वर्ष 8 माह 5 दिन 18
 बुद्धिनाथ मिश्र को टाइम्स ऑफ़ इंडिया राजभाषा सम्मान     हिन्दू कालेज में दीपक सिन्हा स्मृति व्याख्यान     हिंदी को हृदय और पेट की भाषा बनाने की जरूरत है : मृदुला सिन्हा     व्यंग्य संगोष्ठी तथा गोइन्का साहित्य पुरस्कार     हिंदी सदैव कमज़ोर मनुष्य का पक्षधर रही है     2010 का सुब्रह्मण्य भारती पुरस्कार डा. श्याम सुन्दर दुबे को     डॉ. मोटुरी सत्यनारायण पुरस्कार-2011   

     
आधुनिक वेताल कथा अतिक्रमण ये भी एक दृष्टिकोण समय-समय पर ओडिया-माटी बाअदब-बामुलाहिजा धारिणी सिनेमा के शिखर टेक-वर्ल्ड आखर-अनंत
जनमन
प्रफुल्ल कोलख्यान
प्रफुल्ल कोलख्यान
समाधान
जया केतकी
जया केतकी
बाअदब-बामुलाहिजा
फजल इमाम मलिक
फजल इमाम मलिक
धारिणी
विपिन चौधरी
विपिन चौधरी
सिनेमा के शिखर
प्रमोद कुमार पांडे
प्रमोद कुमार पांडे
आखर-अनंत
ओमप्रकाश कश्यप
ओमप्रकाश कश्यप
रोज़-रोज़
दयानंद पांडे
दयानंद पांडे


स्याह सफ़ेदआधुनिक वेताल कथाअतिक्रमणये भी एक दृष्टिकोणसमय-समय परओडिया-माटीझरोखाबाअदब-बामुलाहिजाधारिणीब्लॉग गाथासमांतरपुस्तक-संसारविचारार्थनया नज़रिया
<< 1 2 3 4 >>

गांधी के नाम के हिज्जे और गांधी की सोच पर अमल
जो लोग मोदी के इतिहास को गिनाते हुए उन्हें आज भी कोसते चलना चाहते हैं, उनको अपने इस हक के साथ-साथ यह भी देखना होगा कि मोदी ने घंटे भर के अपने भाषण में कम से कम दर्जनभर बार गांधी का नाम लिया, और बालिकाओं के लिए शौचालयों को, देश में सफाई को उन्होंने लालकिले से लेकर न्यूयॉर्क तक महत्वपूर्ण माना और बताया ... पढ़िए
0 टिप्पणी, स्याह सफ़ेद, (3 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 1 अक्टूबर 2014,
सुनील कुमार

सांप्रदायिकता से कौन लड़ना चाहता है?
एक चुनाव से दूसरा चुनाव और एक उपचुनाव से दूसरा उपचुनाव यही आज की राजनीति के लक्ष्य और संधान हैं। इसमें जनता की गोलबंदी जनता के एजेंडे पर नहीं, उसके विरूद्ध की जा रही है। जनता को यह नहीं बताया जा रहा है कि आखिर उसके सपनों की दुनिया कैसे बनेगी, कैसे भारत को एक समर्थ देश के रूप में तब्दील किया जा सकता है? उसे पंथ के नारों पर भड़काकर, उसके धर्म से विलग किया जा रहा है ... पढ़िए
0 टिप्पणी, अतिक्रमण, (2 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 1 अक्टूबर 2014,
संजय द्विवेदी

सहाराश्री कहीं भी रहें, दिल तो गोरखपुर में
बात बहुत पुरानी नहीं है । 18 अप्रैल , 2010 को सहाराश्री गोरखपुर गए थे । वहां के लोगों ने तब उन के सम्मान में गोरखपुर क्लब में एक समारोह आयोजित किया था । कई सारी संस्थाओं ने मिल कर यह आयोजन किया था । तब राष्ट्रीय सहारा ने एक विशेष परिशिष्ट निकाला था सहाराश्री के अभिनंदन में । उस सप्लीमेंट में तब मैं ने भी एक लेख लिखा था । वह आज भी पूरी तरह प्रासंगिक है ... पढ़िए
0 टिप्पणी, रोज़-रोज़, (0 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 1 अक्टूबर 2014,
दयानंद पांडेय

अब मत चला कुल्हाड़ी
0 टिप्पणी, बचपन > बालगीत, (18 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 30 सितम्बर 2014,
प्रभुदयाल श्रीवास्तव

वापसी
याद रख कि गरीबी वह सोम रस है जिसे गुनाहों के सोड़े में मिलाकर पीने से अपचन का आभास नहीं होता। और यह भी समझ ले कि मात्र गरीबी ही मनुष्य को चोर, उच्चक्का नहीं बनाती। इसकी बहुत कुछ जिम्मेदारी उन हालातों की होती हैं जिसमें गरीबों को ढ़केल दिया जाता है तुम जैसे सम्पन्नों द्वारा ... पढ़िए
0 टिप्पणी, कहानी, (10 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 30 सितम्बर 2014,
भूपेंद्र कुमार दवे

कामगार औरतें
0 टिप्पणी, कविता, (19 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 29 सितम्बर 2014,
सुशांत सुप्रिय

अम्मा और अम्मा
माता अमृतानंदमयी हर किसी को गले लगाकर, लिपटाकर उनको अपना प्रेम और आशीर्वाद देती हैं। कुछ लोगों को यह बात अटपटी भी लग सकती है कि हम दो बिल्कुल ही अलग-अलग किस्म की महिलाओं को एक साथ यहां पर लिख रहे हैं, और यह बात इन दोनों में से जो महिला विवादहीन और भली है, उसके लिए अपमान की है। लेकिन हमारा मानना है कि दो अलग-अलग किस्म के लोगों को एक साथ देखने पर ही अच्छे लोग और अधिक अच्छे दिखते हैं ... पढ़िए
0 टिप्पणी, स्याह सफ़ेद, (16 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 29 सितम्बर 2014,
सुनील कुमार

धरा गए शंभूजी
वह लेवी वसूलने पटना आया था। शंभू अरविन्द उर्फ देवकुमार सिंह के शिष्य हैं, जो एक लम्बे समय से लातेहार में जड़ जमाए हुए हैं। कहावत है कि गुरु अगर गुड़ है तो चेला चीनी होता ही है। तो शंभू जी भी बड़े-बड़े वारदातों को अंजाम देंगे इसमें शक की गुंजाइश कहां है ? अरविन्द जी उर्फ देवकुमार जी की पत्नी 27.50 लाख रुपये के साथ पकड़ाई थीं ... पढ़िए
0 टिप्पणी, प्रसंगवश, (26 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 28 सितम्बर 2014,
विश्वजीत सेन

मुख़्तारी तो ऐसे भी दिख जाती है, आंगन में बंदूकें बोना ठीक नहीं
पवन कुमार की इन ग़ज़लों के आंचल में, इन ग़ज़लों की गोद में, इन ग़ज़लों की पलकों में इत्मीनान की वह धरती और वह आसमान इस आसानी से विस्तार लेता जाता है कि आप बहुत मुतमइन हो कर अपने आप को इन के हवाले कर देते हैं। पवन कुमार के शेर, आप के शेर बन कर आप की जुबान पर अपना रास्ता तय करते मिलते हैं। लगता है यह बात पवन कुमार की ही नहीं आप की अपनी भी है। यह दुःख, यह ज़ज़्बात, यह टीस और चुभन जो फरियाद बन कर पवन कुमार के शेरों में उपस्थित मिलती है ... पढ़िए
0 टिप्पणी, रोज़-रोज़, (24 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 28 सितम्बर 2014,
दयानंद पांडेय

मेक इन इंडिया की सोच और हकीकत
ग्राहकों के हक की हिफाजत के लिए बने कानूनों पर कोई अमल इस देश में नहीं होता, और लोग कम्पनियों और दुकानदारों पर मुश्किल से भरोसा कर पाते हैं। दूसरी तरफ राष्ट्रीय कौशल विकास कार्यक्रम के तहत भी लोगों को तरह-तरह के हुनर सिखाने का काम बहुत फर्जी तरीके से चल रहा है, और कागजी खानापूरी अधिक हो रही है ... पढ़िए
0 टिप्पणी, स्याह सफ़ेद, (31 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 27 सितम्बर 2014,
सुनील कुमार

बुद्धिनाथ मिश्र को टाइम्स ऑफ़ इंडिया राजभाषा सम्मान
नई दिल्ली । इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के सभागार में टाइम्स ऑफ़ इंडिया समूह द्वारा आयोजित भव्य समारोह में सुप्रसिद्ध गीतकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र को ‘राजभाषा पुरस्कार’ से सम्मानित किया गया। ... पढ़िए
0 टिप्पणी, हलचल, (27 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 27 सितम्बर 2014,
-

कुरआन को गा गा कर पढ़ना
दुनिया कि किसी और किताब के संबंधित ऐसा किया जाता है? और उस के बाद उस तथ्य को भी सामने लाएं कि इस किताब के अर्थ से जिस तरह हम वंचित है, किया उस की मिसाल कहीं और भी मिल सकती है?। और फिर सोचिएं कि जिन लोगों के संबंधित कहा गया है कि। यही वे लोग है जिन्होंने अपने रब की आयतों का और उससे मिलन का इनकार किया। अतः उनके कर्म ग़ारत हो गए ... पढ़िए
0 टिप्पणी, (25 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 26 सितम्बर 2014,
जी एम परवेज़

ग्लोबल का बल और राष्ट्रीयता
प्रसंगवश, `काल' के साथ हिंदी कविता के नागार्जुन का यह बरताव `देश' के संदर्भ में भी जारी रहता है। इसीलिए नागार्जुन समाज, जाति और राष्ट्र से जुड़े रहकर ही किसी भी वैश्विक-बोध से तदाकार होते हैं। जैसे वे सीधे शाश्वत से संवाद नहीं करते हैं, वैसे ही सीधे विश्व-मानव भी नहीं हो जाते हैं। शंभुनाथ ठीक कहते हैं कि `कवि की चिंता-भावना की परिधि कभी भी किसी खास देश-प्रदेश तक सीमित नहीं हो सकती। कवि की संवेदना का मुख्य वैश्विक जरूर होता है ... पढ़िए
0 टिप्पणी, जनमन, (28 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 26 सितम्बर 2014,
प्रफुल्ल कोलख्यान

छितामणि की घूरती आंखें
पनी रिपोर्ट में पुलिस का कहना था कि छोटोपेलिया गांव में कुछ संदिग्धों को पकड़ने के क्रम में छितामणि मूमरू को मामूली चोट आई थी और आंख तो कतई क्षतिग्रस्त नहीं हुई थी। सरकारी वकील कनिष्क बसु ने कहा कि छितामणि की आपत्ति न रहने की स्थिति में मुकदमा खारिज कर दिया गया। इस प्रकरण का विश्लेषण विभिन्न बिन्दुओं से किया जा सकता है। जैसे हो सकता है छोटोपेलिया गांव में 2008 में माओवादियों की टोह में गई पुलिस की छितामणि से वाकई मामूली हाथापाई हुई हो ... पढ़िए
0 टिप्पणी, प्रसंगवश, (29 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 25 सितम्बर 2014,
विश्वजीत सेन

हिन्दू कालेज में दीपक सिन्हा स्मृति व्याख्यान
दिल्ली। कुछ विद्वान पूरा का पूरा भक्ति काव्य आधुनिकता के साँचे में "कन्वर्ट " कर देना चाहते हैं, जबकि भक्ति काव्य की विशेषता यह है कि उसमे आधुनिक भाव बोध से मेल वालीं बहुत सारीं बातें हैं पर सारा का सारा भक्ति काल आधुनिक नहीं हो सकता, किसी भी रूप में नहीं। डॉ सिंह हिन्दू कालेज में दीपक सिन्हा स्मृति व्याख्यानमाला में बोल ... पढ़िए
0 टिप्पणी, हलचल, (37 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 25 सितम्बर 2014,
डॉ विमलेन्दु तीर्थंकर

सातवीं सदी का एक आदेशपत्र
अन्याथ परिणाम गंभीर हो सकते हैं। सभी अगरबत्ती बनाने वाले कारखानों को सख्त चेतावनी दी जाती है कि वे मंदिरों के लिए शुद्ध सनातनी अगरबत्ती बनायें । उस पर चंदन के अलावा किसी भी अन्य वस्तु का लेप न हो । अगरबत्ती में प्रयोग की जाने वाली लकड़ी भी चंदन की ही हो । यह विशेष ध्यान रखा जाये कि वह चंदन किसी विधर्मी के वन का न हो । संस्कृतियों में सुगंध का आदान प्रदान बिल्कुल सहन नहीं किया जायेगा ... पढ़िए
0 टिप्पणी, व्यंग्य, (45 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 24 सितम्बर 2014,
शशिकांत सिंह शशि

याद रखें कि लोकतंत्र के चुनाव फोटोशॉप से नहीं लड़े जा सकते
एक चुनाव जीतने के लिए, या दूसरे चुनाव की तैयारी में किसी एक प्रदेश में या पूरे देश में धार्मिक और साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण करने की कोशिशों को भी मोदी के भक्त अनदेखा कर रहे हैं, और सैकड़ों बरस पहले लिखी गई एक बात को भी वे अनदेखा कर रहे हैं कि समझदार को निंदक नियरे राखना चाहिए। मोदी के समर्थन में कीर्तन करने वालों को यह समझना चाहिए कि अगले पांच बरस मोदी को उनके समर्थन की जितनी जरूरत नहीं है ... पढ़िए
0 टिप्पणी, स्याह सफ़ेद, (31 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 24 सितम्बर 2014,
सुनील कुमार

शिक्षा, राजनीति और मोदी
प्रधानमंत्री इसीलिए शिक्षक दिवस पर भाषण नहीं देते, संवाद करते हैं। बच्चों के सवालों के जवाब देते हैं। इससे लोकतंत्र मजबूत होता है। टेक्नालाजी ने इसे संभव किया है, नरेंद्र मोदी उसे प्रयोग में लाते हैं। वे टेक्नालाजी चपल हैं, मीडिया का इस्तेमाल जानते हैं। संवाद की भाषा जानते हैं। संवाद से सार्थक विमर्श रचना भी जानते हैं ... पढ़िए
0 टिप्पणी, अतिक्रमण, (43 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 23 सितम्बर 2014,
संजय द्विवेदी

घूँघट
बेटियों को स्कूल भी नहीं भेजा जाता था। खिड़की से झाँक भी नहीं सकती थी वे अब तो लड़कियाँ लड़कों को अच्छे तरह से देख नहीं लें, हाँ नहीं कहती हैं। तू कतराता क्यों है? लाखों में एक है तू मेरे सुन्दर बेटे को भला कौन पसंद नहीं करेगा? तुझे बस उसको अपनी सूरत दिखानी है या उससे बात करनी है ... पढ़िए
0 टिप्पणी, लघुकथा, (60 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 23 सितम्बर 2014,
प्राण शर्मा

तनाव से गुजरते महाराष्ट्र के दो सबसे स्वाभाविक गठबंधन
बाल ठाकरे और अटल बिहारी बाजपेयी के वक्त से चले आ रहा यह गठबंधन बड़ा ही स्वाभाविक है, क्योंकि हिन्दुत्व की आक्रामकता की धार का फर्क होने के बावजूद इन दोनों का मिजाज एक है, और महाराष्ट्र में जिन पार्टियों या जिस गठबंधन से इनका मुकाबला रहता है, उनके परंपरागत वोटरों के खिलाफ यही धार काम भी आती है ... पढ़िए
0 टिप्पणी, स्याह सफ़ेद, (37 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 22 सितम्बर 2014,
सुनील कुमार

सरकारी पाखंड का मूलाधार चक्र!
जब सचिव स्वयं इस विभाग में आकर `दण्डित' अनुभव करता है, तब उसका उद्देश्य अपने पद के दायित्वों का निर्वाह करना न होकर किसी तरह इस सरकारी दण्डकारण्य से निकल भागना होता है । जिस प्रेरणा और प्रोत्साहन से राजभाषा हिन्दी को आगे बढ़ाने की अपेक्षा गयी, वह ऊपर से नीचे की ओर बहता है । राजभाषा विभाग में निराशा और अकर्मण्यता का वातावरण ऊपर से नीचे तक ऐसा फैला है कि उसकी दिशाहीनता का असर पूरी सरकारी मशीनरी पर पड़ रही है । कभी-कभी तो लगता है,जैसे यह विभाग अपने मूल उद्देश्य के विलकुल विपरीत भूमिका निभा रहा है ... पढ़िए
0 टिप्पणी, जाग मछिन्दर गोरख आया, (42 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 22 सितम्बर 2014,
डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र

<< 1 2 3 4 >>

Everyday, New Posts, Like, News, Poet, Story, Gazal, Song, novel, blog, Article, music, lyrics, books, review,conference, training etc. On srijangatha Magazine


स्याह सफ़ेद पुस्तक-संसार नया नज़रिया विचारार्थ कभी नीम-नीम कभी शहद-शहद
जाग मछिन्दर गोरख आया
बुद्धिनाथ मिश्र
बुद्धिनाथ मिश्र
विचारार्थ
बृजकिशोर कुठियाला
बृजकिशोर कुठियाला
स्याह सफ़ेद
सुनील कुमार
सुनील कुमार
समय-समय पर
अखिलेश शुक्ल
अखिलेश शुक्ल
ओडिया-माटी
दिनेश माली
दिनेश माली
नया नज़रिया
जगदीश्वर चतुर्वेदी
जगदीश्वर चतुर्वेदी
अतिक्रमण
संजय द्विवेदी
संजय द्विवेदी