वर्ष 8 माह 3 दिन 19
 डॉ. रमा पांडे के काव्य संग्रह, गुहार, का वातायन द्वारा विमोचन     प्रसिद्ध कथाकार हरिसुमन बिष्ट का कहानी पाठ     संतोष श्रीवास्तव की पुस्तक पर चर्चा     'ऋतुराज एक पल का' को नवगीत पुरस्कार     कहानी संग्रह 'वृक्ष और बेल' के लोकार्पण समारोह पर केंद्रित रिपोर्ट     बाबू गुलाबराय स्मृति दिवस समारोह     विश्व मैत्री मंच का प्रथम हिन्दी साहित्य सम्मेलन हिमाचल प्रदेश में   

     
आधुनिक वेताल कथा अतिक्रमण ये भी एक दृष्टिकोण समय-समय पर ओडिया-माटी बाअदब-बामुलाहिजा धारिणी सिनेमा के शिखर टेक-वर्ल्ड आखर-अनंत
जनमन
प्रफुल्ल कोलख्यान
प्रफुल्ल कोलख्यान
समाधान
जया केतकी
जया केतकी
बाअदब-बामुलाहिजा
फजल इमाम मलिक
फजल इमाम मलिक
धारिणी
विपिन चौधरी
विपिन चौधरी
सिनेमा के शिखर
प्रमोद कुमार पांडे
प्रमोद कुमार पांडे
आखर-अनंत
ओमप्रकाश कश्यप
ओमप्रकाश कश्यप
रोज़-रोज़
दयानंद पांडे
दयानंद पांडे


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डॉ. रमा पांडे के काव्य संग्रह, गुहार, का वातायन द्वारा विमोचन
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नागाफाकी
अनजाने में इतने दिन मैं मन ही मन उसकी पत्नी और परिवार से ईर्ष्या कर रही थी ! उसके नजदीक होने की कल्पना भी कर रही थी। कभी भी जवाब नहीं देने के बाद भी मैं उसके पत्रों का इंतजार करती और उन्हें संभाल कर रखती। यह बात सही थी कि अपनी लंपट स्वभाव के कारण उसे आर्मी से निकाला गया था, उसके बावजूद भी उसने शराब पीकर न तो अपनी पत्नी पर हाथ उठाया और न ही कभी कठोर भाषा का इस्तेमाल किया ... पढ़िए
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मूल : दिनेश माली, अनुवाद : मोनालिसा जेना

सव्यसाची पंडा गिरफ्तार
कुछ दिन पहले उनके दांया हाथ प्रदीप मांझी मुठभेड़ में मारे गए थे। मूल पार्टी से अलग हो जाने के बाद तथा कई महत्त्वपूर्ण साथियों के मारे जाने के बाद सव्यसाची का संगठन कमजोर पड़ गया था। फिर भी उनके पास से बरामद सामान बताते हैं कि उनके पास संसाधनों की कमी नहीं थी। पर संसाधन क्रांति नहीं करते, मनुष्य करते हैं ... पढ़िए
0 टिप्पणी, प्रसंगवश, (10 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 1 अगस्त 2014,
विश्वजीत सेन

21वीं सदी के हिंदुस्तान को गुफा में ले जाने को आमादा
जिस तरह भारत की मौजूदा संस्कृति को खत्म करके केक के पहले के दिनों में वे ले जाना चाहते हैं, उससे न तो इस देश की इज्जत बढऩे वाली है, न भाजपा की, और न मोदी सरकार की। यह हिंदुस्तान की 21वीं सदी है, और आज दुनिया भर में जो प्रवासी भारतीय मोदी और भाजपा के दोस्त और शुभचिंतक हैं, उनसे कोई पूछे कि क्या सिर्फ संस्कृत से काम चलाकर वे प्रवासी भारतीय बन सकते थे ... पढ़िए
0 टिप्पणी, स्याह सफ़ेद, (13 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 31 जुलाई 2014,
सुनील कुमार

दलदल
सबके विदा होने के बाद बिखरी हुई हर चीज अपनी - अपनी जगह पर रक्खो ....फिर सारे दिन के बंधे - बंधाये काम ....शाम होते ही फिर वही सबकुछ और उसके बाद वही घिसी हुई रात ....कुछ भी तो नया नहीं .....ये भी कोई जिंदगी है क्या ... पढ़िए
0 टिप्पणी, लघुकथा, (18 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 31 जुलाई 2014,
सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा

दबाव में महानगर : उछाल में ‘भूमिपुत्र’
अपने मूल राज्य से बाहर रहनेवाले लोगों पर, खासकर बच्चों पर इसका बहुत विपरीत मनोवैज्ञानिक असर होता है। यह मनोवैज्ञानिक असर लोगों को भारत राज्य और राष्ट्र के साथ उनके लगाव का कमजोर बनाता है। मुंबई महानगर हो, कोलकाता महानगर हो या देश का कोई और महानगर या सार्वजनिक संस्थान और संपद हो, सामान्य रूप से समस्त देशवासियों का उस पर समान अधिकार होना चाहिए। निश्चित रूप से यह समान अधिकार नि:शर्त्त नहीं हो सकता है ... पढ़िए
0 टिप्पणी, जनमन, (11 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 30 जुलाई 2014,
प्रफुल्ल कोलख्यान

एक दशक लंबा सूचना तकनीक का जलजला
टेलीप्रेजेन्स, वीडियो कॉन्फरेन्सिंग, वेब कॉन्फरेंसिंग, वीडियो कॉलिंग और वॉयस ओवर इंटरनेट ने संचार क्षेत्र का नक्शा ही बदल दिया। उसी की बदौलत आउटसोर्सिंग का जलवा जमा और न्यूयॉर्क के उपभोक्ता अपने अकाउंट्स की जानकारी लेने के लिए जयपुर, गुड़गांव या नोएडा फोन करने लगे, बिना यह जाने कि वे किससे और कहां बात कर रहे हैं ... पढ़िए
0 टिप्पणी, टेक-वर्ल्ड, (19 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 30 जुलाई 2014,
बालेन्दु शर्मा दाधीच

बालसाहित्य का विकासयुग : साहित्य में बचपन की दस्तक
सूरदास ने कृष्ण की बाललीलाओं का ऐसा मनोरम वर्णन किया है जिसका उदाहरण अन्यत्र दुर्लभ है। लेकिन सब बड़ांे द्वारा, बड़ों के बड़े उद्देश्य साधने के निमित्त किया गया साहित्यिक आयोजन था। बचपन का मुक्त उल्लास वहां अनुपस्थित है। लेकिन यह भी स्मरण रखने योग्य है कि बच्चों की शिक्षा को लेकर तो मनुष्य सभ्यता के आरंभ से ही सजग था, परंतु बचपन पर वास्तविक विमर्श काफी विलंब से आरंभ हो सकता ... पढ़िए
0 टिप्पणी, आखर-अनंत, (9 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 30 जुलाई 2014,
ओमप्रकाश कश्यप

प्रसिद्ध कथाकार हरिसुमन बिष्ट का कहानी पाठ
कहानी “खुली रह गई खिडकी के दूसरी तरफ” में स्त्री के मज़बूत पक्ष और उसकी मनोदशा का प्रभावशाली वर्णन है। कहानी की प्रशँसा सभी ने की। कहानी पाठ के पश्चात कहानी पर चर्चा सत्र चला। दूसरे सत्र में कविता पाठ हुआ ... पढ़िए
0 टिप्पणी, हलचल, (35 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 29 जुलाई 2014,
प्रस्तुति प्रमिला वर्मा

आए दिन निर्भया लेकिन गुस्सा अब सड़क पर नहीं दिखता, नहीं फूटता, लगता है लोग नपुंसक हो गए हैं
अब किस फोर्स को रोकने की लाचारी है भाई ? वास्तव में सपा , बसपा हो, भाजपा , कांग्रेस हो या कोई और पार्टी , मुद्दा तो अब किसी के पास नहीं है । सब के पास बस अपनी सुविधा और स्वार्थ की राजनीति है । बाकी बातें तो बस जनता को बरगलाने के लिए ही हैं । न मायावती के पास अंबेडकर हैं न मुलायम के पास लोहिया , न भाजपा के पास दीनदयाल उपाध्याय हैं न कांग्रेस के पास गांधी ... पढ़िए
0 टिप्पणी, रोज़-रोज़, (28 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 29 जुलाई 2014,
दयानंद पांडेय

हिन्दुस्तान के हिंसक प्रदर्शनों पर हवाई नजर की तकनीक
खिलौनों की तरह के ये छोटे विमान दूर से नियंत्रित किए जाते हैं, और कुछ ऊंचाई पर उड़ते हुए ये नीचे की तस्वीरें रिकॉर्ड भी कर सकते हैं, और उन्हें उसी वक्त प्रसारित भी कर सकते हैं। ऐसे वीडियो सुबूत पुलिस के काम आ सकते हैं, और अदालतों से लेकर मानवाधिकार आयोग तक कई जगहों पर पुलिस को ऐसे हर मौके के बाद कटघरे में खड़ा किया ही जाता है ... पढ़िए
0 टिप्पणी, स्याह सफ़ेद, (24 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 28 जुलाई 2014,
सुनील कुमार

भारत में भारतीय भाषाओं का सम्मान और विकास
क्या भारत में ऐसे विद्वान नहीं हैं जो भारतीय भाषाओं में मूल प्रश्न पत्र का निर्माण कर सकें। मूल अंग्रेजी के प्रश्न पत्र का अनुवाद जटिल, कठिन एवं अबोधगम्य हिन्दी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में कराया जाना क्या जरूरी है। संघ लोक सेवा आयोग चाहता क्या है। क्या उसकी कामना यह है कि देश के प्रशासनिक पदों पर केवल अंग्रेजी जानने वाले ही पदस्थ होते रहें ... पढ़िए
0 टिप्पणी, आलेख, (15 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 28 जुलाई 2014,
प्रो. महावीर सरन जैन

प्राण शर्मा की ग़ज़ल
0 टिप्पणी, छंद > ग़ज़ल, (17 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 28 जुलाई 2014,
प्राण शर्मा

साओन मास बरिस घन वारि
उनका रंग सफेद होकर भी सफेद नहीं है। बस, उजाले पर अँधेरे की हल्की परत चढ़ी हुई है,जैसे बगुले पर किसीने गोइठे की राख मल दी हो। गर्दन मोड़कर और नयी-नयी ध्वनि निकालकर वह कई रूपों में प्रिया को रिझाना चाहता है। उसकी आवाज पंचम सुर में गूँजती बाँसुरी की तरह सुरीली है। प्रेम के उन मादक क्षणों में वे कृष्ण-राधा की भाँति ही दिव्य प्रेमी लग रहे हैं ... पढ़िए
0 टिप्पणी, जाग मछिन्दर गोरख आया, (18 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 27 जुलाई 2014,
डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र

कहाँ जाएँ औरतें
यह समय इसे सच साबित कर रहा है। जबकि इस दौर में स्त्री ने अपनी सार्मथ्य के झंडे गाड़े हैं। अपनी बौद्धिक, मानसिक और शारीरिक क्षमता से स्वयं को इस कठिन समय में स्थापित किया है। एक तरफ ये शक्तिमान स्त्रियों का समय है तो दूसरी ओर ये शोषित-पीड़ित स्त्रियों का भी समय है। इसमें औरत के खिलाफ हो रहे अपराध निरंतर और वीभत्स होते जा रहे हैं ... पढ़िए
0 टिप्पणी, अतिक्रमण, (33 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 27 जुलाई 2014,
संजय द्विवेदी

नाम गुम जायेगा, चेहरा ये बदल जायेगा, मेरी आवाज ही पहचान है गर याद रहे...
पश्चिम बंगाल की बात करें, तो दशकों तक वहां मुख्यमंत्री रहे, माक्र्सवादी ज्योति बसु का नाम और चेहरा उस राज्य का सबसे बड़ा ब्रांड एंबेसडर था। उनके रहते राज्य को किसी और नाम की जरूरत नहीं थी, और वामपंथी नीतियों से सहमत या असहमत जो भी हों, ज्योति बाबू के बारे में यह बात साफ थी कि वे पश्चिम बंगाल का समानार्थी शब्द बने हुए थे ... पढ़िए
0 टिप्पणी, स्याह सफ़ेद, (36 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 26 जुलाई 2014,
सुनील कुमार

मजरूह सुल्तानपुरी
सबा, संगीतकार नौशाद साहब के संगीतकार बेटे राजू नौशाद की पत्नी हैं। तीन बेटियों के बाद इरम का जन्म हुआ तो मजरूह साहब ने शकीला बानो भोपाली की क़व्वाली का प्रोग्राम रखा। इरम जिन्हें प्यार से अमू कहते थे, हार्ट अटैक का शिकार होकर भरी जवानी में दुनिया से सिधार गए। ये एस.एम. सागर की बेटी से ब्याहे गए ... पढ़िए
0 टिप्पणी, आलेख, (43 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 26 जुलाई 2014,
सादक़ा नवाब सहर

आज से पहले ऐसा दृश्य नहीं देखा गया
आज सम्पूर्ण व्याकरण कैसे उलट गया यह समझ में आनेवाली बात नहीं लगती। क्या इसकी वजह नरेन्द्र मोदी का प्रधानमंत्री बनना है? अगर अडवाणी बनते तो क्या सबकुछ ठीकठाक रहता ? पहचान की राजनीति को इतनी दूर नहीं ले जानी चाहिए कि किसे दाढ़ी है, किसे नहीं – इसपर विचार किया जाए। जहाँ तक साम्प्रदायिकता की बात है- नरेन्द्र मोदी इसके लिए जिम्मेदार अवश्य हैं ... पढ़िए
0 टिप्पणी, प्रसंगवश, (62 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 25 जुलाई 2014,
विश्वजीत सेन

अखिलेश के निर्वासन के बहाने कुछ बतकही, कुछ सवाल
कुछ अच्छी रचनाएं और संस्मरण तदभव में पढ़ने को मिले हैं । मन को मोहित कर लेने वाले । कई बार उन से मिलने पर इसी बिना पर मैं उन्हें संपादक जी ही कह कर संबोधित भी करता हूं । पर अपने इसी सफल संपादक को साध कर वह अपने को बड़ा लेखक स्थापित करवाने में पूरे मनोयोग से लगे हैं । साम, दाम, दंड, भेद, लाइजनिंग, वायजनिंग सब आजमा डाल रहे हैं। लेकिन अच्छा संपादक, अच्छा लेखक भी साबित हो यह ज़रूरी नहीं है ... पढ़िए
0 टिप्पणी, रोज़-रोज़, (42 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 25 जुलाई 2014,
दयानंद पांडेय

कैमरे पर रिकॉर्ड शिवसेना सांसदों की बदसलूकी पर कार्रवाई हो...
ताकतवर की बच निकलने की संभावना ही अधिक होती है। शिकायत से लेकर जांच तक, और सुबूत से लेकर गवाह तक, वकील से लेकर जज तक, कमजोर तबका मानो कोई हक ही नहीं रखता। आज अगर दिल्ली के महाराष्ट्र सदन में रेल मंत्रालय के कर्मचारियों द्वारा चलाई जा रही यह केंटीन वीडियो रिकॉर्डिंग नहीं दिखा पाती, तो हमें कोई हैरानी नहीं होती ... पढ़िए
0 टिप्पणी, स्याह सफ़ेद, (38 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 24 जुलाई 2014,
सुनील कुमार

कहो माधो, कैसी रही?
हमें तो महाजन से मरने के बाद भी शांति मिलेगी नहीं पर भगवान महाजनी की आत्मा को शांति दे जो उसे महाजन के साथ रहते न मिल सकी। चलो, बेचारी अब तो भगवान के चरणों में सुखी रहेगी, महाजन के साथ ब्याह कर उसे जितना नरक भोगना था भोग लिया। बेचारी को महाजन के घर रूपी नरक से तो सदा सदा के लिए मुक्ति मिली ... पढ़िए
0 टिप्पणी, व्यंग्य, (32 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 24 जुलाई 2014,
अशोक गौतम

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