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 जाति के कारण आंबेडकर को अनेक अवसरों पर हिंदू कट्टरपंथियों द्वारा अपमान का सामना करना पड़ा था। बचपन से बड़े होने तक वे ऐसे ही हालात से गुजरते रहे। पूरे देश का बुरा हाल था। छूआछूत और भेदभाव की भावना बच्चों के दिमाग में ठूंस-ठूंस कर भर दी जाती थी। यह घटना तब की है जब वे सतारा स्कूल में पढ़ने जाते थे। जैसा चलन था, बच्चे अपना टिफिन ब्लैकबोर्ड के पीछे रखते थे। एक दिन की बात, अध्यापक ने भीमराव से ब्लैकबोर्ड पर आकर गणित का सवाल हल करने को कहा। आंबेडकर उठें, उससे पहले ही पूरी कक्षा में हड़कंप मच गया। बच्चे बदहवास होकर दौड़ पड़े। गिरते-पड़ते, एक दूसरे से टकराते हुए सब ब्लैकबोर्ड तक पहुंचे। भीमराव वहां पहुंचें उससे पहले ही सबने अपना-अपना टिफिन उठा लिया। वे बुरी तरह घबराए हुए थे। कुछ बच्चे चीखे जा रहे थे। मानो भूचाल आ गया हो। प्रत्येक को डर था कि अछूत भीमा के ब्लैकबोर्ड तक पहुंचते ही उसके पीछे रखा भोजन अपवित्र हो जाएगा। बालक भीमराव के दिल पर क्या गुजरेगी, इसका उन्हें भान न था। न ही उन्हें ऐसा कुछ सिखाया गया था। ऐसे ही दर्जनों उदाहरण हैं। आंबेडकर जीवन-भर इस तरह के अपमान झेलते रहे। अंततः उन्होंने अपने लाखों समर्थकों के साथ हिंदू धर्म को छोड़ने का निर्णय लिया था। वह उनकी प्रतीकात्मक कार्रवाही थी। जातिवादियों के नाम संदेश देते हुए एक बार उन्होंने कहा था—हिंदू धर्म स्वयं नहीं बदला तो उसे बहुत जल्दी मिटने के लिए तैयार रहना पड़ेगा।

वे यह भी जानते थे कि धर्मांतरण समस्या का एकमात्र समाधान नहीं है। दलितों की दुर्दशा का अंत तब तक असंभव है, जबतक राज्य और कानून उनके अधिकारों के समर्थन में न हों। यह केवल विधि-शासित राज्य में ही संभव है। मगर कानून का राज्य भी तभी सफल हो सकता है जब नागरिक अपने अधिकारों को लेकर जागरूक हों। इसके समाधान हेतु वे लोकतंत्र का सामाजिक-सांस्कृतिक परिक्षेत्रों में विस्तार चाहते थे। उनका विचार था कि अपनी मांगों को राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित रखने वाले नेता, बहुसंख्यक समाज को वास्तविक स्वतंत्रता से दूर रखना चाहते हैं। बिना सामाजिक स्वतंत्रता के राजनीतिक-आर्थिक स्वतंत्रता निरर्थक है—ऐसा उनका मानना था। स्वाधीनता संग्राम के दौरान तिलक जैसे हिंदू नेताओं का नारा था—‘वेदों की ओर वापसी।’ अप्रत्यक्ष रूप में यह प्राचीन वर्णाश्रम व्यवस्था की पुनर्वापसी का ब्राह्मणवादी षड्यंत्र था। उसका उन सपनों से कोई वास्ता न था, जिन्हें उत्पीड़ित समाज आजादी के साथ साकार करना चाहता था। आंबेडकर जानते थे कि भीषण असमानता, शोषण एवं उपेक्षा के शिकार दलितों के लिए जिन्हें आरंभ से ही शिक्षा से वंचित रखा गया है, ऐसे नारे निरर्थक और प्रतिगामी हैं। वे उसी समाज में अपनी स्वतंत्रता का लाभ उठा सकते हैं, जहां पर्याप्त समानता, स्वतंत्रता और भाईचारा हो। तिलक के एक और प्रसिद्ध नारे के उत्तर में उनका कहना था—‘तिलक यदि अछूत परिवार में जन्मे होते तो बजाय यह कहने के कि ‘स्वतंत्रता मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है,’ कहते—‘अश्पृश्यता उन्मूलन मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है।’5 उनका कहना था कि सरकार यदि तिलक की स्वतंत्रता की मांग को तत्काल मान लेती है, तो वह केवल ब्राह्मणों की आजादी होगी। उसका लाभ समाज के बहुत छोटे-से समूह को प्राप्त होगा, जो समाज में पहले से ही लाभ की अवस्था में रहा है। दलितों और पिछड़ों के हालात में उससे कोई सुधार होने वाला नहीं है। उन्होंने लिखा था कि समाज की शक्तियों और अधिकारों का सीमित हाथों में सिमट जाना सर्वथा अलोकतांत्रिक है। अतएव सामाजिक स्वतंत्रता के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग करना या केवल राजनीतिक स्वतंत्रता से संतुष्ट होकर रह जाना, पूर्णतः अलोकतांत्रिक कदम होगा। इस विचार को वे अपने विभिन्न लेखों में तरह-तरह से उठाते हैं। उन्हीं के शब्दों में—

‘लोकतांत्रिक शासन के लिए लोकतांत्रिक समाज का होना बहुत आवश्यक है। लोकतंत्र के औपचारिक ढांचे का, यदि उसमें सामाजिक लोकतंत्र का अभाव है, तो कोई महत्त्व नहीं है। यदि सामाजिक लोकतंत्र नहीं है तो राजनीतिक लोकतंत्र भी अपूर्ण एवं अनुपयुक्त होगा। वस्तुतः राजनीति से जुड़े लोगों ने यह कभी महसूस नहीं किया कि लोकतंत्र केवल शासन तंत्र नहीं है। वह वास्तव में सामाजिकता का तंत्र है। लोकतांत्रिक समाज के लिए यह आवश्यक नहीं है कि उसमें एकता, सामुदायिक उद्देश्य, लोकहित के प्रति निष्ठा तथा पारस्परिक सहानुभूति जैसी विशेषताएं हों। उसके लिए दो बातें साफ तौर पर आवश्यक होती हैं। पहली है—उदार मनोवृत्ति। अपने साथियों के प्रति सम्मान और समानता का भाव। दूसरी है—एक सामाजिक संगठन जो कठोर सामाजिक बंधनों से सर्वथा मुक्त हो। लोकतंत्र की सदस्यों के अलगाव या अकेलेपन के साथ संगति नहीं होती। ये चीजें समाज में सुविधा-संपन्न एवं सुविधा-वंचित लोगों के बीच दरार पैदा करती हैं।’ (डॉ। आंबेडकर, रानाडे, गांधी और जिन्ना)।

भारतीय समाज में व्याप्त भारी असमानता का एक कारण यह है कि वह उन धर्म-ग्रंथों से प्रेरणाएं लेता आया है, जिनमें समानता, स्वतंत्रता, भाईचारे और सहिष्णुता को उपेक्षित रखा गया है। जो अपने महत्त्वपूर्ण निर्णय उन अदृश्य शक्तियों के नाम पर लेता है, जिनके आगे मनुष्य का अस्तित्व बिलकुल गौण मान लिया जाता है। चूंकि वे ग्रंथ मानवीय अस्मिता और अधिकारों की अवहेलना करते हैं, इसलिए उनमें मानवीय विवेक को उपेक्षित रखा जाता है। सहज प्रश्नाकुलता को दबाए रखने के लिए विचार-स्वातंत्र्य को भी विद्रोह मान लिया जाता है। दूसरों के श्रम पर पलने वाले अभिजन समूहों को बहुसंख्यक जनसमाज पर शासन करने की जिम्मेदारी सौंप दी जाती है; तथा श्रम से दूर, दूसरों के अर्घ्य के सहारे सांस लेने वालों को देवता का दर्जा देकर पूज्य और पूरे समाज के लिए मानक बना दिया जाता है। धर्म के नाम पर बने वे संगठन इतने शक्तिशाली होते हैं कि बड़े-बड़े भूपति उनके आगे घुटने टेकते आए हैं।

सम्राट वेन का किस्सा अनेक पुराणों में आया है। यह कहानी उन दिनों की याद दिलाती है जब जनता अपना राजा स्वयं चुनती थी। वेन को जनता द्वारा चुना गया प्रथम सम्राट माना गया है। निर्वाचित राजा होने के कारण वेन खुद को जनता के प्रति उत्तरदायी समझता था। जबकि धर्म और राजनीति के माध्यम से समाज पर काबू गांठने को आतुर पुरोहित वर्ग चाहता था कि राजा उसके हितों को प्रमुखता दे। ब्राह्मणों की सर्वोच्चता को स्वीकार करे। वेन को यह स्वीकार न हुआ तो उन्होंने लोगों को उसके विरुद्ध भड़काना आरंभ कर दिया। पुराणों में यह कहानी अपने विकृत रूप में है। ठीक ऐसे ही प्रस्तुत की गई है जैसी ब्राह्मणवाद को बढ़ावा देने वाली दूसरी कहानियां और मिथ उनमें आए हैं। ब्राह्मणों के बहकावे में आकर उग्र भीड़ वेन की हत्या कर देती है। इस तरह ब्राह्मणों के शब्दों में ‘अन्यायी’ वेन का अंत हो जाता है। पुराणों में दर्ज कथा को पढ़कर आप उससे इतर निष्कर्ष निकाल ही नहीं सकते। परंतु जब हम कहानी के पृथु वाले हिस्से पर जाते हैं तो तस्वीर पूरी तरह साफ नजर आने लगती है।

वेन के बाद ब्राह्मण उसके पुत्र पृथु को राजा बनाते हैं। राजा बनते समय पृथु प्रजा के प्रति ईमानदार और कर्मनिष्ठ रहने की शपथ नहीं लेता। उसे शपथ दिलाई जाती है, ब्राह्मणों की सर्वोच्चता को स्वीकारने की। उनके कहे अनुसार चलने की। कभी उनकी अवज्ञा न करने तथा सदैव उन्हें अपना पूज्य मानने की। पृथु द्वारा शपथ लेते ही प्रकरण का पटाक्षेप नहीं होता। बताया जाता है कि पृथ्वी का नामकरण भी उसी ब्राह्मण-भक्त सम्राट के नाम पर हुआ है। यह दर्शाने के लिए कि पूरी पृथ्वी ब्राह्मणों के अनुशासन में है। वही सबके स्वामी, सर्वेसर्वा और पथ-प्रदर्शक हैं।

सवाल है कि धर्म को इतनी शक्ति मिलती कहां से है? क्या देवताओं से? परंतु उसका तो कोई प्रमाण नहीं है। उनका अस्तित्व वायवी है। धर्म को वास्तविक ताकत उसके अनुयायियों की ओर से मिलती है। केवल जनसमाज धर्म को, राजनीति को और व्यापार को सफल और शक्तिशाली बनाता है। उन्हें सत्ता के रूप में न केवल पालता-पोसता है बल्कि अपने व्यक्तित्व को उनके आगे तुच्छ मानकर पीढ़ी-दर-पीढ़ी उनके लिए खपता चला जाता है। अतीत में जाकर इसकी पुष्टि भी संभव है। करीब ढाई हजार वर्ष पहले तक समाज के स्तर पर पर्याप्त लोकतांत्रिकता थी। नागरिकगण स्वयं स्थानीय प्रशासन की जिम्मेदारी संभालते थे। महत्त्वपूर्ण निर्णय परस्पर विचार-विमर्श द्वारा मिल-जुलकर लिए जाते थे। राज्य भी उतने शक्तिशाली न थे। न ही आर्थिक और सामाजिक स्तर पर आज जितना वैषम्य था। धीरे-धीरे धर्म का प्रसार हुआ। उसने लोगों के दिलो-दिमाग को अपने बस में करना आरंभ कर दिया। कहने को धर्म सामूहिकता का उद्यम है। असल में उसकी सामूहिकता दिखावे के लिए होती है। जो चालाक लोग हैं वे इस रहस्य को समझते हैं।

इसलिए धर्म का उपयोग अपनी स्वार्थ-सिद्धि के लिए करते हैं। परंतु जो ऐसे नहीं हैं। जो दूसरों के साथ विश्वास भरा जीवन जीना चाहते हैं, वे प्रकारांतर में इहलौकिक सुखों को ओर से मुंह मोड़ जानबूझकर छाया के पीछे भागने लगते हैं। जिनके वे अधिकारी हैं, वे सुख भी छीन लिए जाएं तब भी उफ् नहीं करते। हालात को नियति मानकर स्वीकार लेते हैं। धर्म का नशा उनके सहज विवेक को कुंठित किए रहता है। ऐसे लोगों का शोषण आसान होता है। दुख की बात यह है कि ऐसे लोग बहुतायत में होते हैं। धर्मसत्ता, राजसत्ता और अर्थसत्ता की प्रगति इन्हीं के कंधों पर टिकी होती है। धर्माचार्य उनकी संख्याबल के आधार पर आवश्यकतानुसार राजसत्ता पर दबाव बनाए रहता है। व्यापारी उनकी सदाशयता का लाभ उठाते हुए उनसे उनके श्रम के मूल्यांकन के अधिकार हर लेता है। राजसत्ता अपने मददगार पुरोहितों को बढ़ावा तथा व्यापारी की बेईमानियों को संरक्षण देती है। बदले में व्यापारी राजसत्ता को भेंट, सौगात कर आदि देकर अपनी ओर मिलाए रखता है। तीनों वर्ग भली-भांति जानते हैं कि वे जनता की शक्ति और संसाधनों का उपयोग करते हैं। केवल जनता उस ओर से अनजान होती है। अतएव जनता को उसकी शक्तियों का बोध कराना तथा अधिकारों से परचाना, परिवर्तनकारी आंदोलनों की पहली मांग होती है।

आंबेडकर इस सच को भली-भांति समझते थे उनकी लड़ाई भारतीय समाज में व्याप्त जातिवाद की विषबेलि, अशिक्षा, अज्ञानता और आडंबरवाद से थी। समाज और कानून के क्षेत्र में अपने उल्लेखनीय योगदान के आधार पर हम उन्हें आधुनिक सभ्यता का वास्तुकार भी कह सकते हैं। हम जानते हैं कि आधुनिकता केवल फैशन का पर्याय नही हैं। फैशन तो उसका बाहरी आवरण है। आधुनिकता बदलते समाजार्थिक मूल्यों को आत्मसात् करते हुए, वर्तमान के साथ अद्यतन रहने की कला है। जिसे हम, आप आधुनिक होना कहते हैं, उसकी नींव मानव-अधिकार, समानता और स्वतंत्रता पर टिकी है। प्रौद्योगिकीय क्रांति के फलस्वरूप आज बाजार में ऐसे अनेक उपकरण हैं, जिनके चलते परिवार और समाज पर मनुष्य की निर्भरता घटी है। आधुनिक सभ्यता के आकलन की व्यावहारिक कसौटी भी यही है। वास्तविक आधुनिकता तर्क, ज्ञान, सहज मानवीय विश्वास पर केंद्रित नए जीवन-मूल्यों को आत्मसात् कर लेने में है। इसका आशय यह नहीं है कि आधुनिकता मनुष्य और समाज के अंतर्संबंधों पर भारी पड़ती है।

मनुष्य को समाज की जितनी जरूरत पहले थी, उतनी आज भी है और आगे भी रहेगी। आधुनिकता एक ओर समाज में मनुष्य की महत्ता को भी चिह्नित करती है, दूसरी ओर उसे समाज के प्रति ज्यादा जिम्मेदार भी बनाती है। मनुष्य की कमजोरी है कि केवल किसी वस्तु के आने से उसकी अहं-तुष्टि नहीं होती। वस्तु के बारे में दूसरों को बताना भी उसे जरूरी लगता है। इसलिए प्रौद्योगिकीय विकास द्वारा मनुष्य और समाज के संबंधों में स्वाभाविक परिवर्तन आता रहता है। आधुनिकता का अभिप्राय उन संबंधों के लोकोपकारी स्वरूप को समयानुसार मान्यता देते रहना है।

इस दृष्टि से देखें तो समकालीन नेताओं के बीच कदाचित आंबेडकर अकेले थे, जो आधुनिकता और मनुष्यता के अंतर्संबंधों से भली-भांति परिचित थे। इसलिए वे समाज में निरंतर उन मूल्यों का समर्थन करते रहे, जिनसे सभ्यता का परिष्कार हो सके। वे प्रखर लेखक थे, प्रकांड विद्वान। उन्होंने विपुल लेखन किया। उनके लेखन में सघन प्रतिबद्धता है। उनका लिखा एक-एक शब्द आंदोलनधर्मी है। उसका एकमात्र ध्येय था—समाज के दमित-शोषित वर्गों की समस्याओं को केंद्र में लाना, उनके लिए न्याय सुनिश्चित करना तथा अशिक्षा और अज्ञानता के अंधकार में डूबे लोगों को उनके शोषण और शोषणकारी परिस्थितियों से परचाना। रूसो का कहना था कि मनुष्य आजाद जन्मता है। लेकिन हर जगह बेड़ियों में रहता है। वे बेड़ियां कहां से आती हैं। इसका उत्तर रूसो का समकालीन वाल्तेयर हमें देता है। वह ईश्वर को खूंटा और धर्म को रस्सा मानता था।

उसके अनुसार धार्मिक अंधता का शिकार मनुष्य ईश्वर नामक खूंटे के चारों ओर चक्कर काटता रहता है। यूरोपीय पुनर्जागरण के दिनों में लॉक, वाल्तेयर और रूसो ने धर्म और उपलब्ध ज्ञान के प्रति मनुष्य की आलोचनात्मक सोच को पुख्ता किया था। लॉक ने ज्ञानार्जन में अनुभव की महत्ता पर जोर देते हुए मानव-मस्तिष्क की अंतहीन सीमाओं की ओर संकेत किया था। वह स्थापित ज्ञान को ज्यों का त्यों मानने की अपेक्षा उन्हें तर्कसम्मत ढंग से अपनाने का पक्षधर था। वाल्तेयर और रूसो ने धर्म के मकड़जाल को भेदने के लिए अनेक जीवनमंत्र दिए थे। रूसो मानवमात्र की स्वतंत्रता का समर्थक था। उनके क्रांतिधर्मा सोच ने ही फ्रांसिसी क्रांति की नींव रखी थी। भारत के संदर्भ में आंबेडकर वाल्तेयर और रूसो दोनों की भूमिका का साथ-साथ निर्वाह करते हैं। उनका कहना था—

‘गुलाम को उसकी गुलामी का एहसास करा दो, वह क्रांति कर देगा।’

यहां अरस्तु भी याद आते हैं। सुकरात, प्लेटो और अरस्तु तीनों के विचारों में बड़ा अंतर है। परंतु समाज, संस्कृति और राजनीति के प्रति नैतिकतावादी दृष्टिकोण के मामले में वे एक-दूसरे का पूरी तरह समर्थन करते थे। तीनों विचारक शुभत्व को समाज का मूलाधार मानते थे। सुकरात का मानना था कि मानव जीवन का एकमात्र ध्येय शुभत्व की प्राप्ति है। वह केवल नैतिक आचरण द्वारा संभव है। नैतिकता की खूबी है कि वह प्रत्येक परिस्थिति में लक्ष्य बनी रहती है। मनुष्य जब तक व्यक्तित्व उठान के एक स्तर तक पहुंचता है, नैतिकता का स्तर कुछ और ऊपर उठ चुका होता है। सुकरात का आग्रह था कि मनुष्य को शुभत्व प्राप्ति के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहना चाहिए। प्लेटो ऐसे आदर्श समाज का स्वप्न देखता था, जहां नागरिकों के हित परस्पर आबद्ध हों। समाज के सुख-दुख में प्रत्येक नागरिक की समान साझेदारी हो। प्लेटो के अनुसार यह केवल दार्शनिक राजा के शासनकाल में संभव है। अरस्तु अपने पूर्ववर्ती विचारकों की अपेक्षा व्यावहारिक था। जानता था कि दार्शनिक सम्राट की कल्पना आदर्श स्वप्न से परे कुछ नहीं है। आवश्यक नहीं कि विद्वता के शिखर-पुरुष राजनीति में भी उतने ही सफल सिद्ध हों। वैसे भी वह समय पूरी दुनिया में बौद्धिक क्रांति का था। भारत में बुद्ध, महावीर, चीन में कन्फ्युशियस, ला-ओत्जे, यूनान में सुकरात, प्लेटो जैसे नैतिकतावादी विचारकों का बोलबाला था।

उन सबका अपना-अपना तत्व दर्शन था। राजाओं के बीच खुद को विद्वान सिद्ध करने की होड़ मची रहती थी। राजा-महाराजा अपने दरबारों में दार्शनिकों और विद्वानों को उच्च पदों पर रखते थे। इसके बावजूद उनके बीच वर्चस्व की लड़ाइयों का अंत न था। समाज में नैतिक पराभव की स्थिति आम बात थी। ऐसे हालात में अरस्तु की व्यावहारिक सलाह बहुत काम की थी। उसका कहना था कि यदि समाज सामान्य नैतिकता से दूर है तो राजनीति में भी उसका लोप स्वाभाविक है। आंबेडकर का पूरा जीवन सामाजिक शुद्धीकरण को समर्पित रहा। वे एक तो समाज के सवर्णों से समानता, समरसता तथा दलितों के प्रति न्याय-सम्मत व्यवहार की मांग करते रहे, वहीं उन्होंने दलितों का आवाह्न किया कि वे शताब्दियों पुरानी बौद्धिक जड़ता, अज्ञानता के दलदल, रूढ़ियों के मकड़जाल, हताशा और दैन्य से बाहर निकलें। नए ज्ञान का स्वागत करें और अपने अधिकारों के लिए एकजुट होकर संघर्ष करें। समझ लें कि उनके हालात को सिवाय उनके अपने कोई बदलने वाला नहीं है। आंबेडकर की निजी उपलब्धियां उनके अपने संघर्ष और स्वाध्याय की दें थीं।

आंबेडकर ने लोगों को समझाया कि मनुष्य अपनी परतंत्रता, दैन्यादि के लिए खुद भी जिम्मेदार होता है। दुरावस्था के कारणों को समझने, उनका विरोध करने की अपेक्षा वह उन्हें सह लेने में अपनी भलाई समझता है। ‘जेहि विध राखे राम तेहि विध रहिए’—जैसी भाग्यवादी मान्यताएं उसे हालात से बच निकलने को प्रेरित करती हैं। शिखर पर विराजमान लोग जनसाधारण की इन दुर्बलताओं को भलीभांति समझते हैं। वे शासन चलाना भले ही न जानें, स्वार्थ-सिद्धि हेतु शिखर पर बने रहना उन्हें भली-भांति आता है। अवसरवादी चालों के बीच उनकी कोशिश किसी भी तरह अपना वर्चस्व बनाए रखने की होती है। वे निरंतर इस प्रयास में रहते हैं कि जनता को वास्तविक मुद्दों से हटाकर जाति, धर्म जैसे नकारात्मक और वायवी मुद्दों में उलझा दिया जाए।

इससे उसका ध्यान समस्या के असली कारण के बजाए उस ओर चला जाता है, जिधर वे ले जाना चाहते हैं। धर्म, जाति, क्षेत्रीयता ऐसे ही औजार हैं। उन्हें ईश्वरीय आदेश बताकर दलितों एवं पिछड़ों को शताब्दियों से दास बनाया जाता रहा है। आंबेडकर इस समस्या को भली-भांति समझते थे। इसलिए वे लगातार इस प्रवृत्ति का विरोध करते रहे। दलितों और पिछड़ों के निरंतर पराभव का एक कारण यह भी था कि वे मान चुके थे कि शासक होना जन्मजात गुण होता है; और उनमें इस गुण का अभाव है। इसलिए शासित रहना उनकी नियति है। उन्हें इस भ्रांति से निकालने के लिए आंबेडकर उनके राजनीतिकरण हेतु सतत प्रयत्नशील रहे।

राजनीति से जुड़ाव तथा परिवर्तनकारी राजनीति करना दोनों अलग-अलग बातें हैं। परिवर्तनकामी राजनीति के लिए समाज में परिवर्तन की इच्छा का होना आवश्यक है। और परिवर्तन को अनुकूल दिशा देने के लिए आवश्यक है कि राजनीतिक संस्थाएं लोकतांत्रिक चेतना से भरपूर सामाजिक संस्थाओं के नियंत्रण में कार्य करें। यदि सामाजिक स्तर पर लोकतंत्र का अभाव है तो राजनीतिक क्षेत्र में भी लोकतंत्र अधिक समय तक टिक नहीं पाएगा। आंबेडकर पश्चिमी पुनर्जागरण से प्रेरित थे। रूसो, वाल्तेयर, थामस पेन, बैंथम आदि के विचार उनके चिंतनकर्म पर छाए रहते थे, जिन्होंने उनके सामाजिक न्याय संबंधी विचारों को धार दी थी। उन्होंने दलितों और शोषितों को समझाया कि मनुष्य होने के नाते उन्हें वही अधिकार प्राप्त हैं, जो समाज के किसी भी दूसरे व्यक्ति को प्राप्त हैं। दलित और शोषित वर्ग जो आज शोषण और दैन्य को अपनी नियति स्वीकार बैठा है, उसके पूर्वजों ने ज्ञान के शिखर क्षेत्रों में दखलंदाजी बनाए रखी है। मनु का विधान केवल आलसी और मानसिक दुबर्लता के शिकार लोगों पर पूरी तरह लागू हो पाया है। जिन्होंने उसे नकारने का साहस किया, उसने अपने क्षेत्र में जोरदार उपस्थिति दर्ज की है। प्राचीनकाल में भी ईश्वरवादी और निरीश्वरवादी विचारधाराओं के बीच सदैव संतुलन रहा है। जिन दिनों ब्राह्मण लोग वेद-वेदांग रचने में जुटे थे, उन्हीं दिनों समानांतर रूप से अनीश्वरवादी चिंतक अपनी सशक्त उपस्थिति समाज में बनाए हुए थे।

आंबेडकर का विचार था कि समानता, स्वतंत्रता और सौहार्द की स्थापना के लिए धर्म की भूमिका केवल सहायक की होती है। अधिकारों की रक्षा केवल विधिसम्मत राज्य में ही संभव है। इसके लिए लोगों में सामाजिक एवं नैतिक चेतना की व्याप्ति अपरिहार्य है। यदि सामाजिक चेतना ऐसी है कि वह उन अधिकारों की रक्षा करने में भी सक्षम है, जिसके लिए कानून बनाए जाते हैं, तो उसके सदस्यों के अधिकार सुरक्षित बने रहते हैं। यदि समाज व्यक्ति के मूलभत अधिकारों के प्रति उदासीन है, अथवा उनका विरोध करता है तो कोई कानून, न्यायपालिका या दूसरी वैधानिक व्यवस्था उनका संरक्षण नहीं कर सकती। धर्म और जाति के आधार पर बंटे, असमानता के शिकार समाजों में यह काम प्रभुवर्ग की इच्छा से नहीं हो सकता। जैसा कि गांधी चाहते थे। इसके लिए आवश्यक है कि शिखरस्थ वर्ग अपने सोच में बदलाव लाएं। समानांतर रूप से उत्पीड़ित वर्गों में भी चेतना का संचार हो, ताकि वह शोषण तथा उसके कारणों का तत्क्षण विरोध कर सके। बलात् धर्मांतरण को छोड़ दें तो भी हिंदुओं के बीच धर्मांतरण नई घटना नहीं है। उसके पीछे जो प्रेरणाएं काम करती हैं उनमें पहली सत्ता के निकट, सुख-साधनों और शक्ति से लैस रहने की कामना है।

जैसा मुगलों के राज्य में होता था। धर्मांतरण की ऐसी प्रवृत्ति मुख्यतः सवर्ण लोगों में रही है। उनमें से कुछ शक्ति-केंद्र से सटे रहने का मोह छोड़ नहीं पाते। ऐसे लोग सत्ता-परिवर्तन के समय धर्म-परिवर्तन द्वारा भी उसके करीब रहने में ही बुद्धिमानी समझते हैं। धर्मांतरण का दूसरा कारण दूसरा सामाजिक शोषण और उत्पीड़न से बचाव के लिए अपेक्षाकृत उदार धर्म को अपनाना है। जैसा भारत में दलितों ने किया है। धर्मांतरण का तीसरा कारण आध्यात्मिक भी चेतना हो सकती है। व्यक्ति किसी धर्म विशेष के देवता या दर्शन से प्रेरित होकर उसकी ओर आकर्पित होता है। यह धर्मांतरण की श्रेष्ठतम वजह कही जा सकती है। हालांकि ऐसे मामले नगण्य होते हैं। आंबेडकर के लिए धर्मांतरण न तो सत्ता से निकटता बनाए रखने का माध्यम था, न ही आस्था का। वे तो अपने समाज को सामंतवादी लक्षणों से युक्त हिंदू धर्म के चंगुल से बाहर निकालना चाहते थे। ताकि दलित वर्ग अपने संगठन सामर्थ्य को समझे और उसके माध्यम से अपने अधिकारों की लड़ाई के लिए तैयार रहे। अप्रत्यक्ष रूप से आंबेडकर के धर्मांतरण का लाभ हिंदू धर्म को भी हुआ। उनके द्वारा बौद्ध धर्म ग्रहण करने से पहले दलितों का पलायन आमतौर पर ईसाई और इस्लाम की ओर होता था। बाद में दलितों का झुकाव भारतीय मूल के बौद्ध धर्म की ओर हो गया।

आंबेडकर मानते थे कि दलितों को मान-सम्मान की प्राप्ति तभी संभव है जब उन्हें राज्य स्वतंत्र नागरिक का सम्मान दे। नागरिक के रूप में स्वीकारे। कम से कम संवैधानिक स्तर पर उनके साथ कोई भेदभाव न हो। इसके लिए ‘मनुस्मृति’ के ईश्वर-केंद्रित विधान को संविधान-समर्थित विधान में बदलना आवश्यक था। रूसो, बैंथम, लॉस्की जैसे विद्वानों का भी मत था कि राज्य को ईश्वरीय विधान या नैतिकता के बजाय कानून के द्वारा चलना चाहिए। ईश्वरीय विधान के अनुसार काम करने वाले समाजों के लिए बार-बार अतीत में झांकना सामान्य बात है। भारत जैसे देश के लिए जहां एक वर्ग आज भी इस खुशफहमी में जीता है कि कभी यह धरती चलते-फिरते देवताओं की बस्ती थी। जिसके एक अवतार का दावा है कि दुर्जनों को ताड़ने और सज्जनों की रक्षा हेतु वह पुनः-पुनः जन्म लेता रहेगा। ऐसे समाज में समस्याओं से जूझने के बजाय उनसे पलायन नागरिक-स्वभाव का हिस्सा स्वतः बन जाता है।

आधुनिक समाजों में जो सामाजिक न्याय, समानता एवं मानवाधिकारवादी जीवनमूल्यों के अनुसार संचालित हों, इस प्रवृत्ति को प्रगति-विरोधी, प्रतिगामी और सामंतवाद का पोषक माना जाता है, जिसमें एक वर्ग को दूसरे वर्ग पर शासन करने का अधिकार मिल जाता है। मोसका के अनुसार ऐसे समाजों में असंगठित बहुसंख्यक वर्ग पर संगठित अल्पसंख्यक वर्ग राज करता है। लोग अपनी दुर्दशा को समझ न पाएं इसलिए, चुनौती सामने देख वह दैवी विधान को बीच में ले आता है। आंबेडकर का सपना समानताधारित समाज का था। जिसका रास्ता दलितों और पिछड़ों के सबलीकरण की ओर से जाता था। उनका विचार था कि दलित वर्ग बौद्धिक दैन्य से बाहर आए। ताकि उन्हें किसी दीनानाथ की प्रतीक्षा में जीवन न बिताना पड़े। उन्होंने दलितों और शोषितों का ज्ञान के क्षेत्र में आगे आने के लिए आवाह्न किया, ताकि संस्कृति के आधार पर होने वाले शोषण को समझकर उससे मुक्ति के उपाय सोचे जा सकें।