वर्ष 8 माह 3 दिन 11
 संतोष श्रीवास्तव की पुस्तक पर चर्चा     'ऋतुराज एक पल का' को नवगीत पुरस्कार     कहानी संग्रह 'वृक्ष और बेल' के लोकार्पण समारोह पर केंद्रित रिपोर्ट     बाबू गुलाबराय स्मृति दिवस समारोह     विश्व मैत्री मंच का प्रथम हिन्दी साहित्य सम्मेलन हिमाचल प्रदेश में     लोकेन्द्र सिंह की 'देश कठपुतलियों के हाथ में' का विमोचन     हेमंत फाउँडेशन के विश्व मैत्री मंच द्वारा महिला पत्रकारों, साहित्यकारों का राष्ट्रीय सम्मेलन   

     
आधुनिक वेताल कथा अतिक्रमण ये भी एक दृष्टिकोण समय-समय पर ओडिया-माटी बाअदब-बामुलाहिजा धारिणी सिनेमा के शिखर टेक-वर्ल्ड आखर-अनंत
जनमन
प्रफुल्ल कोलख्यान
प्रफुल्ल कोलख्यान
समाधान
जया केतकी
जया केतकी
बाअदब-बामुलाहिजा
फजल इमाम मलिक
फजल इमाम मलिक
धारिणी
विपिन चौधरी
विपिन चौधरी
सिनेमा के शिखर
प्रमोद कुमार पांडे
प्रमोद कुमार पांडे
आखर-अनंत
ओमप्रकाश कश्यप
ओमप्रकाश कश्यप
रोज़-रोज़
दयानंद पांडे
दयानंद पांडे


स्याह सफ़ेदआधुनिक वेताल कथाअतिक्रमणये भी एक दृष्टिकोणसमय-समय परओडिया-माटीझरोखाबाअदब-बामुलाहिजाधारिणीब्लॉग गाथासमांतरपुस्तक-संसारविचारार्थनया नज़रिया
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कहो माधो, कैसी रही?
हमें तो महाजन से मरने के बाद भी शांति मिलेगी नहीं पर भगवान महाजनी की आत्मा को शांति दे जो उसे महाजन के साथ रहते न मिल सकी। चलो, बेचारी अब तो भगवान के चरणों में सुखी रहेगी, महाजन के साथ ब्याह कर उसे जितना नरक भोगना था भोग लिया। बेचारी को महाजन के घर रूपी नरक से तो सदा सदा के लिए मुक्ति मिली ... पढ़िए
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अशोक गौतम

विशाल पंखों वाला बहुत बूढ़ा आदमी
इसी तरह वहाँ आया एक अपाहिज चलने-फिरने में सक्षम तो नहीं हो पाया पर वह लाॅटरी का इनाम लगभग जीत ही गया था। ऐसे ही एक और मामले में वहाँ आए एक कोढ़ी के घावों में से सूरजमुखी के फूल उगने लगे। खिल्ली उड़ाने जैसे इन सांत्वना-चमत्कारों ने पहले ही देव-दूत की ख्याति को धक्का पहुँचाया था ... पढ़िए
0 टिप्पणी, कहानी, (0 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 23 जुलाई 2014,
मूल : गैब्रिएल गार्सिया मार्खे़ज़ अनुवाद : सुशांत सुप्रिय

वेद प्रताप वैदिक पर दाग दूसरे हैं, हाफिज सईद से मुलाक़ात कोई दाग नहीं, कोई अपराध नहीं
इन दिनों उन्हें भाजपाई होने का तमगा देते लोगों को देख रहा हूं। अभी जल्दी ही उन्हें अन्ना हजारे और फिर रामदेव के साथ भी निरंतर देखा गया था। रामदेव को जब रामलीला मैदान में आधी रात गिरफ्तार किया गया और उन के अनुयायियों को तंग किया गया तो रामदेव की उस कठिन घड़ी में वेद प्रताप वैदिक उन के प्रवक्ता बन कर उपस्थित हुए थे ... पढ़िए
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दयानंद पांडेय

दान की नीयत तो अच्छी है, सुपात्र की शिनाख्त भी जरूरी
दान के बेहतर इस्तेमाल की संभावना जरूर देखते हैं। जब कभी भूखों के नाम पर दानदाताओं की जेब से रकम निकलती है, तो उसका सबसे अच्छा इस्तेमाल ही होना चाहिए। यह दान सबसे गरीब तक जाना चाहिए। लेकिन सबसे गरीब से परे बाकी लोगों तक यह न जाए, ऐसा कोई जरिया सड़क किनारे के भंडारों में निकलना नामुमकिन है ... पढ़िए
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सुनील कुमार

एक सार्थक व्यंग्य संग्रह : ‘‘कार्यालय तेरी अकथ कहानी "
नेता भजनावली मे जहाँ लम्पट राजनीति बाजो का काला चिट्ठा है वहीं खतरनाक हड़ताल मे आमरण अनशन के नाम पर उपवासीय थोथे ढकोसलों की नौटंकी का पर्दाफाश किया गया है । समकालीन परिदृश्य मे जहाँ सम्मानों और पुरस्कारों का अवमूल्यन होता चला जा रहा है और उन्हें किन्हीं परोक्ष या अपरोक्ष सूत्रो द्वारा संचालित माना जा रहा है ... पढ़िए
0 टिप्पणी, पुस्तकायन, (9 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 22 जुलाई 2014,
मुकुंद कौशल

चूहों की बदनामी
उधर कुछ चूहें करोड़ों के अनाज चट करके पूरा चूहा समाज को बदनाम कर रहे हैं। हम पर करोड़ों के अनाज पर हाथ साफ करने का गंभीर आरोप लगाये जा रहें हैं। हमारे पुरखों ने जो प्रतिष्ठा अर्जत की थी वह आज दांव पर लगी हुई है। हमारे माथे पर लगा हुआ कलंक का यह दाग मुझसे बर्दाश्त नहीं हो पा रहा है। तुरन्त जांच कमेटी गठित करके पता लगाओ कि कौन हैं वे चूहें जो ऐसे अपराधिक कार्य मे संलिप्त है ... पढ़िए
0 टिप्पणी, व्यंग्य, (15 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 21 जुलाई 2014,
वीरेन्द्र ‘सरल‘

बलिदान
हमारे गाँव और आस-पास के सभी गाँवों के लोग उस मेले की प्रतीक्षा साल भर करते थे। मेले वाले दिन सब लोग नहा-धो कर तैयार हो जाते और जल-पान करके मेला देखने निकल पड़ते। हमारे गाँव में से जो कोई मेला देखने नहीं जा पाता उसे बहुत बदक़िस्मत माना जाता । हमारे गाँव चैनपुर और धरहरवा गाँव के बीच भैरवी नदी बहती थी ।साल भर तो वह रिबन जैसी एक पतली धारा भर होती थी। पर बारिश के मौसम में कभी-कभी यह नदी प्रचण्ड रूप धारण कर लेती थी ... पढ़िए
0 टिप्पणी, कहानी, (22 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 21 जुलाई 2014,
सुशांत सुप्रिय

चेरापूंजी
पता नहीं, 25 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद भी तुम्हारे इस आरोपित नाम का दाग तुम्हारे मन में रहेगा या नहीं| लड़कियां इस तरह के नाम अपने प्रेमियों के लिए रखती है या नहीं,मैंने कभी पूछा भी नहीं। संभवत नहीं ,यदि ऐसा होता दो तुमने भी निश्चित रूप से मुझे भी ऐसा ही कोई नाम दिया होता। यह बात मुझे याद नही आती ... पढ़िए
0 टिप्पणी, ओडिया-माटी, (21 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 20 जुलाई 2014,
मूल : दिनेश माली, अनुवाद : रवि पटनायक

शिवमूर्ति के कंधे पर बैठ कर एक अपठनीय रचना का बचकाना बचाव
किस तरह एक अपठनीय रचना के बचाव में यह एकपक्षीय रिपोर्ट ढाल बन कर शिवमूर्ति के कंधे पर बैठ कर चीख रही है , अपनी बात किस तरह शिवमूर्ति के मुंह में डाल कर कही जा रही है इस बारे में मुझे या किसी और को कुछ कहने सुनने की ज़रुरत है नहीं। बाकी आप शिवमूर्ति के मित्र हैं, उन के जनपद के हैं, उन से बतिया लीजिए, कुछ आनंद भी मिलेगा ... पढ़िए
0 टिप्पणी, रोज़-रोज़, (14 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 20 जुलाई 2014,
दयानंद पांडेय

अधूरा प्रतिनीधि
परिचय का दौर चल रहा था तभी अध्यक्ष महोदय का ध्यान गया कि बिलकुल पीछे सबसे अलग, बिना किसी बिल्ले के एक अस्त व्यस्त आंकड़ा बैठा है और चुपचाप सुन रहा हैl ... पढ़िए
0 टिप्पणी, लघुकथा, (20 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 19 जुलाई 2014,
अशोक गुप्ता

तकलीफ की जिंदगी ढोने के बजाय मरने का हक बेहतर
त सिर्फ यूरोप के इस विकसित और संपन्न देश में निजी आजादी की सोच के एक अलग दर्जे की नहीं है, खुद भारत के भीतर जैन समाज में कई बार संथारा लेने की खबर आती है जो कि एक धार्मिक और सामाजिक परंपरा है। इसके तहत जब कोई प्राण छोड़ देने की सोचते हैं, तो वे खाना-पीना बंद कर देते हैं, और परिवार-समाज उनकी मौत तक उनका साथ देते हैं ... पढ़िए
0 टिप्पणी, स्याह सफ़ेद, (21 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 19 जुलाई 2014,
सुनील कुमार

इस्लाम की स्वधर्म त्याग की समस्या
कोई भी धर्म अपने बारे में कैसे महान और उचित होने का दावा कर सकता है जो अपने मानने वालों को मौत की धमकी के साथ मानने वालों को अपने साथ रखने की कोशिश करता है? हम कैसे ये उम्मीद कर सकते हैं कि ये धमकी मुर्तद बनने जा रहे इंसान को अच्छा मुसलमान बना सकती है? इसके बजाय उनके लिए मुनाफिक (कपटी) हो जाना बेहतर नहीं होगा ... पढ़िए
0 टिप्पणी, आलेख, (19 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 18 जुलाई 2014,
मुस्तफा अक्योल

संतोष श्रीवास्तव की पुस्तक पर चर्चा
नासिक। साहित्य सरिता हिन्दी मंच नासिक के द्वारा प्रख्यात लेखिका संतोष श्रीवास्तव के कथा संग्रह "प्रेम सम्बन्धों की कहानियाँ" पर चर्चा एवं कहानी पाठ का आयोजन वरिष्ठ लेखिका डॉ विद्या चिटको की अध्यक्षता में आयोजित किया गया। ... पढ़िए
0 टिप्पणी, हलचल, (26 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 18 जुलाई 2014,
लक्ष्मी यादव

कांग्रेस की हार की वजह!
अल्पसंख्यक तुष्टीकरण या धर्म निरपेक्षता? क्या हम धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अल्पसंख्यक तुष्टीकरण कर रहे हैं? इस एक प्रश्न से कई प्रश्न निकलकर सामने आ सकते हैं। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर क्या हम सुविधाभोगी अल्पसंख्यक नेताओं का एक वर्ग नहीं खड़ा कर रहे हैं जिन्हें अल्पसंख्यकों के सुख-दुःख से कोई रिश्ता-नाता नहीं है, जो अपने लिए सुख बटोरने में अधिक मशगूल हैं ... पढ़िए
0 टिप्पणी, प्रसंगवश, (23 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 17 जुलाई 2014,
विश्वजीत सेन

हुल्लड़ मुरादाबादी के संग
इन्हें प्रस्तुत करते समय अपनी भाव-भंगिमाओं से श्रोताओं के बीच कुछ ऐसा माहौल बना देते थे कि हंसते हंसते उनके पेट में बल पड़ जाया करते थे। इनमें से कई श्रोताओं को तो जमीन पर लोट पोट होते हुए भी देखा जा सकता था। आमतौर पर ऐसे कवि सम्मेलनों को उस समय शहर के मारवाड़ी लाइन के आसपास रखा जाता था ... पढ़िए
0 टिप्पणी, संस्मरण, (23 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 17 जुलाई 2014,
विनोद साव

अच्छे अफसरों से बुरे सुलूक का सिलसिला खत्म हो
गुजरात की प्रशासनिक अकादमी वल्लभ भाई पटेल के नाम पर ही रखी गई है, और राष्ट्रीय पुलिस अकादमी भी उन्हीं के नाम पर है। सरदार पटेल जिस कड़ाई के हिमायती थे, वैसी कड़ाई और ईमानदारी को शासन-प्रशासन में लागू करना ही उनका असली सम्मान होगा, प्रतिमा खड़ी होती है तो हो, और नहीं होती है, तो न हो ... पढ़िए
0 टिप्पणी, स्याह सफ़ेद, (63 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 16 जुलाई 2014,
सुनील कुमार

हुल्लापुर में हल्ला
कहने को हम धर्म निरपेक्ष हैं पर जब राजनीति की बात आती है तो हम धर्म सापेक्ष हो जाते हैं। फिर धर्म का रास्ता सत्ता के मंदिर तक पहुँच ही जाता है। जैसा कि होता आया है,मंदिर और मस्जिद दोनों के निर्माण पर हाई कोर्ट से रोक लग गयी। और हिंदूवादी संगठनों के कदम खेमराज की और बढ़ चले थे। एक ऐसी ही पार्टी ने वहां के वर्तमान विधायक जो इस तरह का कृत्य अपने पुरे शासन काल में नहीं करा पाए थे,उनका पत्ता काट दिया गया था ... पढ़िए
0 टिप्पणी, व्यंग्य, (21 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 16 जुलाई 2014,
पंकज प्रसून

बीनू भटनागर की हाइकू
0 टिप्पणी, छंद > हाइकु, (19 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 16 जुलाई 2014,
बीनू भटनागर

धर्म, समाज और राज्य
कहना न होगा कि हमारा समाज इस आदर्श को अभी हासिल नहीं कर पाया है, इसलिए कबीरदास ज्ञान की आँधी से तो सावधान करते हैं, ज्ञान का निषेध नहीं करते हैं। समाज में साझा विचार विवेक समर्थित संवेदना के साझापन से बनता है। शायद इसीलिए सतसंग की सामाजिक साझीदारी के बिना विवेक के सक्रिय होने की बात की ही नहीं जा सकती है, तलसीदास के शब्दों में कहें तो– बिनु सतसंग विवेक न होई! सतसंग की सामाजिक साझेदारी के अभाव में विवेक बाँझ हो जाता है ... पढ़िए
0 टिप्पणी, जनमन, (26 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 15 जुलाई 2014,
प्रफुल्ल कोलख्यान

कंप्यूटर में ही सिमट आए अंग्रेजी-हिंदी शब्दकोश
एचटीएमएल, टेक्स्ट तथा पीडीएफ शब्दकोश फाइलों को आप क्रमश: किसी भी ब्राउजर, पाठ संपादक या पीडीएफ फाइल प्रदर्शक के द्वारा विंडोज?लिनक्स के किसी भी संस्करण में उपयोग में ले सकते है। इन फाइलों में शब्दकोश प्रोग्रामों की तरह शब्दों को ढूंढने की ठीक-ठाक सुविधा तो नहीं मिल पाती हैं, परन्तु फिर भी शब्द अकारादि क्रम में होने के कारण उन्हें ढूंढने में ज्यादा कठिनाई भी नहीं होती ... पढ़िए
0 टिप्पणी, टेक-वर्ल्ड, (22 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 15 जुलाई 2014,
बालेन्दु शर्मा दाधीच

क्यों कि मैं उन्हें देवता नहीं बना सकता!
समझ रहे हैं न आप लोग कि मैं क्या कह रहा हूं? आदमी को आदमी कहना भी बताइए कि पाप हो गया है। दुखवा मैं कासे कहूं? क्यों कि बहुत लोग तो बहुतों को देवता बना रहे हैं। तू मुझे खुदा कह, मैं तुझे खुदा कहता हूं! का बाज़ार अपनी पूरी रवानी पर है! खुदा निगेहबान हो तुम्हारा, धड़कते दिल का पयाम ले लो ... पढ़िए
0 टिप्पणी, रोज़-रोज़, (39 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 14 जुलाई 2014,
दयानंद पांडेय

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