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रस्तु की विलक्षणता उसके तार्किक विश्लेषण में है। सुकरात और प्लेटो की शैली मुख्यतः निगमनात्मक थी। अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचने से पहले सुकरात अपने प्रतिपक्षी के आगे तर्क करता था। उत्तर प्राप्त होने पर वह प्रति तर्क अथवा प्रत्युत्तर के माध्यम से बातचीत को आगे बढ़ाता था। सुकरात को पढ़ते हुए सुधी पाठक समझ जाता है कि संबंधित विषय को लेकर उसका खास दृष्टिकोण है। परंतु निष्कर्ष को सामने रखने से पूर्व वह उसके सभी पक्षों को गंभीरतापूर्वक परख लेना चाहता है। प्रत्येक तर्क के साथ वह अपने मंतव्य को मजबूत करता जाता है। संवादात्मक शैली इसमें सहायक बनती है। यह तर्क की निगमनात्मक पद्धति है, जिसमें एक परिकल्पना को सिद्धांत में बदलने के लिए उसके समर्थन में तर्क जुटाए जाते हैं। पर्याप्त साक्ष्य हों तो ठीक वरना उस परिकल्पना को किनारे कर नए शोध की शुरुआत की जाती है। इसका मुख्य प्रयोग विज्ञान में होता है, जिसमें एक परिकल्पना के साथ परीक्षण, अनुरीक्षण करते हुए निष्कर्ष तक पहुंचने की कोशिश की जाती है। आगमनात्मक पद्धति में निष्कर्ष भविष्य में निहित होता है। उससे जुड़ी कुछ छोटी–छोटी स्थितियां, विचार अथवा अनुभवादि होते हैं। फिर उनकी पड़ताल, पुराने निष्कर्षों के साथ मिलान, व्याख्या और परिणामों में आवश्यक संशोधन–परिवर्धन के बाद अंतिम निष्कर्ष तक पहुंचा जाता है। अरस्तु को तर्क के क्षेत्र में आगमनात्मक पद्धति के प्रथम उपयोग का श्रेय भी प्राप्त है।

अरस्तु को इस बात का भी श्रेय दिया जाता है कि उसने राजनीति को फुटकर विचारों से ऊपर उठाकर स्वतंत्र विषय के रूप में मान्यता दिलाने का काम किया। उससे पूर्व वह धर्म–दर्शन का हिस्सा थी। भारत में तो वह आगे भी बनी रही। अरस्तु का समकालीन चाणक्य ‘अर्थशास्त्र’ में अपने राजनीतिक विचारों को सामने रखता है और मजबूत केंद्र के समर्थन में तर्क देते हुए राज्य की सुरक्षा और मजबूती हेतु अनेक सुझाव भी देता है, परंतु ‘अर्थशास्त्र’ और ‘पॉलिटिक्स’ की विचारधारा में खास अंतर है। यह अंतर प्राचीन भारतीय और पश्चिम के राजनीतिक दर्शन का भी है। उनमें अरस्तु की विचारधारा आधुनिकताबोध से संपन्न और मानव–मूल्यों के करीब है। ‘पॉलिटिक्स’ के केंद्र में भी मनुष्य और राज्य है।

दोनों का लक्ष्य नैतिक एवं सामाजिक उद्देश्यों की प्राप्ति है। अरस्तु के अनुसार राजनीतिक–सामाजिक आदर्शों की प्राप्ति के लिए आवश्यक है नागरिक और राज्य दोनों अपनी–अपनी मर्यादा में रहें। सामान्य नैतिकता का अनुपालन करते हुए एक–दूसरे के हितों की रक्षा करें। इस तरह मनुष्य एवं राज्य दोनों एक–दूसरे के लिए साध्य भी साधन भी। ‘अर्थशास्त्र’ में राज्य अपेक्षाकृत शक्तिशाली संस्था है। उसमें राज्य–हित के आगे मनुष्य की उपयोगिता महज संसाधन जितनी है। लोककल्याण के नाम पर चाणक्य यदि राज्य के कुछ कर्तव्य सुनिश्चित करता है तो उसका ध्येय मात्र राज्य के लिए योग्य मनुष्यों की आपूर्ति तक सीमित है। ‘पॉलिटिक्स’ के विचारों के केंद्र में नैतिकता है। वहां राज्य का महत्त्व उसके साथ पूरे समाज का हित जुड़े होने के कारण है। राज्य द्वारा अपने हितों के लिए नागरिक हितों की बलि चढ़ाना निषिद्ध बताया गया है। दूसरी ओर ‘अर्थशास्त्र’ के नियम नैतिकता के बजाए धर्म को केंद्र में रखकर बुने गए हैं, जहां ‘कल्याण’ व्यक्ति का अधिकार न होकर, दैवीय अनुकंपा के रूप में प्राप्त होता है। जिसका ध्येय राज्य की मजबूती और संपन्नता के लिए आवश्यक जनबल का समर्थन और सहयोग प्राप्त करना है। ठीक ऐसे ही जैसे कोई पूंजीपति श्रमिक–कामगार को मात्र उतना देता है, जिससे वह अपनी स्वामी के मुनाफे में उत्तरोत्तर संबृद्धि हेतु अपने उत्पादन–सामर्थ्य को बनाए रख सके।

अरस्तु के जीवनकाल में यूनान भारी उथल–पुथल के दौर से गुजर रहा था। लोग छोटै–छोटे राज्यों से उकताने लगे थे। गणतांत्रिक प्रणाली को नाकाम होते देख साम्राज्यवादियों का हौसला बढ़ा था। वे नए सिरे से साम्राज्यवादी विस्तार की तैयारियों में लगे थे। छोटे राज्यों के असफल होने के दो कारण थे। पहला उनमें आपस में बहुत झगड़े होते थे। जरा–सी बात पर तलवारें खिंच जाया करती थीं। दूसरा और प्रमुख कारण था—व्यापारिक बाधाएं। ईसा पूर्व पांचवी–छठी शताब्दी में अंतर्प्रायद्विपीय व्यापार ने काफी तरक्की की थी। व्यापारिक बेड़े दूर–दराज के राज्यों के साथ व्यापार करते थे। दूसरे राज्य में व्यापार की अनुमति पारस्परिक राजनीतिक संबंधों पर निर्भर करती थी। संबंध अनुकूल हों तब भी शिल्पकार संगठनों को दूसरे राज्य में व्यापार हेतु भारी–भरकम करों का भुगतान करना पड़ता था। बड़े राज्यों के गठन के पीछे मूल विचार था कि उनमें मुक्त व्यापार के लिए अधिक बाजार उपलब्ध हो सकेगा। कुल मिलाकर बड़े राज्यों के गठन के पीछे जहां सभ्यताकरण की प्रेरणाएं थीं, वहीं वर्तमान के प्रति असंतोष की भावना भी थी। अरस्तु जैसा प्रखर विद्वान परिवर्तनों का मूक–निष्पंद द्रष्टा बनकर नहीं रह सकता था। वह दार्शनिक था। विचारों का उसकी दुनिया में महत्त्व था।

विचारों को वह किसी भी प्रकार के परिवर्तन की आधारशिला मानता था। उसका मानना था कि मनुष्य श्रेष्ठ का चयन तब कर सकता है, जब उसे श्रेष्ठत्व का बोध हो। उन खूबियों की जानकारी हो जो श्रेष्ठ को श्रेष्ठत्व प्रदान करती हैं। ऐसा नहीं है कि इसकी शुरुआत अरस्तु या प्लेटो से हुई हो। दर्शन के रूप में राजनीति के अध्ययन की शुरुआत बहुत पहले हो चुकी थी। प्राचीन यूनान में होमर, लायक्राग्स, सोलन, प्रोटेगोरस, एंडीफोन, पाइथागोरस, जेनोफीन जैसे अनेक नाम हैं, जिन्होंने राजनीति को सभ्यताकरण के उपकरण की भांति प्रयुक्त किया था। तथापि सुसंगत राजनीतिक चिंतन का अभाव था। राजा प्रजा की मांग तथा अपनी सुविधा के अनुसार कुछ नियम बना लिया करते थे। फिर लंबे समय तक उन्हीं को मार्गदर्शक मानकर काम चलाया जाता था। उनमें से कुछ पर अमल हो पाता था, कुछ पर नहीं। प्रजा कुछ समय तक प्रशासन की दुर्बलताओं को सहती। धीरे–धीरे असंतोष उमड़ने लगता था। फलस्वरूप नए सिरे से व्यवस्था–परिवर्तन की मांग उठने लगती थी। नियमों में बड़ा परिवर्तन प्रायः बड़े सत्ता–परिवर्तन के साथ ही हो पाता था।

प्लेटो ने न केवल विभिन्न राजनीतिक दर्शनों को एक साथ अध्ययन–चिंतन का विषय बनाया, वहीं उनकी खूबियों और खामियों पर भी चर्चा की। उसका लक्ष्य सामाजिक आदर्श थे, जिनके लिए वे राजनीति को औजार के रूप में उपयोग करना चाहता था। अरस्तु ने उस अध्ययन को तर्कसम्मत ढंग से विस्तार दिया। उसके लिए कसौटी न्याय और नैतिकता को बनाया। अरस्तु की कामना ऐसे राज्य की थी, जो परमशुभ की प्राप्ति हेतु सतत अग्रसर हो। जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को अपनी अच्छाइयों के साथ जीने की आजादी हो। और वह अंतःस्फूर्त्त प्रेरणा के साथ लक्ष्य–प्राप्ति हेतु संकल्परत हो। यह तभी संभव है जब व्यक्ति को कानून और समाज की मर्यादा में, वह सब कुछ करने की स्वतंत्रता हो जिसे वह अपने लिए उपयुक्त मानता है। इसके लिए आवश्यक है कि राज्य अपेक्षित रूप में उदार हो। निरंकुश, अल्पतंत्रात्मक राज्यों में जनसाधारण से उसके चयन का अधिकार छीन लिया जाता है। इस कारण प्लेटो ने निरंकुश राज्य को सबसे बुरा माना है। उसके अनुसार निरंकुश राज्य में नीचे से ऊपर तक सभी स्वार्थ–लिप्त होते हैं। संसाधनों पर कुछ लोगों का अधिकार होता है। बहुसंख्यक वर्ग से अपेक्षा की जाती है कि वह अल्पसंख्यक शासक वर्ग की मनमानियों को सहते हुए शासन में सहयोग करे तथा राज्य के हित को, जो वास्तव में उसपर शासक वर्ग द्वारा थोपा हुआ उसका स्वार्थ होता है—अपना हित समझकर वर्ताब करे। ऐसे राज्य में मनुष्य सज्जन की संगत को तरस जाता है। दुर्जन उसे चारों ओर से घेरे रहते हैं। परिणामस्वरूप वह अपनी ही अच्छाइयों से कट जाता है। दुष्प्रभाव केवल यहीं तक सीमिन नहीं रहता। अपने चारों और स्वार्थपरक माहौल देख भले नागरिकों का अपनी मूल–भूत अच्छाई से भरोसा उठने लगता है। वे मान लेते हैं कि अस्तित्व को बचाए रखने के लिए दुर्जनों के बीच दुर्जन जैसा व्यवहार करना उसकी मजबूरी है। बुराई के लिए आपधापी में अच्छाई की बलि चढ़ा दी जाती है। परिणामस्वरूप लोगों के स्वार्थ प्रबल होने लगते हैं। केवल अपने लिए जीने की होड़ मच जाती है। कुल मिलाकर निरंकुश राज्य नागरिकों को स्वार्थ के लिए प्रेरित करता है। ऐसे समाजों में चूंकि प्रत्येक व्यक्ति अपने स्वार्थ के लिए जीता है, इसलिए सामूहिक हितों के लिए संगठित प्रतिरोध की उसकी क्षमता निरंतर घटती जाती है। ऐसे समाजों में न्याय के अवसर विरल हो जाते हैं।

प्लेटो व्यक्ति एवं समाज की अंतःनिर्भरता पर जोर देता है। सामाजिकता की शर्त है कि अन्योन्याश्रितता केवल सुख–सुविधाओं और संसाधनों की नहीं, आचार–व्यवहार की भी बनी रहे। इस दृष्टि से मनुष्य तथा समाज के बीच बहुत अधिक अंतर नहीं होता। श्रेष्ठ मनुष्य श्रेष्ठ नागरिक भी होता है, किंतु अकेले मनुष्य की श्रेष्ठता क्षण–भंगुर होती है। मनुष्य अपने आचार–व्यवहार में श्रेष्ठतर बना रहे, उसके लिए समाज की श्रेष्ठता अपरिहार्य है। इस तरह जो मनुष्य के लिए आदर्श है, प्रकारांतर में वह राज्य के लिए भी आदर्श होना चाहिए। न्याय मानव जीवन का उद्देश्य तभी बन सकता है, जब वह समाज का उद्दिष्ट हो। यदि समाज में न्याय का अभाव है तो समझना चाहिए कि राज्य एवं नागरिकों के बीच विश्वास एवं तालमेल की कमी है। विचार को आगे बढ़ाता हुआ प्लेटो लिखता है कि मनुष्य के लिए क्या श्रेष्ठ है, इसे उस समय तक नहीं जाना जा सकता, जब तक हम यह न जान लें कि राज्य के लिए क्या श्रेष्ठ है। अथवा राज्य जो उसके नागरिकों के लिए श्रेष्ठ है, उसे अपने लिए भी श्रेष्ठ न मान ले।

निरंकुश राज्य में ऐसा संभव नहीं होता। वहां नागरिकों से न केवल उनके चयन का अधिकार छीन लिया जाता है, बल्कि लोगों को विवश किया जाता है कि वे अपने विवेक से काम लेने के बजाय दूसरों के आदेश का अनुपालन करें। इससे मनुष्य अपने नागरिक धर्म को भूल जाता है। दूसरी ओर वे लोग जो दूसरों के श्रम और अधिकारों पर कब्जा जमाए होते हैं, विरोध की कोई संभावना न देख उनका दुस्साहस बढ़ता ही जाता है। परिणामस्वरूप स्तरीकरण स्थायी रूप ले लेता है। इससे समाज दो हिस्सों में बंट जाता है। एक ओर आज्ञा–प्रदाता समूह होता है। दूसरी ओर आज्ञापालक लोग, जो संख्या में बहुसंख्यक होने के बावजूद अधिकार–वंचित होने के कारण दबाव में रहने को विवश होते हैं। इससे मनुष्य की मूलभूत पहचान जो उसके मानवीकरण की शर्त के साथ जुड़ी है, धूमिल पड़ने लगती है। अरस्तु ने मनुष्य को सभी प्राणियों में श्रेष्ठ माना है। मनुष्य सबके साथ मिलकर जीने को उत्सुक होता है, इस कारण वह दूसरों से श्रेष्ठ है। परंतु सामूहिकरण की भावना जो पशुओं में भी होती है। यहां तक कि कीट–पतंगे भी समूह में जीना जानते हैं। फिर मनुष्य की सामूहिकता और मानवेत्तर प्राणियों की सामूहिकता में क्या अंतर है? अरस्तु के अनुसार मनुष्य की सामूहिकता समाज के रूप में कुछ नियमों से बंधी होती है। या यह कहो कि अपनी सूझबूझ का परिचय देते हुए वह सामाजिक नियमों के रूप में कुछ मर्यादाएं चुनता है। फिर उनके अनुपालन हेतु संस्थाओं का गठन करता है। मानवेत्तर प्राणियों में ऐसा नहीं होता। वहां केवल बल का साम्राज्य होता है। इसलिए जब कोई बलशाली प्राणी अपने से कमजोर पर आक्रमण कर उसके लिए संकट उत्पन्न करता है, तो बाकी जानवरों में उसकी कोई स्थायी प्रतिक्रिया नहीं होती। मनुष्य के साथ ऐसा नहीं है। मानव–समाज में अधिकार एवं कर्तव्य साथ–साथ चलते हैं। परंतु ऐसे समाजों में जहां स्तरीकरण बहुत अधिक हो, समाज शक्तिशाली और शक्ति–विपन्न वर्गों में बंटा हो, वहां मिल–जुलकर रहने की प्रवृत्ति भी कमजोर पड़ती जाती है। न्याय–भावना किसी भी मनुष्य की श्रेष्ठता का मापदंड होती है। न्याय–भावना से कटा मनुष्य नितांत जंगली हो सकता है।

कवि–हृदय प्लेटो आदर्श राज्य के सपने को अपनी कल्पना के जरिये विस्तार देता है। उसका वैचारिक स्तर इतना ऊंचा है कि व्यावहारिक कठिनाइयों को कभी समझ ही नहीं पाता। अरस्तु को मानव–व्यक्तित्व की जटिलताओं की समझ अपेक्षाकृत अधिक थी। वह जानता था कि मनुष्य के व्यवहार के बारे में कोई भी सटीक भविष्यवाणी कर पाना संभव नहीं है। यह भी नहीं कहा जा सकता कि किसी मनुष्य में जो गुण आज हैं, वे सदैव बने रहेंगे। इसलिए किसी व्यक्ति का दार्शनिक होना उसके चरित्र का स्थायी लक्षण नहीं है। अपने विचारों की व्याख्या के लिए अरस्तु ने ‘पॉलिटिक्स’ के तीसरे खंड के तेरहवें अध्याय में पेरियांडर का उदाहरण दिया है। पेरियांडर ने 627 ईस्वीपूर्व से 587 ईस्वीपूर्व तक कोरिंथ पर राज किया था। उसकी गिनती ग्रीक के सात प्राचीन संतपुरुषों में होती है। वह दार्शनिक, कवि, आविष्कारक, योद्धा और श्रेष्ठ प्रशासक था। यातायात साधनों की खोज तथा अनेक महत्त्वपूर्ण भवनों के निर्माण के कई आविष्कारों का श्रेय भी उसे दिया जाता है। किंतु उसका आचरण उसकी विद्वता के सर्वथा विपरीत था।

अपने आचरण में वह पूरी तरह निरंकुश, क्रोधी, निर्मम, कठोर और कुटिल तानाशाह था। एक बार उसे अपनी पत्नी लिसिडा पर इतना क्रोध आया कि उसे सीढ़ियां पर ढकेल दिया था, जिसमें उसकी मृत्यु हो गई। पेरियांडर और मेनिटस के राजा थ्रेसीबुलस् के बीच गहरी मैत्री थी। पेरियांडर की भांति थ्रेसीबुलस् भी निरंकुश सम्राट था। मेलिटस और लीडिया के बीच लंबा संग्राम चला था। वर्षों तक चलने वाले युद्ध का कोई परिणाम न निकलता देख दोनों राज्य आपस में समझौते के लिए विवश हो गए। थ्रेसीबुलस ने युद्ध विराम की घोषणा तो कर दी, लेकिन वह अपने विरोधियों को मित्र का दर्जा देने को तैयार न था। इस कारण वह भीतर से बहुत आहत था। सो उसने पेरियांडर से सलाह लेने के लिए उसके पास अपना दूत भेजा। पेरियांडर ने दूत की बातें सुनीं। सलाह देने के बजाय वह दूत को बस्ती से बाहर खेत में ले गया। वहां गेहूं की फसल खड़ी थी। पेरियांडर ने साथ आए सैनिकों को सबसे ऊपर निकली बालियों को काटने का आदेश दिया। उसके इशारे पर सैनिकों ने सबसे ऊपर दिखने वाली बालियों को काटकर जमीन पर बिछा दिया। उसके बाद थ्रेसीबुलस् के दूत को वापस लौटा दिया। दूत की कुछ समझ न आया। उसने वापस लौटकर जो कुछ घटा था, सम्राट को बता दिया। सुनकर थ्रेसीबुलस् की आंखों में चमक आ गई।

वह पेरियांडर का इशारा समझ गया। सबसे ऊंची बालियों को नष्ट कर देने का अर्थ जो उसने निकाला वह था, अपने सभी प्रमुख विरोधियों का निर्ममतापूर्ण सफाया। अरस्तु का निष्कर्ष था कि सत्ताएं अपना विरोध नहीं सह पातीं। गणतांत्रिक सरकारें तानाशाहों की भांति कठोर फैसले लेने से बचती हैं, लेकिन विरोधियों को वे भी अपवादस्वरूप ही पचा पाती हैं। विरोधियों के क्रूरतापूर्ण दमन से बचते हुए वे आरंभ में अपेक्षाकृत उदार दिखने वाले रास्ते अपनाती हैं। उनकी पहली कोशिश विरोधियों के संगठन को तोड़ने की होती है। फिर उनमें से एक पक्ष को बहला–फुसला या सत्ता में हिस्सेदार बनाकर अपने पक्ष में कर लिया जाता है। यदि उससे समाधान की संभावना कम हो अथवा कोई अड़ जाए राष्ट्रहित का हवाला देते हुए देश–निकाले जैसी सजा देकर उससे मुक्ति पा ली जाती है।

अरस्तु आदर्श और व्यवहार के अंतर को वह भली–भांति समझता था। प्लेटो आदर्श से तनिक पीछे हटने को तैयार न था, जबकि अरस्तु आदर्श और व्यवहार में संतुलन बनाए रखने का समर्थक था। व्यावहारिकता से जरा–भी पीछे हटे बिना वह समाज में नैतिकता और अनुशासन को बनाए रखने का समर्थन करता है। व्यावहारिक आदर्शोन्मुखता उसके दर्शन का मुख्य लक्षण है। उल्लेखनीय है कि ‘पॉलिटिक्स’ की रचना से पहले उसने 158 नगर–राज्यों के संविधानों का अध्ययन किया था। अंततः वह इस निष्कर्ष पर पहुंचा था कि प्रत्येक राजनीतिक दर्शन स्वयं में अपूर्ण है। केवल चरित्र की ईमानदारी और निष्ठा से अपेक्षित लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। किसी एक व्यक्ति अथवा समूह द्वारा भी उन आदर्शों को प्राप्त नहीं किया जा सकता। इसके लिए समाज के सभी वर्गों के बीच आपसी सहयोग और तालमेल आवश्यक है। समाजवाद की भाषा में कहें तो सब एक के लिए और एक सबके लिए जीने को तैयार हो, तभी अपेक्षित लक्ष्यों की प्राप्ति संभव है। राजनीति के आधुनिक पंडित राजतंत्र की आलोचना इस आधार पर करते हैं कि वहां राजा वंशानुगत आधार पर सत्ता ग्रहण करता है। एक ही वर्ग की मनमानी चलती रहती है। महत्त्वपूर्ण निर्णय लेते समय जनता से सलाह–मशविरा करने अथवा लोगों की इच्छाओं का सम्मान करने की जरूरत ही नहीं समझी जाती। प्रायः सत्ता पक्ष की पसंदों को प्रजा की पसंद या उसके लिए सर्वथा हितकारी बनाकर लाद दिया जाता है। ऐसे समाजों में संपन्न लोगों की चलती है और न्याय की संभावना अत्यंत विरल हो जाती है।

जबकि अरस्तु के अनुसार न्याय प्रत्येक व्यवस्था का अंतिम उद्देश्य होना चाहिए। तदनुसार न्याय की दृष्टि में जो श्रेष्ठ है, वही राज्य के गठन का उद्देश्य भी है। इसलिए राजतंत्र हो अथवा लोकतंत्र, यदि उसका शासन समाजीकरण की प्रक्रिया को मजबूत बनाते हुए राज्य के उद्देश्यों के प्रति समर्पित है, यदि वह राजकर्म को समाज द्वारा सौंपी गई जिम्मेदारी मानता है तो उसे अनैतिक नहीं माना जा सकता। हालांकि अकेले व्यक्ति के हाथों में सत्ता आने पर उसकी मनमानी के आसार अधिक होते हैं। राजतंत्र में प्रायः यह सोचकर कि राजा के सुख में ही प्रजा का सुख निहित है—नीतियां बनाई जाती हैं। इसलिए प्रजा की पसंदों के बारे में पता ही नहीं चल पाता। प्रजा भी राज्य की ओर से उम्मीद खो बैठती है। उस अवस्था में राज्य के गठन का औचित्य ही समाप्त हो जाता है। यदि प्रजा की उदासीनता बहुत अधिक बढ़ जाए तो वह राज्य की प्रवृत्ति तथा उसके बदलाव में रुचि लेना छोड़ देती है। इससे शीर्ष पर बैठे लोगों की मनमानियां बढ़ती जाती हैं।

भारत में राजा नामक संस्था को असुरों की देन बताया गया है। ऐतरेय ब्राह्मण में रोचक प्रसंग आया है—‘‘देव और असुर परस्पर युद्धरत रहते थे। दोनों के बीच पूरब दिशा में युद्ध हुआ। उसमें देवता पराजित हुए। अगली लड़ाई दक्षिण में हुई। उसमें भी असुरों की जीत हुई। उसके बाद पश्चिम में युद्ध हुआ। असुरों ने एक बार पुनः देवताओं को पराजित किया। फिर उत्तर दिशा में युद्ध हुआ। देवता उस युद्ध में भी पराजित हुए। उसके बाद वे उत्तर–पूर्व में युद्धरत हुए। इस बार देवताओं की विजय हुई। देवताओं ने माना, वह दिशा ‘अपराजेय’ है…।केवल वही दिशा थी, जिसमें देवताओं को जीत मिली। अंततः देवताओं को समझ आया—‘हम इसलिए पराजित हुए, क्योंकि हमारा कोई राजा नहीं है।’ उसके बाद उन्होंने सोम को अपना राजा चुना।’’16 उसके बाद राजा नियुक्ति की जाने लगी। यजुर्वेद में राजा को उसके कर्तव्यों के बारे में चेताते हुए कहा गया है—‘तुम्हें यह राष्ट्र सौंपा जाना है—प्रजा के क्षेम तथा उसके सर्वविध पोषण, कृषि की उन्नति एवं बहुआयामी विकास के लिए।’17 अथर्ववेद में कहा गया है—‘प्रजा के सुख में ही राजा का सुख, प्रजा कल्याण में राजा का कल्याण निहित है।18 लेकिन कल्याण का स्वरूप क्या हो? प्रजा के सुख को तय करने वाले मापदंड कैसे हों? क्या यह संभव है कि कोई एक सुख प्रजा के सभी सदस्यों के लिए समानरूप से सुखकारी हो? राजतंत्र चूंकि किसी एक व्यक्ति या चुने हुए व्यक्तियों के समूह की इच्छा द्वारा नियंत्रित होता है, इसलिए राजतंत्र में इन प्रश्नों को प्रायः अनसुना कर दिया जाता है।

देवासुर संग्राम एक प्रतीक है। मिथकीय आख्यान। परंतु यह ऐतिहासिक सत्य है कि प्राचीन भारत में लंबे समय तक यही हाल रहा। छोटे–छोटे राज्य आपस में लड़ते रहते थे। इसलिए प्रजा ‘कोऊ नृप होय हमें क्या हानि’—कहकर राज्य और राजा दोनों की ओर से उदासीन बनी रहती थी। यहां तक कि सत्ता केंद्र पूरी तरह बदल जाने पर भी परिवर्तनों पर उसका ध्यान नहीं जाता था। सामान्यतः इसे राजनीति की असफलता कहा जाएगा। क्योंकि वह उन लोगों के राज्य का नेतृत्व करने का दावा करती थी, जिन्हें पता ही नहीं होता कि उनका राज्य के प्रति और राज्य का उनके प्रति क्या कर्तव्य है? न ही यह मालूम होता है कि राज्य समाज से ऊपर नहीं, बल्कि समाज द्वारा खुद को व्यवस्थित रखने के लिए गढ़ी गई संस्था है, जिसपर एकमात्र जनता का सर्वाधिकार है। यदि उन्हें या उनमें से किसी एक को राज्य की ओर से कुछ समस्या है तो इसका कारण केवल राज्य की दुर्बलता नहीं, बल्कि उनका अपने ही अधिकारों के प्रति उपेक्षा–भाव भी है। असल में वे जान ही नहीं पाते कि वास्तविक समस्या राज्य को उत्तराधिकार का विषय और केवल शक्ति–केंद्र समझकर उसपर काबिज होने, फिर उन कर्तव्यों से पलायन से जन्म लेती है, जो राजा नामक संस्था के लिए विहित हैं।

इसलिए अरस्तु ने राजतंत्र की आलोचना करने के बजाए राजा के आदर्शों पर ज्यादा जोर दिया है। उसका विचार था कि जिस व्यक्ति में नेतृत्व का गुण हो, वही राजा है। स्टोइक विचारकों के अनुसार केवल वही व्यक्ति सम्राट बनने का अधिकारी था, जो आचरण में सर्वश्रेष्ठ तथा राजपद के लिए अपेक्षित योग्यताएं रखता हो। सुकरात का विचार था कि राजा उसे बनाना चाहिए जिसमें राजा के लिए अपेक्षित सभी गुणों का समावेश हो। इस तरह सिद्धांत के स्तर पर राजशाही में भी लोकहित को साधने पर जोर दिया जाता है। परंतु यदि समाज का बहुसंख्यक समुदाय ही राज्य, उसकी गतिविधियों और अपने अधिकारों की ओर से उदासीन हो जाए तो शिखर पर बैठे लोगों को मनमानी का अवसर सहज ही मिल जाता है। अरस्तु का विचार था कि यदि नागरिक अपने अधिकारों के प्रति जागरूक तथा शासक वर्ग कर्तव्यों के प्रति पूर्णतः सचेत हो तो कोई भी राजनीतिक दर्शन राज्य के उद्देश्यों को प्राप्त कर सकता है। इसलिए दोष किसी विचार अथवा विचारधारा का न होकर उसका सही अनुपालन न करने तथा राजनीतिज्ञों के स्वार्थ से घिर जाने का है। इसलिए उसने कहा था—

‘कम से कम आधी राजनीति उपलब्ध संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण तथा परिस्थितियों का श्रेष्ठतम उपयोग करने में है।’

ऐसा नहीं है कि अरस्तु राजनीतिक परिवर्तन की संभावनाओं अथवा उसमें नए चिंतन और विचारों को अनावश्यक मानता था। उसका विचार था कि राजनीतिक दर्शनों में सुधार की भरपूर संभावना है। उसके लिए राज्य एवं नागरिकों का आपसी विश्वास एवं सहयोग आवश्यक है। यह तभी संभव है जब राज्य के सभी नागरिक श्रेष्ठतम आचरण का प्रदर्शन करें, तथा राज्य के केंद्र पर आसीन शक्तियां अपने कर्तव्यों के प्रति पूरी तरह सजग एवं समर्पित हों। आदर्श राज्य को लेकर कुछ ऐसा ही स्वप्न प्लेटो का भी था। क्या दोनों का परिकल्पनाएं समान हैं? यदि कुछ अंतर है तो क्या है? ‘दि लॉज’ प्लेटो की प्रौढ़ वयस् की रचना है। उसकी गिनती राजनीतिक दर्शन की श्रेष्ठतम कृतियों में की जाती है। प्लेटो ने उसमें आदर्श राज्य की संकल्पना को प्रस्तुत किया है। अरस्तु को वह परिकल्पना अव्यावहारिक लगती है। प्लेटो के विचारों को सर्वथा मौलिक और अनुपम बताकर वह उसकी प्रशंसा करता है, साथ में यह भी जोड़ देता है कि उसके विचार उत्कृष्ट वैचारिकता से भरपूर होने के साथ–साथ, अत्यधिक क्रांतिकारी किंतु अतिकल्पनात्मक हैं। उसके शब्दों में छिपी व्यंग्य–रेख को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। अप्रत्यक्ष रूप से वह प्लेटो के विचारों को अव्यावहारिक करार देता देता है। इसका आशय यह नहीं है कि राज्य के लिए जिस उच्चतम आदर्शं की परिकल्पना प्लेटो करता है, उसके स्वरूप एवं संचालन को लेकर अरस्तु की उससे कुछ कम अपेक्षाएं हैं। देखा जाए तो दार्शनिक सम्राट के रूप में उसकी कामना ऐसे महामानव की है जो उच्च मानवादर्शों से युक्त हो।

जो लोगों की समानता और स्वतंत्रता में विश्वास रखता हो। उनके सुख एवं सुरक्षा में संवृद्धि के प्रति पूरी तरह संकल्पबद्ध हो। ऐसा महामानव मिलना असंभव है। यदि चमत्कार–स्वरूप मिल भी जाए तो उसके परिवर्त्ती सम्राट उसी की भांति गुणवंत होंगे इसकी संभावना अत्यंत विरल है। समय के साथ स्वयं व्यक्ति के आदर्श एवं प्राथमिकताओं में बदलाव आ सकता है। आदर्श राज्य के लिए ‘दार्शनिक सम्राट’ की अनुशंसा करते समय प्लेटो प्रकारांतर में राजतंत्र का ही पक्ष लेता है, जिसमें राजा की इच्छा सर्वोपरि होती है। जबकि व्यक्ति वह चाहे जितना उदार क्यों न हो, अपने ईमानदार सोच, संपूर्ण सदेच्छा और समर्पण के साथ काम भी करता हो, यह आवश्यक नहीं कि जिसे वह विस्तृत जनसमाज के लिए हितकारी मानता है, वह उसके लिए वास्तव में उतना ही हितकारी हो। पेरियांडर का उदाहरण पीछे दिया गया है। छब्बीस शताब्दी पहले ग्रीक में जन्मा पेरियांडर एक साथ वीर, दूरदृष्टा, आविष्कारक, कुशल प्रशासक, महत्त्वाकांक्षी सम्राट आदि सबकुछ था। उसके शासन के दौरान कोरिंथ ने खूब तरक्की की। कई नए आविष्कार उसने किए। महत्त्वपूर्ण इमारतों का निर्माण कराया, परंतु समय के साथ उसकी मान्यताओं में बदलाव आता गया। आज कुछ लोग उसे तानाशाह के रूप में पहचानते हैं, जबकि कुछ के लिए जो उसके आरंभिक जीवन के कार्यकलापों पर अटके रहते हैं, पेरियांडर संत की हैसियत रखता है। ठीक ऐसे ही जैसे राम के बारे में कहा जाता है। रामराज्य को आदर्श बताने वालों के लिए राम इतना आदर्श राजा है कि वे उसे ईश्वर का दर्जा देते है। परंतु जो लोग उसे शंबूक हत्या का दोषी मानते हैं, उनकी निगाह में वह निरंकुश सम्राट है।

वस्तुतः राजनीतिक आदर्श के रूप में अरस्तु राज्य के जिस स्वरूप की कल्पना करता है, उसमें और प्लेटो के दर्शन में विशेष अंतर नहीं है। ‘आदर्श राज्य’ के रूप में प्लेटो जो कल्पना करता है, अरस्तु उसी सपने को ‘राज्य के आदर्श’ के रूप में साकार करना चाहता है। इस तरह हम अरस्तु के विचारों पर प्लेटो की छाया को देख सकते हैं। बावजूद इसके अरस्तु के विचारों को प्लेटो के दर्शन की पुनरावृत्ति नहीं कहा जा सकता। ‘राज्य के आदर्श’ को परिपक्व दर्शन के रूप में विस्तार देने से पहले वह प्लेटो के ‘आदर्श राज्य’ से उतनी ही प्रेरणा लेता है, जितनी आवश्यक है। ‘लॉज’ में प्लेटो का यह विचार कि न्याय सभ्यताकरण की कसौटी है तथा न्याय से ही मानव ने सभ्यता का पाठ पढ़ा है—अरस्तु के दर्शन के लिए प्रस्थान बिंदू का काम करता है।