SrijanGatha

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अन्तरराष्ट्रीय मंच


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यह आहिस्ता ही जैसे तेजेंद्र की कहानियों की शिनाख़्त है कि कहीं कुछ शोर न हो और सब कुछ टूट जाए

कराची की घुटन के बाद अचानक एक और होली की खुली खुशबू! कैसी होगी अगले सप्ताह की होली? क्या उसके भतीजा-भतीजी भी होली खेलते होंगे? अचानक नजमा को लगा कि किसी ने उसके चेहरे पर गुलाल लगा दिया है। उसका चेहरा आज फिर ठीक वैसे ही लाल हो गया, जैसे छब्बीस साल पहले हुआ था। बस आज उसे देखने के लिए दुर्गा मासी जिंदा नहीं थी
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‘पुरस्कार वापसी’ का पुरस्कार!

अब दिल्ली में आयोजन के लिए तर्क ढूंढे जा रहे हैं । एक तर्क तो ये दिया जा रहा है कि विश्व के चालीस देशों के कवियों के रुकने का पटना में इंतजाम कैसे हो सकता है । दूसरा तर्क ये गढ़ा जा रहा है कि दिल्ली में इस आयोजन से नीतीश कुमार की छवि को देशभर में मजबूती मिलेगी और एक संवेदनशील और उनको सहिष्णु विकल्प के रूप में पेश किया जाएगा
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अपने पुराने जुमलों को भूलकर पाक पर ठंडे दिल से सोचा जाए

जो बात हम कह रहे हैं वह उतनी आसान इसलिए नहीं है कि जटिल अंतरराष्ट्रीय संबंधों में अमरीका को यह भी देखना होगा कि पाकिस्तान की मदद से अगर उसने हाथ खींचा, तो पाकिस्तान चीन की गोद में ही पहुंच जाएगा। लेकिन आज भारत के सामने कई किस्म की दुविधाएं हैं। पाकिस्तान के साथ अमरीका और चीन के अलग-अलग रिश्तों को अनदेखा करके भारत अपनी आबादी के युद्धोन्मादी हिस्से को खुश करने के लिए हमले के विकल्प को आसानी से नहीं चुन सकता
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साहित्य सम्मेलन द्वारा आयोजित हिन्दी पखवारा और पुस्तक चौदस मेला का हुआ समापन

पटना। बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में विगत 1 सितम्बर से आरंभ हुआ हिन्दी पखवारा एवं पुस्तक चौदस मेला आज हर्षोल्लास के साथ बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं, शिक्षकों साहित्यकारों और विद्वानों की उपस्थिति में संपन्न हो गया
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डब्लूटीओ मानवता और प्राकृतिक संसाधनों को लूटने और ध्वस्त करने का अमेरिकी षड्यंत्र

समता, समानता और खुशहाली के नाम पर विषमता, अलगाव और हिंसा इसकी जड़ में है जो उपभोगतावाद के कन्धों पर बैठकर पृथ्वी को निगल रहा है और पृथ्वी का श्रेष्ठ जीव मनुष्य अपनी लालच में अपने ही साथी मनुष्य, पृथ्वी के बाकी जीवों, पर्यावरण, जीवन के लिए ज़रूरी प्राकृतिक संसाधनों को और स्वयं पृथ्वी को निगलने के लिए उतारू है. सभ्यता, संस्कृति की दुहाई देने वाला मनुष्य केवल और केवल खरीद फ़रोख्त का सामान बन गया है
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छत्तीसगढ़ में सुप्रीम कोर्ट के सिंगूर-फैसले की बातों को लागू करके देखने की जरूरत

हमारा यह मानना है कि देश के आदिवासी समाज और सामाजिक कार्यकर्ताओं, बहुत से राजनीतिक दलों की यह मांग चली भी आ रही थी कि आदिवासियों को उजाड़कर, खेतों को खत्म करके कारखाने न लगाए जाएं, और वह मांग सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से राहत पाती है। इसलिए सरकार को खुद होकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के शब्दों और उसकी भावना को देखते हुए छत्तीसगढ़ के बस्तर की इस जमीन के बारे में फैसला लेना चाहिए
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संपन्न हुआ प्रगतिशील लेखक संघ का 16 वां राष्ट्रीय अधिवेशन

बिलासपुर। संम्पन्न हुआ तीन दिवसीय प्रगतिशील लेखक संघ का राष्ट्रीय अधिवेशन। जिसमे 18 राज्यों से पधारे 300 से अधिक साहित्यकार, पत्रकार, लेखक-कवि आदि ने अपनी भागीदारी से सम्मेलन को यादगार बना दिया। 9 सितम्बर को उदघाटन सत्र की अध्यक्षता प्रलेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष पुन्नीलन, वरिष्ठ पत्रकार पी. साईनाथ एवं आलोचक डा. खगेन्द्र ठाकुर ने की
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जननायक

सभी कर्मचारियों की चेहरों पर खुशी छा गयी। सभी एक स्वर में बोले - `आपने अच्छे कार्य किये हैं हैं, आपको जननायक की उपाधि अवश्य मिलनी चाहिए।` `कर्मचारी हों तो आप जैसे निष्ठावान हों।` गुनेंद्र प्रसाद ने आनंदित हो कर कहा
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भारत के चीन से पीछे रहने में मच्छर और नेता दोनों का हाथ

मच्छरों का सीधा रिश्ता गंदगी से है, जिसे कि काबू में किया जा सकता है। भारत के सभी हिस्सों को यह भी सोचना चाहिए कि सरकार के जिम्मे ही सफाई का काम भी रहता है, और सरकार के जिम्मे ही गरीबों के इलाज का काम भी रहता है। अगर गंदगी को घटाया जाएगा, तो सरकार का इलाज का खर्च सीधे-सीधे घट जाएगा। लेकिन चूंकि सत्ता पर बैठा ताकतवर तबका और समाज का संपन्न तबका, अपने बंद घरों के भीतर मच्छरों के बिना रहते हुए अपने को बड़ा महफूज समझता है
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मॉ का पार्सल

यॅू तो फोन पर मुझसे बड़ी-बड़ी घी चुपड़ी बातें करेगा कि भाभी आप भी मेरी मॉ जैसी हैं और अब भेद-भाव, छीः कैसी ओछी मानसिकता है गगन की। जाकर देखूॅ तो सही आखिर भेजा क्या है उस लाडले ने अपनी मॉ के लिये
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परदेश और अपने घर-आंगन में हिंदी

भारतीय फिल्मों , कलाकारों, पेशेवर कामगारों, धार्मिक गुरुओं, समाज-सुधारकों, राजनेताओं को चाहने वालों की संख्या करोड़ों में है तथा इन मनीषियों ने हिंदी भाषा के माध्यम से वैश्विक परिदृश्य में भारत को महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की ओर अग्रसर किया है । विश्व में नेपाल, पाकिस्तान, बांग्लादेश, संयुक्त राज्य अमेरिका, यूनाइटेड किंगडम, कनाडा, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका, मॉरीशस, दक्षिण अफ्रीका, यमन, युगांडा, सिंगापुर, न्यूजीलैंड, जर्मनी आदि; लगभग डेढ़ सौ से ज्यादा देशों में हिंदी वृहद् रूप में बोली या समझी या पसंद की जाती है
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हसरतें और जरूरतें मिलाकर ही नई खरीदी का फैसला करें

यह सिलसिला बाजार का पैदा किया हुआ एक ऐसा झांसा रहता है, जिसके असर से लोग अपने पास की चीजों की खुशी तो खो बैठते हैं, लेकिन वे उन चीजों की हसरत में स्थायी रूप से बेचैन रहते हैं, जो उनके पास नहीं है, लेकिन बाजार में है, या कुछ दूसरों के पास है। किसी ब्रांड की चाह, नए से नए मॉडल की चाह, और दूसरों से पहले पाने की चाह लोगों की खुशी पूरी तरह छीन लेती है
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पुरस्कारों का खुला खेल

फेसबुक पर प्रसिद्धि की चाहत लेखकों को आयोजनों आदि की तस्वीर डालने के लिए दबाव बनाती है । आयोजनों की तस्वीरों और बाद में पुरस्कारों की सूची पर नजर डालेंगे तो एक सूत्र दिखाई देता है । उस सूत्र को पकड़ते ही सारा खेल खुल जाता है । और हां ये सूत्र कोई गणित के कठिन सूत्र की तरह नहीं होता है यहां बहुत आसानी से इसको हल किया जा सकता है । किसी पुरस्कार या लेखक का नाम लेकर मैं उनकी साख पर सवाल खड़ा करना नहीं चाहता हूं लेकिन इस बात के पर्याप्त संकेत करना चाहता हूं
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चलते-चलते : बचपन पर विमर्श

होता है। जिस वस्तु को उसे समझना हो, पहले वह उसे अपने व्यक्तित्व के समानांतर धरातल पर ले आता है। इसके अनेक उदाहरण दिए जा सकते हैं। अधिकांश बालक मिठाई खाना पसंद करते हैं. परंतु आवश्यक नहीं कि जिस मिठाई को बड़े चाव से खाते हों, बालक को उतनी ही पसंद हो. बालक का मन। महंगी मिठाइयों को नकार कर वह मामूली मीठी गोलियों से भी बहल सकता है। वे बालक को अपने व्यक्तित्व के अनुकूल लगती हैं। छोटेपन का एहसास तक नहीं होने देतीं
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रोशनी जिनके साथ चलती थी

भारत के स्वतन्त्र होने के बाद विनोबा भावे ने समाज सुधार के आंदोलन की शुरुआत की। इस क्रम में भूदान तथा सर्वोदय आन्दोलन बहुत प्रभावी रहे। उनका मानना था कि भारतीय समाज के पूर्ण परिवर्तन के लिए ‘अहिंसक क्रांति’ छेड़ने की आवश्यकता है। इसके लिये वे आचार्य तुलसी और उनके अणुव्रत आन्दोलन को उपयोगी मानते थे और उन्हें अपना पूरा समर्थन प्रदत्त किया
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क्षमायाचना की जरूरत तो धर्म से परे राजनीति और सरकारों के लिए भी जरूरी

बाद में जब दुनिया संवेदनशील हुई, तो यह माना गया कि यह मूल निवासियों के बच्चों की पूरी पीढिय़ों की चोरी थी, और ऐसी चोरी की पीढ़ी के लिए गोरों ने अपने-आपको चोर मानते हुए देश की संसद में मूल निवासियों से माफी मांगी। यह घटना इसलिए भी अधिक सोचने लायक है कि आज भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों से हिंदू संगठन आदिवासी बच्चों को निकालकर ला रहे हैं, और उन्हें हिंदू बनाने के लिए देश के अलग-अलग प्रदेशों में उन्हें रख रहे हैं
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विश्व मैत्री मंच के अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन में जुटे साहित्यकार

यूनाइटेड अरब अमीरात। खूबसूरत सात राज्य में से एक दुबई में 28 अगस्त 2016 को भारत,टर्की और आबूधाबी से एकजुट हुए पत्रकारों ,साहित्यकारों, संपादकों के सम्मेलन का सफल आयोजन विश्व मैत्री मंच के बैनर तले संपन्न हुआ
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मनोज सुधर गया

मनोज ने उसकी एक न सुनी वह तो अपनी षरारत में इतना खोया हुआ था।कि पंकज को धक्का देते-देते खेल के मैदान के किनारे पर पहुंच गया। वहां पर प्रधानाध्यापक ने स्कूल का कूड़ा-करकट डालने के लिए एक गड्ढा बनवा रखा था।अचानक ही टांग मे टांग अड़ाकर उसने पंकज को उस गडढे में गिरा दिया
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अंबानी अफसोस जाहिर करे और मोदी इससे अपने को अलग करें

आखिर चुनावों के वक्त लंबा-चौड़ा कालाधन कारोबार की दुनिया से ही नेताओं को मिलता है, इसलिए आदर्श की खोखली बातों को हकीकत पर लादने का कोई फायदा तो है नहीं। ऐसे में यह समझने की जरूरत है कि राजनीति और कारोबार के बीच के संबंधों में क्या कोई सीमा रेखा हो सकती है? लोगों को याद होगा कि आज के राष्ट्रपति और कांग्रेस पार्टी के एक सबसे लंबे वक्त के सबसे ताकतवर मंत्री रहे प्रणब मुखर्जी की खूबी यही मानी जाती थी कि वे देश के बड़े उद्योगपतियों से पार्टी के लिए मनचाहा चंदा जुटा सकते थे
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हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आरंभ हुआ ‘पुस्तक चौदस मेला’, उमड़ी भीड़

पटना। साहित्य संस्कृति का वाहक है। यदि साहित्य नहीं होता तो बिहार के लोग सीता, भारती, भामती और अहिल्या पर गर्व नही करते। बुद्ध, अशोक और चाणक्य जैसी महान विभूतियों की बातें भी गर्व से नहीं कर पाते। हमने उन्हें साहित्य के माध्यम से जाना। पुस्तकों के माध्यम से जाना। यदि इतिहास का लेखन नहीं होता, पुस्तकें नहीं आती तो हम उन्हें कैसे जानते
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हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आयोजित हुआ कवयित्री सम्मेलन

पटना। बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन में आयोजित हिन्दी पखवारा का तीसरा दिन महिलाओं के नाम रहा। मंच पर केवल महिलाएं प्रतिष्ठित थीं। आज पुरुषों ने कुछ नही कहा, सिर्फ़ सुना। अवसर था कवयित्री-सम्मेलन का। संध्या 4 बजे से खनकती सुरीली आवाज़ों में गीतो-गज़ल की जो महफ़िल सजी वह देखने-सुनने लायक थी
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