वर्ष 8 माह 6 दिन 13
 चतुर्थ अंतरराष्ट्रीय परिकल्पना ब्लॉगोत्सव भूटान में     लमही सम्मान इस बार तारिक छतारी को     कैलाश सत्यार्थी को नोबल पुरस्कार     नदी संरक्षण के लिए दिल्ली में होगा मीडिया जुटान     साहित्य मंथन सृजन पुरस्कार     मध्यप्रदेश के राज्यपाल श्री रामनरेश यादव के करकमलों द्वारा संतोष श्रीवास्तव पुरस्कृत     बुद्धिनाथ मिश्र को टाइम्स ऑफ़ इंडिया राजभाषा सम्मान   

     
आधुनिक वेताल कथा अतिक्रमण ये भी एक दृष्टिकोण समय-समय पर ओडिया-माटी बाअदब-बामुलाहिजा धारिणी सिनेमा के शिखर टेक-वर्ल्ड आखर-अनंत
जनमन
प्रफुल्ल कोलख्यान
प्रफुल्ल कोलख्यान
समाधान
जया केतकी
जया केतकी
बाअदब-बामुलाहिजा
फजल इमाम मलिक
फजल इमाम मलिक
धारिणी
विपिन चौधरी
विपिन चौधरी
सिनेमा के शिखर
प्रमोद कुमार पांडे
प्रमोद कुमार पांडे
आखर-अनंत
ओमप्रकाश कश्यप
ओमप्रकाश कश्यप
रोज़-रोज़
दयानंद पांडे
दयानंद पांडे


स्याह सफ़ेदआधुनिक वेताल कथाअतिक्रमणये भी एक दृष्टिकोणसमय-समय परओडिया-माटीझरोखाबाअदब-बामुलाहिजाधारिणीब्लॉग गाथासमांतरपुस्तक-संसारविचारार्थनया नज़रिया
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जब हम जवॉ होंगे
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डॉ. विजय चौरसिया

राजनीति में संस्कृति का संकट
इनका उद्देश्य हिंदू राष्ट्र की स्थापना नहीं है- हिंदू धर्म की ठेकेदारी करना है। डॉ लोहिया कहते थे- धर्म एक दीर्घकालीन राजनीति है और राजनीति एक अल्पकालीन धर्म। यह धर्म अव्याख्येय है और अपरिभाषित भी। अब डॉ लोहिया, जयप्रकाश नारायण का जमाना तो रहा नहीं कि ‘बहस’ से सत्य कमाने का दम-खम दिखाया जाए ... पढ़िए
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कृष्णदत्त पालीवाल

लक्ष्मी पूजा के दिन तस्वीरों, प्रतिमाओं से परे की बात
हम आज इस मौके पर भारत की जीती-जागती लक्ष्मियों के बारे में बात करना चाहते हैं। जो लोग इस दिन पूजा की तैयारी में कई दिन से साज-सज्जा कर रहे होंगे, वे भी अपने घर की अजन्मी लक्ष्मी से लेकर पैदा हो चुकी लक्ष्मी तक, गृहलक्ष्मी से लेकर घर आई बहू तक, और घर में बुजुर्ग बच गई बूढ़ी लक्ष्मी मां तक से कैसा बर्ताव करते हैं, यह सोचने की बात है ... पढ़िए
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सुनील कुमार

प्राण शर्मा की ग़ज़ल
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प्राण शर्मा

अरुण यह मधुमय देश हमारा
महाभारत युद्ध में दुर्योधन की ओर से लड़ी थी,क्योंकि दुर्योधन प्राग्ज्योतिषपुर नरेश भगदत्त का जामाता था।द्वारकाधीश श्रीकृष्ण की पटरानी रुक्मिणी यहाँ के किरात राजा भीष्मक की पुत्री थी। भालुकपुंग असम और अरुणाचल की सीमा पर बसा एक छोटा-सा कस्बा है,जिसे बाणासुर के पौत्र भालुक ने बसाया था ... पढ़िए
0 टिप्पणी, जाग मछिन्दर गोरख आया, (22 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 22 अक्टूबर 2014,
डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र

स्वार्थ की संवेदना
किसी की मौत का समाचार लिखा हुआ था। जिसके कारण आज सायंकाल तीन बजे से आफिस की छुट्टी हो रही थी। उसने यह कभी नहीं सोचा था कि एक खूबसूरत औरत की बच्ची की मौत पर भी आफिस दो घंटे पहले बंद हो जायेगा।तभी तिवारी बाबू जो सोनी जी के पास खड़े नोटिस बोर्ड़ में लगे उस समाचार को पढ़ रहा था! तपाक से बोल उठे - क्या मिसेज नंदा की हार्ट अटैक से मृत्यू हो गई ... पढ़िए
0 टिप्पणी, कहानी, (36 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 21 अक्टूबर 2014,
डॉ. विजय चौरसिया

धन्यवाद-ज्ञापन
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सुशांत सुप्रिय

जयललिताओं के हाथों में खेलते लोकतंत्र की कहानी
एक हाथ लूटता है, और दूसरे हाथ रॉबिन हुड की तरह गरीबों को बांटता है, तो यह कैसा लोकतंत्र है? क्या लूट का कुछ हिस्सा जनता को बांट देना जनतंत्र हो सकता है? दूसरी बात यह कि चुनाव के वक्त जितने बड़े पैमाने पर वोटों की खरीदी होती है, जाति और धर्म के आधार पर, मिलते-जुलते नाम के आधार पर धोखा देने के लिए फर्जी उम्मीदवार खड़े किए जाते हैं, वोटरों को तोहफे बांटे जाते हैं, शराब बांटी जाती है, नगदी बांटी जाती है, और विपक्षी उम्मीदवार के कार्यकर्ताओं को खरीदा जाता है, ... पढ़िए
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सुनील कुमार

जगमग करता दीप
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विशाल शुक्ल ऊँ

जंगलमहल में पुनः माओवादियों के पैरों की आहट
पिछले हफ्ते पश्चिम मिदनापुर (बेलपहाड़ी) तथा पुरुलिया (आड़सा तथा बलरामपुर) से माओवादी पोस्टर तथा बैनर जप्त किये गए थे। उसके पहले उसी के आसपास बेलपहाड़ी से 5 किलोमीटर दूर झारखंड के चेकम के जंगल में माओवादियोें से लड़ते हुए वीरभूम के रहनेवाले एक कोबरा जवान के जंगल में माओवादियों से लड़के हुए वीरभूम के रहनेवाले एक कोबरा जवान ने शहादत प्राप्त की। ... पढ़िए
0 टिप्पणी, प्रसंगवश, (26 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 19 अक्टूबर 2014,
विश्वजीत सेन

इन लोगों को एक बड़ी खुशफहमी यह भी है कि यह लोग समाज में जहर बो कर बहुत बड़ी क्रांति कर रहे हैं
क्या आमने-सामने लड़ रहे भारतीय उपमहाद्वीप के दो देशों के लोगों भारत के कैलाश सत्यार्थी और पाकिस्तान की मलाला को शांति का मिला नोबल सम्मान क्या इन दोनों देश के बीच भी शांति के लिए सेतु बन कर हमारे सामने उपस्थित हो सकता है? प्रार्थना और कामना दोनों है कि काश ऐसा ही हो जाए। दोनों देश आज की तारीख़ शांति के नए प्रतीक और नई मिसाल बन जाएं। इस शांति के नोबल का यह एक बहुत बड़ा संदेश यह भी तो है ... पढ़िए
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दयानंद पांडेय

चतुर्थ अंतरराष्ट्रीय परिकल्पना ब्लॉगोत्सव भूटान में
लखनऊ। दक्षिण एशिया का एक महत्वपूर्ण देश भूटान की राजधानी और सांस्कृतिक राजधानी क्रमश: थिम्पू और पारो में दिनांक 15 से 18 जनवरी 2015 तक चार दिवसीय "चतुर्थ अंतरराष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन सह परिकल्पना सम्मान समारोह" का आयोजन किया जा रहा है ... पढ़िए
0 टिप्पणी, हलचल, (51 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शनिवार, 18 अक्टूबर 2014,
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दीवाली के बहाने, इस मौके पर हमारी वही पुरानी सलाह फिर से
अगली पीढ़ी तक सम्हालकर रख लेते हैं। यही हाल कपड़ों और जूतों का रहता है, नए सामान आते जाते हैं, और पुरानों की बिदाई कभी नहीं हो पाती। संपन्नता जितनी अधिक रहती है, घरों में कबाड़ उसी अनुपात में बढ़ते चलता है। घर पर कोई साइकिल चलाने वाले नहीं रह जाते, लेकिन जंग खाती साइकिल रह जाती है ... पढ़िए
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सुनील कुमार

इस्लाम को लेकर सोच कैसी हो?
मैंने ग्रेजुएशन के दौरान सीखा था कि किसी बदलती स्थिति की आप किसी स्थिर कारण के आधार पर व्याख्या नहीं कर सकते, इसलिए आप यदि यह कह रहे है कि हिंसा, असहिष्णुता इस्लाम के भीतर ही मौजूद है और वह सारे बुरे विचारों का उद्‌गम है तो चूंकि इस्लाम दुनिया में 14 सदियों से मौजूद है तो हमें इन 14 सदियों में ऐसा ही व्यवहार देखने को मिलना चाहिए ... पढ़िए
0 टिप्पणी, आलेख, (41 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2014,
फरीद ज़कारिया

लमही सम्मान इस बार तारिक छतारी को
लखनऊ। हिंदी की सुप्रतिष्ठित पत्रिका लमही की ओर से दिया जाने वाला लमही सम्मान वर्ष 2013 के लिए उर्दू के मशहूर अफ़साना निगार तारिक छतारी को दिया जायेगा ... पढ़िए
0 टिप्पणी, हलचल, (49 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2014,
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युवा और आन्दोलन
भारत में, अन्ना आन्दोलन युवओं की बुलंद आवाज़ की मिसाल है।दामिनी के समर्थन में बिना किसी नेतृत्व में स्वप्रेरणा से दिल्ली के इण्डिया गेट पर रोजाना हज़ारों की संख्या में युवाओं का जुटना प्रतीक है कि युवा शक्ति और उसकी भावुकता कुंद नहीं हुई है। फिर चाहें गरियाने वाले कितना ही आज के युवा को पश्चिमपरस्त करार देते हों। ... पढ़िए
0 टिप्पणी, आलेख, (51 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : शुक्रवार, 17 अक्टूबर 2014,
गुलशन कुमार गुप्ता

लोकतंत्र में गब्बर को बिस्किट की मॉडलिंग की रियायत नहीं
एक बुनियादी जरूरत होनी चाहिए, लेकिन जब कोई मुखिया बनते हैं, तो उनके लिए यह भी जरूरी होता है, कि वे अपने मातहत जुर्म होते हुए देखते न बैठे रहें। जहां कहीं भी ऐसा होता है, और हम सिर्फ कांग्रेस के बारे में यह बात नहीं कह रहे हैं, दूसरी पार्टियों का हाल इससे बेहतर हो ऐसा भी नहीं है। लोकतंत्र में ऐसा बिल्कुल नहीं होना चाहिए ... पढ़िए
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सुनील कुमार

तन और मन की सभ्यता प्रदान करता है साहित्य ...
अपने अस्तित्व के लिए, मानवता के लिए। जिसे कभी मानव ही नहीं समझा गया था। उसे जानवर से बदतर समझा गया था। यह साहित्य स्वानुभूत साहित्य हैं। इसमें न कोई कल्पना है, ना ही कोई मनोरजन। भोगे गये वास्तविकता को अभिव्यक्त करने वाला साहित्य हैं। वह सिर्फ दुजाभाव रखने वाले समाज के सम्मुख स्वं को भी मानव समझने की बात कहता हैं। वह मनुष्य की बीच में मनुष्य द्वार मनुष्य समझा जाना चाहता है ... पढ़िए
0 टिप्पणी, आलेख, (41 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : गुरूवार, 16 अक्टूबर 2014,
डॉ.सुनील जाधव

कैलाश सत्यार्थी को नोबल पुरस्कार
आर्य समाज तो उनका प्रथम प्रेम था जिसके चलते वह स्वामी अग्निवेश संपर्क में आए और बंधुआ मुक्ति मोर्चा में शामिल हो गए। यही उनकी इस क्षेत्र में पहली पाठशाला थी। बंधुआ बाल श्रमिकों को मुक्त कराना उनकी प्राथमिकता बन गई और पैशन भी। एक बार इंजीनियरिंग कॉलेज के प्राचार्य ने उनसे पूछा था कैलाश तुम्हारी योग्यता क्या है तब कैलाश ने कहा था आप देख रहे हैं जो कुछ में कर रहा हूं यही मेरी योग्यता है। तब कैलाश की इस योग्यता पर शायद किसी को विश्वास न रहा हो लेकिन आज यह प्रमाणित हो गया है कि कैलाश की यह योग्यता किसी अकादमिक योग्यता से कहीं बड़ी थी ... पढ़िए
0 टिप्पणी, हलचल, (61 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 15 अक्टूबर 2014,
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जान की सलामत मांगते जान लेनेवाले
जब वे अपने काफिले के साथ दुमका की बैठक से वापस जा रहे थे। इस हत्या के पीछे कोई वजह नहीं थी सिवाय इसके कि माओवादियों को हाथ साधने के लिए एक कनवाय की जरूरत थी। अमरजीत के साथ उनके काफिले के अन्य लोग भी मारे गए। पश्चिम बंगाल से खदेड़े गए माओवादी झारखंड में प्रवेश न कर पाएं इसलिए झारखंड की सीमा को सील कर दी गई। मिडिया में तरह-तरह के कयास लगाए गए। कुछ दिनों तक अमरजीत की हत्या चर्चा में रही ... पढ़िए
0 टिप्पणी, प्रसंगवश, (56 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : बुधवार, 15 अक्टूबर 2014,
विश्वजीत सेन

कुदरती मार से दूर के राज्यों का भी एक राष्ट्रीय जिम्मा है
बाकी देश का हाथ बंटाने के लिए प्रशिक्षित स्वयंसेवकों की एक ऐसी फौज तैयार कर सकते हैं कि जिसके उत्साही लोग देश में कहीं भी जरूरत पडऩे पर अपने घर-बार और कारोबार को छोड़कर वहां जाएं, और कुछ हफ्ते काम करके लौटें। सुरक्षित राज्यों को चाहिए कि वे अपनी आबादी में से नौजवान, मजबूत, उत्साही लोगों को छांटकर उनको ऐसी ट्रेनिंग देने का ऐसा स्थायी इंतजाम करें, ताकि वे लोग किसी भी मुसीबत में जाकर मददगार हो सकें। ऐसे नौजवानों को छांटकर उन्हें किस्तों में सौ-दो सौ दिनों की ऐसी ट्रेनिंग दी जा सकती है ... पढ़िए
0 टिप्पणी, स्याह सफ़ेद, (56 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : मंगलवार, 14 अक्टूबर 2014,
सुनील कुमार

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