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 बेगम अख़्तर को याद किया...     चतुर्थ अंतरराष्ट्रीय परिकल्पना ब्लॉगोत्सव भूटान में     लमही सम्मान इस बार तारिक छतारी को     कैलाश सत्यार्थी को नोबल पुरस्कार     नदी संरक्षण के लिए दिल्ली में होगा मीडिया जुटान     साहित्य मंथन सृजन पुरस्कार     मध्यप्रदेश के राज्यपाल श्री रामनरेश यादव के करकमलों द्वारा संतोष श्रीवास्तव पुरस्कृत   

     
आधुनिक वेताल कथा अतिक्रमण ये भी एक दृष्टिकोण समय-समय पर ओडिया-माटी बाअदब-बामुलाहिजा धारिणी सिनेमा के शिखर टेक-वर्ल्ड आखर-अनंत
जनमन
प्रफुल्ल कोलख्यान
प्रफुल्ल कोलख्यान
समाधान
जया केतकी
जया केतकी
बाअदब-बामुलाहिजा
फजल इमाम मलिक
फजल इमाम मलिक
धारिणी
विपिन चौधरी
विपिन चौधरी
सिनेमा के शिखर
प्रमोद कुमार पांडे
प्रमोद कुमार पांडे
आखर-अनंत
ओमप्रकाश कश्यप
ओमप्रकाश कश्यप
रोज़-रोज़
दयानंद पांडे
दयानंद पांडे


स्याह सफ़ेदआधुनिक वेताल कथाअतिक्रमणये भी एक दृष्टिकोणसमय-समय परओडिया-माटीझरोखाबाअदब-बामुलाहिजाधारिणीब्लॉग गाथासमांतरपुस्तक-संसारविचारार्थनया नज़रिया
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किनके चंगुल में है भारतीय मुसलमान
बताइए जिस शख्स ने अपने दामाद को मंत्री बनवाने के लिए समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव से हाथ मिलाया औऱ फिर उन्हें छोड़ दिया...बताइए जिस शख्स पर जामा मस्जिद की तमाम प्रॉपर्टी को लेकर आरोप हैं...वह शख्स अचानक देश के 35 करोड़ (सरकारी आंकड़ा...हालांकि यह ज्यादा है) मुसलमानों का नेता बनने का ख्वाब देखने लगा ... पढ़िए
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यूसुफ किरमानी

झूठ का मुँह काला
वो सॉकेट से डिस्कनेक्ट है। हैरत में पड़ जाती है वह। एक दराज़ से उसको पति का मोबाइल नंबर मिल जाता है। भाग कर वह पड़ोसन के घर जाती है। उसकी लैंड लाइन से पति का मोबाइल नंबर मिलाती है ... पढ़िए
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प्राण शर्मा

मोदी सरकार पर चोरों को बचाने का आरोप विपक्ष का नहीं, सुप्रीम कोर्ट का है
आगे की जांच का फैसला खुद तय करना तय किया है, वह भारतीय लोकतंत्र में एक असाधारण घटना है। यहां पर कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच कामों का बंटवारा संविधान के भीतर शब्दों और भावना दोनों में ही काफी कुछ किया हुआ है। लेकिन जब-जब सरकार खुलकर कोई गलत काम करती है, तो अदालती दखल का इतिहास भी भारत में रहा है ... पढ़िए
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सुनील कुमार

बेगम अख़्तर को याद किया...
नई दिल्ली। बेगम अख़्तर जितनी बड़ी गायिका थीं, उतनी बड़ी ही इंसान थीं। यह बात लेखक और फ़िल्मकार शरद दत्त ने बेगम अख़्तर को समर्पित सन्निधि की संगोष्ठी में अध्यक्षीय भाषण के दौरान कही। गांधी हिंदुस्तानी साहित्य सभा और विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान की ओर से रविवार को सन्निधि सभागार में आयोजित संगोष्ठी में दत्त ने बेगम अख़्तर के साथ व्यतीत क्षणों का विस्तार से ज़िक्र किया, ... पढ़िए
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हबूचंद और गबूचंद
प्रधानमंत्री गबूचंद की आंखों में अंधेरा छा गया। उसने तुरंत अपने मंत्रीयों की एक सभा बुलाई। उसने सभी मंत्रीयों से अलग - अलग इस समस्या पर उनका मत लिया कि राज्य भर के कचरा को कहां फिकवाया जावे।राज्य के मंत्रीयों ने अलग - अलग सलाह दी। किसी ने कहा की राजा को राजमहल से कहीं बाहर नहीं जाने दो ... पढ़िए
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डॉ. विजय चौरसिया

आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी का आलोचना विवेक और इतिहास के सवाल
प्राचीन भारत के ज्ञान-शास्त्र की लगभग प्रत्येक शाखा से उनका न सिर्फ गहरा परिचय, बल्कि गहरा लगाव भी था। कहना न होगा कि लगाव से एक तरह का मोह भी उत्पन्न हो ही जाता है। भारतीय विद्या मोह की इस स्थिति के प्रति कदम-कदम पर सावधान करती आयी है। संभवत: इसीलिए ‘निर्लिप्तता’ की इतनी बड़ी महिमा मानी गई है। पूरी विनम्रता के साथ यह कहना जरूरी है कि भारतीय विद्या से गहरा लगाव कई बार उन्हें मोहग्रस्त भी करता है। यह समझना जितना आसान आज है ... पढ़िए
0 टिप्पणी, जनमन, (15 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 30 अक्टूबर 2014,
प्रफुल्ल कोलख्यान

परीकथाओं का भविष्य : भविष्य की विज्ञानकथाएं
चूंकि मनुष्य सामाजिक प्राणी है, वह स्वयं को बाहर की दुनिया से अलग कर ले फिर भी, उसके भीतर पैठा हुआ सामाजिक बोध उसे शेष समाज से जोड़े रखता है। इस कारण उसके साहित्य और कला की दुनिया की ओर वापस लौटने की संभावना सदैव बनी रहती है। मानवमन की इस प्रवृत्ति पर नियंत्रण रखने तथा कमाई हेतु आज्ञाकारी उपभोक्ता में ढालने के लिए नई तकनीक ने आभासी दुनिया सृजित करने में सक्षम अनेक अवतार सृजित किए हैं। उनमें मैत्री केवल तस्वीरों से और विचार कंप्यूटर स्क्रीनों के सामने व्यक्त किए जाते हैं ... पढ़िए
0 टिप्पणी, आखर-अनंत, (14 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 30 अक्टूबर 2014,
ओमप्रकाश कश्यप

जांच से बचने का कांग्रेस का तर्क बहुत ही शर्मनाक
लगता है कि वे बदले की भावना से यह निर्णय करना चाहते हैं। अल्वी ने कहा कि उन्हें (भाजपा) याद रखना चाहिए कि लोकतांत्रिक प्रणाली में कोई स्थायी सरकार नहीं होती। कभी वे सत्ता में होते हैं तो कभी विपक्ष में, उन्हें हमारे देश को पाकिस्तान की तरह नहीं बनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब हमारी सरकार थी तो हमने तत्कालीन प्रधानमंत्री के दामाद की जांच नहीं की। हम कोई ऐसी परंपरा नहीं बनाना चाहते थे कि लोग कहें कि हम बदले की भावना से काम कर रहे हैं ... पढ़िए
0 टिप्पणी, स्याह सफ़ेद, (13 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 29 अक्टूबर 2014,
सुनील कुमार

न्यायपालिका पर लालू, मायावती, ए राजा, जयललिता को विश्वास नहीं होगा तो क्या हम को -आप को होगा?
हमारा पाकिस्तान से राजनीतिक और सरहदी रिश्ता हमेशा ही से खटाई में रहा है, लेकिन आतंकवाद, कश्मीर के बावजूद बाक़ी रिश्ते पानी की तरह चलते रहे हैं। और तमाम मुश्किलों के बावजूद इस के बरक्स हमारा सांस्कृतिक और व्यापारिक रिश्ता सर्वदा से पुरसुकून और परवाज़ पाता रहा है। क्रिकेट डिप्लोमेसी की तरह व्यावसायिक और सांस्कृतिक रिश्ते कभी स्थगित नहीं हुए ... पढ़िए
0 टिप्पणी, रोज़-रोज़, (17 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 29 अक्टूबर 2014,
दयानंद पांडेय

“हम गवाही देंगे” पर एक दृष्टि
‘दादी दूर नहीं है’ कविता में कवि अपने दादा जी व उनके भाई बिना मजदूरी के चमड़े का चड़स तथा रहट चलाने की यादें ताजा करते हैं , वहीं दादी रेटिया चलाकर ऊन कात कर कंबल बनाती थी , भादों की दूज पर रामदेव के मेले में धोक चढ़ाकर प्रसाद बांटती थी। एक दिन दादी भगवान के घर चली गईं और अब जब उनके बेटे अपनी दादी से बतियाते है ... पढ़िए
0 टिप्पणी, पुस्तकायन, (65 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 28 अक्टूबर 2014,
दिनेश माली

मोदी और मीडिया के बीच मिलने की शुरूआत हुई...
मीडिया की यह मजबूरी रही कि अपने खर्च पर उसे अपने दर्जन-दर्जन भर लोगों को अमरीका भेजना पड़ा, और मोदी के पल-पल को अपने चैनलों पर दिखाना पड़ा। यह सब कुछ एक बहुत नए अंदाज का मीडिया संबंध था, और है। अंग्रेजी में जिसे जमी हुई बर्फ को तोडऩा कहते हैं, वैसी ही इस असहज स्थिति को आज भाजपा के दीवाली मिलन पर तोडऩे का एक मौका दोनों तरफ के लोगों को मिला ... पढ़िए
0 टिप्पणी, स्याह सफ़ेद, (22 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 27 अक्टूबर 2014,
सुनील कुमार

भूले-बिसरे: सच्चे कामरेड के दिल से निकली आवाज
एक ओर जहां उनकी कविता जनमुखी बन रही थी वहीं दूसरी ओर वह अन्तमरुखता की ओर बढ़ रहे थे जैसा कि उन्होंने खुद ‘हमारे समयों में’ की भूमिका में स्वीकार किया। दोनों परस्पर विरोधी चिंतन थे, पर इसकी पर्याप्त वजहें थी। इस दौरान पाश ट्राटस्कीवाद का अध्ययन कर रहे थे और भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन की विसंगतियों के बारे में भी सचेत हो रहे थे। उनकी ‘कामरेड से बातचीत’ को इस चेतना की उपज के रूप में देखा जाना चाहिए ... पढ़िए
0 टिप्पणी, प्रसंगवश, (32 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 27 अक्टूबर 2014,
विश्वजीत सेन

जब हम जवॉ होंगे
इसलिए हमने सोचा कि इस युवा वर्ष पर लगे हाथ जवानी पर रिसर्च ही कर ली जाये।किताबें छान मारी,लोगों के दिमागों को चाट लिया,लेकिन परिणाम वही ठाक के तीन पात! किसी ने बहुत ही तीर मारा तो कह दिया साहब जवानी दिवानी नही अंधी होती है।कोई साहब और चार कदम आगे बढ़े और कहा :जवानी का देवता क्यूपिड़ अंधा होता है।फिर इस उमर में आदमी भले बुरे की तमीज भूल जाता है ... पढ़िए
0 टिप्पणी, व्यंग्य, (37 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 26 अक्टूबर 2014,
डॉ. विजय चौरसिया

स्वच्छता अभियान में जीवन भैया
टैªक्टर का भाड़ा? यह एक यक्ष प्रश्न था। मिश्रा जी को काम याद आ गया। सिंह जी के घर से फोन आ गया। गुप्ता जी के सिर में तेज दर्द होने लगा। अर्थात सभी चले गये। रह गये जीवन भैया उन्होंने ट्रेक्टर वाले को मोल-जोल करने के बाद बारह सौ रुपये दिये। गांधी बाबा की जय---मोदी जी की जय--स्वच्छ भारत अमर रहे। गगन भेदी नारों के साथ टैªक्टर को विदा किया गया। अपने-अपने मोबाइल से सबने उसकी फोटो उतारी ... पढ़िए
0 टिप्पणी, व्यंग्य, (39 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 25 अक्टूबर 2014,
शशिकांत सिंह शशि

राजनीति में संस्कृति का संकट
इनका उद्देश्य हिंदू राष्ट्र की स्थापना नहीं है- हिंदू धर्म की ठेकेदारी करना है। डॉ लोहिया कहते थे- धर्म एक दीर्घकालीन राजनीति है और राजनीति एक अल्पकालीन धर्म। यह धर्म अव्याख्येय है और अपरिभाषित भी। अब डॉ लोहिया, जयप्रकाश नारायण का जमाना तो रहा नहीं कि ‘बहस’ से सत्य कमाने का दम-खम दिखाया जाए ... पढ़िए
0 टिप्पणी, आलेख, (49 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 24 अक्टूबर 2014,
कृष्णदत्त पालीवाल

लक्ष्मी पूजा के दिन तस्वीरों, प्रतिमाओं से परे की बात
हम आज इस मौके पर भारत की जीती-जागती लक्ष्मियों के बारे में बात करना चाहते हैं। जो लोग इस दिन पूजा की तैयारी में कई दिन से साज-सज्जा कर रहे होंगे, वे भी अपने घर की अजन्मी लक्ष्मी से लेकर पैदा हो चुकी लक्ष्मी तक, गृहलक्ष्मी से लेकर घर आई बहू तक, और घर में बुजुर्ग बच गई बूढ़ी लक्ष्मी मां तक से कैसा बर्ताव करते हैं, यह सोचने की बात है ... पढ़िए
0 टिप्पणी, स्याह सफ़ेद, (47 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 23 अक्टूबर 2014,
सुनील कुमार

प्राण शर्मा की ग़ज़ल
0 टिप्पणी, छंद > ग़ज़ल, (64 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 22 अक्टूबर 2014,
प्राण शर्मा

अरुण यह मधुमय देश हमारा
महाभारत युद्ध में दुर्योधन की ओर से लड़ी थी,क्योंकि दुर्योधन प्राग्ज्योतिषपुर नरेश भगदत्त का जामाता था।द्वारकाधीश श्रीकृष्ण की पटरानी रुक्मिणी यहाँ के किरात राजा भीष्मक की पुत्री थी। भालुकपुंग असम और अरुणाचल की सीमा पर बसा एक छोटा-सा कस्बा है,जिसे बाणासुर के पौत्र भालुक ने बसाया था ... पढ़िए
0 टिप्पणी, जाग मछिन्दर गोरख आया, (61 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 22 अक्टूबर 2014,
डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र

स्वार्थ की संवेदना
किसी की मौत का समाचार लिखा हुआ था। जिसके कारण आज सायंकाल तीन बजे से आफिस की छुट्टी हो रही थी। उसने यह कभी नहीं सोचा था कि एक खूबसूरत औरत की बच्ची की मौत पर भी आफिस दो घंटे पहले बंद हो जायेगा।तभी तिवारी बाबू जो सोनी जी के पास खड़े नोटिस बोर्ड़ में लगे उस समाचार को पढ़ रहा था! तपाक से बोल उठे - क्या मिसेज नंदा की हार्ट अटैक से मृत्यू हो गई ... पढ़िए
0 टिप्पणी, कहानी, (79 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 21 अक्टूबर 2014,
डॉ. विजय चौरसिया

धन्यवाद-ज्ञापन
0 टिप्पणी, कविता, (56 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 21 अक्टूबर 2014,
सुशांत सुप्रिय

जयललिताओं के हाथों में खेलते लोकतंत्र की कहानी
एक हाथ लूटता है, और दूसरे हाथ रॉबिन हुड की तरह गरीबों को बांटता है, तो यह कैसा लोकतंत्र है? क्या लूट का कुछ हिस्सा जनता को बांट देना जनतंत्र हो सकता है? दूसरी बात यह कि चुनाव के वक्त जितने बड़े पैमाने पर वोटों की खरीदी होती है, जाति और धर्म के आधार पर, मिलते-जुलते नाम के आधार पर धोखा देने के लिए फर्जी उम्मीदवार खड़े किए जाते हैं, वोटरों को तोहफे बांटे जाते हैं, शराब बांटी जाती है, नगदी बांटी जाती है, और विपक्षी उम्मीदवार के कार्यकर्ताओं को खरीदा जाता है, ... पढ़िए
0 टिप्पणी, स्याह सफ़ेद, (55 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 20 अक्टूबर 2014,
सुनील कुमार

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