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ब्लॉग गाथा

ब्लॉग गाथा

राजभाषा संगोष्ठी में वैचारिक सत्र व काव्य सत्र सम्पन्न

भिलाई । नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति, भिलाई दुर्ग के तत्वावधान तथा भिलाई इस्पात संयंत्र के प्रायोजन में आयोजित राष्ट्रीय राजभाषा संगोष्ठी के समापन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक, श्री विश्वरंजन उपस्थित थे। समापन सत्र की अध्यक्षता दिल्ली विश्वविद्यालय से पधारे सुप्रसिद्ध समालोचक एवं प्रोफेसर डॉ. अजय तिवारी ने किया। आगे पढ़िये...

हलचल, (7) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 2 सितम्बर 2010

राष्ट्रीय राजभाषा संगोष्ठी का महामहिम राज्यपाल द्वारा उद्घाटन

भिलाई । नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति भिलाई-दुर्ग के तत्वावधान तथा भिलाई इस्पात संयंत्र के प्रायोजन में भिलाई निवास में आयोजित राष्ट्रीय राजभाषा संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में छत्तीसगढ़ के राज्यपाल महामहिम श्री शेखर दत्त उपस्थित थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता भिलाई इस्पात संयंत्र के प्रबंध निदेशक व नगर राजभाषा कार्यान्वयन समिति के अध्यक्ष श्री वी के अरोरा ने की। आगे पढ़िये...

हलचल, (6) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 2 सितम्बर 2010

भवभूति एवं वागीश्वरी अलंकरण

भोपाल। मध्यप्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन ने भवभूति अलंकरण एवं वागीश्वरी पुरस्कारों के लिए प्रविष्टियाँ आमंत्रित की जा रही हैं। प्रतिभागी रचनाकार को कविता, कहानी, उपन्यास एवं आलोचना पर कृतियों की चार-चार प्रतियाँ भेजना होगा।
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हलचल, (7) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 2 सितम्बर 2010

फ़िमेल एन्टरटेनर

रोमेश को राजधानी के इस थाने में टी आई के पद पर ज्वाईन किये अभी चौबीस घंटा भी नहीं हुआ था । कल दोपहर में ट्रेन से उतरने के बाद उसने एसपी ऑफ़िस में आमद दिया था और साहब से औपचारिक भेंट करने के पश्चात थाने चला गया था । वहाँ मातहतों से मिलते जुलते, फ़ाईलें, कागज़-पत्तर देखते रात हो गई थी । यात्रा और दिन भर की भागदौड़ की थकान उतारने वह पुलिस ट्राँज़िट हास्टल के इस छोटे परन्तु आरामदेह कमरे में आ गया था । आगे पढ़िये...

कहानी, (13) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 2 सितम्बर 2010
सुरेश कुमार पंडा

ज्ञानपीठ से रिश्ता तोड़ा कृष्‍ण बलदेव वैद ने भी

दिल्ली । सूचना है कि कुलपति-ज्ञानोदय विवाद में शामिल होते हुए हिंदी के वरिष्ठतम पीढ़ी के रचनाकार कृष्ण बलदेव वैद ने भी अन्य लेखकों की तरह भारतीय ज्ञानपीठ से अपनी किताबें वापिस ले ली हैं। आगे पढ़िये...

हलचल, (10) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 2 सितम्बर 2010

शमशेर की डायरी

शमशेर की इन डायरियों में उनके चिंतन और मौलिक सोच के स्फुलिंग इसी तरह जहाँ-तहाँ चमकते हैं। अकेले पड़ जाने की पीड़ा झेलकर भी इस दिशा में उन्होंने लम्बा अनथक संघर्ष किया। इसी संघर्ष से उन्होंने वह ऊर्जा हासिल की जिसके बिना रचना को कोई अर्थ ही नहीं होता-रचना सचमुच ‘रचना’ न होकर सिर्फ़ उसका भ्रम होती है। शमशेर भ्रमों में जीने वाले कवि नहीं है।
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मूल्याँकन, (9) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 2 सितम्बर 2010
मधुरेश

ईरान की नजर में कार्ला ब्रूनी वेश्या !

दरअसल मामला ये है कि कार्ला ने ईरान की एक अदालत के एक  आदेश का विरोध किया था। अदालत ने एक महिला को अश्लीलता फैलाने के आरोप में पत्थर से मार-मार कर जान से मारने का आदेश दिया था। कार्ला ने इसका पत्र लिखकर विरोध किया  था। कार्ला के विरोध को देखते हुए प्रतिक्रिया में ईरान के अखबार 'केहान' ने कार्ला को अपने संपादकीय लेख में 'वेश्या' कह डाला। आगे पढ़िये...

ब्लॉग गाथा, (7) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 2 सितम्बर 2010

दो कविताएँ
कविता, (13) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 2 सितम्बर 2010,
मनोहर चमोली ‘मनु’

सोमारू सच कहता है
छंद, (5) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 2 सितम्बर 2010,
कमलेश्वर साहू

''ज़बरदस्त'' और ''ज़बरदस्ती'' कवि...

दयाराम की कविताये पढ़ कर राजदरबार के लोग नाराज़ होते रहे। एक समय तो ऐसा भी आया कि राजदरबार से आदेश ही जारी कर दिया गया, कि दयाराम को राज्य से बाहर निकाल दिया जाए, क्योंकि वह लोगों को भड़कता है। राज्य ने कविता की परिभाषा तय कर के जारी कर दी-'जो कविता भड़काए, वह कविता नहीं होती। जो कवित्त हँसाये, मन बहलाए, वही सच्ची कविता है। आगे पढ़िये...

आधुनिक वेताल कथा, (12) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 1 सितम्बर 2010
गिरीश पंकज

गुलमोहर

सोई हुई धरती की सेज पर गुलमोहर का चँवर जैसे कोई हिला रहा था । सदानंद पेड़ के नीचे खड़ा हो गया और अपनी धोती को बाँध कर पेड़ पर चढ़ने लगा। परंतु उसे लग रहा था मानो उसका शरीर पंगु हो गया हो। पहले जैसी चंचलता उसके शरीर में नहीं थी फिर भी वह चढ़ने लगा। पीछे से अचानक किसी ने आवाज़ दी, "कौन है ?" रात की ड्यूटी  पर तैनात कांस्टेबल था। गले से पैर तक बरसाती पहने हुए तथा हाथ में लाठी, होठों पर सुलगी हुई बीड़ी थी। सदानंद पेड़ से उतर आया। आगे पढ़िये...

ओडिया-माटी, (24) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 1 सितम्बर 2010
सुरेन्द्र मोहंती

विनोद – ओज़ी स्टाइल

ऑस्ट्रेलिया के लोगों का हास्य और विनोद इतना अज़ीब और अनोखा है जिसका जवाब नहीं । बील लीक को जब पता चला कि उसका दोस्त किसी दुर्घटना में जख़्मी हो गया है और उसका दाहिने पैर का अँगूठा कट गया है तो सामान्यतया वह फूलों का गुलदस्ता व “ज़ल्दी अच्छे हो जाओ” का कार्ड दे सकता था । पर नहीं, उसने चमड़ी की पट्टी पर एक नकली अँगूठा लगाया और वहाँ पर लिख दिया “यहाँ से चिपकाईये” । अन्दाज़ लगाइये दोनो में कितनी गहरी दोस्ती होगी और यहाँ विनोद की कौनसी सीमा होगी जिसे भद्दा मज़ाक़ नहीं माना जाता । आगे पढ़िये...

शेष-विशेष, (57) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 1 सितम्बर 2010
हरिहर झा

सिस्टम

“दादाजी, ग़रीबी, भूखमरी और बेरोज़गारी जैसी समस्याएँ सिस्टम के ग़लत तरीक़ों के कारण बढ़ रही है”, कुलदीप को लग रहा था कि जगनसिंह उसकी बात को समझ रहा है। “कुलिया (कुलदीप को जगनसिंह इसी नाम से पुकारता था) ग़रीबी और भूखमरी तो कर्मों का फल है इसमें “सिस्टम” क्या होता है ?” जगनसिंह को अपने 95 वर्ष के अनुभव पर गुरुर था। आगे पढ़िये...

कहानी, (11) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 1 सितम्बर 2010
संदीप कुमार मील

शीशे की छत : या ग्लास सीलिंग

सन` 2000 की जन गणना के आँकड़ों के अनुसार 11 प्रतिशत परिवार अमरीका में ग़रीबी की हालत में जी रहे हैं । जबकि 28 प्रतिशत एकल मुखिया स्त्री वाले परिवार ग़रीबी की हालत में जीने को बाध्य हैं । बिनब्याही माँ अकसर कच्ची या कम उम्र में माता बनी हैं । पढाई शिक्षा सिर्फ़ स्कूल तक सीमित होते ना उनके पास कोई डिग्री है ना कोइ ऐसा हुनर है जिस के तहत उन्हें अच्छा रोज़गार प्राप्त हो सके इस कारण ऐसी महिलाओं को नौकरी या पेशा भी ऐसा ही मिल पाता है जो उन्हें कम आय ही प्राप्त करवाता है । आगे पढ़िये...

शेष-विशेष, (20) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 1 सितम्बर 2010
लावण्या दीपक शाह

पैनी सामाजिक चेतना के ग़ज़लकार : दुष्यंत

शमशेर जी के बाद दुष्यंत कुमार ही एक ऐसे शायर हुए जिन्होंने उर्दू ग़ज़ल के बँधे-बँधाए ढाँचे को एकदम तोड़ दिया । यूँ हिंदी में ग़ज़ल लिखने की पहल जयशंकर प्रसाद, निराला, देवी प्रसाद पूर्ण, राम नरेश त्रिपाठी आदि कवियों ने की पर वे चूँकि उर्दू की परंपरागत ग़ज़लों और उसके छंद शास्त्र से कतई भिन्न थीं सो तब बहुत लोकप्रियता उन्हें हासिल नहीं हुई । इसका एक कारण उनका रूढ़ और पारंपरिक कंटेन्ट भी रहा होगा। आगे पढ़िये...

आलेख, (20) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 1 सितम्बर 2010
शैलेन्द्र चौहान

जाने क्या तूने कही...

जॉर्ज़ टाउन विश्वविद्यालय में भाषा विज्ञान की प्रोफ़ेसर और विख्यात समाज-भाषा वैज्ञानिक डेबोराह तान्नेन ने अपनी नई किताब यू जस्ट डॉण्ट अण्डर स्टैण्ड : वुमन एण्ड मेन इन कन्वर्सेशन में स्त्री और पुरुष द्वारा भाषा के इसी भिन्न व्यवहार पर गहन किंतु रोचक विमर्श किया है। आगे पढ़िये...

पुस्तकायन, (8) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 1 सितम्बर 2010
डॉ. दुर्गा प्रसाद अग्रवाल

राजेन्द्र मिश्र के नाम अज्ञेय के तीन पत्र

आपने अमर कंटक/जगदलपुर का चारा डाला है उसका लोभ छोड़ नहीं सकता हूँ। पर 17 की शाम तक दिल्ली लौट भी आना चाहता हूँ। क्या आप इसी हिसाब से कार्यक्रम बना ले सकेंगे? समय-सारणियाँ देखकर पता लगा कि एक गाड़ी (उत्कल एक्सप्रेस) पेंडरा रोड से सीधी दिल्ली तक आती है- पर सप्ताह में शायद दो दिन आगे पढ़िये...

शेष-विशेष, (8) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 1 सितम्बर 2010
राजेन्द्र मिश्र

आजाद भारत को और नत्था नहीं चाहिए- आमिर ख़ान

अगर कोई दर्शक टिकट ख़रीदकर फ़िल्म देखने आया है तो उसका मनोरंजन होना चाहिए। एक निर्माता के तौर पर मैं इस बात का पूरा ख़्याल रखता हूँ। फ़िल्म से सिर्फ़ पैसे नहीं कमाए जाते हैं। निर्माता के तौर पर मेरा फ़र्ज है कि दर्शकों को एक बेहतरीन फ़िल्म दी जाए। आगे पढ़िये...

शेष-विशेष, (12) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 1 सितम्बर 2010
नवीन कुमार

दो लघुकथाएँ
लघुकथा, (16) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 1 सितम्बर 2010,
डॉ. राकेश कुमार बब्बर

घर मुझे ऐसा भाए

'घर' तो घरइंसान के तन-मन का विरामस्थली है । मकान में रेत-पत्थर की दीवारें होती है । मगर उन दीवारों के बीच के पोलेपन में  चातुर्यता और संवेदना से भरे इंसान हों, तो वहाँ शून्यावकाश के बदले ठोस 'घर' मिलता है । वहाँ एक-दूसरे के प्रति स्नेह-प्यार की उष्मा रहती है । आगे पढ़िये...

झरोखा, (62) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 1 सितम्बर 2010
पंकज त्रिवेदी

क़लमकार की पीड़ा

मीडिया, सरकार, डॉक्टर्स एवं सुधी समाज-सेवाकों को भी इस ओर ध्यान देना होगा तभी ऐसे साहित्यकारों का कुछ भला हो सकता है और तभी पीड़ित-व्यथित क़लमकार की अपील का कोई माने निकल पायेगा। यहाँ यह भी विचारणीय हो जाता है कि क़लमकार के प्रति समाज का नजरिया कैसा है? समाज का एक बड़ा तबका इलेक्ट्रॉनिक मीडिया विशेषकर चेनलों के वशीभूत होकर साहित्य के पठन-पाठन में अपनी रुचि खो चुका है, उसके लिए रचनाधर्मिता फ़ालतू का काम है। वहीं धनाढ्य  वर्ग रचनाकार को पागल या बहुत फ़ुर्सत में है, समझकर उससे अपना पल्ला झाड़ लेता है। घर-परिवार के लोग उसे किसी काम का नहीं या किताबी-कीड़ा मान बैठते हैं।
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आलेख, (76) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 1 सितम्बर 2010
अवनीश सिंह चौहान

सरकार पर बाहर से पड़ते असर की एक बड़ी मिसाल यूपीए

इस आंदोलन का समर्थन करते हुए राहुल गांधी ने जो कुछ कहा है अगर वैसी ही नीतियां केंद्र सरकार पूरे देश के लिए अपने पूरे अधिकार का इस्तेमाल करते हुए बना सकती है तो उससे कांग्रेस का चाहे जो नफ़ा-नुकसान हो, उससे इस देश के उन तमाम हिस्सों के मूलनिवासियों का बहुत भला होगा जिनके शोषण का एक नतीज़ा आज नक्सल हिंसा के रूप में देश के सामने है। आगे पढ़िये...

स्याह सफ़ेद, (7) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 1 सितम्बर 2010
सुनील कुमार

मानव अधिकारों पर सृजनात्मक लेखन पुरस्कार

दिल्ली । राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग, भारत सरकार द्वारा मानव अधिकारों से संबंधित विविध विषयों पर हिंदी में मौलिक लेखन को बढ़ावा देने, देश के अंतर्गत मानव अधिकारों के प्रति जागरूकता लाने के साथ-साथ राष्ट्रीय एवं भावनात्मक स्तर पर एकता स्थापित करने में पर्याप्त सहायता पहुँचाने के लिए पुस्तकों/पाडुंलिपियाँ आमंत्रित की गयी हैं । आगे पढ़िये...

हलचल, (9) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 1 सितम्बर 2010

विट्ठलभाई पटेल का ‘अमृत-पर्व’ सितम्बर में

भोपाल। कवि-गीतकार श्री विट्ठलभाई पटेल ने विगत 21 मई को अपने जीवन के 75 वें वर्ष में प्रवेश किया है। उनके उपलब्धि भरे बहुआयामी जीवन के पचहत्तरवें वर्ष के दौरान दुष्यन्त कुमार स्मारक पाण्डुलिपि संग्रहालय द्वारा उनके सरोकारों पर केन्द्रित ‘विट्ठलभाई पटेल: अमृत पर्व’ नाम से दो दिवसीय आयोजन किया जा रहा है। आगे पढ़िये...

हलचल, (4) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 1 सितम्बर 2010

हिन्दी का भविष्य – भविष्य की हिन्दी

हिन्दी ही नहीं, भाषा मात्र बहते नीर की तरह होती है । जब जल ही नहीं रहेगा तो नदी तो सूख ही जायेगी ना ! जब उसे हर मोड़ पर और अधिक जल मिलेगा नहीं तो वह कब तक बहेगी । दरअसल हमने हिन्दी के साथ ठीक वही बर्ताव किया जैसा हम गंगा के साथ करते रहे । उसे माँ जैसी पवित्र भी मानते रहे और उस पर मलमूत्र और क्षत-विक्षत शव भी प्रवाहित करते रहे । गंगा की सफाई के नाम पर घोषणायें और परियोजनायें तो बनती रहीं किन्तु स्वार्थगत राजनीति और कामचोरी से सब कुछ जस के तस है । आगे पढ़िये...

अपनी बात, (38) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 1 सितम्बर 2010
जयप्रकाश मानस

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