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हिंदी प्रेमी कलाम

जब उनके करीबी सहयोगी सृजन पाल सिंह से बात हुई तो पता चला कि हिंदी को लेकरकलाम साहब के मन में गहरा अनुराग था। सृजन पाल जी ने बताया कि कलाम साहब उत्तर भारत के सौकड़ों दौरे पर रहे होंगे और हर दौरे में वो अपनी स्पीच हिंदी में मुझसे बुलवाते थे, ताकि श्रोताओं को उनकी बात समझने में आसानी हो। अपने भाषण की शुरुआती चार पांच पंक्तियां हिंदी में बोलने के लिए वो प्रैक्टिस करते थे
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न हन्यते...जाग्रत सपनों की उड़ान

एक से एक भूतपूर्व-अभूतपूर्व अधिकारी, पूर्व राज्यपाल,पूर्व सचिव आदि अलग-अलग समूहों में बैठे गुरदासपुर में हुई आतंकी घटना पर चर्चा कर रहे थे। हमलोगों ने कॉफ़ी पर थोड़ी देर तक देश-काल की चर्चा करते रहे । इसके बाद खाने जा ही रहे थे कि जिसे अंग्रेजी में ‘प्याले में तूफ़ान’ कहते हैं,टीवी चैनलों पर एकाएक शिलांग में कलाम साहब के आकस्मिक निधन का बुरा समाचार तैरने लगा। वहाँ बैठे सभी लोग हक्का-बक्का रह गये
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मेरी गुड़िया


एक ऐसे देश के भक्त, जो होगा तो वह लोकतंत्र तो नहीं होगा...

एक बड़ा तबका धर्मोन्माद से लेकर उथले-राष्ट्रवाद तक के नारे लगाते हुए चौराहे पर इंसाफ के अंदाज में किसी मुजरिम से अपील का हक भी छीन लेना चाह रहा था। जो लोकतंत्र पहले मीडिया में, और अब सोशल मीडिया में भी, लोगों को विचारों का हक दे रहा है, उसी लोकतंत्र के खिलाफ सोशल मीडिया का जैसा इस्तेमाल किसी भी बेचैन करने वाली नौबत में होता है, उससे वह लोकतांत्रिक-अधिकार प्रतिउत्पादक (काउंटर प्रोडक्टिव) साबित हो रहा है
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एक गाय की आत्मकथा" की यथार्थ गाथा

किस तरह तीन-चार दिन से भूखी प्यासी गायों को रेलिंग से बंधे हुए खांचे में भेजी जाता है, जिसमें उसकी गर्दन फंस जाती है और तुरंत ऊपर आरा मशीन की तेज धार वाली ब्लेड एक ही क्षण में सिर धड़ से अलग कर देती है। एक तरफ कटा हुआ गाय का मुंड, दूसरी तरफ खून से लथपथ धड़, जिसे क्रेन की तरह एक मशीन अपने शिकंजे में पकड़ लेता है और दूसरे कटर मशीन द्वारा उसकी चमड़ी उधेड़ जाती है। शेष में बचा रह जाता है लटकता हुआ मांस का लोथड़ा,जिसे तीव्र गति से चलने वाली आरा मशीन उस लोथड़े का दो-भागों में विभक्त कर देती है
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न पर्याप्त बिजली, न स्पेक्ट्रम- कैसे बनेगा इंडिया डिजिटल

आज भारतीय दूरसंचार क्षेत्र में जिस समस्या को लेकर सर्वाधिक चिंता और चर्चा है, वह है बार-बार मोबाइल कॉल ड्रॉप होने (टूटने) की समस्या। इसकी मूल वजह है- पर्याप्त स्पेक्ट्रम का अभाव। जब हम निर्बाध टेलीफोन कॉल ही सुनिश्चित नहीं कर सकते तो निर्बाध इंटरनेट कनेक्टिविटी और वह भी तेज स्पीड से कैसे मुहैया कराएंगे
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योग दिवस ने खोले उनकी बुद्धि के कपाट

वे इसमें सफल नहीं हो सके। एक दिन उन्हें किसी विषय पर गहन चिंतन करना था, तो वे तीन घंटे तक लगातार शीर्षासन की मुद्रा में ही रहे। इसके बाद वे सीधे खड़े हुए, तो चक्कर आने लगे। इससे उनकी मैडम घबरा गयी। वे भागकर गुप्ता जी को बुला लायीं। उनके सहयोग से शर्मा जी सामान्य स्थिति में आ सके
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पटना उच्च न्यायालय के आदेश पर खुला हिन्दी साहित्य सम्मेलन

पटना। लगभग डेढ साल से बंद, बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन आखिरकार पटना उच्च न्यायालय के आदेश पर गत संध्या एक विशेष कार्यपालक दंडाधिकारी तथा पुलिस बल के साथ कदमकुआँ थाना प्रभारी की उपस्थिति में खोला गया। इस प्रकार एक लम्बे जद्दोजहद के बाद सम्मेलन के अध्यक्ष डॉ अनिल सुलभ पुनः सम्मेलन परिसर में अपना अधिकार पाने में सफ़ल हुए
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दामाद, कोई कांग्रेस का, तो कोई भाजपा का भी...

यह भी याद रखने की जरूरत है कि राजस्थान की भाजपा-मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे जिस तरह ललित मोदी की कंपनी से अपने बेटे की कंपनी के लिए करोड़ों की रियायत पाने के आरोप झेल रही हैं, वह नौबत भी मोदी के लिए बुरी नहीं है, क्योंकि जब मोदी प्रधानमंत्री बन रहे थे, तो वसुंधरा के तीखे तेवर सामने आए थे
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नीरस का रस व्यंग्य

आज-कल लेखकों के बीच यह अक्सर हो रहा है कि छूंछ का ही बार-बार दोहन कर रस की निष्पत्ति की जा रही है। ऐसे नीरस माहौल में मधुर रस की उम्मीद कैसे की जाये, समझ नहीं पड़ता। फिर भी आइये प्रिय रस मर्मज्ञों और रसिक महानुभावों! आज हम साहित्य के नौ प्लस एक रसों के आधुनिक संदर्भ ढूंढे
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प्रेम की आरती के नेह में नत गीतों की एक सरिता

भावनाएं और शब्द सुमन और सुगंध की तरह एकमेव हो जाते हैं। शाम सुरमई हो जाती है। संवेदना और संकोच में डूबा सरिता शर्मा का काव्यपाठ एक नया ही ठाट रचता है , नया ही रंग उपस्थित करता है। उन के गीतों की सुगंध के कई-कई मनोहर रंग मन में उमगने लगते हैं। उन के गीत जैसे प्रेम की आरती के नेह में नत मिलते हैं
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राजनीति में शुचिता के सवाल

राजनीतिक दलों का वैचारिक आधार दरक गया है। वे कंपनियों में बदल रही हैं जहां संसदीय दलों का व्यवहार बोर्ड रूम सरीखा ही है। ऐसे में राजनीतिक क्षेत्र में नैतिक मूल्यों के साथ आ रही नई पीढ़ी भी समझौतों को विवश है, क्योंकि व्यवस्था उसे ऐसा बना देती है। राजनीति अगर समर्पण और समझौतों से प्रारंभ होगी तो वह जनता की मुक्ति में सहायक कैसे बन सकती है। आज के समय में महात्मा गांधी, पं.दीनदयाल उपाध्याय, राममनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव, पुरूषोत्तम दास टंडन की राजनीतिक धारा सूख सी गयी लगती है
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