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पुस्तकों के बिना दुनिया की कल्पना भी नहीं की जा सकती : संतोष चौबे

सीहोर। पुस्तकों के बिना हम दुनिया की कल्पना भी नहीं कर सकते। पुस्तकें हमारी मित्र हैं, हमारी पथ प्रदर्शक है तथा जब भी हम किसी उलझन में होते हैं तो हमें रास्ता दिखाने का काम पुस्तकें ही करती हैं। यह चिंता का विषय है कि पुस्तकों के स्थान पर दूसरे संचार माध्यमों को प्राथमिकता दी जा रही है लेकिन फिर भी पुस्तकों की उपयोगिता बनी रहेगी
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'उन्हें गोली मारनी थी, मार दिया'

कराची के खचाखच भरे हॉल में जैसे ही 'बलूचिस्तान की ख़ामोशी तोड़ दो' नामक सेमीनार ख़त्म हुआ मैंने T2F की मालकिन और मेरी दोस्त सबीन महमूद से कहा क्या तुम्हारे यहाँ मेहमानों को पानी भी नहीं पूछते। उसने हाथ में पकड़ी पानी की बोतल मुझे दे दी और फिर अपनी माताजी के साथ गाड़ी में बैठ के चल पड़ी
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मैं नहीं देता इस धोखे में सने मज़दूर दिवस की बधाई, आप बुरा मानते हैं तो मान जाइए, अपनी बला से !

यह स्कूल, यह अस्पताल, यह ये और वह वो कुछ भी इन के लिए नहीं है। यह रेल के डब्बे, यह बसें कुछ भी नहीं। यह नौटंकीबाज़ और खोखलेपन से भरा आदमी राहुल गांधी रेल के जिस जनरल डब्बे में फोटो खिंचवाने जाता है यह रेल डब्बा भी एक धोखा है। मज़दूर जिस रेल के जनरल डब्बे में सफर करता है, कितना अपमानित हो कर करता है
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ये पिशाच और हैवान बाहर नहीं, हमारे भीतर ही हैं...

समाज की व्यवस्था समाज की निगाहों के सामने तक कायम रह जाए, तो रह जाए। जहां समाज की निगाहों से परे की बात शुरू हुई, वहां समाज बनने के पहले का इंसानी मिजाज जागने लगता है। और हमारा मानना है कि हिंसा या जुर्म करने वाले लोगों को हैवान या पिशाच कहना नाजायज है, और निगाहें चुराना है। किसी ने न हैवान देखा है, न पिशाच देखा है
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हर युग में कुचली गयी नारी... बस अब और नहीं

कानपुर। साहित्य, कला संस्कृति की पत्रिका ‘समकालीन सांस्कृतिक प्रस्ताव’ का लोकार्पण हुआ। इस मौके पर कवि एवं दूरदर्शन के पूर्व उपमहानिदेशक रमाकांत शर्मा ‘उद्भ्रांत’ ने आत्मीय संवाद के माध्यम से अपने ‘त्रेता’ महाकाव्य से कविता प्रस्तुत की और नारी को सतयुग से लेकर त्रेता और द्वापर युग में कुचले और दबाये जाने का दर्द प्रस्तुत किया
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बोलती लाशें

इस तथ्य से भी लोगों को रु-ब-रु कराया कि 11 अप्रैल की मुठभेड़ में माओवादियों को 35 लोगों का नुकसान हुआ, तथा उनके 10 लोग घायल हुए। माओवादियों की लाशों को डब्बाकोंटा में जलाया गया। माओवादी कमांडर नागेश ने अपने भाषण में कहा कि पहली बार उन्हें इतना बड़ा नुकसान हुआ, लेकिन इसका जिक्र स्थानीय लोगों से न किया जाये
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साहस, श्रम पर विश्वास और निष्ठा मेरे संबल है : बलदेव वंशी

तरराष्ट्रीय कबीर सम्मेलन की अध्यक्षता कर चुका था, जिसमें राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह मुख्य अतिथि थे। संत साहित्य की खोज में मॉरीशस, बेल्जियम, हॉलैंड, इंग्लैंड और नेपाल सहित देश में हिमाचल, मेघालय, असम, महाराष्ट्र, गोआ, पश्चिम बंग, गुजरात, राजस्थान और पंजाब की लंबी-लंबी सृजन-यात्राएं कीं। मेरा नाम गुरुग्रंथ साहिब में से बाबू लेकर 'ब' अक्षर से बलदेव रखा गया
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आधा ज्ञान, दुगुना भरोसा, आज का खतरनाक चलन

कुछ दूसरे चिकित्सा वैज्ञानिक यह मानते हैं कि बहुत अधिक पानी पीने से जान भी जा सकती है, और बदन के भीतर के बहुत से दूसरे तत्व जरूरत से अधिक पानी पीने से उसके साथ बह निकलते हैं, और उनकी कमी बदन में हो सकती है। यह तो सादे पानी की बात हो गई, लेकिन इससे परे जब खाने-पीने की दूसरी चीजों पर जाएं, तो वैज्ञानिक निष्कर्षों में बहुत किस्म की विविधताएं हैं
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बौद्धिक विमर्शों से नाता तोड़ चुके हैं हिंदी के अखबार

हमारे समाचारपत्र अगर समाज में चल रही हलचलों, आंदोलनों और झंझावातों की अभिव्यक्ति करने में विफल हैं और वे बौद्धिक दुनिया में चल रहे विमर्शों का छींटा भी अपने पाठकों पर नहीं पड़ने दे रहे हैं तो हमें सोचना होगा कि आखिर हमारी एक बड़ी जिम्मेदारी अपने पाठकों का रूचि परिष्कार भी रही है। साथ ही हमारा काम अपने पाठक का उसकी भाषा और समाज के साथ एक रिश्ता बनाना भी है
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निज-निज पानीपत

उसके ऊपर कटने का यह दाग। प्रद्युम्न को मन में आने लगा, निश्चय ही वह वीभत्स दिखाई दे रहा होगा। उसका मन खराब हो गया था। और डॉक्टर के पास नहीं गया वह। हॉस्पिटल से बाहर आने पर उसे प्रचंड ठंड लगने लगी। दोनों पांव सुन्न हो गए थे। वह कहां जाएगा? अगणी काका के घर? होटल? पान-दुकान? पोस्ट-ऑफिस? अब तक तीन दिन हो गए स्ट्राइक चलते हुए
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'स्वजन' और 'श्वजन'

सघन सलाह के बाद तय हुआ कि इसे भाषा संबंधी ज्ञान को अवश्य ही अर्जित करना चाहिए। अब समस्या यह थी कि इसके लिए साहित्य की राह पकड़ी जाये या व्याकरण की! जैसा कि विद्वानों के साथ होता ही है, फिर सघन-सलाह! अंत में फैसला व्याकरण के हक में गया
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कायर संसद-अदालत, और कायर समाज के चलते समलैंगिकों को बस मौत

दिल्ली हाईकोर्ट ने पिछले बरस जो फैसला दिया था, उसे पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इसे अपराध ही मान लिया है। भारत का समाज बहुत सी दूसरी बातों की तरह समलैंगिकता को भी कभी पश्चिम से जोड़ लेता है, कभी यहां के हिन्दू आंदोलनकारी इसे एक ईसाई बुराई मान लेते हैं, और हमेशा ही इसे एक गाली की तरह इस्तेमाल किया जाता है
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अकबर का यह अकेलापन, यह गुस्सा, यह अवसाद

इसी वक्त जब मैं उन्हें मिला तो पहले तो वह बहुत खुश हुए। हम लोग टहलते हुए बतियाने लगे। पत्रकारिता में उन के स्वर्णिम दिनों की याद जब तक दिलाता रहा, तब तक वह खुश-खुश रहे। लेकिन ज्यों भारतीय पत्रकारिता में पतन की बात शुरू की तो वह असहज होने लगे। और राजनीति पर बात आते-आते वह कतराने लगे। और जेट का लाउंज खोजने लगे
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सह अस्तित्व


दुःख ,सन्तोष श्रीवास्तवकी कहानियों का स्थाई भाव है : सूरज प्रकाश

मुंबई। "दुःख सन्तोष श्रीवास्तव की कहानियों का स्थाई भाव है ।उन्होंने दुःख को जिया है और ज़िन्दगी के कई रंग इनकी कहानियों में शिद्दत के साथ महसूस किये जा सकते हैं ये बातें सूरज प्रकाश ने अपने अध्यक्षीय वक्तव्य में संतोष श्रीवास्तव के कहानी सन्ग्रह 'आसमानी आँखों का मौसम ' के लोकार्पण के अवसर पर कहीं ।यह कार्यक्रम मणि बेन नानावटी महिला महाविद्यालय में आयोजित किया गया
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नक्सल हिंसा, बातचीत के बिना लोकतंत्र में कोई रास्ता नहीं

ऐसे में मुठभेड़, हत्या, शहादत, श्रद्धांजलि का सिलसिला ऐसे चले आ रहा है कि शहरों में महफूज रहने वाले लोग इन खबरों में आंकड़ों को देखकर बाकी बातों को छोड़ ही देते हैं। यह सिलसिला खतरनाक इसलिए है कि नौकरी के लिए बेबस लोग वर्दी पहनकर, बंदूक लेकर, केंद्र और राज्य के सुरक्षा बलों में शामिल होकर ऐसे मोर्चों पर चले तो जाते हैं
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ममता और ”संसदीय“ माओवाद

कोलकाता की जनता को इस प्रतिरोध की जरूरत तब महसूस हुई, जब उन्होंने देखा क्या पूरब क्या पश्चिम, क्या उत्तर क्या दक्षिण, हर दिशा में उनके बोट लुटे जा रहे हैं। लूम्पनों की फौज इस काम को अंजाम दे रही थी, जिसे मुख्यमंत्री का वरदहस्त प्राप्त था। दिन का अन्त एक पुलिस एस.आई को तृणमूल गुण्डों द्वारा गोली मार दिये जाने से हुआ
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धर्म और नैतिकता

यह तथ्य पुरा–पाषाणकाल की उन चित्रमालाओं से सिद्ध होता है, जो भारत के अलावा फ्रांस, स्पेन आदि देशों में प्राप्त भित्ति–चित्रें से सिद्ध हो जाती है। भारत में मध्यप्रदेश के रायसीना जिले के भीमबेटका की पहाडि़यों के बीच मिली चित्रमालाओं से भी प्राचीन मनुष्य की सामाजिक चेतना को समझा जा सकता है
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साहित्य में कब आएगा पैसा?

शेयर बाजार से कमाए गए पैसे लोग कला बाजर में निवेशक करते थे जो कि एक बेहद सुरक्षित विकल्प माना जाता था । अंतर्राष्ट्रीय और भारतीय कला बाजार में ना तो आर्थिक मंदी का कोई बहुत ज्यादा असर दिखा और ना ही अर्थवयवस्था के कमजोर होने का बहुत असर दिखा । कई नामचीन भारतीय पेंटर हैं जिनकी कलाकृतियां करोड़ों रुपये में बिकीं
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मौलानाओ के कम- अक़्ली के कारण इस्लाम बदनाम हो रहा है!

जब हम मुसलमानों को व्यवहार की द्रष्टि से देखते हैं तो पता चलता है कि किसी ना किसी रूप में मुस्लिम समाज में भी इस्लाम के विरुद्ध जाति व्यवस्था कि जड़ें गहरे तक पायी जाती है। और सभी मुसलमान खुद को एक नहीं मानते हैं। केवल इतना ही नहीं, विवाह इत्यादी में भी एक-दूसरे से सम्बन्ध स्थापित करने में भी कुछ सामजिक और जातीय नियमों का पालन करते हैं
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सच के बस हिज्जे ही सरल हैं

जिस किस्म से सरकारी दफ्तरों में फाईलों को आगे बढ़वाने के लिए हाथों पर चिकनाई लगाने की बात कही जाती है। यह माना जाता है कि सरकारी ढांचे के चक्के ऐसी चिकनाई की वजह से ही घूम पाते हैं, और इसके न रहने पर काम रूक जाता है। सच कहने की बात सुनने में अच्छी लगती है, बुद्ध से लेकर कबीर तक और गांधी तक भी सच की महिमा बार-बार कही गई है
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