SrijanGatha

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अन्तरराष्ट्रीय मंच


<< 1 2 3 >>

वासंती ऋतु का प्रेम आख्यान

भारत के सर्वोच्च व्यक्ति को न केवल रंग पोत सकता है, बल्कि हक से प्रत्यक्ष- अप्रत्यक्ष कुछ ‘अतिरिक्त’ भी कह सकता है। यह होली का ही उल्लास है, जिसमें समाजबद्ध संरचना टूटती है। अब यह ज्यादा टूटती है लेकिन अब भी और अधिक टूटने की आकांक्षा है। इस मौके पर रघुवीर सहाय की कविता याद आती है- टूट, टूट, टूट। या सृजन के लिए टूट जरूरी है लेकिन चिंतनीय यह है कि हर टूट सृजन नहीं बनती। डीकंस्ट्रक्शन जरूरी है पर वह कंस्ट्रक्शन का क्या स्वरूप लेगा, यह विचारणीय है
पढ़िए ...

गरीबों को रियायती गैस से हिन्दुस्तानी महिला और बच्चों की सेहत में एक क्रांति संभव

निष्कर्ष है कि परमाणु बिजलीघर की इतिहास की आज तक की सारी दुर्घटनाओं को मिला दिया जाए, तो भी एक महीने में घरेलू चूल्हे से होने वाली मौतों का आंकड़ा वे नहीं छू सकते। लकड़ी या कोयले के चूल्हे से उठने वाला धुआं महिला और उसके बच्चों को खोखला करके रख देता है। यह देखने के बाद हैरानी होती है कि किस तरह भारत में महिला यह झेलते हुए भी पुरूष के मुकाबले औसत उम्र में खासी आगे है और तीन-चार बरस अधिक जीती है
पढ़िए ...

यह दल्ले पत्रकार किस मुंह से प्रेस क्लबों में समारोहपूर्वक मज़दूर दिवस की हुंकार भरते हैं

बिना किसी छुट्टी के छ हज़ार, सात हज़ार रुपए महीने ही कमा पाता है। इन की या उन की नौकरियां जब दिहाड़ी में तब्दील हो गई हों, मज़दूर मज़दूरी के साथ ही खून बेचने के काम में लग गया हो, किडनी रैकेटियरों के चंगुल में फंस गया हो, ऐसे में भी आप मज़दूर दिवस के समारोह कैसे आयोजित कर लेते हैं? नेताओं और अधिकारियों के तलवे चाटने के लिए? राजनीतिक रैलियों में बंधुआ बन कर जाने वाले मज़दूर जिस देश में करोड़ों की संख्या में बसते हों, उस देश में यह मज़दूर दिवस, यह लाल सलाम-वलाम सिर्फ़ और सिर्फ लफ़्फ़ाज़ी की बातें हैं, वाहियात बातें हैं, भरमाने की बातें हैं
पढ़िए ...

गर्भ गृह

वहाँ उसे भयंकर गरीबी का नंगा नाच देखने को मिला था। फिर भी वहाँ की औरतें अधखुला ब्लाऊज पहने हुए, होठों पर लाल-लाल लिपिस्टिक लगाए हुए, बालों में गजरा सजाए हुए मुस्कराते हुए हर दरवाजे के बाहर खड़ी हुई थी मानो वे किसी के आने का इंतजार कर रही हो कुछ लावारिस मैले-कुचेले बच्चे नाले के पास एक देसी कुतिया के पिल्लों को गोद में लेकर इधर-उधर घूम रहे थे
पढ़िए ...

हिंसा करने की क्षमता को हक बना देना घातक

आरक्षण का मतलब न केवल पढ़ाई में दाखिला होता है, नौकरी होती है, बल्कि राजनीतिक चुनावों के लिए सीट का आरक्षण भी होता है। इनमें से कौन सी बात को लेकर कौन सा आंदोलन चलता है यह अंदाज लगाना मुश्किल है, और यह भी अंदाज लगाना मुश्किल है कि क्या हरियाणा का जाट आंदोलन, हैदराबाद विश्वविद्यालय से देश भर में फैल रहे, और दिल्ली में इकट्ठा होने जा रहे दलित छात्रों के आंदोलन को वहां न पहुंचने देने के लिए अचानक छेड़ा गया आंदोलन था?
पढ़िए ...

साहित्य में ग्लैमर का तड़का

जगरनॉट ने तो मोबाइल वैलेट कंपनी पेटीएम के साथ भी करार किया है। इस करार के मुताबिक कोई भी ग्राहक जिसके पास पेटीएम का ऐप है वो उसके जरिए भी जगरनॉट के ऐप तक पहुंच सकता है। जगपनॉट को पेटीएम के मोबाइल ग्राहकों की संख्या पर भी भरोसा है कि उनके जरिए किताबों की बिक्री हो सकेगी। ये तो आनेवाला वक्त ही तय करेगा कि मोबाइल वैलेट के लोग कितना पैसा किताबों के लिए निकालते हैं
पढ़िए ...

नास्तिक दर्शन : पुरोहितवाद विरुद्ध सार्थक मोर्चा (दो)

वह जीवन के प्रति पूरी तरह वैज्ञानिक दृष्टिकोण था। वे सत्तावादी प्रलोभनों, छल–प्रपंच, लालच आदि से दूर, यायावर चिंतन–परंपरा से निकले विद्वान थे। दूसरी ओर ब्राह्मण दर्शनों का पोषण–पल्लवन राज्य के संरक्षण–समर्थन के साथ हुआ था। धर्म और राजसत्ता के उस गठजोड़ ने केंद्रोन्मुखी संस्कृति और सभ्यता को जन्म दिया था। एक–दूसरे के प्रकटतः विरोधी और आलोचक दिखने के बावजूद उसके विभिन्न घटक पारस्परिक हितों को लेकर संगठित थे। उनकी रक्षा एवं विस्तार के लिए वे सम्मिलित शक्तियों का उपयोग करते थे
पढ़िए ...

लोक सुराज जैसे अभियान तो अच्छे हैं लेकिन रोज का सरकारी कामकाज भी सुधरे

अगले चुनाव के पहले आधे कार्यकाल से भी कम का वक्त काम करने के लिए है। ऐसे में एक व्यवस्था उन्हें कम से कम अब तो लागू कर देने चाहिए कि हफ्ते का पहला दिन किसी भी तरह की बैठकों, या किसी भी तरह के दौरों से मुक्त रहे, और मुख्यमंत्री से लेकर मंत्रियों तक, मुख्य सचिव से लेकर पटवारी तक, हर सोमवार अपने दफ्तर में सुबह से शाम तक मौजूद रहें। आज सरकार में इतने तरह की बैठकों और दौरों में, विधानसभा सत्रों और लोक सुराज जैसे अभियानों में, चुनाव की तैयारियों में सरकारी अमला लगे रहता है कि जनता को यह पता ही नहीं रहता कि किस कुर्सी पर भगवान कब विराजमान मिलेंगे
पढ़िए ...

फोन पर फ्लर्ट

तीन चार फोन उसे मिलाने थे पर सभी इंगेज मिल रहे थे। वह लगातार ट्राई कर रहा था। कुछ नंबरों को वह रीडायल भी करता जा रहा था तभी कोई नंबर मिल गया। कौन सा नंबर मिल गया उसे समझ नहीं आया। जब तक वह सोचता-सोचता ‘हलो’ कहते ही उधर से एक औरत ने बोलना शुरू कर दिया। बेधड़क। वह कहने लगी, ‘क्या बताएं बिजली चली गई है। गरमी मारे दे रही है
पढ़िए ...

जजों की कमी का रोना रोते मुख्य न्यायाधीश का गला भरा

यही हाल मुकदमा चलने तक अदालत में चलता है, और फिर यही हाल ऊपरी अदालतों तक जाकर निचली अदालत के फैसले के खिलाफ अपील करते हुए चलता है। चारा खाए हुए लोग संसद और विधानसभाओं का रियायती खाना खाते रहते हैं, और जिन भैंसों के हिस्से का चारा चोरी हुआ था, उनकी पीढिय़ां निकल जाती हैं
पढ़िए ...

हिंदू राष्ट्र के खतरे का खटराग

करीब चार दशक से इन संस्थाओं पर कुंडली मारकर बैठे वामपंथियों को जब हटाया जाने लगा तो उनको असहिष्णुता और हिंदू राष्ट्र की ओर बढ़ा कदम नजर आने लगा। सीताराम येचुरी बेहद पढे लिखे महासचिव हैं लेकिन जब वो इस तरह की बातें करते हैं तो भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र की ताकत को कम करके आंकते हैं
पढ़िए ...

“नागार्जुन के उपन्यासों में मिथिलांचल” का लोकार्पण

पटना। विदुषी लेखिका डॉ सुलक्ष्मी कुमारी की सद्यः प्रकाशित शोध-पुस्तक ‘नागार्जुन के उपन्यासों में मिथिलांचल” का लोकार्पण, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आयोजित एक समारोह में सम्मेलन अध्यक्ष डॉ अनिल सुलभ तथा सुप्रसिद्ध लेखक डॉ वालेन्दु शेखर तिवारी ने किया
पढ़िए ...

दुनिया के लंबे वक्त के फैसले अगली पीढ़ी को गोद में बिठाकर लेने के फायदे बहुत

वह आने वाली पीढिय़ों का ख्याल करके हो रहे इस समझौते का एक बड़ा प्रतीक था। एक समझौता दस्तखत से गुजरते हुए महज छोटी सी खबर बन पाता है, लेकिन इस तरह के प्रतीक किसी भी मौके को, किसी भी दस्तावेज को अधिक महत्वपूर्ण और अधिक असरदार बना देते हैं। लोगों की मानसिकता पर असर डालने के ऐसे कई काम सोच-समझकर भी होते हैं, और अनायास भी हो जाते हैं
पढ़िए ...

गर्भ गृह

एक बार कूकी आठ दिन के लिए बाहर गई हुई थी, जब वह वापस घर लौटी तो उसने देखा कि उसके मेल- इनबाक्स में कई मेल आए हुए थे। उस आदमी की बैचेनी वास्तव में किसी को भी व्याकुल कर देने वाली थी, जैसे कि उसकी कोई कीमती चीज किसी भीड़ के अंदर खो गई हो। और वह उस भीड़ के अंदर अपनी खोई हुई मणि को नहीं खोज पा रहा हो। उसकी अवस्था ठीक उसी तरह थी जैसे बिन पानी तड़पती मछली
पढ़िए ...

‘कहाँ हो तुम?' का लोकार्पण

अलीगढ़। चर्चित कवि अशोक ‘अंजुम के नवीनतम गीत संग्रह ‘कहाँ हो तुम’ का लोकार्पण समारोह संत फिदेलिस स्कूल जूनियर विंग के सभागार में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि श्री संतोष कुमार शर्मा ;नगर आयुक्त, श्री विवेक बंसल, फादर जार्ज पाॅल, डाॅ वेदप्रकाश अमिताभ, डाॅ प्रेम कुमार, डाॅ महेन्द्र कुमार मिश्र के द्वारा दीप प्रज्जवलन के साथ हुआ।
पढ़िए ...

स्मृतियाँ और शुभेच्छाएँ नहीं मानतीं ‘सरहदें’

सारी कविताएँ मिलकर स्वयं स्वतंत्र पाठ रचने में समर्थ हैं। यह पाठ सरहद के विभिन्न रूपों से संबंधित है। हदें और सरहदें मनुष्य के वैयक्तिक और सामाजिक आचरण को नियंत्रित करती हैं। वैयक्तिकता जहाँ बे-हद और अन-हद की जिद करती है वहीं सामाजिकता सर्वत्र और सर्वदा हदों का निर्धारण करती चलती है। ‘सीमित’ और ‘सीमातीत’ के द्वंद्व में से उपजती है मनुष्यों, राष्ट्रों, समाजों और समस्त जगत के आपसी संबंधों की विडंबनाएँ
पढ़िए ...

असुरक्षित धरती पर कोई सुरक्षित टापू संभव नहीं

दुनिया में पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले लकड़ी या कोयले के चूल्हे ऐसी अकेली सबसे बड़ी वजह हैं जिनसे कि इंसानों की सेहत को सबसे अधिक और सबसे बुरा नुकसान पहुंचता है। उनका मानना है कि धरती और हवा के प्रदूषण के साथ-साथ सेहत को होने वाला यह नुकसान सबसे अधिक महंगा है
पढ़िए ...

साहित्यक बाबाओं के जोर का दौर

बाबा संस्कृति के विकास के साथ साथ साहित्य के नए नए मठ बनने लगते हैं और जो लोग साहित्यक बाबाओं की श्रेणी में चले जाते हैं वो इन मठों के मठाधीश बन जाते हैं। साहित्यक मठों के निर्माण के लिए ये जरूरी नहीं कि साहित्य के ये बाबा बहुत मान्यता वाले हों। छोटे-मोटे लेखक भी बाबा बन जाते हैं। उसके बाद उन साहित्यक मठों में साहित्य स्थापना का कार्य प्रारंभ होता है
पढ़िए ...

सामाजिक सरोकारों से हटता सिनेमा

आगे चलकर जब तकनीकी स्तर पर हिंदी सिनेमा मजबूत हुआ तो फिल्में साल दो साल के बजाय फटाफट वाली रफ्तार से बनने लगीं। यहीं से फिल्म उद्योग पर पूँजी का वर्चस्व इतना अधिक बढ़ा कि उसने कंटेंट और सामाजिक सरोकारों को बहुत पीछे ढकेल दिया। यही वजह है कि आज की फिल्मों में हमें उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड या छत्तीसगढ़ के गाँवों के भारत की तसवीर कम दिखती है जबकि मेट्रो शहरों मुंबई या गोवा की चमक-दमक, शापिंग मॅाल और मल्टीप्लेक्स अधिक दिखता है
पढ़िए ...

लहू सने गौरवपथ

उसे राजनीतिक इंतजामों, गैरजरूरी आंदोलनों और मंत्री-अफसरों के घरेलू कामों में झोंक दिया जाता है। ट्रैफिक का इंतजाम भी सबसे पहले लालबत्ती काफिलों के लिए होता है, जुलूसों के लिए होता है, तब जनता की बारी आती है। जब पुलिस ट्रैफिक के बजाय सरकारी और राजनीतिक शादियों में पार्किंग करवाने में लग जाती है तब सड़कों का इंतजाम तो घट ही जाता है। ताकतवर ओहदों पर बैठे लोगों को अपने लिए पुलिस का बेजा इस्तेमाल बंद करना चाहिए
पढ़िए ...

भोजपुरी के लाल- लाल बिहारी लाल सम्मानित

नई दिल्ली । युवा उत्कर्ष साहित्यिक मंच के द्वारा मासिक गोष्ठी के आयोजन रेलवे ऑफिसर्स क्लब ,पी. के. रोड़ नई दिल्ली में भइल। एह काव्य गोष्ठी के अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती लता यादव जी कइनी। विशिष्ट अतिथियों में “नवांकुर साहित्य सभा ”के अध्यक्ष श्री अशोक कश्यप ,”हमारा मेट्रो” के साहित्य सम्पादक श्री लाल बिहारी लाल, गीतकार सुश्री मीरा शलभ, ग़ज़लकार प्रो.रमेश सिद्धार्थ, श्याम नंदा नूर आ ट्रू मीडिया की उपसम्पादक ड़ॉ. पुष्पा जोशी जी की गरिमामयी उपस्थिति में आयोजित कइल गइल
पढ़िए ...

<< 1 2 3 >>

Everyday, New Posts, Like, News, Poet, Story, Gazal, Song, novel, blog, Article, music, lyrics, books, review,conference, training etc. On srijangatha Magazine

जनमन
प्रफुल्ल कोलख्यान
प्रफुल्ल कोलख्यान
समाधान
जया केतकी
जया केतकी
बाअदब-बामुलाहिजा
फजल इमाम मलिक
फजल इमाम मलिक
धारिणी
विपिन चौधरी
विपिन चौधरी
सिनेमा के शिखर
प्रमोद कुमार पांडे
प्रमोद कुमार पांडे
आखर-अनंत
ओमप्रकाश कश्यप
ओमप्रकाश कश्यप
रोज़-रोज़
दयानंद पांडे
दयानंद पांडे

जाग मछिन्दर गोरख आया
बुद्धिनाथ मिश्र
बुद्धिनाथ मिश्र
विचारार्थ
बृजकिशोर कुठियाला
बृजकिशोर कुठियाला
स्याह सफ़ेद
सुनील कुमार
सुनील कुमार
समय-समय पर
अखिलेश शुक्ल
अखिलेश शुक्ल
ओडिया-माटी
दिनेश माली
दिनेश माली
नया नज़रिया
जगदीश्वर चतुर्वेदी
जगदीश्वर चतुर्वेदी
अतिक्रमण
संजय द्विवेदी
संजय द्विवेदी