वर्ष 8 माह 10 दिन 24
 साहित्य सरहदों का मोहताज नहीं     हिन्दी चेतना अंतरराष्ट्रीय साहित्य सम्मान     रामधारी सिंह दिवाकर का कहानी पाठ     दो पुस्तकों का विमोचन     श्लाघ्य है डॉ शिववंश पाण्डेय का साहित्यिक अवदान : डॉ अनिल सुलभ     प्रो. तुलसी राम उत्तर भारत के बड़े चिन्तक थे : आलोकधन्वा     विश्व पुस्तक मेले में नवगीत पर चर्चा   

     
आधुनिक वेताल कथा अतिक्रमण ये भी एक दृष्टिकोण समय-समय पर ओडिया-माटी बाअदब-बामुलाहिजा धारिणी सिनेमा के शिखर टेक-वर्ल्ड आखर-अनंत
जनमन
प्रफुल्ल कोलख्यान
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समाधान
जया केतकी
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बाअदब-बामुलाहिजा
फजल इमाम मलिक
फजल इमाम मलिक
धारिणी
विपिन चौधरी
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सिनेमा के शिखर
प्रमोद कुमार पांडे
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आखर-अनंत
ओमप्रकाश कश्यप
ओमप्रकाश कश्यप
रोज़-रोज़
दयानंद पांडे
दयानंद पांडे


स्याह सफ़ेदआधुनिक वेताल कथाअतिक्रमणये भी एक दृष्टिकोणसमय-समय परओडिया-माटीझरोखाबाअदब-बामुलाहिजाधारिणीब्लॉग गाथासमांतरपुस्तक-संसारविचारार्थनया नज़रिया
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हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ होने का मतलब
आप का कोई दुश्मन है और आप उसके साथ दुश्मनी का व्यवहार नहीं करते बल्कि आप सोचते हैं कि आप को अपने दुश्मन के साथ वही व्यवहार करना चाहिए जो नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अपने दुश्मनो के साथ करते थे" और अगर आप उनके साथ वैसा ही करते हैं तो उस समय आप नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के साथ एक अलग प्रकार का लगाव महसूस करेंगे ... पढ़िए
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मौलाना वहीदुद्दीन ख़ान

हररररररर अरररररर र... होरी आई रे रंग-रंगीली
होली का त्यौहार ब्रज की धरा पर उल्लास, अनुराग, हास-परिहास और आनंद लेकर उमड़ता है। यहाँ प्रेम-अनुराग की उमड़ती-घुमड़ती सरिता सारी वर्जनाओं को तोड़ देती है। यहाँ ‘ब्रज का रसिया’ ऐसे व्यक्ति को बोलते हैं जो हर ओर प्रेम व उल्लास का वातावरण उत्पन्न कर दे। श्रीकृष्ण ब्रज के सिरमौर रसिया हैं ... पढ़िए
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रश्मि

मुजरिम की सोच का गंभीर अध्ययन समाज के हित में
आज हिंदुस्तान का एक सबसे बड़ा मुजरिम करार दिया गया दाऊद इब्राहीम टेलीफोन पर हिंदुस्तानी मीडिया को इंटरव्यू देते दिखता है। दूसरे तरह के मुजरिम भी अपनी बात कहते दर्ज होते रहे हैं। देश का सबसे बड़ा मुजरिम नाथूराम गोडसे न सिर्फ अपने लंबे बयान को लेकर किताबों की शक्ल में आ चुका है, बल्कि उस पर फिल्में बन चुकी हैं, और नाटक खेले जाते हैं ... पढ़िए
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सुनील कुमार

साहित्य सरहदों का मोहताज नहीं
भूटान। विश्व मैत्री मंच (संलग्न हेमंत फाउण्डेशन)द्वारा भूटान की राजधानी थिम्फू में अंतरराष्ट्रीय महिला लघुकथा सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें भूटान समेत भारत के विभिन्न राज्यों से आई महिला रचनाकारों ने भाग लिया ... पढ़िए
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मधु सक्सेना

हिन्दी चेतना अंतरराष्ट्रीय साहित्य सम्मान
संयुक्त राज्य अमेरिका। पंकज सुबीर ने जानकारी दी है कि ‘ढींगरा फ़ाउण्डेशन-अमेरिका’ तथा ‘हिन्दी चेतना-कैनेडा’ द्वारा प्रारंभ किये गये सम्मानों के लिए2014 में प्रकाशित हिन्‍दी के उपन्यासों और कहानी संग्रहों पर विचार-विमर्श करके जिन साहित्यकारों को सम्मान हेतु चयनित किया है, वे हैं -‘ढींगरा फ़ाउण्डेशन-हिन्दी चेतना अंतर्राष्ट्रीय साहित्य सम्मान’ : (समग्र साहित्यिक अवदान हेतु) उषा प्रियंवदा (अमेरिका), ‘ढींगरा फ़ाउण्डेशन-हिन्दी चेतना अंतर्राष्ट्रीय कथा सम्मान’ : कहानी संग्रह- ‘पेंटिंग अकेली है’-चित्रा मुद्गल (सामयिक प्रकाशन) भारत, उपन्यास-‘हम न मरब’-डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी (राजकमल प्रकाशन) भारत ... पढ़िए
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फागुन के दिन बौराने लगे
यह ऋतु अन्य ऋतुओं की तुलना में चालीस दिन अधि यानी पूरे सौ दिनों तक हमारी धरती पर राज करती है।यह चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा के बजाय माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को ही सज-सँवरकर आ जाती है। और जब वसंत ऋतु जैसी रूपसी फूलों के रंगों, कोयल की कूकों और आम्र-मंजरी की गंधों से सजकर गाँव के सिवाने पर आ जाए, तो उसकी अगवानी कौन नहीं करना चाहेगा ... पढ़िए
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डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र

छटपटाहट, बेकली और बेचैनी भरे अभिनय और सौंदर्य की नदी सुचित्रा सेन
जैसे सुचित्रा के अभिनय का दर्पण हो यह गाना। वह सचमुच ऐसे ही महकती रहेंगी। मौसम कोई हो इस चमन में, रंग बन के रहेंगी इस फ़िज़ा में वह। उन की चाहत की खुशबू यों ही उन की ज़ुल्फ़ों से उड़ती रहेगी। उन के अभिनय की आग और आह दोनों ही उन के सौंदर्य की आंच और सादगी का जब साथ पाते हैं तो जो किरदार वह जी रही होती हैं ... पढ़िए
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दयानंद पांडेय

मोदी की वजह से राजनीतिक फेरबदल
आज मोदी-अमित शाह से परे इस पार्टी में कुछ नहीं है। और ऐसे ही खालिस एकाधिकार के चलते इस जोड़ी ने ऐसे फैसले लिए कि जिनकी वजह से दिल्ली में यह पार्टी अभी बुलडोजर के नीचे दबे हुए बर्तन की तरह चित्त पड़ी हुई है। लेकिन फिर भी भाजपा के भीतर किसी एक व्यक्ति का इस तरह का कब्जा पहले किसी ने देखा-सुना नहीं था, और यह मोदी ही हैं ... पढ़िए
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सुनील कुमार

वह पागल नहीं लगता
सामान भी बहुत-सा था।बच्चे थे।किसी ने हमारी परवाह नहीं की।हमने बहुत रिक्वेस्ट की परंतु जो लोग दरवाजे पर अट गए थे वो दरवाजा छोड़ने का नाम नहीं ले रहे थे।नैंसी तो एक पैर ट्रेन के पायदान में रख भी चुकी थी परंतु इतने में ट्रेन चल पड़ी। मैंने उसका हाथ पकड़ कर खीचा न होता तो कोई अनहोनी हो जाती ... पढ़िए
0 टिप्पणी, लघुकथा, (32 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 2 मार्च 2015,
सुरेँद्र कुमार पटेल

रामधारी सिंह दिवाकर का कहानी पाठ
दिल्ली। 'बाबूजी प्रसन्न मुद्रा में बोल रहे थे। और मुझे लग रहा था ,अपने ही भीतर के किसी दलदल में मैं आकंठ धंसता जा रहा हूँ। कोई अंश धीरे धीरे कटा जा रहा था अंदर का। लेकिन बाबूजी के मन में गजब का उत्साह था।' सुपरिचित कथाकार-उपन्यासकार रामधारी सिंह दिवाकर ने अपनी चर्चित कहानी 'सरहद के पार' में सामाजिक संबंधों में आ रहे ठहराव को लक्षित करते हुए कथा रचना में यह प्रसंग सुनाया ... पढ़िए
0 टिप्पणी, हलचल, (15 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : सोमवार, 2 मार्च 2015,
भंवरलाल मीणा

अरूण जेटली का बजट दो-तीन छोटी-छोटी बातें
टैक्स पर अमल की हमारी मामूली जानकारी और मामूली समझ के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि सर्विस टैक्स की लंबी लिस्ट में जितने तरह की सेवाएं लिखी गई हैं उन सब तक पहुंच पाना सरकार के बस का वैसे भी नहीं है। इसलिए अधिक अच्छा यह होता कि सर्विस टैक्स को घटाकर लोगों को इसकी चोरी की तरफ से दूर हटाया जाता ... पढ़िए
0 टिप्पणी, स्याह सफ़ेद, (26 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 1 मार्च 2015,
सुनील कुमार

होगी पेपर लेस पढ़ाई
0 टिप्पणी, बचपन > बालगीत, (17 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 1 मार्च 2015,
पी. दयाल श्रीवस्तव

नाटकों में युग-परिवर्तन करने की क्षमता हैं : डॉ. प्रसन्न कुमार बराल
अंगुल जिले के लिए ‘पोस्ट लिटेरीसी प्रोग्राम एंड कंटिन्यूइंग एजुकेशन’ का एक्शन प्लान तैयार करने में मेरी अहम भूमिका रही और मेरे मार्गदर्शन में ‘टोटल लिटरेसी’ पर एक टेली-फिल्म बनाई गई। जिला और राज्य स्तरीय साक्षरता वर्कशॉप,कला-प्रदर्शनी,पुस्तक मेला आदि का आयोजन भी करवाया। एफ़सीआई के मनोरंजन केंद्र की तरफ से (अंगुल) तालचेर में ‘सर्वभाषा नाटक प्रतियोगिता’ का पहली बार आयोजन करवाया गया ... पढ़िए
0 टिप्पणी, कथोपकथन, (58 ) बार देखा गया, प्रविष्ट तिथि : रविवार, 1 मार्च 2015,
डॉ. प्रसन्न कुमार बराल से दिनेश माली

दलित लेखन की चेतना से किन्हें परेशानी है!
साधारण या कम पढ़े-लिखे लोगों की ही बात नहीं है। पढ़े-लिखे लोगों के मन की बात है। वर्ग-स्वार्थ के अलावे भी इसके कारणों की खोज की जानी चाहिए। पहली नजर में तो यह भी लगता है कि उच्च वर्ण से संबंधित वे लोग भी जिन्हें वर्ग-स्वार्थ के कारण स्वाभाविक रूप से दलित-स्वार्थ के निकट होना चाहिए या हैं, वर्गीय आधार को अस्वीकृतकर उभरती हुई दलित संदर्भ की इस प्रतिरोधी चेतना को प्रतिशोधी चेतना मानकर भीतर से बहुत डरे हुए हैं। सवर्ण बुद्धिजीवी दलित साहित्य में कचास आदि की बातें चाहे जितनी ताकत से कहें दलित चेतना की संघटित हो रही राजनीतिक ताकत का पुरजोर एहसास उनको भी है ... पढ़िए
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प्रफुल्ल कोलख्यान

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