SrijanGatha

साहित्य, संस्कृति व भाषा का अन्तरराष्ट्रीय मंच


<< 1 2 >>

ई वी रामास्वामी पेरियार : दि वाल्तेयर ऑफ ईस्ट

मूर्ति पूजा के विरुद्ध विद्रोही तेवर अपनाते हुए कबीर ने कहा कि यदि पत्थर पूजने से ईश्वर प्राप्त होता है तो वे पहाड़ पूजने को तैयार हैं। रैदास ने समानता पर आधारित समाज का सपना देखा था। ऐसे ‘बे-गमपुरा’ की कल्पना की थी, जहां ऊंच-नीच, दुख-क्लेश, कष्ट-शोकों का सर्वथा अभाव है। सभी स्वतंत्र हैं। संत-कवियों को व्यापक प्रसिद्धि मिली। जातीय शोषण के शिकार लोग उनके अनुयायी बनने लगे। रैदास, कबीर, दादू आदि संत-कवियों से प्रेरणा लेकर गुरु नानक ने सिख धर्म की स्थापना की। पूरी दुनिया को समानता का संदेश दिया
पढ़िए ...

सुशोभित सक्तावत के सवालों की आग बहुतों को जला रही है

कोई भी हो । ठीक है यह भी । यह उस की अपनी परंपरा है , व्यवस्था है । लेकिन फ़ेसबुक फिर भी एक हद तक जनतांत्रिक है । तभी तो पूंजीवाद के प्रबल विरोधी भी पूंजीवाद द्वारा संचालित इस फ़ेसबुक पर पूरे दमखम से उपस्थित हैं । खैर , नए अकाऊंट के साथ सुशोभित फिर से उपस्थित हैं । उन का फिर से स्वागत है । इस लिए भी कि सुशोभित के सवालों की सुलगन समाप्त नहीं हुई है। कभी समाप्त नहीं होगी । सवालों और मुद्दों का अंबार है जैसे सुशोभित के पास
पढ़िए ...

साहित्यकार, सिनेमा और संशय

प्रेमचंद, अमृत लाल नागर, उपेन्द्र नाथ अश्क, पांडेय बेचन शर्मा उग्र, गोपाल सिंह नेपाली, सुमित्रानंदन पंत जैसे साहित्यकार भी फिल्मों से जुड़ने को आगे बढ़े थे, लेकिन जल्द ही उनका मोहभंग हुआ और वो वापस साहित्य की दुनिया में लौट आए । प्रेमचंद के सिनेमा से मोहभंग को रामवृक्ष बेनीपुरी ने अपने संस्मरण में लिखा है- ‘1934 की बात है । बंबई में कांग्रेस का अधिवेशन हो रहा था । इन पंक्तियों का लेखक कांग्रेस के अधिवेशन में शामिल होने आया
पढ़िए ...

बीवी बेचने का फतवा देने वाले बददिमाग अफसर...

जिला कलेक्टरों की कुर्सी पर बैठे हुए अफसरों के बीच से ऐसी बददिमागी कुछ अधिक दिखती है। दो दिन पहले ही मध्यप्रदेश के सबसे महत्वपूर्ण कहे जाने वाले जिले इंदौर के कलेक्टर पर बनी एक ऐसी डॉक्यूमेंट्री फिल्म की खबर सामने आई है जिसमें उस अफसर की महानता की स्तुति भरी हुई है, और उसके गुणगान की बातों में उस अफसर और उसके परिवार से बातचीत भी शामिल है। जाहिर है कि उस अफसर की मर्जी और संभवत: उसकी पहल पर ही यह स्तुति तैयार हुई
पढ़िए ...

कोल-कोनन्ड्रम : द एग्जीक्यूटिव फेलियर एंड ज्यूडिशियल एरोगेन्स

आज भी हम अपनी अभिव्यक्ति में पूरी तरह स्वतंत्र नहीं है!हमारे देश में अगर कोई लेखक अपने दम पर अपनी आप-बीती को पाठकों के समक्ष पूरे तथ्य एवं सत्य के साथ उजागर करना चाहता है तो कोई भी प्रतिष्ठित प्रकाशक सामने नहीं आते हैं।वे सरकारी संस्थाओं से खतरा मोल लेना नहीं चाहते है, कहीं ऐसा न हो जाए की सरकारी-तंत्र बेवजह उन पर हावी हो जाए और इस कारण उनके व्यापार को ठेस पहुंचे। क्या किसी बड़े लेखक की यथार्थ अभिव्यक्ति को स्वरुप प्रदान करने में हमारे देश के नागरिक आज भी इतने डरे हुए हैं कि इस विषय पर सरकारी दबाव और न्यायपालिका के अज्ञात डर से चर्चा करने तक से कतराते हैं
पढ़िए ...

अरस्तु का न्याय-दर्शन


टाटा की शुरू की एयर इंडिया फिर टाटा के हाथ जाएगी?

ऐसे में अगर सरकार काबिल कारोबारियों को सार्वजनिक उपक्रम के शेयर बेचती है, और वे ऐसे उपक्रमों को नियंत्रित करते हैं, तो सरकार वहां पर बेईमानी और चोरी-डकैती करने के लायक तो नहीं रहेगी, लेकिन सरकार के पास बचे हुए आधे से कम शेयरों के दाम भी आज के सौ फीसदी शेयरों के मुकाबले कई सौ फीसदी बढ़ जाएंगे, और सरकार फायदे में रहेगी। जब सत्ता का मिजाज ही अपने संस्थानों को लूटने का हो जाता है, तो उसे कारोबार से बाहर हो जाना चाहिए
पढ़िए ...

सेक्यूलर चोले में लीगी पाठ पढ़ते - पढ़ाते लोग

आप का ज़्यादा जोर मुगलों की हिंदू बेगमों पर है। लेकिन इस का ज़िक्र नहीं कि हिंदू बेगम ही क्यों। इस का भी ज़िक्र नहीं कि हिंदुओं को कैसे तो जबरिया कत्लोगारत कर मुसलमान बनाया जाता रहा। जिस के परिणाम में आप भी मुसलमान हुए पड़े हैं । बल्कि प्याज भी खूब खाते जा रहे हैं । नहीं ? अगर नहीं तो बताईए भी भला कि आप के पुरखे अगर हिंदू नहीं थे तो क्या अरब से आए हुए थे, बाबर के साथ कि हुमायू के साथ? इस लिए राख उतनी ही उड़ाईए जितने में चिंगारी न दिखे, न सुलगे
पढ़िए ...

सनसनी पर उतारू मीडिया की सुनामी से घिरे लोग...

टीवी की सनसनी से अछूते नहीं रह पाते, और उनके सामने भी प्रसार संख्या को बढ़ाने का गलाकाट मुकाबला रहता ही है। ऐसे माहौल में जब अच्छे-भले गंभीर और बड़े अखबारों की वेबसाइटों को देखें तो दिखाई पड़ता है कि सबसे सेक्सी, सबसे बुरे स्कैंडल वाली, सबसे अधिक नंगेपन वाली सुर्खियों के लिंक डाल-डालकर ये वेबसाइटें इंटरनेट-ग्राहकों को अपनी ओर खींचती हैं, और जिस तरह टीवी टीआरपी के पीछे भागते हैं, अखबार प्रसार संख्या के पीछे भागते हैं
पढ़िए ...

पाठकीयता के भूगोल का हो विस्तार

ऐसे माहौल में साहित्य में नई वाली हिंदी की बातें जोर पकड़ने लगी है । ऐसी किताबें प्रकाशित की जाने लगी हैं जिसकी मार्केटिंग के लिए इस नई वाली हिंदी का सहारा लिया जा रहा है । इस नई वाली हिंदी में बोलचाल की भाषा को जस का तस रखा गया है । इसका नतीजा यह हुआ है कि कई किताबों में आधे आधे पन्ने अंग्रेजी में लिखे जा रहे हैं और नई वाली हिंदी के नाम पर छप भी रहे हैं। उसपर हिंदी में लहालोट होनेवालों की भी कोई कमी नहीं है
पढ़िए ...

हमारे समय में शेक्सपीयर-एक रिपोर्ट

पटना। जून महान नाटककार शेक्सपीयर की चौथी पुण्यशताब्दी वर्ष के अवसर पर हिंसा के विरुद्ध संस्कृतिकर्मी (रंगकर्मियों-कलाकारों का साझा मंच) एवं बिहार माध्यमिक शिक्षक संघ के संयुक्त आयोजन हमारे समय में शेक्सपीयर विषय पर परिचर्चा का आयोजन आज सम्पन्न हुआ
पढ़िए ...

बुलबुले सी बड़ी हो रही डिजिटल व्यवस्था, बचाव के इंतजाम नहीं

इराक में सामूहिक जनसंहार के रासायनिक हथियार होने की खुफिया जानकारी का दावा करते हुए अमरीकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्ल्यू बुश ने जिस तरह संयुक्त राष्ट्र तक की हेठी करते हुए हमला किया था, और लाखों लोगों को मार डाला था, वह पूरा का पूरा मामला झूठ पर टिका हुआ था, और इराक में रासायनिक हथियार तो दूर कोई रसायन तक नहीं मिले थे। बाद में अमरीकी हमले में साथ देने वाले दूसरे देशों ने भी यह महसूस किया था कि उन्हें झांसा देकर उनको साथ लिया गया था
पढ़िए ...

हमें पूर्वजों के कामों की सजा के लिए दोषी ठहरा दिया गया है: नसीरुद्दीन शाह

इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि कुछ मुस्लिम पाकिस्‍तान की तरफ झुकाव रखते हैं लेकिन उससे कहीं गुना ज्‍यादा संख्‍या ऐसे मुस्लिमों की है जिन्‍हें भारतीय होने पर गर्व है और देशभक्ति पर संदेह किए जाने पर जिन्‍हें काफी बुरा लगता है
पढ़िए ...

किसान आंदोलन एक खतरनाक मोड़ पर पहुंचा, आगे क्या?

फसल से परे का एक मामला इन दिनों खबरों में वैसे भी बना हुआ था, और उस बीच मध्यप्रदेश में किसान आंदोलन पर सरकारी गोलियों से पांच किसानों की मौत भी हो गई है, और हड़बड़ाई सरकार का एक-एक करोड़ रूपए का अभूतपूर्व रिकॉर्ड मुआवजा देने की घोषणा की है। इस घोषणा और ऐसे मुआवजे से बाद में देश भर में आंदोलनों में होने वाली मौतों को लेकर बाकी राज्य सरकारों को क्या-क्या परेशानी झेलनी पड़ेगी, वह एक अलग बहस का मुद्दा है
पढ़िए ...

साहित्य का ‘तू पंत, मैं निराला’ काल

आकाश में अनेक बिजली के डंडे टंगवा दीजिए, जो पूर्णचंद्र से भी अधिक रोशनी दे सके, उसमें ज्वार आप ला नहीं सकते। बड़ी से बड़ी नदियों की धाराएं भी उसके जल की सतह में घट-बढ़ ला नहीं सकतीं। मंदराचल की अनेक मथनियों से उसे मथिए, उसके वीचि-विलास में कोई अंतर नहीं आ सकेगा। वह अपने नियम का अनुसरण करेगा। सारे कृत्रिम उपाय व्यर्थ जाएंगे, व्यर्थ जाएंगे। यही नहीं ऐसे उपाय प्राय: ही उल्टा फल लाएंगे।‘ आज से करीब छह दशक पहले बेनीपुरी जी जो लिख रहे थे वो आज के साहित्यिक परिदृश्य पर सटीक बैठता है
पढ़िए ...

खास लोगों की मनमानीतले कुचलते हुए आम लोग...

जहां सीबीआई ने ट्रांसफर-पोस्टिंग में दलाली-रिश्वतखोरी के एक पूरे रैकेट का भांडाफोड़ किया है, और एक कर्नल सहित उसके दलाल को गिरफ्तार किया है। सेना में कर्नल का पद बड़े सम्मान का माना जाता है, और इस घटना से यह साफ होता है कि सेना भ्रष्टाचार से परे की कोई पवित्र संस्था नहीं है, और वह लोकतंत्र में किसी भी बाकी सरकारी या संवैधानिक संस्था की तरह ही, और उतनी ही बुरी या भ्रष्ट हो सकती है, और इसी वजह से उसे भी लोकतंत्र के प्रति जवाबदेह रहना चाहिए
पढ़िए ...

साहित्य सम्मेलन का 38वां महाधिवेशन 29-30 जुलाई को

पटना। बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन का 38वां महाधिवेशन आगामी 29-30 जुलाई को आयोजित होगा। दो दिवसीय इस अधिवेशन मे देश भर से सैकडों साहित्यकार एवं विद्वान भाग लेंगे। दो दर्जन से अधिक विद्यानों को बिहार के मुर्द्धन्य साहित्यकारों के नाम से नामित अलंकारणों से सम्मानित किया जाएगा। सम्मेलन की पत्रिका ‘सम्मेलन साहित्य’ का नया अंक महाधिवेशन विशेषांक के रूप मे प्रकाशित होगा
पढ़िए ...

पचास साल बाद खुले राज

आशा पारिख ने अपनी इस किताब में माना है कि वो फिल्मकार नासिर हुसैन के प्रेम में थीं और इस बात को भी साफ किया है कि उनका प्रेम परवान क्यों नहीं चढ़ सका। आशा पारिख ने जोर देकर कहा कि उन्होंने जीवन में सिर्फ एक शख्स से प्रेम किया और वो थे नासिर हुसैन। नासिर हुसैन और आशा पारिख का साथ बहुत लंबा चला था। नासिर साहब ने ही आशा पारिख को उन्नीस सौ उनसठ में अपनी फिल्म ‘दिल दे के देखो’ में ब्रेक दिया था। ‘दिल दे के देखो’ से शुरू हुआ सफर एक के बाद एक सात फीचर फिल्मों तक चला
पढ़िए ...

लड़की या महिला की कामयाबी आसानी से गले नहीं उतर पाती

इन सबसे लोगों को सोच-समझकर दूर ले जाया जा रहा है। जिस तरह से गाय के नाम पर पूरे देश में एक बवाल खड़ा किया जा रहा है, उससे यह देश और इसके भीतर के लोग बंटते हुए दिख रहे हैं। आजादी के वक्त भारत और पाकिस्तान के बीच विभाजन धर्म के आधार पर हुआ था। अब भारत में खानपान के आधार पर एक हिंसक विभाजन चल रहा है जिसका लोकतंत्र से सीधा टकराव है, भारत के संविधान से सीधा टकराव है। जो सोच ऐसा टकराव खड़ा कर रही है
पढ़िए ...

<< 1 2 >>

Everyday, New Posts, Like, News, Poet, Story, Gazal, Song, novel, blog, Article, music, lyrics, books, review,conference, training etc. On srijangatha Magazine