामक मामूली शहर के रहने वाले थे। मेसिडन के राजा एमींतस जिसकी प्रतिष्ठा सिंकदर का दादा होने के कारण भी है—का निजी चिकित्सक होने के कारण निकोमाराक्स् की समाज में प्रतिष्ठा थी।

वे वैद्यों की पंचायत के सदस्य भी थे। उन दिनों यूनान के अनेक राज्यों में नगर–राज्य की व्यवस्था थी, जहां शासन प्रक्रिया में अधिकांश नागरिकों की भागीदारी रहती थी। मेडिसन में राजतंत्र था। और जैसा कि इस प्रकार की राज्य प्रणालियों में होता है, मेडिसन में भी वंशानुक्रम के आधार पर राजा की घोषणा की जाती थी। अरस्तु के बचपन के बारे में अधिक जानकारी नहीं है। यत्र–तत्र बिखरी सूचनाओं से पता चलता है कि उसकी प्राथमिक शिक्षा होमर की रचनाओं से आरंभ हुई था। उसपर अपने चिकित्सक पिता का विशेष प्रभाव पड़ा। उन दिनों चिकित्सक परिवार के बच्चों को बचपन से ही शल्य–चिकित्सा का प्रशिक्षण दिया जाता था।सो अरस्तु को भी शरीर विज्ञान और वनस्पतियों की शिक्षा बचपन से ही मिलने लगी थी।शरीर विज्ञान और प्रकृति–विज्ञान के दूसरे क्षेत्रों में अरस्तु की रुचि को देखते हुए उस समय शायद ही कोई कल्पना कर सकता था कि आगे चलकर यूनानी दर्शन और तर्कशास्त्र का महापंडित कहलाएगा। बचपन के वही अनुभव कालांतर में विज्ञान, विशेषकर वनस्पति शास्त्र के क्षेत्र में उसकी रुचि का कारण बने। यह भी बताया जाता है कि बचपन के चिकित्सा क्षेत्र के अनुभवों के कारण ही अरस्तु को चिकित्सकों की स्थानीय संस्था का सदस्य बना लिया था।

अरस्तु का परिवार समृद्ध था। इसलिए बचपन में उसे सुख–सुविधाओं की कमी न थी। उसका बचपन राजपरिवार के लोगों के सान्निध्य में, सुखपूर्वक बीता। संयोगवश अरस्तु के माता–पिता की मृत्यु उसकी किशोरावस्था में ही हो चुकी थी। उसके बाद उसकी देखभाल का दायित्व उसके एक रिश्तेदार प्रॉक्सीनस ने संभाला। सुकरात की भांति अरस्तु की आरंभिक इच्छा भी विज्ञान के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करने की थी। उसने अपने जीवन का लंबा समय वैज्ञानिक अनुभवों के लिए लगाया था। अनेक ग्रंथों की रचना की, बाद में वह प्रकृति विज्ञान से उकताने लगा।

इसका कारण स्टेगिरा की राजनीति थी। सम्राट एमींतस महत्त्वाकांक्षी था। राज्य की सीमाओं के विस्तार के लिए उसने कई युद्ध लड़े थे। जिसमें उसे सफलता भी मिली थी। लेकिन राज्य की सीमाओं का विस्तार और प्रजा के सुख–संतोष में विस्तार के बीच कोई तालमेल न था। लगातार युद्ध के मैदान में रहने वाले राजा की प्रजा को जो कष्ट भोगने पड़ते हैं, वे कष्ट स्तेगिरा की प्रजा को भी भोगने पड़ते थे। इसी विसंगति से अरस्तु के मन में राजनीति को समझने की ललक पैदा हुई। उसने अनुभव किया था कि राज्य के उद्देश्यों तथा उसके कार्यों के बीच कोई तालमेल नहीं है। युवावस्था तक पहुंचते–पहुंचते वह ज्ञान के परंपरागत संसाधनों से उकताने लगा था। उसका झुकाव दर्शन और राजनीति की ओर गया। उस समय पूरे यूनान में प्लेटो द्वारा स्थापित ‘अकादेमी’ की प्रतिष्ठा थी। अरस्तु की प्रतिभा और उच्च शिक्षा के प्रति लगन को देखते हुए प्रॉक्सीनस ने उसका दाखिला प्लेटो की अकादेमी में करा दिया। ईस्वी पूर्व 367 में वह एथेंस पहुंचकर प्लेटो की अकादमी का सदस्य बन गया। उस समय उसकी वयस् मात्र 17 वर्ष थी। अकादमी में आने का उद्देश्य केवल राजनीति और दर्शन की शिक्षा के साथ–साथ विश्व के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में रहकर अध्ययन करने की लालसा थी।

अरस्तु प्लेटो की अकादेमी में लगभग बीस वर्षों तक रहा। वहां रहते हुए उसने गणित, दर्शन, राजनीति आदि विषयों में ज्ञान प्राप्त किया। उसके बाद कुछ अर्से तक अकादेमी में अध्यापन कार्य भी किया। यहीं उसके और प्लेटो के बीच आत्मीयता का विस्तार हुआ। अरस्तु को पुस्तकें जमा करने का शौक था और अपने धन का बड़ा हिस्सा पुस्तकों और पांडुलिपियों को जुटाने पर करता था। प्लेटो ने उसके आवास को ‘श्रेष्ठ अध्येता का घर’ कहा था। कुछ लोग मजाक में कहा करते थे कि ईश्वर ने अरस्तु के मस्तिष्क में गहरा गड्ढा बना दिया है, जिसमें वह पुस्तकों को सहेज कर रखता है। अकादेमी में रहते हुए अरस्तु पर प्लेटो की विद्वता का प्रभाव उत्तरोत्तर बढ़ता गया। प्लेटो की लेखन–शैली का अनुकरण करते हुए उसने अकादमी प्रवास के दौरान भौतिकी, जीवविज्ञान, वनस्पति विज्ञान, तर्कशास्त्र, तत्व–दर्शन आदि पर अनेक पुस्तकों की रचना की। अरस्तु के मन में अपने गुरु के प्रति बेहद सम्मान था। वहीं प्लेटो भी अरस्तु की प्रतिभा का मुरीद था। वह उसे ‘अकादेमी का मस्तिष्क’ और ‘सर्वश्रेष्ठ अध्ययनशील’ विद्यार्थी मानता था। प्लेटो का निधन हुआ, उस समय अरस्तु की उम्र लगभग 37 वर्ष थी। वह प्लेटो के उत्तराधिकारियों में से एक था। प्रतिभा को देखते हुए अरस्तु की दावेदारी भी बनती थी। वह प्लेटो का वास्तविक उत्तराधिकारी है, यह उसने आगे चलकर सिद्ध भी कर दिया था। परंतु ‘अकादमी’ का अध्यक्ष प्लेटो के रिश्तेदार तथा गणित एवं जीवविज्ञान के पंडित स्पूसिपस को बनाया गया। इसका कारण प्लेटो से अरस्तु की वैचारिक असहमतियां भी थीं।

अधिकारियों में इतना साहस न था कि अकादेमी का संचालन का दायित्व ऐसे व्यक्ति के हाथों में सौंप दें, जिसकी अकादेमी के संस्थापक और गुरु से घोर असहमतियां रही हों, हालांकि अरस्तु की प्रतिभा को लेकर उन्हें कोई संदेह न था। नतीजा यह हुआ कि अरस्तु का जी अकादेमी से उचट गया। निराश होकर उसने एथेंस छोड़ दिया। वहां से वह माइसिया में एटारनियस नामक स्थान पर पहुंचा। वहां अकादेमी के पूर्व छात्रों की मंडली का सदस्य बन गया। उनमें वहां का शासक हरमियॉस भी शामिल था। इससे अरस्तु को पुनः राजपरिवार के निकट आने का अवसर मिला। कुछ ही दिनों में हरमियॉस और अरस्तु गहरे दोस्त बन गए। इसका सुखद परिणाम अरस्तु और हरमियॉस की भतीजी(कुछ विद्वानों के अनुसार भानजी) पिथियास के विवाह के रूप में सामने आया। उसके फलस्वरूप उसके जीवन में स्थायित्व आया। अकादमी में प्राप्त गणित और विज्ञान की शिक्षा बहुत कारगर सिद्ध हुई। पिथियास से विवाह के उपरांत उसने खुद को प्रकृति विज्ञान की खोज में लगा दिया। समुद्र तटीय स्थानों पर जाकर वह वनस्पतियों और जीव–जंतुओं का अध्ययन करने लगा। उन अनुभवों के आधार पर उसने आगे चलकर कई पुस्तकों की रचना की। एथेंस छोड़ने के बाद 12 वर्षों तक वह इसी तरह अनुभव और ज्ञान बंटोरता रहा। इस बीच राजतंत्र की निरंकुशता को करीब से देखने का अवसर मिला। कदाचित इसी बीच उसके मन में छोटे–छोटे राज्यों की विकृतियां सामने आने लगी थीं। वही अनुभव कालांतर में आगे चलकर ‘पॉलिटिक्स’ एवं ‘एथिक्स’ जैसे गं्रथों की प्रेरणा बनी। अपने उत्तरवर्ती जीवन में अरस्तु ने एक अन्य युवती हरपिलिस से विवाह किया, जिससे उसे संतान हुई। पुत्र का नाम उसने अपने पिता के नाम पर निकोमाराक्स् रखा।

342 ईस्वीपूर्व के आसपास उसको मेसिडन के सम्राट की ओर से निमंत्रण प्राप्त हुआ। इस अवधि में वहां काफी कुछ बदल चुका था। एमींतस के बाद फिलिप मेसिडन का सम्राट था। उसे अपने बेटे सिकंदर के लिए योग्य शिक्षक की तलाश थी। अरस्तु की प्रतिभा के बारे में वह पहले से ही परिचित था। अकादेमी में अरस्तु द्वारा किए गए कार्य भी उसकी जानकारी में थे। ऐसे में सिकंदर की शिक्षा के लिए अरस्तु से बेहतर कोई हो ही नहीं सकता था। निमंत्रण मिलते ही अरस्तु मेसिडन लौट आया। सम्राट फिलिप की ओर से उसका जोरदार स्वागत किया गया। आते ही उसे ‘रॉयल अकादेमी ऑफ मेसिडन’ का अध्यक्ष बना दिया गया। अगले तीन वर्षों तक वह इसी पद पर बना रहा। शिक्षक के तौर पर उसने राजकुमार सिकंदर में साम्राज्यवादी महत्त्वाकांक्षाएं जगाने का काम किया। उसने सिंकदर को राज्य की सीमाओं के विस्तार के लिए एशिया–माइनर तथा अन्य उत्तर–पूर्वी राज्यों पर अधिकार करने की सलाह दी।

इस बीच एटारनियस से दुखद समाचार आया कि एक ईरानी सेनापति ने उसके मित्र और वहां के शासक हरमियॉस को धोखे से पकड़कर उसकी हत्या कर दी है। इस सूचना ने अरस्तु को व्यथित कर दिया। 340 ईस्वी पूर्व में फिलिप की मृत्यु के बाद सिकंदर सम्राट बना। सिंकदर के मन में शुरू से ही साम्राज्यवादी भावनाएं जोर मारती थीं। सत्ता हाथ में आते ही वह युद्ध पर निकल पड़ा। अब मेसिडन में अरस्तु को कोई काम न था। इसी बीच उसे एथेंस जाने का अवसर मिला। उसी समय अकादेमी अध्यक्ष पद के रिक्त होने की सूचना मिली। अरस्तु के मन में अकादेमी से जुड़ने की लालसा अब भी शेष थी। परंतु अरस्तु की उपेक्षा करते हुए अकादेमी के अधिकारियों द्वारा खेनोक्रातेस को अकादेमी का मुख्य–अधिष्ठाता मनोनीत किया गया। अरस्तु एक बार फिर निराश हो गया। परंतु उसके जैसे मननशील व्यक्ति के आगे निराशा बहुत टिकाऊ नहीं थी। उसने स्वयं को अध्ययन के प्रति समर्पित कर दिया।

335 ईस्वी पूर्व में उसे पुनः एथेंस लौटने का अवसर मिला। इस बार आमंत्रित करने वाला था, हर्मेडयस उस समय उसकी उम्र 51 वर्ष थी और एक विद्वान दार्शनिक के रूप में उसकी ख्याति आसपास के देशों में फैल चुकी थी। एथेंस की ज्ञान–विज्ञान के क्षेत्र में धाक थी। अवसर गंवाए बिना अरस्तु एथेंस के लिए प्रस्थान कर गया। उन दिनों एथेंस और मेसीडन के संबंध अच्छे न थे। परंतु अरस्तु की विद्वता की धाक ऐसी थी कि एथेंस में उसका स्वागत हुआ। जाहिर है इसके पीछे एथेंसवासियों की ज्ञान के प्रति सम्मान–भावना का असर था। एथेंस के उत्तर–पूर्व स्थित उपनगर अपोलो में लीशियस देवी का मंदिर था। एथेंस के कानून के अनुसार वहां बाहरी व्यक्तियों को भूमि खरीदने की अनुमति नहीं थी। इसलिए अरस्तु ने मंदिर के आसपास के क्षेत्रों में कुछ मकान किराये पर लेकर अपने विश्व–विद्यालय की स्थापना की। विश्वविद्यालय का नाम लीशियस देवी के नाम के आधार पर ‘लीशियम’ रखा गया। कुछ ही दिनों में एथेंस के अनेक प्रतिष्ठित लोग जिनमें अकादेमी से शिक्षित लोग भी थे, अरस्तु से जुड़ने लगे।

इससे अरस्तु और उसके विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा बढ़ने लगी। उस विश्वविद्यालय की खूबी थी कि वहां टहलते हुए शिक्षार्जन पर जोर दिया जाता था। अरस्तु स्वयं टहलते हुए पढ़ाता था। इसलिए कुछ प्लेटो को ‘टहलते–टहलते पढ़ाने वाला अध्यापक’ तथा संस्था को ‘परिभ्रामी विद्यालय’;च्मतपचंजमजपब ैबीववसद्ध भी कहने लगे थे। लीशियम में रहते हुए अरस्तु ने अध्यापन के अलावा कई महत्त्वपूर्ण काम किए। पुस्तक संग्रह का शौक उसको अकादेमी प्रवास से ही था। लीशियम में उसे पुस्तकें जमा करने के भरपूर अवसर मिला। फलस्वरूप उसने सैकड़ों पुस्तकों एवं पांडुलियों का संग्रह किया। और उन्हें सुरक्षित रखने लिए लीशियम के भीतर एक विशाल पुस्तकालय का निर्माण किया। अरस्तु द्वारा निर्मित पुस्तकालय उसके समकालीन नाटककार यूरीपिडिस के पुस्तकालय को छोड़कर, पूरे यूनान में सबसे बड़ा था। यही नहीं उसने पुस्तकों को व्यवस्थित करने के लिए आवश्यक नियम भी बनाए थे। पुस्तकालय के अलावा उसने विश्वविद्यालय में विचित्र वस्तुओं, शैवालों तथा मानचित्रों का एक अजायबघर तैयार किया। हालांकि स्वयं अरस्तु के पास धन की कमी न थी। उसकी पत्नी धनाड्य परिवार से थीं। इसके साथ–साथ पुस्तकालय, अजायबघर, वैज्ञानिक उपकरण आदि के लिए सिंकदर की ओर से भी समय–समय पर मदद प्राप्त होती रहती थी। गुरु अरस्तु के प्रति सिंकदर का सम्मान इससे भी जाहिर होता है कि उसने अपने सैनिकों, मछुआरों, बहेलियों और शिकारियों को आदेश दिया था कि काम के दौरान यदि कोई विचित्र वस्तु मिले तो उसे संग्रहित कर, लीशियम के संग्रहालय में जमा करा दें। इसके अतिरिक्त सिंकदर ने जीव विज्ञान एवं भौतिक विज्ञान संबंधी खोजों के वैज्ञानिक उपकरण भेजकर भी अरस्तु की मदद की थी।

अरस्तु ‘लीशियम’ में 12 वर्षों तक रहा। इस बीच उसका विद्यालय निरंतर प्रगति करता रहा। लगभग सभी विषय की शिक्षाओं का वहां प्रबंध था और शिक्षार्थी के रूप में दूर–दूर के विद्यार्थी वहां पहुंचते थे। ‘लीशियम’ के प्रशासन हेतु अरस्तु ने विशेष प्रबंध किए थे। उस व्यवस्था को प्लेटो के ‘आदर्श राज्य’ तो नहीं कह सकते, परंतु शिक्षक और विद्यार्थी के बीच अनौपचारिक बातचीत को बढ़ाने, शिक्षा में सहजता लाने की भावनाएं उसके पीछे अवश्य थीं। तदनुसार विद्यार्थी अपने बीच से एक विद्यार्थी को चुनते थे। अगले दस दिनों तक वही विश्वविद्यालय के प्रशासक का काम करता था। इसके बावजूद ‘लीशियम’ में पर्याप्त अनुशासन था। भोजन–व्यवस्था वहां सामूहिक थी। महीने में एक दिन विशेष परिचर्चा के लिए सुरक्षित था, जिसके नियम अरस्तु ने निर्धारित किए थे। अरस्तु का यह विश्वविद्यालय ‘अकादेमी’ जैसी प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं कर सका। एक तरह से यह उसकी शाखा जैसा ही था।

दोनों में एक विशेष अंतर भी था। ‘अकादेमी’ में गणित पर ज्यादा जोर दिया जाता था, जबकि ‘लीशियम’ में जीवविज्ञान और वनस्पति विज्ञान की शिक्षा पर खास ध्यान दिया जाता था। प्रायोगिक शिक्षा का खास महत्त्व था। उन दिनों बाढ़ आम समस्या थी। बरसात के समय नील नदी उफनने लगती। अरस्तु ने नियमित आने वाली बाढ़ों की रोकथाम के लिए भी शोधकार्य किया था। ‘लीशियम’ को प्लेटो के ‘अकादेमी’ जैसी प्रतिष्ठा भले ही प्राप्त न कर सका, परंतु एक दार्शनिक के रूप में अरस्तु को वैसी प्रतिष्ठा प्राप्त हो चुकी थी, जैसी कभी सुकरात और प्लेटो को प्राप्त था। अरस्तु को नकारकर जिस व्यक्ति को अकादेमी का अध्यक्ष मनोनीत किया गया था, अरस्तु के प्रभामंडल के आगे उसकी प्रतिष्ठा नगण्य थी।

लीशियम में अध्यापन करते हुए अरस्तु ने अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रंथों की रचना की। उस समय सिकंदर विश्व–विजय के लिए निकला हुआ था। यात्रा के विवरणों को दर्ज करने के लिए सिंकदर के साथ कल्लिस्थेसनस् नामक युवा भी उसके साथ अभियान पर था। वह अरस्तु का शिष्य था और अपने गुरु की भांति स्पष्टवक्ता भी। अभियान के दौरान किसी कार्य के लिए कल्लिस्थेसनस् ने सिंकदर की आलोचना कर दी। परिणामस्वरूप सिंकदर उससे रुष्ट हो गया। उस समय तक सिंकदर की विश्व–विजय की कामनाएं उभार पर थीं।

आलोचना उससे सहन न हुई। उसके आदेश पर कल्लिस्थेसनस् को मृत्युदंउ सुनाया गया। कल्लिस्थेसनस अरस्तु का करीबी शिष्य था। अरस्तु ने ही उसे सिकंदर के साथ भेजा था, इसलिए कल्लिस्थेसनस् के साथ–साथ अरस्तु को भी दोषी माना गया। सिंकदर ने अरस्तु को दंडित करने का निर्णय कर लिया। लेकिन भारत अभियान में वह इतनी बुरी तरह से उलझा कि वापस लौट ही नहीं पाया। ईसा पूर्व 323वें वर्ष में उसकी मृत्यु हो गई।सिकंदर की मौत का समाचार जैसे ही मेसिडन पहुंचा वहां विद्रोह हो गया। अरस्तु सिंकदर का गुरु और करीबी रह चुका था, इसलिए विद्रोहियों ने उसे भी दंडित करने का निर्णय किया। लेकिन अरस्तु को दंडित करना आसान न था। उसकी पूरे यूनान में प्रतिष्ठा थी। विद्रोहियों ने उसे ‘नास्तिक’ घोषित कर दिया। आरोप का आधार अरस्तु द्वारा ईसापूर्व 340-341 में अपने दोस्त हरमियॉस पर लिखी कविता को बनाया गया। वह कविता अरस्तु ने हरमियॉस की हत्या के बाद लिखी थी, जिसमें उसके गुणों का बखान करते हुए उसे देवतुल्य घोषित किया गया था। बीस वर्ष पुरानी उस कविता के समय और परिस्थिति को देखते हुए इस प्रकार के आरोप बेमानी थे। विरोधी किसी भी प्रकार अरस्तु को दंडित करना चाहते थे, इसलिए अरस्तु को नास्तिक घोषित करना, जनता के बीच उसकी छवि को धूमिल करने की चाल थी। अपने विरुद्ध बढ़ता माहौल देख अरस्तु को एथेंस छोड़ना पड़ा। उसी वर्ष 62 वर्ष की अवस्था में उसकी मृत्यु हो गई।

एथेंस छोड़ते समय उसने घोषणा की थी कि एथेंसवासियों को दर्शनशास्त्र के विरुद्ध दूसरी बार अपराध नहीं करने देगा। दर्शनशास्त्र के विरुद्ध एथेंसवासियों का पहला अपराध उसकी संसद द्वारा सुकरात को दिया गया मृत्युदंड था। एथेंस से वह युबोइया के लिए प्रस्थान कर गया। वहां खॉल्किस नामक छोटे से नगर में जाकर रहने लगा। वहीं रहते हुए उसने अपनी वसीयत तैयार की, जिसमें उसने अपनी पत्नी हर्पीलियस के स्वभाव की प्रशंसा करते हुए उसके लिए धन की व्यवस्था की थी। पहली पत्नी पिथियास की यादें अब भी उसके दिल में बसी थीं। इसलिए उसने वसीयत में लिखा कि उसे पिथियास के अवशेषों के साथ दफनाया जाए। अपनी संपत्ति का कुछ हिस्सा दासों के नाम किया था और कुछ को उसने दासत्व से मुक्त कर, स्वतंत्र कर दिया था। ये घटनाएं उसकी संवेदनशीलता को दर्शाती हैं। कवि–हृदय प्लेटो ने भी पाया था, परंतु उसे कविता से अरुचि थी। मानता था कि कविता और नाटक जैसी विधाएं मनुष्य को यथार्थ से परे ले जाकर कमजोर बनाती हैं। अरस्तु मनो–मस्तिष्क से वैज्ञानिक होने के साथ–साथ संवेदनशील कवि भी था। एक कविता में उसने प्लेटो की विलक्षण मेधा की प्रशंसा करते हुए उसे विद्वानों के बीच अद्वितीय घोषित किया है।

देहयष्टि को लेकर भी अरस्तु और प्लेटो के बीच उल्लेखनीय अंतर था। प्लेटो लंबे–चौड़े डील–डोल, चौड़ी छाती और सुदर्शन चेहरे वाला व्यक्ति था। उसके नामकरण का कारण ही उसका लंबा–चौड़ा डील–डौल था। दूसरी ओर अरस्तु की आंखें छोटी–छोटी। पैर पतले। कद–काठी सामान्य थी। बोलते समय वह कभी–कभी तुतलाने लगता था। यह भी कहा गया है कि उम्र के आखिरी पड़ाव पर उसके बाल झड़ चुके थे। रहन–सहन और बोलचाल में वह असंयमी था। अरस्तु की वाक्पटुता की प्रशंसा की जाती है। दियोगेनस ने उसकी वाक्पटुता के उदाहरणों को पुस्तकाकार संग्रहित किया है। मगर उसकी प्रतिभा बेमिसाल थी। वह अपने समय के शीर्षतम दार्शनिकों और कुछ मामलों में तो अपने गुरु प्लेटो से भी आगे था। दांते ने उसे ‘सभी विद्वानों का गुरु’ घोषित किया है। अरस्तु ने विपुल साहित्य की रचना की। उसके ग्रंथों की संख्या लगभग चार सौ बताई जाती है। उनमें से अनेक ग्रंथ तो दर्शन–शास्त्र और राजनीति की धरोहर हैं। लेकिन यह भी विडंबना है कि अरस्तु जैसे महामेधावी दार्शनिक की पुस्तकें भी उसके निधन के लगभग 250 वर्ष बाद ही सिसरो के प्रयासों के फलस्वरूप प्रकाशित हो सकीं। इस बीच उसकी अनेक पांडुलिपियां लुप्त हो चुकी थीं। अब सिवाय संदर्भों के उनका कहीं अता–पता नहीं है। लेकिन ‘पॉलिटिक्स’ और ‘एथिक्स’ जैसे ग्रंथ मानवता के उपहार के रूप में आज भी सुरक्षित हैं।