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साहित्य, संस्कृति व भाषा का अन्तरराष्ट्रीय मंच


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जाति : आखिर क्यों नहीं जाती?

आर्थिक विकास की घटती दर तथा प्रदूषण–नियंत्रण के तमाम प्रयासों के बावजूद उसमें जरा–भी गिरावट न आने का अभिप्राय है कि उसके कारणों के प्रति हमारी जानकारी अधूरी और अपर्याप्त है। यदि ध्यानपूर्वक विश्लेषण किया जाए तो पर्यावरण असंतुलन एवं प्रदूषण के लिए जिम्मेदार कारणों में से प्रायः उन्हीं की चर्चा की जाती है, जिनके आधार पर सारा दोष आम नागरिक के सिर मढ़ा जा सके। इस क्षेत्र के बड़े मगरमच्छों या आम नागरिक के निर्णय–अधिकार पर डाका डालने वालों को लगभग बरी कर दिया जाता है
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ब्रिटिश जनता का फैसला, योरप से परे बाकी दुनिया पर भी असर

1971 में बांग्लादेश बनने के वक्त वहां से दसियों लाख शरणार्थी भारत आए थे, और उनमें से शायद पूरे के पूरे कानूनी रूप से भारत में रह गए। इनसे परे असम जैसे राज्य में अवैध रूप से आकर बसे हुए दसियों लाख बांग्लादेशियों का मुद्दा लंबे समय से भारत की राजनीति में उठाया जाता रहा, और इस बार असम में भाजपा की पहली सरकार बनने के पीछे जो वजहें गिनाई जाती हैं, उनमें ऐसे अवैध बांग्लादेशियों का मुद्दा भी एक है, जिनकी वजह से असम के कुछ लोगों का यह मानना रहा है
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आलोचना वितंडा और पाठक

इस समय कविता के कुछ भक्त तो यत्र-तत्र दीख जाते हैं, लेकिन पाठक रूठ गये हैं। पाठक, जिसे पहले सामाजिक भी कहा जाता था और ठीक ही कहा जाता था, तो इस बात से उदासीन ही है कि कहीं कोई पाठ बहुत ही बेसब्री से उसकी प्रतीक्षा कर रहा है। पाठक की इस उदासीनता के लिए कुछ हद तक साहित्य तो जिममेवार है
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गर्भ गृह

नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। यह आदमी शफीक नहीं हो सकता। यह आदमी तो देखने में गोरा-चिट्टा नहीं लग रहा था। इस आदमी के बाल घने ना होकर, छितरे हुए लग रहे थे। बहुत कम बालों में जबरदस्ती कंघी किया हुआ वह आदमी कौन हो सकता है? पिचके हुए गालों वाला आदमी जिसकी मूँछे भी नहीं है? कौन हो सकता है यह? यह आदमी तो किसी भी हालत में शफीक नहीं हो सकता
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हथियार, इंसान, और सामाजिक तनाव का मेल ऐसा खतरनाक..

देश में जिस तरह का धार्मिक उन्माद छाया हुआ है, और जिस तरह की साम्प्रदायिकता बढ़ रही है, उसके चलते हुए यह खतरा बना हुआ है कि किसी दिन कोई अकेला सिरफिरा यह तय कर ले कि वह समाज से, सरकार से, या किसी तबके से हिसाब चुकता करने के लिए बहुत से लोगों को मार डालेगा। लोगों को याद रखना चाहिए कि प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके एक सिक्ख अंगरक्षक ने स्वर्ण मंदिर पर हुई फौजी कार्रवाई के विरोध में की थी। और प्रधानमंत्री के इर्द-गिर्द तैनात, जांचे-परखे हुए एक गार्ड ने जब ऐसा किया, तो किसी धार्मिक उन्माद में कोई व्यक्ति और बड़ी हिंसा, और बहुत सी हत्याएं कर सकते हैं
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अकादमी सचिव की ‘ललित कला’

राष्ट्रीय अकादमियों और अन्य सांस्कृतिक संस्थाओं का कार्यकरण- मुद्दे और चुनौतियों के नाम से तैयार की गई इस रिपोर्ट में साहित्य अकादमी, ललित कला अकादमी और संगीत नाटक अकादमी के अलावा इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के काम-काज का लेखा-जोखा तो प्रस्तुत किया ही था, साथ ही इन संस्थानों में सुधारों के बारे में सिफारिश भी की थी । दिसंबर 2013 के बाद तो पूरा देश चुनाव के मोड में चला गया था और चुनावी कोलाहल के बीच किसी को कला और संस्कृति की सुध लेने की फुरसत नहीं थी
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हिन्दी साहित्य के 12 सौ वर्षों के इतिहास में तुलसी के बाद कबीर सबसे प्रतिभाशाली कवि

पटना। हिन्दी साहित्य के लगभग 12 सौ वर्षों के इतिहास में, संत शिरोमणि तुलसी दास के अतिरिक्त कबीर सा प्रतिभाशाली कवि-व्यक्तित्व दूसरा नहीं हुआ। कबीर अक्खड़ भाषा में जीवन का मर्म समझाते हैं
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योग के फायदे तो अनगिनत पर धर्मांधता से दूर ही रखें

जिससे होने वाले नुकसान को लेकर कई तरह आशंकाएं भी हैं, हम भारत के परंपरागत योग की बात करते हैं जो कि रामदेव के पैदा होने के सदियों पहले से बिना किसी बाजारू नाटकीयता के चल रहा है, और आज भी मुंगेर जैसे विश्वविख्यात योग संस्थानों से लेकर दक्षिण भारत के कई योग गुरुओं तक ने बिना साबुन और नूडल्स बेचे सिर्फ योग को फैलाया है
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बिहार की बहादुर बेटी बनी महिला फ़ाइटर पायलट

24 वर्षीय भावना बिहार के दरभंगा ज़िले की हैं। यद्यपि उनकी पैदाइश बेगुसराय ज़िले के बरौनी रिफ़ाइनरी में हुई। उनके पिता इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन में इंजीनियर हैं, जबकि मां गृहणी हैं। बरौनी रिफ़ाइनरी के डीएवी पब्लिक स्कूल से पढ़ाई करने के बाद भावना ने बीएमएस कॉलेज, बेंगलौर से इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की
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मेरा वतन

उसकी दृष्टि तो आस-पास की दुकानों पर जा अटकती थी। जैसे मिकनातीस लोहे को खींच लेता है वैसे ही वे बेंजबाम् इमारतें जो जगह-जगह पर खंडहर की श€ल में पलट चुकी थीं, उसकी नंजर को और उसके साथ-साथ उसके मन, बुध्दि, चिžा और अहंकार सभी को अपनी ओर खींच लेती थीं और फिर उसे जो कुछ याद आता, वह उसे पैर के तलुए से होकर सिर में निकल जानेवाली सूली की तरह काटता हुआ, उसके दिल में घुमड़-घुमड़ उठता
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अभिधा का कहरः दयानंद पांडेय की ग़ज़लें

वह खुल कर अपनी बात कहते हैं । उन्हें शायद घुमा फिरा कर बात कहना न तो आता है और न ही पसंद है। अभिधा का कहर ढाना जैसे उन की फितरत है । वस्तुतः यह लेखक दयानंद पांडेय की शुरू से ही विशिष्टता रही है। अब इस ट्रेडमार्क को यदि उन्होंने अपनी काव्याभिव्यक्ति में भी अपना लिया है तो इस में आश्चर्य की कोई बात नहीं । क्रिकेट की भाषा में कहें तो वह ‘गुगली’ या ‘स्पिन’ की जगह ‘बाउंसर्स’ में ही यक़ीन रखते हैं। हैरानी की बात यह अवश्य है कि जो बेबाकी उनकी लेखों में मिलती है
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स्मृति ईरानी, मोदी, उनके साथी और केजरीवाल की भाषा...

जिसकी जगह सार्वजनिक जीवन में शिष्टाचार की वजह से खत्म नहीं हो सकती। भारतीय राजनीति में ऐसे तंज कसने की लंबी परंपरा रही है, और अक्सर तो होता यह है कि किसी व्यंग्य से परे भी बहुत से नेता महज गाली-गलौज की जुबान में एक-दूसरे के लिए बात करने लगते हैं। लोगों को याद होगा कि बिहार में राबड़ी देवी ने मुख्यमंत्री रहते हुए राज्यपाल की शारीरिक दिक्कत को लेकर उनके बारे में सार्वजनिक रूप से लंगड़ा कहकर हिकारत जाहिर की थी
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गर्भ गृह

एक बार उसने कार स्टार्ट करने की कोशिश की। मगर इस बार भी कार स्टार्ट नहीं हुई। आधे घण्टे से ज्यादा का समय सड़क पर ही बीत गया था। आस-पास में कोई गैरेज भी नजर नहीं आ रहा था, जिससे वह किसी मैकैनिक को बुलाता। अनिकेत तनावग्रस्त हो गया था। देखते-देखते वह अपने नाखूनों को दाँत से काटने लगा
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मुस्कान धर्म का प्रसार

मनुष्य का समग्र चेहरा मयूरनृत्य का रोमांच अनुभव करे तब किसी अंजान होठों पर मुस्कान का उदय होता है। मनुष्यत्व को जब पुष्पत्व की दीक्षा प्राप्त होती है तब मुस्कान खिलती है। हास्य उत्पन्न हो सकता है, मुस्कान उत्पन्न नहीं हो सकती। रोम-रोम से जब प्रसन्नता की खबर मिलती है तब कहीं मुस्कान घटना घटित होती है
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सड़कों के मुजरिमों के साथ कोई रियायत नहीं हो...

हम लगातार यह भी लिखते आ रहे हैं कि इन मौतों से कई गुना अधिक ऐसे मामले रहते हैं जिनमें लोग विकलांग हो जाते हैं, और काम के लायक नहीं बचते हैं। लेकिन उनके आंकड़े सरकार के किसी रिकॉर्ड में नहीं आते, इसलिए लाशों से परे लोगों का ध्यान नहीं जाता। प्रदेश में गाडिय़ां चलाने वाले लोगों की क्षमता, उनकी सेहत और उनकी आंखों का हाल, गाड़ी चलाते समय उनके नशे की कोई जांच, गाड़ी की फिटनेस, आगे-पीछे लाईट, ब्रेक, इन सबका बुरा हाल है
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वंचित बहुसंख्यकों को स्वर देने की कोशिश

सामाजिक मुद्दों से उनका जुड़ाव बहुत कम है। दलित बहुजन मुद्दों की बात करें तो यह कमी और स्पष्ट उजागर होती है। हमने इसका हल अंग्रेजी के लेखकों को अपने साथ जोड़कर निकाला। उनके आलेखों का हिंदी में अनुवाद किया जाता है। इस तरह हम दोनों भाषाओं के श्रेष्ठ विद्वानों शोधा‍र्थियों को अपने साथ जोड़ पाने में कामयाब रहे और हमारी पहुंच गैर हिंदी भाषी इलाकों में भी हुई
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आत्मीयता का सूखता झरना

मार्निंग वाक के बहाने दलाली की दुकान उन की फिर भी बंद नहीं हुई । वह चीफ जस्टिस हो कर अवकाश प्राप्त हो गए हैं । पर क़ानून किस चिड़िया का नाम है , वह यह भी नहीं जानते । क़ानून जगत के लोग भी उन्हें नहीं जानते । उन के ज़्यादातर निर्णय सुप्रीम कोर्ट में पलट जाते थे । पर उन को शर्म नहीं आती थी
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नवोन्मेष की चुनौती के सामने हिंदी समाज और साहित्य

हिंदी की हालत अपनी सहायक नदियों के जलप्रवाह से वंचित गंगा की तरह हो गई है। ऊपर से सांस्कृतिक प्रदूषण का असर! अब गाँवों में भी शादी-व्याह के अवसरों पर चालू बंबइया फिल्मों की धुन पर गीत गाये जाते हैं! मजदूर, किसानों के खाली समय में भी इन्हीं की धूम मचती है! व्यक्ति-समाज-जातीयता-स्थानिकता-वैश्विकता के अंतर्संबंधों के संतुलन बिंदु पर कायम रहकर ही साहित्य की संवेदना का प्रसार होता है। जिस सामाजिक-लोकेल में यह संतुलन बिंदु हुआ करता है, हिंदी साहित्य का वह सामाजिक-लोकेल ही खो गया है। इस लोकेल को ढूढ़ना बहुत जरूरी है। कुछ अपवादों की बात छोड़ दें तो, हिंदी-कवि अब संघर्षशील श्रम-सौंदर्य-चेतना की स्वरलिपि पढ़ पाने में असमर्थ होता जा रहा है
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प्रवासी साहित्य के झंडाबरदार

पटना के कहानीकार रत्नेश्वर की कहानी अमेरिका और युनाइटेड किंगडम में रेडियो पर सुनाई जाएगी । क्या नवोदित लेखिका सोनाली मिश्रा ने ये सोचा होगा कि उसकी रचना को विस्तार का ये क्षितिज हासिल होगा लेकिन रेडियो स्पाइस ने इसको मुमकिन बनाया है । संभव है कि इस तरह के और भी कार्यक्रम चल रहे हों जिसकी जानकारी हमें नहीं है लेकिन जिसकी जानकारी हो उसकी हिंदी साहित्य जगत को नोटिस लेनी चाहिए और उनके प्रयासों की सराहना की जानी चाहिए
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संसद-विधानसभा में लोकतंत्र की भावना को पीछे की सीट भी नहीं, बस दर्शकदीर्घा नसीब

यह महिला जीत नहीं पाईं। जिन पाठकों को संसद की पूरी जानकारी नहीं है उनके लिए यह बता देना ठीक होगा कि भारतीय संसद में राज्यसभा को उच्च सदन कहा जाता है, और उसका दर्जा लोकसभा से ऊपर, अधिक सम्मान का माना जाता है। यह भी माना जाता है कि इस सदन में ऐसे लोगों को लाया जाना चाहिए जो कि आम चुनावों में जीतकर नहीं आ सकते, और जो चुनावी राजनीति से परे के हैं। ऐसे लोग राजनीतिक दलों के भी होते हैं, और गैरराजनीतिक भी होते हैं। पार्टियां भी अपने संगठन से परे के लोगों को भी राज्यसभा में भेजती हैं, और यह माना जाता है कि राज्यसभा में बहस का स्तर ऐसे लोगों की वजह से ऊंचा बने रहेगा
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डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल की रचनावली का प्रकाशन

समग्र के पाँचवें खंड में भारतीय साधकों, संतों, महापुरुषों, राजनेताओं और स्वतंत्रता-सेनानियों, साहित्यकारों की जीवनियाँ, क्रांतिकारी सुभाष के जीवन पर आधारित जीवनीपरक उपन्यास 'क्रांतिकारी सुभाष', लेखक का आत्मचरित (आत्मकथ्य) संयोजित किया गया है। क्रांतिकारी सुभाष' जीवनीपरक उपन्यास है, जो महान देशभक्त और स्वतंत्रता-सेनानी सुभाषचंद्र बोस के जीवन को आधार बनाकर लिखा गया है। आत्मकथ्य में डॉ. गिरिराजशरण ने अपने जीवन की उन घटनाओं का उल्लेख किया है
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