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साहित्य, संस्कृति व भाषा का अन्तरराष्ट्रीय मंच


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साहित्य में गाँव की वह फगुनहट!

उनकी पुस्तकों में दस उपन्यास,नौ कहानी संग्रह,नौ निबंध संग्रह, तेरह समीक्षा ग्रन्थ, छह कविता संग्रह हिंदी में और सात पुस्तकें भोजपुरी में प्रकाशित हैं। उनका 'फिर बैतालवा डार पर' अपने समय काफी चर्चित हुआ था। इसके अलावा 'आंगन के बंदनवार' 'आम रास्ता नहीं है''जीवन अज्ञान का गणित है' 'देहरी के पार' आदि एक से एक पुस्तकें हैं,जिनके माध्यम से उनके दौर के ग्रामीण समाज को ठीक से देखा-परख जा सकता है
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महेन्द्रभटनागर रांगेय राघव, अमृतराय और धर्मवीर भारती की पीढ़ी के लेखक हैं

प्रेमचंद पर महेन्द्रभटनागर के काम को वस्तुतः इस व्यापक परिप्रेक्ष्य में ही देखा जाना चाहिए। अभी पिछले दिनों उनका ग्रंथ ‘सामयिक परिदृश्य और कथा-स्रष्टा प्रेमचंद’ (‘प्रेमचंद-समग्र’) आया है। इसमें उनकी पहली पुस्तक भी समाहित है। स्पष्ट है कि इन पचास से भी अधिक बरसों में प्रेमचंद के प्रति महेन्द्रभटनागर की दिलचस्पी बनी रही है
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जयललिता सोचे-समझे शून्य की गारंटी करके गईं हैं...

दशकों पहले राजनीति शुरू करने के बाद पलटकर नहीं देखा, और एक महिला होने को उन्होंने कभी अपने आड़े नहीं आने दिया। इसी तरह प्रदेश के गरीबों के लिए अनगिनत सहायता-योजनाओं को लागू करते हुए उन्हें कभी इस बात की परवाह नहीं रही कि अनुपातहीन संपत्ति जुटाने की तोहमत उन पर लगती रहीं, और अदालत से उन्हें इसी बात के लिए सजा भी हुई। अपनी संपन्नता, और लोकप्रियता पाने के लिए विपन्नता की मदद का मिलाजुला काम एक अनोखा मेल था
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बच्चों पर बोझ बनता पीएम पद छोड़ दिया न्यूजीलैंड पीएम ने

भारत में तो किसी वार्ड या पंचायत में भी जब आरक्षण के चलते किसी आदमी को अपनी सीट खोनी पड़ती है, और अगर वह सीट महिला के लिए आरक्षित हो जाती है, तो रातों-रात हलफनामा देकर पत्नी के नाम के साथ पति का नाम जोड़ दिया जाता है, और उसे पार्षद या पंच बनाने का काम शुरू हो जाता है। भारतीय राजनीति में जो ताजा शब्दावली है, उसमें सरपंच-पति को सांप, और पंच-पति को पाप भी कहा जाने लगा है, और यह कुनबापरस्ती कम होते दिखती नहीं है
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बदलते वक्त में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

न्यूज चैनलों और अन्य टीवी चैनलों के स्वनियमन का मैकेनिज्म है लेकिन उसके दायरे को बढ़ाते हिए उसको मजबूत किए जाने की जरूरत है। मुंबई पर हुए आतंकी हमले के वक्त न्यूज चैनलों के कवरजे को लेकर सवाल उठे थे जिसके बाद सरकार ने आतंकवादी हमले के दौरान कवरेज को लेकर एक गाइडलाइन तो बना दी थी लेकिन न्यूज चैनलों के सबसे पहले की आपाधापी में गड़बड़ी हो जाती है। इसी तरह से अगर देखें तो हमारे चैनलों ने इस्लामिक स्टेट के बगदादी को कई बार मारा और फिर कई बार जिंदा कर दिया। उससे जुड़ी वारदातों को इस तरह से मिर्च मसाला लगाकर पेश किया जाता है जैसे लगता है कि कोई क्राइम थ्रिलर चल रहा हो
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नोटबंदी को देशभक्ति से जोडऩे के बजाय विश्लेषण की जरूरत

सरकारी आंकड़े ही बताते हैं कि आज देश में चार फीसदी लोगों के पास ही क्रेडिट कार्ड है। डेबिट कार्ड हो सकता है कि एक चौथाई आबादी के पास हो, लेकिन छोटी खरीददारी और छोटी-छोटी मजदूरी का भुगतान प्लास्टिक करेंसी से होने में खासा वक्त लगेगा, और तब तक रोज कमाने-खाने वाले ऐसे छोटे लोगों का इतना नुकसान हो चुका रहेगा, कि उसकी भरपाई आने वाले वक्त में कोई नहीं कर पाएंगे
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अहमदाबाद इंटरनेशनल लिट्रेचर फेस्टिवल का भव्य आयोजन

अहमदाबाद। अहमदाबाद मैनेजमेंट असोसिएशन के विशाल सभागार में अहमदाबाद इंटरनेशनल लिट्रेचर फेस्टिवल का भव्य आयोजन किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ सुविख्यात गुजराती साहित्यकार रघुवीर चौधरी, संगीत नाट्य अकादमी के चेयरमेन योगेश गढ़वी, बॉलीवुड से फिल्म निर्देशक मधुर भंडारकर, ब्रिटिश डेप्युटी हाई कमिश्नर जेफ़ वेन, कुमायूँ फेस्टिवल के निदेशक सुमन्त बत्रा एवं एआईएलएफ के निदेशक उमाशंकर यादव ने दीप प्रज्जवलन के साथ किया
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सड़कों पर नियम-कायदे, सरकारी इच्छाशक्ति नहीं

सरकार को दिल कड़ा करके लोगों को उनकी हिफाजत सिखानी ही होगी, और जो लोग सुधरने को तैयार नहीं हैं, उन्हें जुर्माने के साथ-साथ दूसरी दिक्कतें भी झेलने की नौबत खड़ी करनी चाहिए, क्योंकि सड़कों पर जो लोग एक नियम तोड़ते हैं, वे ही लोग कई और नियम भी तोड़ते हैं, और कुल मिलाकर वे दूसरों की जान के लिए भी खतरा बन जाते हैं
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प्रतीकों की आजादी का हासिल क्या

एक और दिलचस्प तथ्य है कि जब देश की आर्थिक स्थिति बेहतर होती है तो ये अनुपात और कम हो जाता है यानि की परिवार की आय बढ़ती है तो महिलाएं काम करना छोड़ देती हैं। अर्थशास्त्र इस स्थिति को अब तक व्याख्यायित नहीं कर पाए हैं। इसके अलावा अगर हम देखें तो लड़कियों और महिलाओं को लेकर सामाजिक हालात बहुत अच्छे नहीं हैं। उनको अब भी अपनी मर्जी से कहीं भी कभी भी आने जाने की ना तो स्वतंत्रता है और ना ही सुरक्षा
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ट्रंप के लिए हवन करने वाले अब रोजगार का घाटा गिनें


जीवन के आयामों का आइना है पॉल की तीर्थयात्रा

पढ़ने वाला पहले तो खुद को एक पाठक की तौर पर ही निश्चत करता है...लेकिन जैसे जैसे किस्सा आगे बढ़ता जाता है...भाषा और उसके प्रभाव का ऐसा असर भी हो सकता है कि पढ़ने वाला खुद को उसी कहानी से जोड़ता महसूस होने लगता है...लेकिन इसके बाद जैसे ही पाठक खुद को इस कहानी का हिस्सेदार समझने का गुमान पालता है...फौरन पॉल की यात्रा पूरी होने लगती है...और पाठक खुद को धीरे धीरे इस कहानी से बाहर निकाल लाता है
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गोवा के चुनाव प्रचार में प्रतिरक्षा मंत्री पर्रिकर की गैरजरूरी भड़काऊ बातें

दूसरी तरफ नोटबंदी को लेकर पूरे देश में मोदी सरकार से जो भी नाराजगी गरीब जनता की है, उससे नोटबंदी का मुद्दा भी चुनाव का आकर्षक मुद्दा नहीं रह गया है। ऐसे में मनोहर पर्रिकर को कोई भी लुभावना भाषण देने में दिक्कत होना स्वाभाविक है, और ऐसे में वे अगर अपने प्रदेश की जनता को याद दिलाना चाहते हैं कि वे देश के सबसे महत्वपूर्ण मंत्रियों में से एक हैं, और देश की हिफाजत उनके हवाले है, तो उन्हें पाकिस्तान पर हमला करना एक जायज मुद्दा लग रहा है
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युवाओं से वरिष्ठों को परहेज क्यों?

आलोचना को पाठकों से दूर भी ले जाती है। नाटक के सत्र में युवा रंगकर्मी आशीष पाठक ने साहित्य में वर्ण व्यवस्था की बात कहकर सबको चौंका दिया। आशीष के मुताबिक उनको ऐसा लगा कि साहित्य में भी वर्ण व्यवस्था होती है। उन्होंने कहा कि कवि ब्राह्मण, कहानीकार क्षत्रिय, उपन्यासकार वैश्य, और हम नाटक वाले शूद्र की तरह जिसका काम मनोरंजन करना भी है। उन्होंने झुब्ध होते हिए सवाल उछाला कि क्या साहित्य के सवर्ण, हमारे लिए कुछ लिखेंगे क्या
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परिताप की मिठास : अतीत से भयभीत चार हस्तियां

वे मानवीय मेधा के ‘मिथ’ के रूप में स्थापित हैं। आज भी यदि कोई बालक अपनी प्रतिभा से समाज को एकाएक चौंका दे तो लोग उसकी तुलना आइंस्टाइन से करने लगते हैं। उनके बारे में कुछ और बताने को कहा जाए तो लोग कहेंगे कि उन्हें संगीत से भी प्यार था। वे गांधी के प्रशंसक तथा विश्वशांति के अग्रदूतों में से एक थे। नए-नए देश बने इजरायल ने उन्हें अपना राष्ट्रपति बनने का न्योता दिया था, मगर उन्होंने विनम्रतापूर्वक अस्वीकार कर दिया था
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सुल्तान शाहीन ने UNHRC में ट्रिपल तलाक के मुद्दे को उठाया, मुसलमानों से कहा, इस्लामी थियोलाजी पर गंभीरता से पुनर्विचार करें

एक मध्य पूर्वी देश में, अदालतें, 9 साल की उम्र वाली छोटी लड़कियों के विवाह की अनुमति देती हैं और उन्हें अपने विवाह को शारीरिक संबंध स्थापित करके पूर्ण करने और अपने पति के साथ रहने को मजबूर करती हैं। मेरे अपने देश, भारत में , मुस्लिम पति एक बार में, एक के बाद एक, तीन बार तलाक शब्द बोलकर ,कानूनी तौर पर एक मिनट से भी कम समय में, अपनी पत्नियों को अपने घरों से बाहर फेंक देते हैं।
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देशभक्त रात-दिन चौकन्ने और देशद्रोहियों की तलाश

जब अपने आपको देशभक्त बताना हो, तो ऐसा तभी मुमकिन है जब किसी दूसरे तबके को देशद्रोही और गद्दार साबित किया जाए। जब तक ऐसा कोई पैमाना सामने नहीं होगा, लोग अपने आपको अपने हाथों तिलक लगाकर शहीद का दर्जा भला कैसे दे सकते हैं। नतीजा यह है कि बात-बात में देश के साथ वफादारी को साबित करने की जरूरत पड़ रही है
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आजाद मनुष्य की खोज ही साहित्य का लक्ष्यः मणि

बहुत सारी चीजें बदल गई हैं। कोई सांस्कृतिक राजनीतिक चेतना नहीं है। वहां कोई बालगोविंद, कालीचरण नहीं है उस गांव में। एक पंचायत ‘मैला आंचल’ में भी है। कोठारीन को बेदखल किया जाता है। ‘अपना रिश्ता’ में भी पंचायत है। वहां बड़ा आधुनिक लकदक मुखिया है। कहानी में कुछ सवाल आए हैं जिससे गांवों का नक्शा बनता है
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आरोपों की सियासत का हासिल क्या

जब भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे के साथ मिलकर मुहिम शुरू की थी तब भी उन्होंने यूपीए सरकार के सोलह मंत्रियों की एक सूची जारी कर उनपर भ्रष्टाचार के संगीन इल्जाम लगाए थे । उन मंत्रियों में मौजूदा राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी का नाम भी शामिल था । ये उनकी रणनीति है कि आरोप लगाओ, शक का एक वातावरण तैयार करो और फिर उसका राजनीतिक फायदा उठाओ । यूपीए सरकार के दौरान लगातार भ्रष्टाचार के मामलों ने केजरीवाल के आरोपों की सियासत को उर्वर जमीन मुहैया करवाई थी । तब लोग उनपर यकीन भी कर लेते थे और उनकी सियासी जमीन मजबूत भी हो जाती थी
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भारत जैसे संसदीय लोकतंत्र में एकतरफा फैसलों वाले पीएम

तमाम बातें कुछ परेशान करती हैं, और यह भी सुझाती है कि देश के व्यापक महत्व के मुद्दों पर विपक्ष को भरोसे में लेना तो दूर रहा, प्रधानमंत्री ने अपनी ही पार्टी के नेताओं को, अपने ही मंत्रिमंडल के लोगों को फैसले की घोषणा के बाद भी भरोसे में नहीं लिया है। यह लोकतंत्र में एक व्यक्ति के फैसले लेने की एक ऐसी नौबत है जिसमें उस फैसले के असर को ढोने का जिम्मा पूरे देश पर आ रहा है। और यह एनडीए और भाजपा के भीतर एक असंतुलित शक्ति केन्द्र का सुबूत भी है
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काले धन के खिलाफ एक आभासी लड़ाई!

कुछ ने अपने कर्मचारियों को तीन से चार माह की तनख्वाह बांट डाली। कुछ ने दीवाली के बाद भी बोनस दे डाला। इसमें ज्यादातर पैसा बैंक के पास कहां आया? सोची-समझी रणनीति के तहत कुछ लोगों के लाभ-हानि को देखकर यह कदम उठाया गया लगता है। जिसके नाते कठिनाई सिर्फ आम आदमी के हिस्से आयी। यह देखना बहुत रोचक है कि सरकार के साधारण फैसलों पर सड़कों पर आ जाने वाले उनके सहयोगी संगठन और समविचारी संगठन कहीं जनता की मदद करते नहीं दिखे
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Garbh Gruh

कूकी दौड़कर उसके पास चली गई। अब तक उसकी आँखें अंधेरे में देखने के लिए अभ्यस्त हो चुकी थी। नींद में छोटे बेटे की बड़बड़ाहट अस्पष्ट थी। कूकी उसकी पीठ पर अपना हाथ घुमाते हुए कहने लगी "बेटे, कोई सपना देख रहे हो ? सो जा, मेरे लाड़ले, सो जा।" दोनों बच्चे अपने पापा को घर नहीं आया देखकर बुरी तरह से डर गए थे।उन्होंने तरह-तरह के सवाल पूछकर कूकी को परेशान कर दिया था
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