साहित्य में पुरस्कारों की राजनीति

पुरस्कारों की समाज में प्राचीनकाल से ही एक लम्बी परम्परा रही है। उत्कृष्ट व सृजनात्मक कार्य को सम्मानित-पुरस्कृत करके जहाँ सम्बन्धित व्यक्ति को प्रोत्साहित किया जाता है, वहीं अन्य लोगों हेतु यह एक नजीर भी पेश करता है। पुरस्कार भावनात्मक, आर्थिक या अन्य किसी भी रूप में हो सकते हैं। सभ्यता के विकास के साथ ही पुरस्कारों के रूप, उद्देश्य व प्रयोजन में भी मात्रात्मक परिवर्तन होते गये। साहित्य में रचनाधर्मिता भी पुरस्कारों से अछूती नहीं है। कभी-कभी तो रचना स्वयं किसी के सम्मान में कही जाती है, यहाँ पर रचना स्वयं में पुरस्कार बन जाती है। आगे पढ़िये...

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  • प्रविष्ट तिथि : Wednesday, March 17, 2010
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राम शिव मूर्ति यादव

भाषाओं को बचाने रांची में महासम्मेलन

रांची । भाषाओं को विलुप्त होने से बचाने के लिए ‘झारखंडी भाषा साहित्य संस्कृति अखड़ा ‘ लगातार सक्रिय है । इसी तारतम्य में 16-17 अप्रैल 2010 को रांची में अखड़ा का द्वितीय महासम्मेलन किया जा रहा है । आगे पढ़िये...

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छोटे कस्बों तक हो लोक संस्कृति का प्रचार

जयपुर । राज्यपाल प्रभा राव ने कहा है कि विभिन्न राज्यों की कला एवं संस्कृति का प्रचार-प्रसार करने के लिए पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र शहरी क्षेत्रों के साथ-साथ छोटे जिलों एवं कस्बों में भी कार्यक्रमों का आयोजन करें। राज्यपाल शनिवार को उदयपुर स्थित आनंद भवन में पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र के शासकीय बोर्ड की बैठक की अध्यक्षता कर रहीं थीं। उन्होंने बैठक में केंद्र की वर्ष 2008-2009 के कार्यो की समीक्षा तथा वर्ष 2009-2010 में आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों का अवलोकन दृश्य-श्रव्य माध्यम से किया। आगे पढ़िये...

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  • प्रविष्ट तिथि : Wednesday, March 17, 2010
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राजस्थान साहित्य अकादमी पुरस्कार हेतु कृतियाँ आमंत्रित

जयपुर । राजस्थान साहित्य अकादमी की पुरस्कार योजना के अंतर्गत वर्ष 2010-2011 के लिए कृतियाँ आमंत्रित की गई हैं। आगे पढ़िये...

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  • प्रविष्ट तिथि : Wednesday, March 17, 2010
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ओडिसा की साहित्यिक गतिविधियाँ

भुवनेश्वर ने 'सरग शशि' के 9 वें राज्यस्तरीय वार्षिक सारस्वत समारोह में मुख्य अतिथि व राज्य की प्रख्यात लेखिका पद्मश्री डा. प्रतिभा राय ने बाल साहित्यकार देवराज सामन्तराय द्वारा रचित पुस्तक 'ता धेईकी' का विमोचन किया गया। उधर राऊरकेला के भाषासेवी श्री नारायण पति सम्मानित हुए हैं । किशोर कुमार महान्ति रचित कविता पुस्तक 'धुम्राभ स्वर-' का विमोचन भी पिछले दिनों कटक में किया गया । आगे पढ़िये...

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  • प्रविष्ट तिथि : Wednesday, March 17, 2010
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डॉ. हरेकृष्ण मेहेर

केदारनाथ सिंह भी नहीं लेंगे अकादमी सम्म्मान

दिल्ली । हिंदी के स्वनामधन्य कवि श्री केदारनाथ सिंह ने हिंदी अकादमी की ओर से घोषित शलाका सम्‍मान लेने से इनकार कर दिया है। उन्होंने यह निर्णय उन्‍होंने कथाकार कृष्‍ण बलदेव वैद के साथ अकादमी के अपमानजनक बर्ताव की जानकारी मिलने पर किया है। आगे पढ़िये...

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  • प्रविष्ट तिथि : Wednesday, March 17, 2010
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ग्लोबल गाँव के देवता

नियुक्ति-पत्र देखकर ख़ुश होऊँ कि उदास होऊँ, समझ में नहीं आ रहा। लम्बी बेरोज़गारी, बदहाली, उपेक्षा, अपमान की गाढ़ी काली रात के बाद रौशनी आयी थी। मैं अब नौकरीशुदा था। यह ख़ुशी की बात थी। एक तरफ़ बहुत ही ख़ुशी की बात, मन बल्लियों उछलने को कर रहा था। दूसरी तरफ़ जिस स्कूल में पोस्टिंग हुई थी उसे देखकर दिल डूबा जा रहा था। बरवे ज़िला ही हमारे घर से ढाई-तीन सौ किलोमीटर दूर था। उस पर प्रखंड कोयलबीघा का भौंरापाट। पहाड़ के ऊपर, जंगलों के बीच वह आवासीय विद्यालय। पीटीजी गर्ल्ज रेज़िडेंशियल स्कूल। प्रिमिटिव ट्राइव्स, आदिम जनजाति परिवार की बच्चियों के लिए आवासीय विद्यालय में विज्ञान-शिक्षक। क्या पोस्टिंग थी ! ख़ुश होने के बदले माथा पीटने का मन होने लगा। मेरे ही साथ ऐसा क्यों होता है ? माँ पिछली रोटी खिलाती रही है शायद। आगे पढ़िये...

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  • प्रविष्ट तिथि : Wednesday, March 17, 2010
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उपन्यासकार : रणेन्द्र

रज़ा अब लौटेंगे स्वदेश

नई दिल्ली। मशहूर पेंटर एम.एफ.हुसैन भले ही वृद्धावस्था में कतर की नागरिकता ले ली हो, लेकिन एक अन्य विख्यात पेंटर सैयद हैदर रज़ा अपना शेष जीवन भारत में बिताने की ख़्वाहिश लेकर साल के आख़िर में स्वदेश लौटने की तैयारी में हैं। बीते छह दशक से वह फ्रांस में रह रहे हैं। वह दुनिया के सबसे महँगे पेंटरों में से एक हैं। आगे पढ़िये...

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  • प्रविष्ट तिथि : Wednesday, March 17, 2010
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भावों का पानी
  • कविता,
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  • प्रविष्ट तिथि : Tuesday, March 16, 2010,
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आशा पाण्डे

तितलियों के देश में....!

इन्सान को जब जीवन जीने की समझ मिलती है तब कच्चे हीरे जैसी होती है । हीरे को तराशने के बाद ही उसके मूल्य की परख हो सकती है । उसे बाज़ार में रखा जाए तब ही जौहरी की नज़र उन पर होती है. समझ पाने के बावजूद इन्सान आख़िर बच्चा ही तो होता है न? उसके बचपन से ही उसे तराशने का कार्य शुरू करना चाहिए । फिर देखो, समाज के बाज़ार में उस हीरे का मूल्य अपने आप बढ़ने लगेगा । बच्चे में जो शक्ति पहली नज़र में ही दिखती है वह आखरी नहीं होती । जो नहीं दिखती उसका शून्यावकाश भी तो नहीं होता! इस बात को स्पष्ट रूप से समजने में हमारी ग़लती हो सकती है, उस बात को कैसे नकार सकेंगे? कभी-कभी बच्चे की बाह्य-भीतरी शक्ति के आसपास ही हम होतें है । जो हमारे छीछौलेपन को प्रकट करके दंभ को ललकारता है । किसी व्यक्ति के सन्दर्भ में हम विविध प्रकार के अभिप्राय देने का हक़ प्राप्त कर लेतें है । ऐसा क्यों? आगे पढ़िये...

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  • प्रविष्ट तिथि : Tuesday, March 16, 2010
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पंकज त्रिवेदी

कृष्ण कुमार यादव को अक्षर शिल्पी सम्मान- 2010

गुना। म.प्र. के प्रतिष्ठित राजेश्वरी प्रकाशन, गुना ने युवा साहित्यकार एवं भारतीय डाक सेवा के अधिकारी श्री कृष्ण कुमार यादव को उनके विशिष्ट कृतित्व, रचनाधर्मिता और प्रशासन के साथ-साथ सतत् साहित्य सृजनशीलता हेतु अक्षर शिल्पी सम्मान-2010 से विभूषित किया है। आगे पढ़िये...

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  • प्रविष्ट तिथि : Tuesday, March 16, 2010
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गोवर्धन यादव की रपट

नहीं रहे मराठी कवि विंदा कारंदीकर

मुंबई। जाने-माने मराठी कवि गोविंद विनायक करंदीकर का रविवार को संक्षिप्त बीमारी के बाद निधन हो गया। 23 अगस्त 1918 को जन्मे विंदा ने मुंबई के भाभा अस्पताल में आख़िरी साँसे लीं। 92 वर्षीय श्री करंदीकर के परिवार में दो पुत्र और एक पुत्री है। वह विंदा करंदीकर के नाम से विख्यात थे। आगे पढ़िये...

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  • प्रविष्ट तिथि : Monday, March 15, 2010
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माँ का पैर
  • कविता,
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  • प्रविष्ट तिथि : Monday, March 15, 2010,
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शिवानन्द द्विवेदी, ‘सहर’

अशोक कुमार पांडेय की तीन कविताएँ
  • कविता,
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अशोक कुमार पांडेय

अखंडता के लिए विभाजन ज़रूरी !

हमारे देश के नेताओं की देशभक्ति देखने लायक है। उन्होंने पहले आज़ादी की लड़ाई लड़ी। ख़ूब लड़ी। जब देखा सत्ता मिलने ही वाली है और उसके दो दावेदार हो गए हैं तो अपनी-अपनी सत्ता बचाने का एकमात्र रास्ता उन्हें यही दिखाई दिया कि विभाजन कर लो। एक म्यान में दो तलवारें तो रह नहीं सकतीं। उन नेताओं के हाथ में धर्म का अस्त्र भी था। काम और आसान हो गया। विभाजन हुआ और आज़ादी के सिपाहियों की राजनीति चल निकली। अब उसका ठीकरा फोड़ना था। सारे नेताओं को एक फ़कीर दिखाई दिया। उस पर ठीकरा क्या फोड़ा, उसे गोली से छलनी कर दिया। आगे पढ़िये...

  • व्यंग्य,
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  • प्रविष्ट तिथि : Monday, March 15, 2010
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डॉ. पुष्पेंद्र दुबे

सुरक्षा का पाठ

राघव अपनी अमरीकी बीवी स्टेला और दो बच्चों - पॉल और जिनि के साथ भारत लौट रहा है, सुनकर मेरा कलेजा चौड़ा हो गया । आख़िर अपना देश खींचता तो है ही । मेरा बेटा राघव तो अमरीका जाने के बाद और भी भारतीय हो गया था । भारत में रहते चाहे उसने कभी 15 अगस्त और 26 जनवरी के कार्यक्रमों में भाग न लिया हो पर विदेश जाते ही उसने अपनी कम्पनी के भारतीय अधिकारियों को इकट्ठा कर वह इन दिनों के उपलक्ष्य में देशप्रेम के कुछ कार्यक्रम करने लगा था जिसके लिए वह मुझसे फ़ोन पर देशप्रेम की कविताएँ और राष्ट्रªप्रेम के गीत पूछता और नोट करता । कार्यक्रम की शुरुआत का भाषण भी रोमन अक्षरों में देवनागरी लिखकर मैं ई मेल से उसे भेजती । आगे पढ़िये...

  • लघुकथा,
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  • प्रविष्ट तिथि : Monday, March 15, 2010
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सुधा अरोड़ा

जेहादी लड़ाकों के ग़ैर इस्लामी कारनामे

जेहादी आतंकवाद की जड़ें वहीं हैं जिनका ज़िक्र बार-बार होता आ रहा है और इतिहास में यह घटना एक काले अध्याय के रूप में दर्ज हो चुकी है। अर्थात् सोवियत संघ की घुसपैठ के विरुद्ध जब अफ़ग़ानी लड़ाकुओं ने स्वयं को तैयार किया उस समय इन लड़ाकुओं ने जिन्हें तालिबानी लड़ाकों के नाम से जाना गया, सोवियत संघ के विरुद्ध ख़ुदा की राह मे जेहाद घोषित किया। इस कथित जेहादी युद्ध में जहाँ अशिक्षित अफ़ग़ानी मुसलमान सोवियत संघ के विरुद्ध एकजुट हुए वहीं इसी दौरान अमेरिका ने भी सोवियत संघ के विरुद्ध तालिबानों को न केवल सशस्त्र सहायता दी तथा अफ़गानिस्तान में इन लड़ाकुओं के प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करने में भी उनकी पूरी मदद की बल्कि उन्हें नैतिक समर्थन देकर उनकी हौसला अफ़ज़ाई भी की।
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  • राजकाज,
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  • प्रविष्ट तिथि : Sunday, March 14, 2010
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तनवीर जाफ़री

पुरुषोत्तम अग्रवाल और पंकज सिंह ने ठुकराया अकादमी सम्मान

दिल्ली । हिन्दी अकादमी के पुरस्कारों को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर गहरा गया है। ख़बर है कि हिन्दी के जाने माने कवि पंकज सिंह ने अकादमी द्वारा उन्हें दिया गया 2008-09 का साहित्यकार सम्मान लेने से मना कर दिया है। इसके साथ ही आलोचक पुरुषोत्तम अग्रवाल ने भी अकादमी सम्मान को ठुकरा दिया है । पंकज सिंह का मानना है कि 'वरिष्ठ लेखक कृष्ण बलदेव वैद को वर्ष 2008-09 का शलाका सम्मान जो देने का निर्णय लिया गया था, वह राजनीतिक दवाबों के चलते निरस्त कर दिया गया। इतना ही नहीं इस वर्ष में भी किसी लेखक को शलाका सम्मान नहीं दिया गया। उनका मानना है कि निर्णायक समिति में शामिल लेखकों और बुद्धिजीवी की अपनी गरिमा और मर्यादा होती है जिसे ठेस पहुँचाने का अधिकार किसी को नहीं है। आगे पढ़िये...

  • हलचल,
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  • प्रविष्ट तिथि : Sunday, March 14, 2010
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प्रदीप कांत की तीन प्रेम कविताएँ
  • कविता,
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  • प्रविष्ट तिथि : Sunday, February 14, 2010,
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प्रदीप कांत

शरणार्थी

दूरस्थ गाँव से आए ये अजनबी नई राजधानी से होते हुए चले जा रहे थे, भले ही उनकी अपनी ज़मीनें यहाँ से, इसी गली से जिस पर वे चले जा रहे थे, कुछ ही सैंकड़ों मील दूर थीं । फिर भी इनके लिए बहुत दूर थीं। उनकी आँखें उन लोगों की आँखें थीं जिन्हें किसी अनुत्तरदाई शक्ति ने उनकी हमेशा से जानी पहचानी उस दुनिया से अचानक अलग कर दिया हो जिसमें वे स्वयं को अब तक सुरक्षित अनुभव करते आए हों । वे जिनके पाँवों अब तक केवल गाँव के रास्तों और खेतों पर चलने के ही अभ्यस्त थे, अब नई राजधानी की भव्य सड़क के एक तरफ़ बनी कंकरीट की नई पटरी पर चले जा रहे थे। भले ही बाज़ार की इस सड़क पर ऐसी चीज़ों की भरमार थी जो उन्होंने पहले कभी नहीं देखी नहीं थीं, और यहाँ तो वाहन भी थे जिनके बारे में उन्होंने कभी सुना भी नहीं था, फिर भी वे कुछ भी देखे बिना चले जा रहे थे, मानो स्वप्न में चले जा रहे हों। आगे पढ़िये...

  • भाषांतर,
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  • प्रविष्ट तिथि : Saturday, March 13, 2010
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मूल : पर्ल. एस. बक
अनुवाद : द्विजेन्द्र ‘द्विज’

महिलाओं की उपस्थिति : एक विहंगावलोकन

स्त्रियों की समस्या और स्थान को लेकर बातें तो बहुत सी है जो की जा सके क्योंकि दोनों को लेकर माहौल तो भड़का हुआ है।स्त्री-पुरुष जैसे सनातन संबंध के बीच जीवन एवं साहित्य में भी कँटीली रेखाएँ खींची जा रही है। जैसे कि सारे झगड़े की जड़ इन दोनों के बीच का शोषक-शोषित का रिश्ता हो। इस बात को हम भूल रहे हैं कि पुरुष,एक पुरुष ही नहीं परंपरा में व्यस्त बहुत से आयामोंवाला एक प्रतीक है। संबंधो में परंपरा का मुखडा़ उसी से दिखाई देता है। आगे पढ़िये...

  • आलेख,
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  • प्रविष्ट तिथि : Saturday, March 13, 2010
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डॉ. नैना डेलीवाला

आधुनिक युग में क्वालिटी मनुष्य

क्वालिटी अर्थात गुणवत्ता। यह शब्द आते ही उत्कृष्टता का स्वर उभरता है। उच्चस्तरीय कार्य या वस्तु। यहाँ प्रयोग में आने वाले माल की शुद्धता भी जेहन में उभरती है। वस्तु के सही नाप-तोल का होना प्रमुख पैमाना बन जाता है। ठीक इसी तरह विश्वसनीयता भी यहाँ जुड़ जाती है। तकनीकी व सेवा के क्षेत्र में विशेष तौर पर सुरक्षा और वातावरण में सकारात्मकता भी अपेक्षित नज़र आती है। मगर क्या उपरोक्त भावना तक ही क्वालिटी के क्षेत्र को सीमित किया जाना चाहिए? शायद नहीं। क्या क्वालिटी शब्द का संदर्भ सिर्फ़ मशीन, उत्पादन और बाज़ार के माल तक ही सीमित है? नहीं। क्या क्वालिटी की विचारधारा को विदेशी मान लिया जाना चाहिए? नहीं। यह तो जीवन के हर क्षेत्र में है। आदिकाल से। कह सकते हैं कि क्वालिटी जीवन जीना हर एक जीवित मानव का सपना और उद्देश्य होता है। और इसी की कोशिश में वो तमाम उम्र निरंतर प्रयासरत रहता है। आगे पढ़िये...

  • आलेख,
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  • प्रविष्ट तिथि : Friday, March 12, 2010
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मनोज सिंह

विमोचन

देवीदयाल जीकी रोज़मर्रा की दिनचर्या मुझसे जान-पहचान के बाद और नियमित हो गयी थी अब तो वे मुझसे पहले मेरे दफ़्तर आ जाते और बाहर प्रतीक्षा करते मिलते। दफ़्तर आते ही खींसे निपोर कर मुझशे पूछते, अर........आप आ गये ? मैं ख़ुद को गिल्टी कॉसस फ़ील करता, कहीं मैं लेट तो नहीं हो गया ? कोई बात नहीं 5-10 मिनट देरी चलती है। देवीदयाल जी से सुनकर मुझ लगता मानो मेरा बास नसीहत दे रहा हो। आगे पढ़िये...

  • कहानी,
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  • प्रविष्ट तिथि : Friday, March 12, 2010
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उमेश द्विवेदी

लिट्ररी क्लब में श्री अशोक वाजपेयी का काव्यपाठ

भिलाई । लिट्ररी क्लब भिलाई इस्पात संयंत्र द्वारा सुविख्यात कवि व समालोचक तथा राष्ट्रीय ललित कला अकादमी के अध्यक्ष श्री अशोक वाजपेयी का काव्यपाठ समारोह 16 फरवरी को क्लब के अध्यक्ष व राजभाषा प्रमुख, भिलाई इस्पात संयंत्र श्री अशोक सिंघई के निवास सिंघई विला में सम्पन्न हुआ। इस गरिमामय आयोजन की अध्यक्षता गाँधीवादी लेखक श्री कनक तिवारी ने की। श्री अशोक सिंघई ने महत्वपूर्ण साहित्यिक अवदान के लिये श्री अशोक वाजपेयी को भिलाई इस्पात संयंत्र की ओर से सम्मानस्वरूप स्वर्ण जयंती पोस्टल आल्बम भेंट किया। आगे पढ़िये...

  • हलचल,
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  • प्रविष्ट तिथि : Friday, March 12, 2010
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अशोक सिंघई

कृत्या का पाँचवा समारोह

मैसूर । उन्नीसवीं सदी के एक दार्शनिक ने कहा था कि समय के साथ कविता सर्वाधिक प्रासंगिक और कवि सर्वथा अप्रासंगिक होता जाएगा। इस कथन पर अलग अलग राय हो सकती है, पर कविता और कवियों का जुटना अपने आप में एक जीवंत कविता का रचाव है, यह सिद्ध हुआ कृत्या 2010 यानी कृत्या के पाँचवें अंतरराष्ट्रीय काव्योत्सव में। जो इस बार तीन से पाँच फरवरी का मैसूर में केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान के परिसर में आयोजित हुआ। आयोजन में कृत्या के सहयोगी थे- केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान, साहित्य अकादमी, भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् आदि। आगे पढ़िये...

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  • प्रविष्ट तिथि : Friday, March 12, 2010
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डॉ. दुष्यंत

डॉ.अभिज्ञात की तीन कविताएँ
  • कविता,
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  • प्रविष्ट तिथि : Friday, March 12, 2010,
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डॉ.अभिज्ञात

कविता की जातीयता

'जातीय' यहाँ 'राष्ट्रीय' का पर्याय है, परंतु यह राष्ट्र ‘नेशन’ नहीं है। जातीय या राष्ट्रीय का गहरा सांस्कृतिक अर्थ है, जो भौगोलिक या राजनीतिक से अधिक सांस्कृतिक है। इस ग्रन्थ की लेखिका डॉ. कविता वाचक्नवी ने राष्ट्र को परिभाषित करते हुए लिखा है- "जिसे हम भारतीय संस्कृति कहते हैं, उसके तत्त्वों का अन्वेषण भारतीय जातीयता की व्याख्या करने में समर्थ होगा।" आगे पढ़िये...

  • पुस्तकायन,
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  • प्रविष्ट तिथि : Friday, March 12, 2010
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समीक्षक : डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय

दलित लेखन का सौंदर्यशास्त्र

दलित एक समाज वर्ग विशेष को अभिहित करने के हेतु प्रयुक्त शब्द है। वह एक व्यंजनात्मक शब्द है। गाँधी द्वारा शब्द हरिजन में उस वर्ग को कृत्रिम ढंग से ऊपर उठाने का प्रयास ही अधिक दिखता है। हरिजन एक महिमामंडित शब्द है। दलित शब्द जिस विशेष के लिय प्रयुक्त हैं उसकी वास्तविकता को प्रकटित करने में यह सक्षम है। मराठी भाषा में दलित आन्दोलन का ज दौर चला तब से यह शब्द स्वीकृत और प्रयुक्त है। आगे पढ़िये...

  • मूल्याँकन,
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  • प्रविष्ट तिथि : Friday, March 12, 2010
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प्रो. ए. अरविदांक्षन

दिल्‍ली पूछे चार सवाल

अब दिल्‍ली जाने से बहुत डरता हूँ। दिल्‍ली से नहीं, दिल्‍ली के इन सवालों से। लेखक बनने और सचमुच कुछ कर दिखाने के बाद भी मैं दिल्‍ली में जा कर तय नहीं कर पाता कि मैं किस मठ का हूँ या किस दरबार में जा कर मुझे सलाम करना चाहिये। कइर् बार सोचता हूँ कि लेखक भी हूँ या नहीं। वजह वही है कि दिल्‍ली हर जगह और हर शिवाले में मुझसे यही चार सवाल पूछती है और मेरे ही जवाबों से ये कह कर मेरी छुट्टी कर देती है। आगे पढ़िये...

  • आलेख,
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  • प्रविष्ट तिथि : Friday, March 12, 2010
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सूरज प्रकाश

महिला सशक्तिकरण: कितनी हक़ीक़त कितना फ़साना

महिला आरक्षण विधेयक से जुड़ी तमाम और ऐसी सच्चाईयाँ हैं जिन्हें हम नज़र अंदाज़ नहीं कर सकते। हालांकि महिलाओं द्वारा आमतौर पर इस विषय पर ख़ुशी का इज़हार किया जा रहा है। आरक्षण की ख़बर ने देश की अधिकांश महिलाओं में जोश भर दिया है। परंतु इन्हीं में कुछ शिक्षित व सुधी महिलाएँ ऐसी भी हैं जो महिला आरक्षण को ग़ैर ज़रूरी और शोशेबाज़ी मात्र बता रही हैं। ऐसी महिलाओं का तर्क है कि महिला सशक्तिकरण का उपाय मात्र आरक्षण ही नहीं है। इसके अतिरिक्त और भी तमाम उपाय ऐसे हो सकते हैं जिनसे कि महिलाओं को पुरुषों के समकक्ष लाया जा सकता है। आगे पढ़िये...

  • राजकाज,
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  • प्रविष्ट तिथि : Thursday, March 11, 2010
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निर्मल रानी

संजय जनागल की लघुकथाएँ
  • लघुकथा,
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  • प्रविष्ट तिथि : Thursday, March 11, 2010,
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संजय जनागल

लोहिया के बिना साहित्य का इतिहास अधूरा - नामवर

नई दिल्ली। डॉ. राम मनोहर लोहिया को गांधी के बाद पाखंड रहित दूसरा राजनेता बताते हुए आलोचक डा. नामवर सिंह ने बृहस्पतिवार को कहा कि लोहिया के जिक्र के बिना आधुनिक भारतीय साहित्य का इतिहास अधूरा ही रह जाएगा। साहित्य अकादमी द्वारा डा. राम मनोहर लोहिया की जन्मशती पर आयोजित त्रिदिवसीय संगोष्ठी में डा. नामवर सिंह ने कहा, मैं लोहियावादी नहीं हूँ, लेकिन वह मुझे आकर्षित करते थे। मुझे कई बार लोहिया को सुनने का मौका मिला है। गांधी के बाद लोहिया दूसरे राजनेता थे, जो पाखंड रहित थे। यहाँ तक कि नेहरू में भी पाखंड था। उन्होंने कहा, राजनीति में व्यक्ति के कई चेहरे होते हैं और ऐसा लगता है कि वह मुखौटे लगाए हुए हैं, जबकि लोहिया पारदर्शी व्यक्तित्व के धनी थे। लोहिया का गांधी पर लिखा गया लंबा लेख उनके व्यक्तित्व को उजागर करता है। आगे पढ़िये...

  • हलचल,
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  • प्रविष्ट तिथि : Thursday, March 11, 2010
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अंतिम पड़ाव तक

पिछले दो हफ़्तों से कोहरे की चादर ने डेनमार्क के शहर नोरेब्रो को अपनी जकड़ में ले रखा था, लेकिन यहाँ के लिए यह कोई अनोखी या नई बात नहीं थी।बर्फीली सर्द हवायें तो यहाँ के लम्बे ठंडे मौसम की मानो शान होती हैं, लेकिन जैसे ही किसी दिन कोहरे की चादर को चीरकर सूरज अपनी चमक को धरती पर बिखेर देता है तो इन्सान ही नहीं, वनस्पतियाँ भी मानों उसकी रोशनी के स्वागत में पलक-पाँवड़े बिछाये तैयार रहती हैं। उजाले की किरणें चारों ओर अपनी छठा बिखेरती हैं। पार्क और दूसरे सार्वजनिक स्थल युवाओं की मदहोश साँसों और बच्चों की किलकारियों से गुँजायमान हो जाते हैं। वृद्ध भी वहाँ के उन्मुक्त वातावरण में जोश से भर जाते हैं। यहाँ तक कि, चिकनी साफ़ सड़कें भी बेकार और बेमक़सद की आवा-जाही की चहल-पहल से भर जाती हैं। आगे पढ़िये...

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  • प्रविष्ट तिथि : Thursday, March 11, 2010
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चाँद शुक्ला "हदियाबादी"

साझी संस्कृति की संवाहक मुस्लिम महिलाएँ

शबनम के काज़ी बनने की कहानी भी कम रोचक नहीं। अपने काज़ी पिता की सातवीं बेटी शबनम ने पिता के लकवाग्रस्त हो जाने पर निकाह कराने में उनकी मदद करना आरम्भ किया। शरीयत का अच्छी तरह इल्म हो जाने पर पिता जी ने उसे नायब काज़ी बना दिया। वर्ष 2003 में पिता जी की मौत के बाद शबनम ने अपने पैरों पर खड़े होने हेतु काज़ी बनने का रास्ता चुना और संयोग से काज़ी के रूप में उनका पंजीयन भी हो गया। पर काज़ी बनने के बाद शबनम की असली दिक्कतें आरम्भ हुईं। अंततः धमकियों और मुक़दमों के बीच शबनम अपने को काज़ी पद के योग्य साबित करने में सफल हुयीं। आगे पढ़िये...

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  • प्रविष्ट तिथि : Thursday, March 11, 2010
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आकांक्षा यादव

दो कविताएँ
  • कविता,
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सुदर्शन प्रियदर्शिनी

कमलेश्वर ने फ़िल्मों को दोयम दर्जे की कला नहीं माना - अरविंद

साहित्य से जुड़ा ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जिसमें अलग हट कर कुछ नया करने का कमलेश्वर जी ने प्रयास न किया हो। उन्हें हमेशा नयी ज़मीन की तलाश रहती थी। नयी कहानी का आंदोलन इसी सब की भूमिका थी। आज़ादी के बाद औद्योगिकीकरण के चलते बड़े शहरों की तरफ़ लोगों का पलायन शुरू हुआ। इससे आपसी रिश्तों को लेकर ज़बरदस्त मोहभंग हुआ। हिंदी कहानी को भी समय के साथ चलना था। कमलेश्वर, मोहन राकेश और राजेंद्र यादव ने समय को पहचाना और नयी कहानी आंदोलन का सूत्रपात किया। आगे पढ़िये...

  • कथोपकथन,
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मधु अरोड़ा

आप सिर्फ़ अपनी भाषा में जीवित नहीं रह सकते

भाषा की जरूरत के हेतु आर्थिक हैं, इसीलिए दुर्निवार हैं। रेणु विकास के लाभ चाहती है और कार्यकारी अधिकारी कमाई चाहता है। दोनों एक-दूसरे से अनजाने भाषा के उपयोग और उपभोग बदलने के कारण दूसरी भाषाएँ सीख रहे हैं। यही वैश्वीकरण की दुर्निवार प्रक्रिया है। यह कहती है कि आप सिर्फ़ अपनी भाषा में जीवित नहीं रह सकते । अपनी आर्थिक स्थिति को बचाने के लिए अपनी भाषा के साथ आपको दूसरी भाषा में जाना हो सकता है । यह द्वय भाषिकता बहु भाषिकता की प्रक्रिया है । ये दोनों उदाहरण भाषा को बनाने वाले हैं ।

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सुधीश पचौरी

मोहन राणा की चार कविताएँ
  • कविता,
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मोहन राणा

डॉ.महेंद्रभटनागर 'साहित्यवाचस्पति' से अलंकृत

हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग के प्रधानमंत्री विभूति मिश्र की सूचना के अनुसार, अपने जगन्नाथपुरी-अधिवेशन (२३ फ़रवरी २०१०) में डा. महेंद्रभटनागर को अपने सर्वोच्च अलंकरण 'साहित्यवाचस्पति' से अलंकृत किया है। उल्लेखनीय है कि हिन्दी के प्रगतिवादी आन्दोलन के शीर्ष कवियों में शुमार डा. महेंद्रभटनागर की रचनाओं के अनुवाद केवल भारतीय भाषाओं में ही नहीं; विश्व-भाषाओं में भी हुए हैं। आगे पढ़िये...

  • हलचल,
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  • प्रविष्ट तिथि : Wednesday, March 10, 2010
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देवमणि पांडेय के दो गीत
  • छंद,
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देवमणि पांडेय

बीकानेर में व्याख्यानमाला आयोजित

राजस्थान साहित्य अकादमी,उदयपुर के सौजन्य से होटल मरूधर हैरीटेज़ के विनायक सभागार में आयोजित राजस्थान का समकालीन हिन्दी साहित्य और सामाजिक सरोकार विषयक व्याख्यान देते हुए डॉ. व्यास ने कहा कि साहित्य को स्वायत्तता तो होनी चाहिए परन्तु यह समाज सापेक्ष होनी आवश्यक है । समकालीन हिन्दी कविता की बात करते हुए उन्होंने कहा कि इसमें लोकतांत्रिक चेतना,शिल्प के प्रति अनाग्रह,केन्द्रीय संवेदना,शिल्प और सौंदर्य के कई रूपाकारों के हमें दर्शन होते हैं । समकालीन कविता कहती अधिक है पर बोलती कम है । आगे पढ़िये...

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  • प्रविष्ट तिथि : Wednesday, March 10, 2010
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अज्ञेय की जन्म शताब्दी वर्ष का शुभांरभ

दिल्ली । आधुनिक हिन्दी साहित्य एवं पत्रकारिता को नई दिशा देने वाले यशस्वी लेखक सच्चिदानन्द हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' की जन्मशती रविवार, 7 मार्च से शुरू हो चुकी है। हिन्दी के कई लेखकों ने उनकी स्मृति में डाक टिकट निकालने तथा दूरदर्शन एवं फ़िल्म डिविजन से उन पर डाक्यूमेंट्री फिल्म बनाने की माँग की है। अज्ञेय जन्मशती के आयोजन के सूत्रधार एवं हिन्दी के प्रसिद्ध कवि तथा संस्कृतिकर्मी अशोक वाजपेयी ने बताया कि कल से अज्ञेय की जन्म शताब्दी शुरू हो रही है। इस मौक़े पर हमने उनकी आवाज़ में उनकी कविताओं की रिकार्डिंग सुनवाने का एक कार्यक्रम का आयोजन किया है। आगे पढ़िये...

  • हलचल,
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  • प्रविष्ट तिथि : Tuesday, March 09, 2010
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हिंदी अकादमी द्वारा पुरस्कारों की घोषणा

नई दिल्ली। हिंदी अकादमी दिल्ली ने इस वर्ष (2009-10) और पिछले वर्ष (2008-09) के पुरस्कारों की घोषणा सोमवार को कर दी। यह पुरस्कार 23 मार्च को श्रीराम सेंटर में पुरस्कार वितरण समारोह में दी जाएगी। अकादमी के सचिव प्रो. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव परिचयदास ने बताया कि इस वर्ष प्रो. केदारनाथ सिंह को शलाका पुरस्कार (दो लाख) की घोषणा की जा चुकी है। नए नियमों के अनुसार अन्य सात पुरस्कारों की घोषणा की जा रही है। आगे पढ़िये...

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  • प्रविष्ट तिथि : Tuesday, March 09, 2010
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कथाकार मार्कण्डेय को दोबारा कैंसर

नई दिल्ली । वरिष्ठ साहित्यकार, जनवादी लेखक संघ के संस्थापकों में एक और कथा के संपादक मार्कण्डेय दोबारा कैंसर से ग्रस्त हो गए हैं। उनका इलाज राजीव गांधी कैंसर अस्पताल में इलाज चल रहा है। प्रेमचंद के बाद हिंदी कहानियों में ग्रामीण जीवन को पुनर्स्थापित करने वालों में मार्कण्डेय अग्रगण्य हैं। आम आदमी के जीवन में साहित्य में उन्होंने महत्वपूर्ण जगह दी है। आगे पढ़िये...

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  • प्रविष्ट तिथि : Tuesday, March 09, 2010
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केदारनाथ सिंह को शलाका सम्मान

दिल्ली । तीसरे सप्तक के कवि, आलोचक और चिंतक प्रोफ़ेसर केदारनाथ सिंह को प्रतिष्ठित शलाका सम्मान देने की घोषणा की गई है। हिंदी अकादमी कविता में नए बिम्ब रचने वाले केदारनाथ सिंह को इस सर्वोच्च सम्मान से नवाज़ने जा रही है। आगे पढ़िये...

  • हलचल,
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  • प्रविष्ट तिथि : Tuesday, March 09, 2010
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कितनी सार्थक पाकिस्तान से बातचीत की प्रक्रिया ?

नवम्बर 2008  के मुम्बई हमले के बाद भारत-पाक के रिश्तों में जो खटास उत्पन्न हुआ था, उस कारण दोनों देशों के बीच वार्ताओं का सिलसिला पूरी तरह से बंद था और भारत द्वारा बार-बार स्पष्ट रूप से यही कहा गया था कि जब तक पाकिस्तान मुम्बई हमलों के ज़िम्मेदार पाकिस्तान में बैठे आतंकवादी गिरोहों के नेताओं को सज़ा नहीं देता तथा अपने वहाँ फैले भारत विरोधी आतंकी नेटवर्क को नेस्तनाबूद करने के लिए ठोस कार्रवाई नहीं करता, तब तक दोनों देशों के बीच कोई बातचीत शुरू नहीं हो सकती लेकिन अति उत्साह से सराबोर भारत सरकार द्वारा अपने ही बयानों से पलटी मारते हुए पाकिस्तान की निरन्तर वादाख़िलाफ़ी के बावजूद पिछले दिनों जिस प्रकार पाकिस्तान के साथ बातचीत की पेशकश की गई, उससे हर किसी का हतप्रभ होना स्वाभाविक ही है। आगे पढ़िये...

  • राजकाज,
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  • प्रविष्ट तिथि : Wednesday, March 10, 2010
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योगेश कुमार गोयल

मरीचिका

वह मन ही मन घबरा रही थी कि वह गोपाल जी से मिल भी पाएगी या नहीं या वह उसे बाहर से ही लौट जाने को कह देंगे। कुछ देर बाद दरबान  जब वापिस आया तो उसने न सिर्फ़ अन्दर आने को कहा बल्कि इज्ज़त के साथ बैठक-कक्ष में ले गया । जबकि आफ़िस के बरामदे में मिलने वाले लोगों का तांता लगा हुआ था । वह उस बैठक-कक्ष में बैठकर तरह -तरह के विचारों के उधेड़-बुन में खो गई । वह मन ही मन अत्यंत ख़ुश हो रही थी कि गोपाल जी ने उसे विशिष्ट स्थान प्रदान कर अनुग्रहित किया है। जहाँ उनको मिलने के लिए आम- लोगों को  लम्बी-कतार में खड़े होकर दीर्घ प्रतीक्षा करनी पड़ती है, वहाँ उसे न तो किसी भी प्रकार का इंतज़ार करना पड़ा बल्कि उसे बैठक-कक्ष में जाने का इशारा कर आम-लोगों की नज़रों में ऊँचा उठा दिया। वह मन ही मन अपने आप को गौरवान्वित अनुभव कर रही थी कि अवश्य विधायक-साहब कहीं न कहीं उसके प्रतिभाशाली व्यक्तित्व के किसी न किसी पहलु से प्रभावित हुए है । आगे पढ़िये...

  • कहानी,
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  • प्रविष्ट तिथि : Tuesday, March 09, 2010
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अलका सैनी

पुष्प जीवंत है

प्रकृति का कोमलतम उपादान पुष्प है । पुष्प रंग हैं । पुष्प सुगन्ध हैं । पुष्प सुन्दर हैं। पुष्प भावनाओं का वाहक है । पुष्प प्रतीक हैं । पुष्प प्रेम हैं। प्रकृति का अन्यतम अवदान पुष्प हैं । पुष्प जीवन्त हैं । पुष्प कारक हैं । पुष्प संदेश हैं, संदेश वाहक भी है । भावनाओं के खिलने, सतह पर आने, अभिव्यक्त होने का आधार पुष्प ही है । भक्त और भगवान के बीच का सेतु है पुष्प । वन्दना का कारक है । प्रार्थना का माध्यम है । प्रेम का उद्रेक है । भगवत आराधन में समर्पण का मुख्य उपादान पुष्प ही है । पुष्प अपने पाँच गुणों, सौंदर्य, रंग, कोमलता, गंध, और पराग, के साथ क्रियारुप है । आनन्द का पोषक है । यह आकर्षण का जनक है । अनुराग का प्रवर्तक है, और प्रकृति की सुन्दर अभिव्यन्जना है । यह व्याकरण में विशेषण है । काव्य में प्रवाह है । गीत में लय है, राग है । आगे पढ़िये...

  • ललित निबंध,
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  • प्रविष्ट तिथि : Tuesday, March 09, 2010
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सुरेश कुमार पंडा

कहीं हम चौथे इडियट तो नहीं?

फ़िल्म 'थ्री इडियट्स' की अच्छी चर्चा हो रही है। इंजीनियरिंग कालेज का छात्र जीवन, युवा वर्ग का संदर्भ व शिक्षानीति का विरोध, इस तरह के कई सारे मुद्दे सुनाई पड़ रहे थे। प्रचार का यही तो कमाल है कि उत्सुकतावश मैंने भी यह फ़िल्म देखी। सपरिवार। और फिर प्रारंभ से ही अपने ज़माने के इंजीनियरिंग कालेज को प्रतीकात्मक रूप से ही सही, ढूँढ़ता रहा। कोई ऐसा क़िस्सा, जिसे मैं अपने हॉस्टल जीवन से जोड़ सकूँ, जब अंत तक मुझे नहीं मिला तो हताशा हुई थी। आगे पढ़िये...

  • शेष-विशेष,
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  • प्रविष्ट तिथि : Tuesday, March 09, 2010
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मनोज सिंह

इंसानी रिश्तों को शर्मसार करते पंचायती फ़ैसले

हरियाणा में जातिगत पंचायतें समाज की भलाई या सामाजिक समस्याओं के निवारण के कार्यों के लिए नहीं बल्कि समाज को बाँटने, बसे-बसाये घरों को तोड़ने और गोत्र के नाम पर मौत के फ़रमान सुनाने जैसे बर्बर एवं घृणित कार्यों के लिए अधिक चर्चा में रही हैं। अब एक बार फिर ये पंचायतें अपने तानाशाही एवं अमानवीय रवैये और तालिबानी फ़तवों को लेकर चर्चा में हैं। बीते दिनों सिर्फ़ एक सप्ताह के अंदर ही एक-एक कर ऐसे ही कई मामले सामने आए, जिन्होंने तालिबानी हुक़ूमत की यादें ताज़ा कराने में कोई क़सर नहीं छोड़ी। आगे पढ़िये...

  • राजकाज,
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  • प्रविष्ट तिथि : Tuesday, March 09, 2010
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योगेश कुमार गोयल

चीड़े की पाठशाला

अपने गाँव के प्राइमीरी इस्कूल के चीड़े ड्राइंग मास्टर जी सर का दसवीं के जाली सर्टिफ़िकेट पर नाम केएस है। जब उनको इस्कूल के इकलौते पक्के मास्टर जी ने अपनी जगह ठेके पर पढ़ाने के लिए तैनात कर ख़ुद होलसेल का काम शुरू किया तो वे इस्कूल में केएस से खेस हो गए। कुछ दिन तक बच्चे उन्हें केएस ड्राइंग मास्टर जी सर भी कहते रहे पर जैसे जैसे वे घिसते रहे उनका नाम घिस कर केएस से खेस और अब चीड़े ड्राइंग मास्टर जी सर हो गया। आगे पढ़िये...

  • व्यंग्य,
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  • प्रविष्ट तिथि : Monday, March 08, 2010
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डॉ. अशोक गौतम

विषमता एक पुनर्विवेचन

यहाँ मेरा तर्क है कि समानता के विश्लेषण और आकलन का केंद्रीय प्रश्न है ‘समानता किस चीज़ की ?’ मेरा कहना यह भी है कि सामाजिक व्यवस्था की नैतिकता के प्रति जो भी दृष्टिकोण समय की कसौटी पर खरे उतरे हैं, लगभग उन सबकी एक साझी विशेषता यह है कि वे किसी-न-किसी वस्तु की समानता की माँग करते रहे हैं- ऐसी किसी वस्तु की जो उस विशेष सिद्धांत में एक महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है। केवल समान-आयवादी ही (अगर इस शब्द के प्रयोग की इजाजत हो तो) समान आयों की और समान-कल्याणवादी के सामने स्तरों की माँग नहीं करते, बल्कि शास्त्रीय क़िस्म के उपयोगितावादी भी सभी को उपयोगिताओं को समान भारमान देने का आग्रह करते हैं और शुद्ध स्वाधीनतावादी भी अधिकारों और स्वाधीनताओं की एक पूरी श्रेणी को लेकर समानता का तकाज़ा करते हैं। किसी-न-किसी बुनियादी अर्थ में वे सभी ‘समानतावादी’ हैं जो किसी ऐसी वस्तु की समानता के ज़ोरदार पक्षधर हैं जो हरेक को प्राप्त होनी चाहिए और जो ख़ुद उनके अपने विशेष दृष्टिकोण के लिए नाजुक अहमियत रखती है। संघर्ष को समानता के ‘पक्ष’ और ‘विपक्ष’ का संघर्ष समझना (जैसाकि ग्रंथों में अकसर पेश किया जाता है) किसी के किसी केन्द्रीय तत्त्वों को अनदेखा करने के बराबर होगा। आगे पढ़िये...

  • पुस्तकांश,
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  • प्रविष्ट तिथि : Monday, March 08, 2010
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अमर्त्य सेन

आकाशवाणी समाचार की दुनिया

पुस्तक आकाशवाणी समाचार की दुनिया, आवाज के आरोह-अवरोह से हमारा बखूबी परिचय कराती है। यों तो आकाशवाणी के प्रादेशिक समाचार एकांश, पटना की स्वर्ण जयंती के अवसर पर आई है यह पुस्तक। लेकिन इसका दायरा विस्तृत है। यह न सिर्फ़ आकाशवाणी पटना के समाचार एकांश के विगत पचास वर्षों का इतिहास एक नज़र में बता जाती है, बल्कि समाचारों के संकलन, तैयारी, संपादन से लेकर वाचन तक की तकनीकी जानकारी भी दे जाती है। आगे पढ़िये...

  • पुस्तकायन,
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  • प्रविष्ट तिथि : Thursday, March 04, 2010
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समीक्षक-कीर्ति सिंह

'समुद्र, चाँद और मैं' केदारनाथ सिंह द्वारा लोकार्पित

भिलाई । शीर्ष कवि व समर्थ समालोचक डॉ. केदार नाथ सिंह ने 4 मार्च, 2010 को लिटरेरी क्लब, भिलाई इस्पात संयंत्र के अध्यक्ष व राजभाषा प्रमुख श्री अशोक सिंघई के पाँचवें काव्य संग्रह समुद्र, चाँद और मैं का लोकार्पण किया। इस सादे किन्तु गरिमामय आयोजन की अध्यक्षता गाँधीवादी चिन्तक व कानूनविद् श्री कनक तिवारी ने की। प्रसंगवश अशोक सिंघई के पहले प्रकाशन प्रदीर्घ कविता अलविदा बीसवीं सदी का लोकार्पण फरवरी 2000 में विश्व पुस्तक मेला में एवं तीसरे काव्य संग्रह सम्भाल कर रखना अपनी आकाशगंगा का भी लोकार्पण छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में नवम्बर, 2004 में प्रख्यात साहित्यकार स्वर्गीय श्रीकान्त वर्मा एवं कीर्तिशेष सम्पादक, कवि व उपन्यासकार गुलशेर अहमद शानी की स्मृति में आयोजित कविता की पंचाट में श्री केदार नाथ सिंह ने ही किया था। आगे पढ़िये...

  • हलचल,
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  • प्रविष्ट तिथि : Monday, March 08, 2010
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बिटिया
  • कविता,
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  • प्रविष्ट तिथि : Sunday, March 07, 2010,
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किरण राजपुरोहित नितिला

नवगीत
  • छंद,
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  • प्रविष्ट तिथि : Sunday, March 07, 2010,
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आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

2010 का ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार पंकज सुबीर को

दिल्ली । सीहोर के युवा कहानीकार पंकज सुबीर को उनके उपन्यास के लिये इस वर्ष का ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार दिया जा रहा है । भारतीय ज्ञानपीठ ने 2009 को उपन्यास वर्ष मनाते हुए नवलेखन पुरस्कार को उपन्यास के लिये दिये जाने की घोषणा की थी । इसके लिये एक चयन समिति शीर्ष आलोचक डॉ. नामवर सिंह की अध्यक्षता में बनाई गई थी । जिसमें शीर्ष कथाकार तथा नया ज्ञानोदय के संपादक रवीन्द्र कालिया, आलोचक डॉ. विजय मोहन सिंह, कथाकार चित्रा मुद्गल, कथाकार अखिलेश सम्मिलित थे । देश भर से प्राप्त पांडुलिपियों में से चयन करके ये पुरस्कार प्रदान किया जाना था । आगे पढ़िये...

  • हलचल,
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  • प्रविष्ट तिथि : Sunday, March 07, 2010
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आमची मुंबई

मुंबई एक ऐसी अनोखी नगरी है , जो भारत को दुनिया से जोड़ती है । किसी के लिए वो सपनों को पूरा करने की संसार में सबसे आख़िरी जगह है, तो किसी के लिए सपनों के टूटने के बाद हक़ीक़त से मुलाक़ात करने की यहाँ कला है। कल्पना है, ख़ूबसूरती है, पैसा है, विकास है, जुआ है, जनसँख्या है, अभिनेता हैं, नेता हैं, क्रिकेटर हैं, शिक्षा है, मीडिया है , विज्ञान है, विश्व की बेहतरीन चिकित्सा है, व्यस्तता है, फ़ैशन है, आधुनिकता है। मुंबई प्रतिनिधित्व करता है भारत का विश्व पटल पर। दुनिया में तीन वजहों से लोग भारत को पहचानतें हैं - मुंबई ,गाँधी और आईटी क्षेत्र। गाँधी के मूल्यों और सिंद्धांतों की क़द्र आज भारत से ज़्यादा भारत के बाहर की जाती है। हम उन मूल्यों को भूलते जा रहें हैं, इसमें कोई दो मत नहीं हैं। आगे पढ़िये...

  • आलेख,
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  • प्रविष्ट तिथि : Sunday, March 07, 2010
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रेखा भाटिया

बादल को घिरते देखा है

हेलो, दीदी...आप सुन रही हैं न? हमारे बिहार से लेकर यहाँ आपके हिमाचल तक भारी बारिशें हो रही हैं...फ़ोन और डाक सेवा गड़बड़ चल रही है...बिहार में बहुत बाढ़ आई है...कोसी बांध टूट गया है...पिताजी दरभंगा के हस्पताल में छाती के दर्द की जाँच कराने आए थे...उन्होंने वहाँ से हमें फ़ोन किया...माताजी ने भी बात की...उनको आपकी और हमारी बड़ी चिंता है...हमारे मनीआर्डर का भी इंतज़ार है...’’ आगे पढ़िये...

  • कहानी,
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  • प्रविष्ट तिथि : Sunday, March 07, 2010
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स्नोवा बॉर्नो

अहमदाबाद डायरी के कुछ पन्‍ने

एक बार फिर अकेले ही रहना है होली पर, लेकिन अब पहले की तरह खालीपन नहीं कचोटता। अकेलेपन के बीसियों इलाज हैं – डायरी, संगीत, पढ़ना, लिखना यूँ ही लेटे रहना। लेकिन खालीपन मारता है। खा जाता है। आप सिर धुनने के अलावा और कुछ नहीं कर सकते। आगे पढ़िये...

  • डायरी,
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  • प्रविष्ट तिथि : Saturday, March 06, 2010
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सूरज प्रकाश

कोपनहेगन में ‘वेयर डू आई बिलान्ग’ का विमोचन

भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित यह उपन्यास योरोपीय वातावरण में रह रहें एक ऐसे भारतीय परिवार की कहानी है। जिसके माध्यम से लेखिका ने भारतीय अप्रवासियों की जीवन शैली, संघर्ष, द्विविधायें, कठिनाईयाँ,उनके सोर्चविचार, दो संस्कृतियों के बीच उनकी जूझ व इमीग्रेशन इशू आदि को दर्शाया है। उपन्यास की प्रमुख पात्र नवयुवती रीना है। रीना की ज़िंदगी के पाँच अहम् 20 से 25 वर्ष उपन्यास में वर्णित है। इन पाँच वर्षो के अन्तराल में आज के युग की किसी महत्वाकांक्षी नवयुवती को अपना कैरियर बनाने के अतिरिक्त जीवन-साथी की भी खोज होती है। आगे पढ़िये...

  • हलचल,
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  • प्रविष्ट तिथि : Saturday, March 06, 2010
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साहित्य में मूल्यबोध

आज के विशृंखलित और ध्वंसाभिमुखी समाज को सन्मार्ग पर प्रवृत्त और परिचालित करने हेतु लेखनी-शक्ति की विशिष्ट पहचान होनी चाहिये । अपसंस्कृति के दूरीकरण एवं आध्यात्मिक चिन्तन-धारा में कर्मों के आचरण से ही सांस्कृतिक महत्त्व को सुरक्षित रखने में सहायता प्राप्त होगी । दृढ़ मनोबल, आत्म-विश्वास एवं सदाचार द्वारा समाज में स्वच्छ परिवेश की सर्जना की जा सकती है । देश को समृद्ध और सुसंस्कृति-सम्पन्न करने में नारी-पुरुष सभीको राष्ट्रीय कर्त्तव्य निभाना है । भारतवर्ष को एक महनीय महान् देश के रूप में सुप्रतिष्ठित करने के लिये मन, वचन और कर्म का त्रिवेणी-संगम आवश्यक है । केवल वाक्य-वीर न होकर धर्म-वीर एवं कर्म-वीर के रूप में अपने को प्रतिपादन करने से मनुष्य-जन्म की सार्थकता बनी रहेगी । आगे पढ़िये...

  • आलेख,
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  • प्रविष्ट तिथि : Friday, March 05, 2010
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डॉ. हरेकृष्ण मेहेर

समाज
  • कविता,
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  • प्रविष्ट तिथि : Thursday, March 04, 2010,
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सुधा ओम ढींगरा

नियति
  • कविता,
  • (294 ) बार देखा गया,
  • प्रविष्ट तिथि : Thursday, March 04, 2010,
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सुधा ओम ढींगरा

अपेक्षा
  • कविता,
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  • प्रविष्ट तिथि : Thursday, March 04, 2010,
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सुधा ओम ढींगरा

‘तीखे तेवर’ विमोचित-योगेश गोयल सम्मानित

इस अवसर पर हिन्दी यूएएसए के संस्थापक श्री देवेन्द्र सिंह एवं रचिता सिंह भी उपस्थित थे। श्रीमती रचयिता सिंह ने कि "जब तक हम मिलकर हिन्दी भाषा के लिए काम नहीं करेंगे, तब तक आने वाली पीढ़ियों को उनकी विरासत देने का प्रयास सफल नहीं होगा" श्री देवेन्द्र सिंह ने हिन्दी के कार्यों का विवरण देते हुए उनमें और सक्रियता का संकल्प लिया। आगे पढ़िये...

  • हलचल,
  • (76) बार देखा गया,
  • प्रविष्ट तिथि : Thursday, March 04, 2010
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‘अनोखी’ है ‘जीव-जंतुओं की अनोखी दुनिया’

वाकई इस पुस्तक में अनेक अद्भुत, असाधारण, दुर्लभ जीव-जंतुओं के बारे में बहुत दिलचस्प जानकारियाँ हैं। जैसे पुस्तक में ‘प्लैनेरियन’ नामक अद्भुत कीड़े की जानकारी है, जो न पूँछ काटने से मरता है और न ही मुँह काटने से। दुनिया के सबसे जहरीले बिच्छू ‘एड्रोक्टोमस आस्ट्रेलिस’ सहित अन्य जहरीले जीवों की जानकारी भी हैरान करने वाली है। दुनिया में अद्भुत पक्षियों में कौन पक्षी सबसे बड़ा है और किसका कितना वज़न तथा कैसा आकार है, इनके अलावा पक्षी होते हुए भी कौन उड़ नहीं सकता, जैसी जानकारियाँ ज्ञान बढ़ाती हैं। मार्श हैरियर रंगदार छाया प्रदान करते हैं तो नर व मादा आस्ट्रिच, दोनों के अण्डे देने की जानकारी तो होश उड़ा देती है। आस्ट्रिच नाम के इस पक्षी के अलावा अन्य परिन्दों की रोचक जानकारी भी इस पुस्तक में है। सी-हार्स नामक समुद्री जीव को ‘समुद्री घोड़ा’ ही कहा जाता है मगर वास्तव में वह मछली है, जो घोड़ेनुमा होती है। इसके अलावा अनेक प्रकार की मछलियों की जानकारी पाठकों को अपने साथ बाँधे रहती है। अपने जीवन का हिस्सा हो चुके मुर्गे, बिल्ली, कोयल जैसे जीव भी यहाँ अपनी अनूठी जानकारियों के कारण अनोखे ही लगते हैं। कोई पक्षी संगीत भी बजा सकता है, यह सुनने में ही अजीब लगता है मगर कुक्कुट एक ऐसा पक्षी है, जो कुशल ड्रम वादक है। व्हेल सहित अन्य कई पक्षी संगीत का शौक रखते हैं। आगे पढ़िये...

  • पुस्तकायन,
  • (92) बार देखा गया,
  • प्रविष्ट तिथि : Thursday, March 04, 2010
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समीक्षक-डॉ. प्रवीण खुराना

'महान हैं हम नारियाँ'
  • कविता,
  • (278 ) बार देखा गया,
  • प्रविष्ट तिथि : Thursday, March 04, 2010,
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मधु अरोड़ा

'टुकड़ा टुकड़ा नारी'
  • कविता,
  • (126 ) बार देखा गया,
  • प्रविष्ट तिथि : Thursday, March 04, 2010,
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मधु अरोड़ा

कहानी संग्रह - कब्र का मुनाफ़ा तेजेन्द्र शर्मा

तेजेन्द्र शर्मा के सद्य: प्रकाशित कहानी संग्रह ‘कब्र का मुनाफ़ा’ में सन्निहित कहानियों सामाजिक और पारिवारिक विसंगतियों को जिस तरह सामने लाती हैं और जैसा मार्मिक चित्रण करती हैं, वैसा कम ही देखा जाता है। वे विसंगतियों के शिल्पी हैं। उनकी सभी कहानियों एक दूसरे से बहुत अलग हैं। वे प्रश्नोऔर समस्याओं को तो उठाते ही हैं मन की कोमल संवेदनाओं को भी कुशलता से चित्रित करते हैं। इस संग्रह में कुल 13 कहानियों हैं जो हमें लगभग इतनी ही दुनियाओं की सैर कराती हैं। आगे पढ़िये...

  • पुस्तकायन,
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  • प्रविष्ट तिथि : Wednesday, March 03, 2010
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समीक्षक : मधु अरोड़ा

पति - पत्नी
  • कविता,
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  • प्रविष्ट तिथि : Wednesday, March 03, 2010,
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कवि कुलवंत सिंह

बजट: कितनी हक़ीक़त, कितना फ़साना ?

वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी द्वारा 26 फरवरी को पेश किए गए आम बजट को लेकर कुछ लोगों द्वारा ख़ूब नुक्ताचीनी करते हुए जो हो-हल्ला मचाया गया, उसकी कोई ख़ास वजह नज़र नहीं आती। यह बात सही है कि पिछले कुछ समय से महँगाई जिस कदर सारे रिकार्डों को ध्वस्त करते हुए आसमान छू रही है, ऐसे में आम आदमी को यूपीए सरकार से राहत की बहुत उम्मीद थी और यह स्वीकार करने में कोई गुरेज़ भी नहीं होना चाहिए कि इस बजट में सरकार ने लगभग सभी वर्गों को रियायतों की कुछ न कुछ सौगात तो दी ही है। आगे पढ़िये...

  • राजकाज,
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  • प्रविष्ट तिथि : Wednesday, March 03, 2010
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योगेश कुमार गोयल

शरीफ़ बदमाश

अगले दिन के अख़बारों में प्रमुखता से यह खबर छपी कि- अमुक गैंग का एक शातिर बदमाश पुलिस ने अपनी सक्रियता से धर दबोचा। अपने को विश्वविद्यालय का छात्र बताने वाला उक्त बदमाश काल-गर्ल्स रैकेट का शहर में सूत्रधार था और उसके कमरे से तमाम आपत्तिजनक वस्तुयें बरामद हुयी हैं। यह भी संज्ञान में आया है कि चंद पैसों के लालच में आरोपी बदमाश बड़े-बड़े होटलों एवं अमीर लोगों को जवान लड़कियाँ सप्लाई करता था और प्राप्त पैसे से गुलछर्रे उड़ाता था। सौदेबाजी में प्रयुक्त मोबाइल फ़ोन एवं गर्ल्स हॉस्टल के आस-पास अक्सर देखी जाने वाली हीरो होण्डा मोटरसाइकिल भी पुलिस ने उस बदमाश के पास से प्राप्त की है। आगे पढ़िये...

  • कहानी,
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  • प्रविष्ट तिथि : Wednesday, March 03, 2010
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कृ्ष्ण कुमार यादव

भारतीय परिप्रेक्ष्य में धर्मनिरपेक्षता

धर्मनिरपेक्षता (सेक्युलरिज्म) जीवन का एक आधुनिक दृष्टिकोण है। यह दृष्टिकोण मूलतः पाश्चात्य जगत की पैदाइश है। राज्य के धर्म (चर्च) से अलगाव सिद्धान्त के पश्चात आधुनिक राज्य निर्माण की परिस्थितियों में मानव इतिहास और राजनैतिक संस्थाओं के नियंता रूप में ईश्वर नहीं, बल्कि स्वयं जन या जनसमुदाय को मान्यता दी गई। इस प्रकार धर्मनिरपेक्षता आधुनिक बौद्धिकता का कारगर सैद्धान्तिक हथियार बन गई और परिणामस्वरूप प्रत्येक व्यक्ति के निजी जीवन में धर्म व अन्धविश्वास की बजाय विज्ञान और बुद्धि को महत्व मिलना शुरू हो गया। आगे पढ़िये...

  • आलेख,
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  • प्रविष्ट तिथि : Tuesday, March 02, 2010
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कृ्ष्ण कुमार यादव

न्यू जर्सी में ‘नवतरंग’ का विमोचन और काव्य गोष्ठी

इस अवसर पर हिन्दी यूएएसए के संस्थापक श्री देवेन्द्र सिंह एवं रचिता सिंह भी उपस्थित थे। श्रीमती रचयिता सिंह ने कि "जब तक हम मिलकर हिन्दी भाषा के लिए काम नहीं करेंगे, तब तक आने वाली पीढ़ियों को उनकी विरासत देने का प्रयास सफल नहीं होगा" श्री देवेन्द्र सिंह ने हिन्दी के कार्यों का विवरण देते हुए उनमें और सक्रियता का संकल्प लिया। आगे पढ़िये...

  • हलचल,
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  • प्रविष्ट तिथि : Monday, March 01, 2010
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देवी नागरानी

राजनीतिक संकट के कई आयाम

पश्चिम बंगाल के राजनीतिक संकट के कई आयाम हैं-जिन्हें अखिल भारतीय स्तर पर आए संकट से अलग नहीं देखा जा सकता । वैश्वीकरण और उदारीकरण के दौर के आने के पहले चीज़ें बहुत हद तक सीधी सपाट थी । नये दौर ने उन्हें अने अनुसार ढालने का प्रयास किया । जब तक चीज़ें ढलती, तब तक उदारीकरण का दौर खुद ही संकट में फॅंस गया । आगे पढ़िये...

  • राजकाज,
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  • प्रविष्ट तिथि : Monday, March 01, 2010
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विश्वजीत सेन

नए साल की शुभकामनाएँ !
  • कविता,
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  • प्रविष्ट तिथि : Monday, March 01, 2010,
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सर्वेश्वर दयाल सक्सेना

धुआँ
  • कविता,
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  • प्रविष्ट तिथि : Monday, March 01, 2010,
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मनीष कुमार जोशी

मनोज भावुक का ग़ज़ल संग्रह लोकार्पित

मॉरिशस भोजपुरी संस्थान की संस्थापक डॉ सरिता बुद्वू , भोजपुरी समाज के अघ्यक्ष अजीत दूबे एवं अखिल विश्व भोजपुरी समाज विकाश मंच जमशेदपुर के बी एन तिवारी उर्फ भाई जी भोजपुरिया ने संयुक्त रूप से युवा कवि मनोज भावुक के लोकप्रिय व बहुचर्चित गजल संग्रह "तस्वीर ज़िंदगी के" के द्वितीय संस्करण का लोकार्पण किया। आगे पढ़िये...

  • हलचल,
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  • प्रविष्ट तिथि : Monday, March 01, 2010
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मनोज भावुक

हंगरी में लहराता हिंदी का परचम

पूर्वी योरोप के इस छोटे से देश में आजकल भारतीयों की संख्या बहुत अधिक भले ही न हो पर यहाँ के निवासी न केवल भारत से परिचित हैं अपितु भारतीय संस्कृति और सभ्यता के लिए उनके हृदय में बेहद सम्मान का भाव है। भारत-भ्रमण बहुत से हंगरी-निवासियों का सबसे बड़ा स्वप्न है।   आगे पढ़िये...

  • हिंदी-विश्व,
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  • प्रविष्ट तिथि : Monday, March 01, 2010
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डॉ. गीता शर्मा

छत्तीसगढ़ में युवा रचना शिविर

यह माना जाता है कि कवि – कथाकार व कलाकार जन्मजात होते हैं । लेकिन ऐसा नहीं है । एक रचनाकार बनने के लिये साधना करनी पड़ती है और विधिवत अध्ययन करना पड़ता है । यह न भी किया जाये तो कवि को कवि बनने से कोई रोक नहीं सकता लेकिन उसकी रचना में परिपक्वता आने में समय तो लग ही जाता है । इस उद्देश्य को ध्यान में रख कर हमारे देश के विभिन्न लेखक संघों और साहित्य सम्मेलनों द्वारा लेखक शिविर या रचना शिविर आयोजित किये जाते रहे हैं । आगे पढ़िये...

  • हलचल,
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  • प्रविष्ट तिथि : Monday, March 01, 2010
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शरद कोकास

बगरो बसन्त है
  • कविता,
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  • प्रविष्ट तिथि : Monday, March 01, 2010,
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अशोक सिंघई

रंग
  • कविता,
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  • प्रविष्ट तिथि : Monday, March 01, 2010,
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अशोक सिंघई

किताबों में क्रांति

अठारह सौ सत्तावन की क्रांति के डेढ सौ साल का जश्न देशभर में मनाया गया । दिल्ली में राष्टीय स्तर के कई भव्य आयोजन एवं इसको लेकर कई गोष्ठियाँ भी आयोजित की गई, जहाँ विद्वानों ने जमकर बहस- मुबाहिसे किए । अख़बारों और पत्रिकाओं ने अपने कई पन्ने आज़ादी की पहली लड़ाई को समर्पित किए । पत्र पत्रिकाओं के अलावा इस मौक़े पर कई किताबें भी प्रकाशित हुई । लेकिन किताबों के प्रकाशन में भी एक बार फिर से हिंदी प्रकाशन जगत अँगरेज़ी से पिछड़ता नज़र आया । जिस तरह से अँगरेज़ी के प्रकाशकों ने योजनाबद्ध तरीके से भारतीय स्वतंत्रता की पहली लड़ाई के विभिन्न पहुलुओं पर किताबें प्रकाशित की वो काबिले तारीफ़ है । हिंदी में भी कई किताबें प्रकाशित हुई लेकिन इसमें लेखकीय प्रयास ज़्यादा, प्रकाशकीय परिश्रम कम नज़र आया । आगे पढ़िये...

  • आलेख,
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  • प्रविष्ट तिथि : Monday, March 01, 2010
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अनंत विजय

रेप

जयंत की यह बात सुनकर सुपर्णा अचंभित रह गई उसे ऐसा लगा जैसे किसी ने कसकर उस पर तमाचा मर दिया हो। उनके हँसते-हँसते यह कहने का अंदाज कुछ इस तरह था कि सुपर्णा अपने अन्तर्मन में घोर अपमान अनुभव करने लगी।उसने पलटकर मद्धिम रोशनी में जयंत के चेहरे को देखने की कोशिश की,पर उनका चेहरा अँधेरे में नहीं दिखाई दे रहा था । अगर इस समय कोई सुपर्णा के चेहरे की तरफ़ देखता, तो उसके चेहरे पर जयंत के प्रति घृणा के भाव स्पष्ट दिखाई देते।वह अपने अपमान के जहरीले घूँट किसी तरह पी गई। उसे लगने लगा मानो किसी ने अभी-अभी उसके साथ रेप किया हो। आगे पढ़िये...

  • भाषांतर,
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  • प्रविष्ट तिथि : Monday, March 01, 2010
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मूल लेखक : सरोजिनी साहू, हिंदी रूपांतरण : दिनेश माली

प्राचीरों में क़ैद पानी

हमारे पास पानी के कितने रंग हैं। कितने संदर्भ हैं। कितने संबंध हैं। कितने संवाद हैं। कितने पनघट हैं। कितने घाट हैं। कितनी यात्राएं हैं। कितनी स्मृतियां हैं। कितने अनुष्ठान हैं। कितने पर्व हैं। कितने प्रसंग हैं। कितने उत्सव हैं। कितने अर्घ हैं। कितने आचमन हैं। कितने तीर्थ हैं। कितने विसर्जन हैं। कितने चिंतन हैं। कितने सन्यास हैं। कितने योग हैं। कितने संयोग हैं। कितने राग हैं। कितने कलकल हैं। कितने कलरव हैं। कितने स्नान हैं। कितने दीपदान हैं। कितने फूलों से भरी झबरिया है। कितने मंत्रों से भरी डगरिया है। कितनी धाराएँ हैं। कितनी सहस्त्रधाराएँ हैं। कितनी पद-यात्राएँ हैं। कितनी परिक्रमाएँ हैं। कितनी मानताएँ हैं। कितनी मान्यताएँ हैं। कितनी कथाएँ हैं। कितनी गाथाएँ हैं। कितनी कन्हुक-क्रीड़ाएँ हैं। कितने वांशीरव हैं। कितने मिलनातुर ज्ञेता हैं। कितने प्रतीक्षारत द्वापर हैं। कितने वरुण, जलधार बनकर बहते रहे। कितने इन्द्रधनुष सपनों में रंग भरते हुए आकाश होते रहे। आगे पढ़िये...

  • ललित निबंध,
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  • प्रविष्ट तिथि : Monday, March 01, 2010
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डा. श्रीराम परिहार

मीडिया

फैशन पत्रिकाओं और स्त्री पत्रिकाओं की भाषा इस तरह की होती है कि स्त्री अपनी व्यक्तिगत छवि को निखरे रूप में पेश कर सके। सच यह है कि कॉस्मेटिक का स्टाइल हर दस साल बाद बदल जाता है।इसके कारण मेकअप में भी कुछ न कुछ नये परिवर्तन आ जाते हैं।खासकर चेहरा सजाना बड़ी स्टाईलाइज गतिविधि है। इसमें सेल्फ एक्सप्रेशन की बहुत कम गुंजाइश है। आगे पढ़िये...

  • शेष-विशेष,
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  • प्रविष्ट तिथि : Monday, March 01, 2010
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जगदीश्वर चतुर्वेदी

संताप की लहरों के बीच व्यक्ति और समाज

करीब आधी सदी की पत्रकारिता में पहली बार छत्तीसगढ़ करीब आधी सदी की पत्रकारिता में पहली बार छत्तीसगढ़ में स्कूली बच्चों के मनोरोगी बनने और हताशा में आत्महत्या करने की खबरें सुनने तथा पढ़ने को मिल रही हैं। ये खबरें आहत करती हैं। उद्वेलित करती हैं। पाँचवी, छठवीं या आठवीं-दसवीं के किसी विद्यार्थी द्वारा पढ़ाई से जुड़े किसी कारणवश आत्मघाती कदम उठाने पर लगता है, यह प्रायः प्रत्येक संस्था की सामूहिक विफलता का परिणाम है। परिवार, शिक्षा-संस्थान, नीति-निर्माता, प्रशासन, समाजशास्त्री, विचारक और सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता सबके लिए यह चिंतन तथा चिंता का विषय है।में स्कूली बच्चों के मनोरोगी बनने और हताशा में आत्महत्या करने की खबरें सुनने तथा पढ़ने को मिल रही हैं। ये खबरें आहत करती हैं। उद्वेलित करती हैं। पाँचवी, छठवीं या आठवीं-दसवीं के किसी विद्यार्थी द्वारा पढ़ाई से जुड़े किसी कारणवश आत्मघाती कदम उठाने पर लगता है, यह प्रायः प्रत्येक संस्था की सामूहिक विफलता का परिणाम है। परिवार, शिक्षा-संस्थान, नीति-निर्माता, प्रशासन, समाजशास्त्री, विचारक और सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता सबके लिए यह चिंतन तथा चिंता का विषय है। आगे पढ़िये...

  • आलेख,
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  • प्रविष्ट तिथि : Monday, March 01, 2010
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श्री रमेश नैयर

शिक्षा और प्रलय के बीच एक रेस

एक जगह ग्रेग लिखते हैं, “हम लोग अफ़गानिस्तान के हर गाँव और कस्बे में, जहाँ बच्चे शिक्षा के लिए तरसते हैं और माँ-बाप ऐसे स्कूलों के निर्माण का सपना देखते हैं जिनके दरवाज़े न सिर्फ़ उनके बेटों बल्कि बेटियों के लिए भी खुले होंगे, आशा की एक किरण जगा सके थे। इन जगहों में वे जगहें भी ख़ास तौर पर शामिल थीं जो कलाश्निकोव धारी ऐसे मर्दों के घेरे में हैं जिनकी पूरी ताक़त इस झूठ को ज़िन्दा रखने में खर्च होती है कि क़ुरान शरीफ में यह सीख दी गई है कि जो लड़की गणित पढ़ना चाहे उसके चेहरे पर तेज़ाब फेंक देना चाहिये। आगे पढ़िये...

  • पुस्तकायन,
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  • प्रविष्ट तिथि : Monday, March 01, 2010
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समीक्षक : डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल

हिंदी पत्रकारिता के प्रकाश पुंज विद्यार्थी

सरफ़रोशी की तमन्ना रखने वाले महान क्रांतिकारी सरदार भगतसिंह, चंद्रशेखर आजाद, रोशन सिंह ठाकुर, रामकृष्ण खत्री आदि का कोई ठोस अथवा नियमित आय स्त्रोत नहीं था। समय-समय पर गणेश शंकर विद्यार्थी ने इनके लिये आजीविका के साधन जुटाकर इनकी सक्रिय सहायता की का एक पैर तो जेल में ही रहता था विद्यार्थी जी ऐसे क्रांतिकारियों के परिवारों की समय-समय पर यथासंभव आर्थिक सहायता भी की। आगे पढ़िये...

  • हस्ताक्षर,
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  • प्रविष्ट तिथि : Monday, March 01, 2010
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ओ.पी.हरयाण

 

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