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एक ‘राष्ट्रवादी’ फैसला

कल्पना कीजिए पर्दे पर राष्ट्रगान के तुरंत बाद हेलन के डांस या सनी लियोनी के रोमांस का सीन आएगा तो उनमें से कौन-सा दिमाग पर देर तक प्रभावी रहेगा. या फिर राष्ट्रगान समाप्त होते ही पर्दे पर सोडे के बहाने शराब का विज्ञापन आया तो राष्ट्रगान का असर कितनी देर टिक पाएगा? कुल मिलाकर हाल का निर्णय राष्ट्रीय भावनाओं को धर्म में ढाल देने जैसा है, जिसमें पुजारी दुनिया के सभी कारोबार आरती, पूजा-अर्चन के बीच तथा आगे-पीछे चतुर सौदागर की तरह निपटाता है
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आदमियत की दुखती रग के निर्दोष राग को ढूँढ़ने का नया तरीक़ा

मुझे पता है, इस रेत से चाक पर कोई उपयोगी वस्तु आकार नहीं ले सकती। मैं ख़ुद भी अपने जीवन में कोई आकार कहाँ ले पाया।’ अब आप ही कहिए, एक चाक, जो एक कुम्हार के हाथों गति पाते हुए, मिट्टी-पानी पाते हुए कितनी ही चमत्कारिक वस्तुएँ देता है, एक लेखक अपनी क़लम से उस चाक से कहीं अधिक चमत्कारिक रचनाएँ देता है
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...महज अतीत के गौरव पर भविष्य निर्माण नहीं हो सकता

स्मृतियों पर गौरव अच्छी बात है, लेकिन स्मृतियों से ऊपर उठकर, आगे जाकर आगे बढऩा भी जरूरी है, उसके बिना ऐसा गौरव पूरी की पूरी पीढिय़ों को झांसे में रख देता है। हमें आज के अपने काम ऐसे रखने चाहिए जिन पर आने वाले कल को गौरव हो सके, लेकिन आज ऐसा करने की फिक्र छोड़कर इतिहास के गौरव पर ही जीने वाली पीढ़ी कभी भी अपनी पूरी संभावनाओं को नहीं पा सकती
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जाकिर जैसे कट्टरपंथियों का इस्लाम हमारा इस्लाम नहीं

गुलामों के साथ शारीरिक संबंध बनाना, बाल विवाह, गैरमजहब के लोगों की निंदा करना, उनसे घृणा करना और असहिष्णुता फैलाना जायज है। ऐसे कामों को वे तब से जायज ठहरा रहे हैं, जब से पीस टीवी शुरू हुआ। तभी से नाइक ऐसी विषैली और कट्टर विचारधारा से भरे उपदेश देते रहे हैं, जो हमारी 21वीं सदी की प्रगतिशील और बहुलतावादी प्रकृति के साथ मेल नहीं खाती, खासकर भारत की धरती पर
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अभिज्ञात अपनी तरह के अलग कवि हैं : केदारनाथ सिंह

कोलकाता। सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन की ओर से आयोजित सात दिवसीय युवा संस्कृति उत्सव व हिन्दी मेला में 'इतिहास और संस्कृति : मुक्तिबोध का साहित्य' विषय पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी में अभिज्ञात के काव्य संग्रह 'बीसवीं सदी की आख़िरी दहाई' का लोकार्पण ज्ञानपीठ से सम्मानित प्रख्यात कवि केदारनाथ सिंह ने किया
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स्वीकृति

उस दिन के बाद उसकी कई बार इच्छा हुई कि वह फोन करके अनू से आग्रह करे कि , " अनू ! आओ न किसी सर्द शाम की हल्की कपकपाहट में शहर से दूर किसी छोटे से रेस्तरां में बैठकर साथ - साथ चाय पीते हैं । तुम्हे छूऊँगा नहीं , सिर्फ देखूँगा , सर्द हवाओं के माध्यम से तुम्हे महसूस करूंगां । सुर्ख लिपस्टिक में लिपटकर बात करते हुए तुम्हारे महीन होठों को या नेल पालिश से सजे हुए तुम्हारे हिलते हुए नर्म - नर्म हाथों को लहरते हुए देखूँगा
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कहानी को बचाने की चुनौती

इस हिचक ने हिंदी साहित्य में थोड़ा सिमोन, थोड़ा वर्जीनिया वुल्फ की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया । यादव जी की लेखिकाएं सिमोन जैसा साहस नहीं दिखा पाईं । लेकिन राजेन्द्र यादव ने लेखक लेखिकाओं की पूरी पीढ़ी तैयार की जो इस तरह का बोल्ड लेखन कर सकें । बोल्ड लेखन की आड़ में राजेन्द्र यादव ने कई लेखकों को कहानीकार बना दिया जिन्हें कलम पकड़ने की तमीज नहीं थी । उनमें से चंद लेखिकाओं के पास भाषा का कौशल था लिहाजा वो देहगाथा को भी संभाल ले गईं
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भूखों का पेट भरना या महज आस्था-प्रदर्शन?

अपने गुरू के सम्मान के लिए कुछ बुनियादी बातों को तय करना चाहिए। पहली बात तो यह कि वे कोई गंदगी छोड़कर न जाएं, दूसरी बात यह कि वे रास्ता जाम न करें, और तीसरी बात यह कि वे इस बारे में भी सोचें कि क्या वे सचमुच गरीबों को खिला रहे हैं, या आम हिन्दुस्तानी अपनी आदत के मुताबिक राह चलते वहां पर कतारों में लग रहे हैं या भीड़ बढ़ा रहे हैं?
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लेखक, प्रकाशक और पैसे का तिलिस्म

जिसके भी पास पच्चीस तीस हजार रुपए होंगे वो अपनी किताब छपवाकर बेचने लग जाएगा । किसी भी प्रकार अगर वो दो चार पाठकों को बेचने में भी सफल हो जाता है तो उन दो चार पाठकों का तो मोहभंग होगा और वो अपने को ठगा हुआ महसूस करेगा । लेखक संगठनों को , लेखकों को , अकादमियों को इस बारे में गंभीरता से विचार करना चाहिए और पारदर्शिता के बारे में जरूरी कदम उठाने चाहिए । सोचना तो भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय को भी चाहिए जो पुस्तकों को छपने के पहले आईएसबीएन नंबर प्रदान करती है
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Garbh Gruh

शफीक आज उसके मुक्त आचरण की वजह से फँसा था। बाकी शफीक की कोई गलती नही थी ? वैसे भी तबस्सुम के कई सारे पुरुष मित्र हैं, अगर वह एक और मिलिटरी ऑफिसर को अपना मित्र बना लेती तो क्या हो जाता ? उसके जैसी छिनाल औरत को क्या फर्क पड़ता ? अगर वह अपने मिलिट्री वाले ब्वायफ्रेंड की बात मान लेती और उसके ऑफिसर के सामने अपने आप को सुपुर्द कर देती तो शायद आज उन्हें यह भयानक दिन नहीं देखना पड़ता
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पतझड़ की पत्तियों से रवानगी सीखने की जरूरत इंसानों को

जहां निजी प्रदर्शन की बात हो, वहां पर लोगों को खेलना तब तक जारी रखना चाहिए जब तक वे अच्छा रिकॉर्ड कायम रख सकें, और जहां उनकी रफ्तार घटने लगे, उनके धीमेपन से टीम पर असर होने लगे, तब उन्हें खुद होकर बाहर हो जाना चाहिए। भारतीय क्रिकेट टीम ने ऐसे भी खिलाडिय़ों को देखा है जो कि किसी रिकॉर्ड पर पहुंचने के लिए खेलते चले जाते हैं, उनका खेल धीमा हो चुका रहता है, वे खुद डरे-सहमे खेलते हैं, लेकिन सन्यास नहीं ले पाते। ऐसे लोगों में कुछ महान खिलाड़ी भी रहे हैं
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पेरिस में झलका झारखंड के गांवों की महिलाओं का हुनर

ठेठ गंवई, दुबली-पतली काया की पुतली गंझू को पढ़ना-लिखना नहीं आता. इन्हें देख कर कोई यकीन भी नहीं कर सकता कि मिट्टी की दीवारों पर उनका हुनर बोलता है और ये हुनर है कोहबर तथा सोहराई
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राज्यों के चुनाव, नोटबंदी पर जनमतसंग्रह होने नहीं जा रहे

सपा और बसपा के अलावा भाजपा और कांग्रेस मैदान में हैं, और हो सकता है कि बात न बने तो सपा की दो टीमें भी मैदान में हो सकती हैं। ऐसे में चुनावी नतीजों के आंकड़े तीन, चार, या पांच कोनों में बंटे हुए हो सकते हैं, और ऐसे में किसी एक पार्टी को बहुमत किसी दूसरी पार्टी को खारिज करने जैसा मानना गलत होगा, या उसी एक पार्टी को जिताना मानना गलत होगा। मतदाताओं का रूझान अगर दो उम्मीदवारों या दो पार्टियों के बीच सीधा बंटा हुआ हो, तब तो नतीजे निकालना आसान होता है
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कहानी से उम्मीदों का साल

रूसी कथाकार चेखव को ऐसी कहानियों का जनक माना जाता है और उनके प्रभाव में यह प्रवृत्ति विश्वव्यापी हो गई । हिंदी भी इससे अछूती नहीं रही । नामवर सिंह के मुताबिक ये कहानी में यथार्थवाद की विजय का पहला उद्घोष था । जिस वक्त चेखव ने यह प्रयोग किया था उस वक्त पाठकों ने इसको काफी पसंद किया था क्योंकि इसमें एक नयापन था । हिंदी में भी यथार्थवादी कहानियां इस वजह से ही स्वीकृत और प्रशंसित हुईं । कहानी की इस तकनीक की सफलता से हिंदी कहानी के ज्यादातर कथाकारों ने इसको अपनाया
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ऐसी धर्मान्धता के बीच पन्द्रह बरसों में हिन्दुस्तान कैसे अव्वल देश बनेगा?

वहां पर विज्ञान की बुनियादी मान्यताओं की इज्जत भी खत्म हो जाती है। विज्ञान एक टापू की तरह विकसित नहीं किया जा सकता, कि गाय को मां मानकर मरी हुई गाय की खाल उतारने वाले इंसानों को भी मार डाला जाए, और डेयरी टेक्नालॉजी की तकनीकों का भी सम्मान हो जाए। आज भारत ऐसे ही आंतरिक विरोधाभासों का शिकार है, और ये विरोधाभास बड़ी कोशिशों और साजिशों के साथ बढ़ाए जा रहे हैं। इससे विचलित वोटरों की उन्मादी भीड़ को तो मतदान केन्द्रों के सामने जुटाया जा सकता है
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मैंने किसी दल की पालकी नहीं उठाई : मधुकर गंगाधर

‘मोहन राकेश, कमलेश्वर और राजेंद्र यादव की त्रिभुज ने एक दौर में हिंदी कहानी को कैद कर लिया था उससे हम मुक्त हुए, लेकिन पुनः नामवर सिंह, केदारनाथ सिंह, दूधनाथ सिंह और कशीनाथ सिंह की चतुर्भुज की कैद में आ गए। यह दुभाग्यपूर्ण है कि हिंदी को बनाने में जिस बिहार का बड़ा योगदान रहा आज वह यूपी वालों की पालकी ढोने लगा है
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अपनी मंजिल, इरादे, और कसमें कुदरत देख तय करें...

समाजवाद के नाम पर एक-दूसरे को साइकिल से धकेलकर गिराते हुए बाप-बेटों से परे, और हिन्दुस्तान को कुचल देने वाली नोटबंदी से परे भी कर ली जाए। दुनिया में नए संकल्पों, नई कसमों, और नए इरादों के साथ आखिर क्या गड़बड़ा जाता है कि वे पूरे नहीं हो पाते? इसके पीछे की एक बड़ी वजह तो यह रहती है कि कसम इतनी बड़ी खा ली जाती है कि वह गले की हड्डी बनकर फंस जाती है, और न निगलते बनती, न उगलते बनती। मंजिल इतनी दूर की तय कर ली जाती है
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नया वर्ष, नई किताबें, नया अंदाज

हिंदी में अनुवाद करने पर ना तो ज्यादा पैसा मिलता है और ना ही अच्छे अनुवादक मिलते हैं । गूगल से अनुवाद करनेवालों की संख्या बढ़ती जा रही है । बावजूद इसके दो हजार सत्रह में कई अच्छी अनूदित किताबें प्रकाशित हो रही हैं । मशहूर अमेरिकी एंकर ओपरा विनफ्रे की बेस्टसेलर किताब ‘व्हाट आई नो फॉर श्योर’ का हिंदी अनुवाद ‘ये जो है जिंदगी’ ( प्रभात प्रकाशन) छपकर आनेवाली है
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ये कुनबा अपनी लठैती अपने बंगलों के भीतर क्यों नहीं निपटा लेता?

ऐसी हरकत क्यों करना चाहिए कि सोशल मीडिया पर लोग लिखने लगें कि आजकल वे क्या पीते हैं? इससे परे भी लोग परिवार के भीतर एक से अधिक शादी और एक से अधिक मां के मुद्दे को लेकर भी लिखने लगते हैं कि परिवार के भीतर की कटुता पार्टी को डुबा रही है। यह सिलसिला न तो मुलायम जैसे बुजुर्ग को सुहाता, और न ही विदेशों में पढ़े-लिखे और बेहतर मुख्यमंत्री समझे जाने वाले नौजवान अखिलेश को सुहाता। फिर जब एक घर के भीतर सत्ता के गोश्त के कतरे-कतरे पर कुनबे के लोग जंगल के जानवर पर भोज करते जानवरों की तरह लडऩे लगता है
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